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ब्रिटिश संसद में 312 सालों में पहली बार कपड़े उतार कर हुआ नग्न विरोध प्रदर्शन

312 साल पुरानी ब्रिटेन की संसद के इतिहास में सोमवार (अप्रैल 01, 2019) को पहली बार लगभग नग्न होकर प्रदर्शन किया गया। ये कार्यकर्ता ब्रेक्जिट करार की शर्तों में क्लाइमेट चेंज के मुद्दा शामिल नहीं करने पर नाराज थे और इस बात से नाराज पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अन्तःवस्त्रों में प्रदर्शन किया।

एक्सिंटशन रेबेलियन ग्रुप के 11 कार्यकर्ताओं ने संसद (हाउस ऑफ़ कॉमन्स) पब्लिक गैलरी में 20 मिनट तक अर्धनग्न होकर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारी गैलरी में बनी काँच की दीवार से सटकर खड़े थे और इनकी पीठ सांसदों की तरफ थी। इनकी छाती पर ‘सबकी जिंदगी के लिए’ (For All Life) जैसे नारे लिखे थे। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को सार्वजनिक स्थल की गरिमा भंग करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।

1978 में घोड़े की लीद फेंक कर हुआ था प्रदर्शन

जुलाई 1978 में माल्टा के पूर्व प्रधानमंत्री डोम मिन्टॉफ की बेटी याना ने स्कॉटिश होम रूल पर बहस के दौरान गैलरी से सांसदों पर घोड़े की लीद से भरे बैग फेंके थे। ये बैग फट गए थे और गंदगी बेंच व सांसदों पर फैल गई थी। इस तरह से एक बार साल 2004 में प्रदर्शनकारियों द्वारा बैंगनी आटा फेंका गया था। फादर्स फॉर जस्टिस के कार्यकर्ताओं ने तत्कालीन प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर पर पर्पल फ्लोर (बैंगनी आटा) फेंका था। प्रदर्शनकारी तलाकशुदा पिता की बच्चों से मुलाकात के कानून को लचीला बनाने की माँग कर रहे थे।

1707 में बनी थी ब्रिटेन की संसद

ध्यान रहे कि ब्रिटेन की संसद 1707 में बनी थी। दुनिया के कई लोकतंत्रों के लिए यह उदाहरण है, इसलिए इसे मदर ऑफ पार्लियामेंट भी कहा जाता है।

फेसबुक का न्यूज़ टैब: क्वालिटी कंटेंट या न्यूज़ के नाम पर वामपंथी ज़हर को फीड में घुसाने की कोशिश?

फ़ेसबुक के CEO मार्क ज़ुकरबर्ग ने हाल में जर्मनी और यूरोप के सबसे बड़े डिजिटल प्रकाशन हाउस एक्सेल स्प्रिंगर के सीईओ मैथियास डॉप्फ्नर से बात की। यह ज़ुकरबर्ग की उस संवाद श्रृंखला का हिस्सा है जिसमें वह कई सारे बिजनेस और टेक्नोलॉजी कम्पनियों के टॉप लीडर्स से तकनीक और समाज के भविष्य के बारे में वार्तालाप कर रहे हैं।

इसी दौरान ज़ुकरबर्ग ने खुलासा किया कि वे फ़ेसबुक ऐप पर न केवल उच्च-गुणवत्ता वाली ख़बरों के लिए एक अलग टैब बनाना चाहते हैं बल्कि वे इसके लिए उन समाचारों के प्रकाशकों को धनराशि भी देने के लिए तैयार हैं। यह फ़ेसबुक के समाचारों को लेकर पिछले स्टैंड से अलग है। पिछले वर्ष फ़ेसबुक ने यह घोषणा की थी कि वह अपने यूज़र्स की न्यूज़ फीड में ‘समाचार’ कम और उनकी फ्रेंडलिस्ट में जुड़े हुए लोगों की पोस्ट्स ज्यादा दिखाएगा।

इस बात का सामान्य यूज़र्स ने स्वागत किया था क्योंकि पिछले काफी समय से पाश्चात्य बौद्धिक जगत में फ़ेसबुक और ट्विटर न्यूज़ फीड के पूर्ण राजनीतिकरण को लेकर लोग खिन्न चल रहे थे। पर समाचार प्रकाशकों समेत डिजिटल कंटेंट के क्षेत्र में काम करने वाली कम्पनियों ने इसका विरोध किया था- खासकर कि मेनस्ट्रीम मीडिया ने यह निराशा जताई थी कि इससे उनकी कमाई के स्रोत और भी कम हो जाएँगे।

गौरतलब है कि मुख्यधारा के मीडिया की कमाई का सबसे बड़ा पारंपरिक स्रोत विज्ञापन होते थे, जो गूगल और फ़ेसबुक के आने के बाद से बहुत कम हो चुका है- यहाँ तक कि द गार्जियन जैसा पुराना अख़बार भी अब अपने हर लेख के नीचे अपने पाठकों से आर्थिक सहयोग की अपील करता है।

समाचारपत्रों को मिलेगी नई जान?

यूरोप की संसद में पहले ही एक ऐसे कानून पर बहस चल रही है, जिसके अंतर्गत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स- जैसे फेसबुक, यूट्यूब आदि- को किसी कॉपीराइट वाली सामग्री के अपने प्लेटफ़ॉर्म पर इस्तेमाल के बदले लाइसेंस फीस चुकानी होगी। यहाँ तक कि यदि कोई यूज़र फ़ेसबुक पर कोई लिंक शेयर करता है और snippet/preview में कॉपीराइट के अंतर्गत आने वाली सामग्री है तो संभव है कि फ़ेसबुक को उस सामग्री के कॉपीराइट की लाइसेंस फ़ीस देनी पड़े

यदि समाचारपत्र और समाचार पोर्टल इस हद की तंगहाली से गुज़र रहे हैं तो जाहिर है कि उनके हिसाब से फ़ेसबुक का उनकी ख़बरें दिखाने के लिए उन्हें पैसे देना किसी संजीवनी से कम नहीं है।

इसके अलावा जो लोग समसामयिक ख़बरों में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं, उनके लिए भी फेसबुक की यह सेवा लाभदायक होने की उम्मीद है क्योंकि फ़ेसबुक प्रतिष्ठित प्रकाशनों की सामग्री छाँट कर उन तक पहुँचा देगी।

अपने राजनीतिक दबदबे और bias को और मजबूत करने की तैयारी?

सिक्के के दूसरे पहलू की और देखें तो फ़ेसबुक की इस योजना की स्याह संभावनाएँ भी कम नहीं हैं। फ़ेसबुक के सर्वेसर्वा मार्क ज़ुकरबर्ग अमेरिकी संसद से बात करते हुए यह मान चुके हैं कि उनकी संस्था वामपंथी झुकाव वाली है। यह झुकाव न ही केवल उनके लोगों का व्यक्तिगत मतदान झुकाव है, बल्कि यह आग्रह फ़ेसबुक की नीतियों से लेकर किसे बैन करना है, किसे चलने देना है जैसे निर्णयों तक फैला है। कुछ समय पहले यह खबर आई थी कि फेसबुक ने अमेरिका में दक्षिणपंथी झुकाव के मशहूर लोगों की पोस्ट्स पर गुप्त रूप से अड़ंगे लगाने शुरू कर दिए थे। हाल ही में भारत में फ़ेसबुक ने अकारण ही भाजपा समर्थक एक बड़े पेज The Third Eye और कॉन्ग्रेस समर्थक 600+ छोटे-मोटे पेजों को बैन कर दिया था।

ऐसे में यह अति महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या फ़ेसबुक इस टैब में भी वामपंथी और अपने bias पर आधारित ख़बरें ही चलाएगा?

निकल जाओ यहाँ से, चले जाओ पाकिस्तान: पल्लवी जोशी ने नसीरुद्दीन और आमिर से कहा

पल्लवी जोशी आने वाली फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ में मुख्य भूमिका में नजर आएँगी। इसी फिल्म की प्रचार और तैयारी के दौरान उन्होंने उन सभी सितारों को लेकर रिएक्ट किया, जिन्होंने पिछले दिनों देश में ‘असुरक्षा का माहौल’ फैलने पर ‘देश छोड़ने’ की बात की थी। आमिर खान, नसीरुद्दीन शाह और आलिया भट्ट की माँ सोनी राजदान इस तरह के बयान देकर सुर्खियों में आ चुके हैं।

NBT को दिए एक इंटरव्यू में एक्ट्रेस पल्लवी जोशी ने आमिर और नसीरुद्दीन शाह के बारे में पूछे जाने पर कहा, “आप लोग जाइए पाकिस्तान, अगर आप वहाँ खुश हैं तो जरूर जाइए। अगर आप यहाँ अपने आप को असुरक्षित महसूस करते हैं तो जरूर जाइए। निकल जाइए यहाँ से।”

अपने इंटरव्यू में पल्लवी जोशी ने कहा, “मैं जानती हूँ कि देश में असुरक्षित महसूस करने वाली बात नसीरुद्दीन शाह ने कही थी। उन्हें लगता है कि वह भारत में सुरक्षित नहीं है। ऐसे में उन्हें वहाँ जाना चाहिए जहाँ वे सुरक्षित हैं। यह उनके विचार हैं, इसमें हम कुछ नहीं कह सकते।” पल्लवी जोशी की फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ में अभिनेता नसीरुद्दीन शाह भी हैं।

देश में असुरक्षित महसूस करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हानि को लेकर आमिर खान ने भी काफी चर्चा बटोरी थी। अपनी फिल्मों के प्रचार के लिए अनाप-शनाप बयान देने के लिए मशहूर आमिर खान ने कहा था कि देश का माहौल देखकर उन्हें लगने लगा है कि वो भारत से बाहर चले जाएँ। इसके अलावा, कुछ दिन पहले ही आलिया भट्ट की माँ और महेश भट्ट की पत्नी सोनी राजदान ने भी कहा था कि वह पाकिस्तान में ज्यादा खुश रहेंगी।

अपनी फिल्म ‘नो फादर्स इन कश्मीर’ के प्रमोशन के लिए उन्होंने पाकिस्तान जाकर रहने तक की बात बोल डाली थी। सोनी राजदान ने बयान दिया था कि जब भी वह कुछ बोलती हैं तो ट्रॉल का हिस्सा बन जाती हैं। उन्हें देशद्रोही कहा जाता है। इसलिए कभी-कभी वह सोचती हैं कि उन्हें पाकिस्तान ही चले जाना चाहिए, वह वहाँ पर ज्यादा खुश रहेंगी। 

फ्रीडम ऑफ स्पीच की बात करते हुए पल्लवी जोशी ने कहा, “जैसे मुझे अपने पूरे विचार रखने की आजादी है, वैसे उनको भी विचार रखने की आजादी है, जो उन्होंने रखे हैं और इसके बाद जिस तरह से लोगों ने उनके विचारों पर प्रतिक्रिया दी है, उन लोगों को भी अपने विचारों को रखने की आजादी है। फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन तो सबके लिए सब जगह है। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि मैं अपने विचार रखूँ और उसको लेकर लोग अपने विचार मुझे न सुनाएँ।” 

पल्लवी जोशी जल्द ही फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ में नजर आने वाली हैं। फिल्म देशभर के सिनेमाघरों में 12 अप्रैल को रिलीज हो रही है।

35% तक बढ़ेंगे हिंदू-ईसाई, 73% की बढ़ोत्तरी के साथ इस्लामी आबादी 2050 तक होगी हिंदुओं की दोगुनी

आज दुनिया सिकुड़ती और आबादी बढ़ती ही जा रही है, लोग जनसंख्या विस्फोट से त्रस्त हैं, इसके कारण समस्याएँ खड़ी होने लगी हैं। लेकिन कुछ हैं, जो आँखें मूँदे हुए हैं। इस्लामिक जगत पूरे विश्व में अन्य समुदायों की तुलना में 150% ज्यादा प्रजनन कर रहा है। यह हम नहीं, दुनिया के सबसे ‘लिबरल’ देश अमेरिका का fact-tank प्यू रिसर्च सेंटर कह रहा है। अपनी इस रिपोर्ट में उसने चेतावनी दी है कि जहाँ दुनिया के बाकी बड़े मज़हब महज 11% (स्थानीय उपासना पद्धतियाँ) से लेकर 34-35% (ईसाई और हिंदुत्व) तक की दर से बढ़ रहे हैं, और बौद्ध मतावलंबी तो 0.3% से घट रहे हैं, वहीं इस्लाम 73% से ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है- वह भी ज्यादा बच्चे पैदा करके। दुनिया की जरूरतों के लिए वैसे ही कम पड़ रहे संसाधनों के बीच यह खबर अत्यंत निराशाजनक है।

मुस्लिमों की आबादी बाकियों से दोगुनी से ज्यादा रफ्तार से बढ़ रही है

2050 तक 9 अरब हो जाएगी दुनिया की आबादी

प्यू के शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि दुनिया की आबादी आने वाले 30 वर्षों में बढ़ कर 930 करोड़ के करीब होगी। यह 2010 के आँकड़े से 35% अधिक होगा।

रिपोर्ट के आँकड़ों पर नज़र डालें तो कुछ मज़हब (यहूदी, बहाई आदि) दुनिया की औसत आबादी वृद्धि दर की आधी दर से अपनी आबादी बढ़ा रहे हैं। जबकि हिन्दू-ईसाई की आबादी औसत दर से ही बढ़ रही है। इसके उलट या यूँ कहें कि चिंताजनक स्थिति मुस्लिम समुदाय की है, जिनकी आबादी औसत दर की दोगुनी तेजी से बढ़ रही है।

प्रतिशत के अलावा संख्या की बात करें तो भी ईसाई साल 2010 के 216 करोड़ से बढ़कर 2050 में 290 करोड़ हो जाएँगे। वहीं हिन्दू 2010 में 103 करोड़ से 2050 में 138 करोड़ तक पहुँचेंगे। जबकि मुस्लिम 2010 में महज 159 करोड़ की जनसंख्या के मुकाबले 2050 में 276 करोड़ के आस-पास होंगे।

क्या दुनिया इतनी आबादी झेल पाएगी?

आदर्श दर 2.1, औसत दर 2.5, मुस्लिम बढ़ रहे @3.1

प्यू के अनुसार दुनिया की औसत fertility rate 2.5 के करीब है। fertility rate का अर्थ है किसी भी समुदाय या समूह में प्रति महिला कितने बच्चे पैदा होते हैं। दुनिया की आबादी स्थिर रखने के लिए ज्यादातर समाज शास्त्री मानते हैं कि आदर्श स्थिति में fertility rate 2.1 (2 के हल्का सा ऊपर) होना चाहिए- ताकि वे दो बच्चे आने वाले समय में अपने माँ-बाप की मृत्यु के उपरांत उनका स्थान लें और लम्बे समय में दुनिया पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।

पूरे विश्व की औसत fertility rate 2.5 है। जो बढ़ती हुई आबादी को देखते हुए आदर्श दर से तो ज्यादा है, पर चिंताजनक स्तर पर नहीं है। यदि जनजागरण अभियान चला कर लोगों को बढ़ी आबादी के नुकसान के बारे में बताया जाए, और कुछ प्रतिशत युगलों (खासकर महिलाओं) को बच्चे पैदा न करने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाए, तो कुछ दशकों में 2.5 को 2.1 के पास तक खींच सकने की उम्मीद की जा सकती है। हिन्दुओं की fertility rate 2.4 है, यानी हिन्दू आबादी रोकथाम की ओर अग्रसर दिख रही है।

अब इस्लाम की ओर देखें तो मुस्लिमों की fertility rate 3.1 है- यानी दुनिया की जरूरत का 150%!! मतलब हर एक मुस्लिम युगल (पति-पत्नी) अपने बाद दो के बजाय तीन इंसान का बोझ दुनिया को दे जाता है।

(यहाँ गणितीय सरलता के लिए हम मुस्लिमों के बहु-विवाह सिद्धांत, जिसके अंतर्गत हर मुस्लिम पुरुष को इस्लाम 4 बीवियाँ तक रखने की इजाज़त देता है, को शामिल नहीं कर रहे। अगर करते तो गणितीय तौर पर यह आँकड़ा कहता कि एक मुस्लिम पुरुष और उसकी 4 पत्नियों की मृत्यु के बाद औसत तौर पर उनके 12 वंशज होते – यानी मरे 5 और आए 12)

प्रतीकात्मक चित्र

अलका लाम्बा ने AAP विधायक को कहा, थूक कर चाटना आपको शोभा नहीं देता!

आम आदमी पार्टी और उसके कार्यकर्ताओं की ग्रह दशा कुछ ठीक नहीं चल रही है, यही वजह है कि पार्टी प्रमुख अरविन्द केजरीवाल गठबंधन के लिए संघर्षरत नजर आ रहे हैं और पार्टी विधायक अलका लाम्बा केजरीवाल जी की अनदेखी से परेशान रहा करती हैं। इसी वजह से अलका लाम्बा ट्विटर पर हर दूसरे दिन किसी ना किसी नेता पर ‘अरविन्द केजरीवाल मॉडल’ पर भिड़ती हुई नजर आती हैं।

इस बार अटेंशन की कमी से जूझती AAP विधायक अलका लाम्बा ने अपनी पार्टी विधायक से ही बहस करते हुए बड़ी बात कह डाली। AAP के दोनों नेताओं के बीच विवाद मंगलवार (मार्च 03, 2019) को कॉन्ग्रेस की ओर से जारी किए गए घोषणापत्र के बाद हुआ।

दिल्ली में AAP और कॉन्ग्रेस के गठबंधन की अटकलों के बीच अलका लांबा ने ट्वीट किया और अपनी ही पार्टी की दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की माँग पर सवाल उठा दिया। उन्होंने लिखा, “हर पार्टी का अपना घोषणा पत्र होता है, कॉन्ग्रेस के घोषणा पत्र में पॉन्डिचेरी को तो पूर्ण राज्य देने की बात है, पर दिल्ली को लेकर कोई बात नही है, साफ है कि कॉन्ग्रेस के लिए अब ‘दिल्ली-पूर्ण राज्य’ मुद्दा नही रहा। वहीं AAP इसी मुद्दे को अपना प्रमुख मुद्दा बना रही है, गठबंधन कैसे होगा?”

अलका लांबा के इस ट्वीट के बाद AAP विधायक सौरभ भारद्वाज ने ट्वीट कर लिखा, “आप क्या चाहती हैं? पूर्ण राज्य या …..”

विधायक सौरभ भारद्वाज के इस ट्वीट के बाद अल्का ने ट्वीट कर लिखा, “मेरे चाहने ना चाहने से क्या फ़र्क पड़ता है…. वैसे भी यह पूछने का समय अब निकल चुका है… अब तो दिल्ली की जनता ही तय करेगी।”

इस पर सौरभ ने लिखा कि जनता को पता होना चाहिए, उनका नेता क्या चाहता है, तभी तो जनता अपने नेता के बारे में तय करेगी। इसके बाद अलका लाम्बा ने सीधा फ़्रंटफूट पर आकर जवाब दिया, “मेरी जनता मुझे बखूबी जानती है, 2020 आने पर पूरे 5 साल का जवाब-हिसाब और क्या सोचती हूँ, सब बता दूँगी, दूसरी बात मैं आप से उलट सोचती हूँ, जनता से अधिक नेता को पता होना चाहिए कि उसकी जनता क्या सोचती और चाहती है, नेता को वही करना चाहिए, ना कि जनता पर अपनी थोपनी चाहिए”

इस पर सौरभ ने उन्हें ट्रॉल करते हुए पूछा, “जनता से पूछना कि ‘कॉन्ग्रेस में चली जाऊँ?’ अगर जनता ‘हाँ’ कह दे, तो इसको साइन करके भेज देना, बाक़ी ज़िम्मेदारी आपके इस भाई की। अगर जनता ‘ना’ कहे तो अनुशासन से रहो, तब भी ज़िम्मेदारी इसी भाई की। अब सो जाओ, शुभ रात्रि।”

सौरभ के इस ट्वीट के जवाब में अलका ने लिखा, “छोटे भाई, धोखा मत दो बड़ी बहन को, यह आदत अब बदल लो, वचन दिया है, अब कल 3 बजे, जामा मस्जिद गेट नंबर 1 पर पहुँच जाना थूक कर चाटने की आदत तो भाजपाइयों की है, आप को यह शोभा नही देता। कल मुझे छोटे भाई सौरव का इंतज़ार रहेगा। शुभ रात्रि, जय हिंद !!!

इसके बाद अलका लाम्बा ने अरविन्द केजरीवाल का नाम लिए बिना उनकी तानाशाही की ओर इशारा करते हुए एक स्वरचित भावुक और सुंदर कविता को भी ट्विटर पर पोस्ट किया जिसके बोल हैं,
“जिसे हम #लोकतंत्र समझते थे,
आज #प्रश्न करने पर उन्हें वह #अनुशासनहीनता लगने लगी।
तानाशाही के दौर में,
लगता है उसे भी अब कुछ सुनना पसंद नही।
बड़े आये, बड़े चले गए,
ना कुछ लाया था साथ,
ना कुछ साथ ले जायेगा।
घमंड में कोई लंबा जिया नही।
कुर्सी तो आनी जानी है,
लालच इसका हमें नही !”

ट्विटर पर चल रही 2 खलिहर विधायकों की इस चकल्लस पर ट्विटर यूजर्स ने दोनों विधायकों को सलाह देते हुए कहा कि दोनों भाई-बहन कॉल कर के लड़ लो और घर के मामलों को इस तरह से सड़क पर मत लाओ।

‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ से कॉन्ग्रेस को सहानुभूति, कॉन्ग्रेस का हाथ, देशद्रोहियों के साथ: PM मोदी

कॉन्ग्रेस पार्टी के घोषणापत्र को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र ने पार्टी पर निशाना साधा है। बता दें कि कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र में राजद्रोह की धाराएँ हटाने की बात की है। इस पर सवाल खड़े करते हुए प्रधानमंत्री ने कॉन्ग्रेस पार्टी को आड़े हाथों लिया। अरुणाचल प्रदेश स्थित पासीघाट में एक विशाल जनसभा को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र को झूठ का पुलिंदा बताते हुए नारा दिया, ‘कॉन्ग्रेस का हाथ, देशद्रोहियों के साथ’। पीएम ने कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र को ढकोसला पत्र करार देते हुए कहा कि इसमें सिर्फ़ झूठ ही झूठ है। मोदी ने कहा कि पासीघाट पहले जंगल हुआ करता था लेकिन केंद्र सरकार ने कनेक्टिविटी बढ़ाने का कार्य किया है, जिससे यहाँ अब घर-घर में उजाला है।

इस दौरान पीएम ने सवालिया लहजे में कहा:

“कॉन्ग्रेस देश के साथ है या फिर देशद्रोहियों के साथ है? कॉन्ग्रेस ने देश को गाली देने वालों के लिए भी एक योजना बनाई है। भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे लगाने वाले, तिरंगा जलाने वाले और आंबेडकर की मूर्तियाँ तोड़ने वालों से भी कॉन्ग्रेस को सहानुभूति है। जो भारत के संविधान को नहीं मानते ऐसे लोगों के खिलाफ देशद्रोह का जो क़ानून है उसको खत्म करने का वादा कॉन्ग्रेस पार्टी ने किया है।”

बता दें कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट, 1958 (AFSPA) में भी संशोधन करने की बात कही है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ख़ुद इससे छेड़छाड़ करने के विरोधी रहे हैं। ऐसे में क्या इस संवेदनशील एक्ट में संशोधित कर भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को पंगु बना दिया जाएगा? राष्ट्रीय सुरक्षा पर कॉन्ग्रेस का घोषणापत्र असंवदेनशील है, सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाला है, एनएसए जैसे अधिकारियों को नेताओं के बीच खड़ा करने वाला है और मानवाधिकार की आड़ में सुरक्षा बलों को पंगु बनाने वाला है। इस से देश की संवेदनशील सुरक्षा के मुद्दे भी सार्वजनिक हो जाएँगे। कॉन्ग्रेस ने मानवाधिकार के साथ यौन हिंसा का जिक्र कर सुरक्षा बलों को कठघरे में खड़ा करने का कार्य किया है।

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने देशद्रोह को अपराध श्रेणी से खत्म करने वाली बात पर कहा कि जो पार्टी इस तरह की बातें करती है वो देश के एक भी वोट पाने की हकदार नहीं है। कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र पर जेटली ने कहा कि इसमें माओवादियों और जेहादियों की रक्षा करने के लिए सीआरपीसी में बदलाव की बात हुई।

उधर नाराज़ सोनिया गाँधी ने न सिर्फ़ घोषणापत्र तैयार करने वाली समिति के सदस्य राजीव गौड़ा को फटकार लगाई बल्कि पी चिदंबरम से भी बात करके अपनी आपत्ति दर्ज कराई। ख़बर है कि सोनिया गाँधी कॉन्ग्रेस घोषणापत्र के कवर पेज पर अपने बेटे राहुल गाँधी के छोटे चित्र को लेकर नाख़ुश हैं। उन्होंने पार्टी नेताओं से पूछा कि राहुल की फोटो कवर पेज पर बड़ी क्यों नहीं रखी गई?

मलाला से सवाल पूछने वालों को भेजी जा रही प्राइवेट पार्ट्स की तस्वीरें, ये है Pak समर्थकों का असल चेहरा

विगत दिनों होली के दौरान पाकिस्तान में दो हिंदू लड़कियों के अपहरण और फिर उनकी जबरन अधेड़ मुस्लिम से शादी करवाने की खबर पर सोशल मीडिया पर खूब विरोध देखने को मिला था।

ट्विटर पर एक बड़े वर्ग ने पाकिस्तान से इस मामले पर कार्रवाई कर वहाँ पर रहने वाले हिन्दू अल्पसंख्यकों को न्याय दिलाने के लिए आवाज उठाई थी। यूँ तो पाकिस्तान जैसे देश से धार्मिक सहिष्णुता और सद्भाव की उम्मीद करना एक दिवास्वप्न देखने जैसा है, लेकिन बात जब महिला उत्पीड़न की आती है तो ऐसे में उन लोगों का समर्थन विशेष मायने रखता है, जिन्होंने अपने हौंसले से समाज में एक अलग पहचान बनाई है। स्वाभाविक सी बात थी कि इतने संवेदनशील विषय पर आम लोग ऐसे चेहरे से भी समर्थन और मदद की उम्मीद करते हैं।

ऐसे में नोबेल प्राइज विजेता मलाला यूसफ़जई को जब लोगों ने इस विषय पर आवाज उठाने की बात कही तो उन्होंने ख़ामोशी धारण कर ली और सवाल पूछने वालों को जवाब देने के बजाए ब्लॉक कर दिया।

असल कहानी इसके बाद शुरू हुई, जब मलाला से सवाल पूछने वाले लोगों के ट्विटर और फेसबुक इनबॉक्स में उन्हें अश्लील तस्वीरें भेजी जाने लगीं। मलाला से महिलाओं के अधिकार पर आवाज उठाने की माँग करने वाली लड़कियों के ट्विटर एकाउंट्स में अपने जननांगों की तस्वीरें भेजने वाले ये लोग पाकिस्तान और कश्मीर के युवा थे। भारतीय मीडिया गिरोह इन्हें भटके हुए युवाओं के नाम से जानता है, जो या तो किसी हेडमास्टर के बेटे निकल जाते हैं या फिर भारतीय सेना द्वारा सताए गए मजबूर युवा।

मलाला से सवाल पूछने पर कुछ भटके हुए युवाओं ने रोजगार की कमी के चलते ट्विटर यूजर के इनबॉक्स में रोजाना अश्लील तस्वीरें भेज रहे हैं

पुलवामा आतंकी हमले के दौरान भारतीय मीडिया गिरोह की प्रमुख अभियुक्त बरखा दत्त को भी कुछ लोगों ने परेशान करने और प्रताड़ित करने के उद्देश्य से अपने जननांग की तस्वीरें भेज डाले थे। बरखा दत्त ने इसके बाद कुछ लोगों के मोबाइल नम्बर सार्वजानिक कर दिए थे। हालाँकि, कुछ दिन बाद ही पुलिस उन्हें पकड़ने में कामयाब रही और कसाई शब्बीर गुरफान के साथ 3 लोग गिरफ़्तार कर लिए गए थे।

लेकिन ट्विटर पर मलाला से हिन्दू लड़कियों को इंसाफ दिलाने की बात करने वाली लड़की को मलाला ने ब्लॉक कर दिया और इसके बाद पाकिस्तान और शायद सम्प्रदाय विशेष के लोगों ने, एक साथ लड़की के इनबॉक्स में अपने जननांगों की फोटो भेजनी शुरू कर दी। फेसबुक और ट्विटर का हिन्दू और दक्षिणपंथियों के प्रति पूर्वग्रह और पक्षपात भी अब जगजाहिर है। इस युवती ने जब अपनी बात फेसबुक पर रखी तो उसके अकाउंट को सस्पेंड कर दिया गया और कम्युनिटी स्टैंडर्ड्स का हवाला दिया गया।

ये अश्लील तस्वीरें भेजने वाले लोगों में अधिकांश लोग पाकिस्तान के थे लेकिन हैरानी की बात ये है कि इनके साथ जम्मू कश्मीर के भी निवासी, जिनके नाम इसलिए नहीं लिए जाने चाहिए ताकि उनका मजहब का भेद न खुल जाए, इस ट्विटर यूज़र को अश्लील तस्वीरें भेजते जा रहे थे। वास्तव में किसी के नाम में उसका मजहब ढूँढ निकालना तार्किक है भी नहीं, लेकिन दिलचस्प बात ये है कि पुलवामा आतंकी हमले में बलिदानी सैनिकों पर हँसने वाले और महिला अधिकारों की बात करने पर लड़की को प्रताड़ित करने वाले लोगों के नाम एक जैसे ही नजर आते हैं, उनकी भौगोलिक सीमाएँ उनमें भेद करने में अक्षम हैं।

मामला सिर्फ अश्लील तस्वीरें भेजकर उसकी आवाज चुप करवाने तक सीमित नहीं है, जब इस लड़की ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट से इस बारे में राय रखी और फेसबुक पर मिलने वाली अश्लील तस्वीरें और भद्दे सन्देश शेयर किए तो लड़की के साथ वालों ने इसे घृणा और उपहास की नजर से भी देखना शुरू कर दिया। इनमें अधिकतर उसके साथ के वो युवा और ऑफिस के लोग हैं जिन्हें उसकी मदद करनी चाहिए।

इस लड़की ने अपने फेसबुक अकाउंट के जरिए अपनी बात रखने की कोशिश की है, जिसमें उसने कहा है कि वो अपनी बात करेगी और उन्हें जरूर जवाब देगी। ये हौसला सराहनीय है, इसका उपहास नहीं होना चाहिए, इस हौंसले को आवाज मिलनी चाहिए ताकि अश्लील तस्वीरें भेजने वालों को ये एहसास हो कि वो सिर्फ अपनी मानसिक विकृति का उदाहरण दे पा रहे हैं और इन तस्वीरों से ज्यादा उनके पास अभिव्यक्ति के लिए कुछ है भी नहीं, ये जननांग ही उनकी पहचान और उनका वास्तविक चेहरा है।    

हिन्दू महिलाओं के अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन की ये बात सार्वजानिक तब हुई थी, जब लड़कियों के पिता का एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया जाने लगा। इस वीडियो में वो बेबस होकर दहाड़े मारकर रो रहे हैं और पुलिस के सामने अपनी शिकायत दर्ज कराने और दोषियों पर कार्रवाई करने की अपील करते हुए देखे गए, उनका कहना था कि उनकी दोनों बेटियों का अपहरण कर लिया गया और उनका धर्मांतरण कर निकाह करा दिया गया।

इसके बाद, केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने जब लड़कियों के अपहरण पर विवरण मँगाया और पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त से घटना पर रिपोर्ट भेजने को कहा है तो पाकिस्तान के अधिकारीयों ने ट्विटर पर भारत को इस विषय पर उल्टा ज्ञान देते हुए देखा गया था कि भारत को उन्हें समझाने की जरुरत नहीं है।

पाकिस्तान जैसे देश मियाँ मिठ्ठू जैसे ठेके पर धर्म परिवर्तन कराने वाले लोगों को राजकीय सुरक्षा और सुविधाएँ देता है, उससे हिन्दुओं के अधिकारों पर चर्चा तो छोड़िए लेकिन महिलाओं के अधिकारों तक पर सवाल पूछना अतार्किक हो चुका है। फिर भी, हम कम से कम भारत में बैठे मीडिया से और नारीवादियों से ये उम्मीद तो कर ही सकते हैं कि इस विषय पर बात की जाए, ताकि महिलाओं के अधिकारों पर मुखर किसी लड़की को अपना एकाउंट डिएक्टिवेट कर के चुप ना बैठाया जा सके, ताकि महिलाओं के अधिकारों पर बात करने वालों को अपने कार्यस्थल और ऑफिस में लोगों की नजरों में शर्मिंदगी से न देखा जाए, बल्कि उसकी सराहना हो और अभिव्यक्ति की आजादी का नारा हमेशा बुलंद रहे।

प्रोपेगेंडा पर विवेक ओबेरॉय ने राजदीप सरदेसाई को याद कराया छठी का दूध

एक हैं भारतीय पत्रकारिता के माइकल एंजेलो प्रोपेगेंडा पत्रकार। उनका नाम है सरदेसाई, राजदीप सरदेसाई। पता नहीं कैसे लेकिन वो अक्सर ही कॉन्ग्रेस और मोदी विरोधी धड़े का पक्ष लेने के बाद भी निष्पक्ष बने रहते हैं। राजदीप लगातार अपनी निष्पक्षता का परिचय प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अपनी अंतर्निहित घृणा और पूर्वग्रह को व्यक्त करते हुए देते रहते हैं।

मंगलवार की रात अपने शो पर, राजदीप सरदेसाई ने अभिनेता विवेक ओबेरॉय को नरेंद्र मोदी से प्रेरित फिल्म पर चर्चा करने के लिए आमंत्रित किया था। इसमें ओबेरॉय ने प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका निभाई है। राजदीप सरदेसाई ने हमेशा की तरह पीएम मोदी से जुड़ी किसी भी बात को खारिज करने की जल्दबाजी में, सीधे तौर पर इसे एक ‘प्रोपेगेंडा फिल्म’ कह दिया, जबकि अभी तक राजदीप ने फिल्म देखी भी नहीं है बस फिल्म मोदी पर है तो हो गया प्रोपेगेंडा।

आप लोगों को याद दिला दें कि सरदेसाई ने एक बार खुद स्वीकार किया था कि उनके जैसे पत्रकार गिद्धों की तरह हैं। कल के शो पर उन्होंने यह बात साबित भी कर दी। उन्होंने फिल्म निर्माताओं के खिलाफ विपक्षी दलों के कंधों के सहारे अपना गुस्सा निकालने का प्रयास किया। राजदीप सरदेसाई ने 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले फिल्म की रिलीज के समय पर विवेक ओबेरॉय से सवाल किया, क्योंकि राजदीप ने दावा किया है कि फिल्म को चुनावों को प्रभावित करने के लिए रिलीज किया जा रहा है।

राजदीप को एक ओपिनियन मेकर के रूप में बताते हुए, विवेक ओबेरॉय ने उनके द्वारा लगाए गए आरोपों का न केवल कायदे से जवाब दिया, बल्कि उनकी राजनीतिक ‘पक्षकारिता’ और राय के बारे में उन्हें आईना भी दिखाया। फिल्म की रिलीज पर विवाद का जवाब देते हुए, विवेक ओबेरॉय ने राजदीप से पूछा कि क्या उनके शो पर दर्शकों को प्रभावित करने के लिए भी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, जैसे उन्होंने फिल्म पर आरोप लगाए।

राजदीप सरदेसाई के तर्क पर सवाल उठाते हुए, विवेक ओबेरॉय ने पूछा कि क्या वह अपनी राय के माध्यम से चुनावों को प्रभावित नहीं कर रहे हैं और यदि उनकी फिल्म को एक ‘प्रोपेगेंडा फिल्म’ आप कह सकते हैं तो उसी तर्क को लागू करते हुए, क्या राजदीप के शो को अपनी राय से दर्शकों को प्रभावित करने के लिए प्रतिबंधित किया जा सकता है?

राजदीप ने विवेक ओबेरॉय से पूछा कि जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं, उनकी फिल्म को विपक्षी नेताओं द्वारा पूर्वग्रह से ग्रसित और पीएम मोदी को महान प्रोजेक्ट करने की कोशिश की जा रही है। विवेक ने जवाब दिया कि न तो चुनाव आयोग और न ही भारत के संविधान को फिल्म बनाने और रिलीज़ करने में कोई समस्या है।

जब राजदीप अपने मक़सद में सफल होते नहीं दिखे और उनकी हताशा बढ़ने लगी, तब उन्होंने विवेक से पूछा कि क्या वह दिल पर हाथ रखकर कह सकते हैं कि फिल्म की फंडिंग राजनीतिक पार्टी द्वारा नहीं की गई? विवेक ने जवाब दिया कि उन्हें किसी भी राजनीतिक दल द्वारा वित्त पोषित नहीं किया जा रहा है। विवेक ने जवाब दिया कि एक फिल्म की फंडिंग को सत्यापित करने के लिए एक प्रणाली है और उनकी फिल्म को किसी भी राजनीतिक पार्टी द्वारा वित्त पोषित नहीं किया गया है। उन्होंने आगे कहा कि पीएम मोदी को एक नायक के रूप में दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि देश के लोग पहले से ही स्वीकार करते हैं कि पीएम मोदी वास्तव में एक ‘हीरो’ हैं।

पीएम मोदी पर एक बायोपिक बनाने के अपने फैसले को सही ठहराते हुए विवेक ने कहा, “पीएम मोदी की कहानी और दृष्टिकोण भारत में एक अरब लोगों को प्रेरित करती है, जो गर्व से भक्त कहलाने को भी तैयार हैं। मैंने महसूस किया कि एक गरीब व्यक्ति की विनम्र शुरुआत से लेकर एक अरब लोगों के प्रेरक नेता बनने तक की कहानी को दिखाया जाना चाहिए।”

वामपंथी झुकाव वाले लुटियंस मीडिया के प्रमुख चेहरों में से एक राजदीप सरदेसाई ने खुले तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति अपमान की हदें लाँघते हुए टिप्पणी की है जबकि उस समय वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे। अभी कुछ दिन पहले ही, राजदीप सरदेसाई ने प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए बयानों को सांप्रदायिक एंगल देने के लिए बेशर्मी से ट्विस्ट भी किया था।

कॉन्ग्रेस घोषणापत्र: नाराज़ सोनिया गाँधी ने पार्टी नेताओं को लगाई कड़ी फटकार

मंगलवार (अप्रैल 2, 2019) को कॉन्ग्रेस पार्टी का घोषणापत्र जारी किया गया। इस घोषणापत्र को पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा तैयार किया गया है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने दावा किया कि घोषणापत्र तैयार करने से पहले समाज के विभिन्न वर्गों से बातचीत की गई व देश के अलग-अलग हिस्से के लोगों से राय ली गई। हालाँकि, कॉन्ग्रेस घोषणापत्र में भारतीय सुरक्षा बलों पर लगाए गए गंभीर आरोपों के कारण पार्टी को अच्छी-ख़ासी आलोचना का सामना करना पड़ा। अपने घोषणापत्र के माध्यम से कॉन्ग्रेस ने भारतीय सेना पर घाटी में यौन हिंसा जैसे जघन्य अपराधों का आरोप लगाकर, अलगाववादियों के सुर-में-सुर मिलाने की घोषणा कर दी है।

उधर यूपीए अध्यक्षा सोनिया गाँधी अपनी पार्टी के घोषणापत्र के एक बात से ख़ासी नाराज़ बताई जा रही हैं। अमर उजाला में प्रकाशित ख़बर के अनुसार, नाराज़ सोनिया ने न सिर्फ़ घोषणापत्र तैयार करने वाली समिति के सदस्य राजीव गौड़ा को फटकार लगाई बल्कि पी चिदंबरम से भी बात करके अपनी आपत्ति दर्ज कराई। ख़बर में कहा गया है कि सोनिया गाँधी कॉन्ग्रेस घोषणापत्र के कवर पेज पर अपने बेटे राहुल गाँधी के छोटे चित्र को लेकर नाख़ुश हैं। उन्होंने पार्टी नेताओं से पूछा कि राहुल की फोटो कवर पेज पर बड़ी क्यों नहीं रखी गई?

सोनिया गाँधी ने राजीव गौड़ा को जमकर डाँट पिलाई। आजतक के अनुसार, पार्टी सूत्रों की मानें तो सोनिया की आपत्ति का कारण निम्नलिखित तीन चीजों को बताया जा रहा है:

  • कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र का कवर पेज आकर्षक नहीं है।
  • राहुल गाँधी की तस्वीर छोटी रखी गई है।
  • कवर पेज पर महात्मा गाँधी की कोई फोटो नहीं है।
कॉन्ग्रेस के ताज़ा घोषणापत्र का कवर पेज

बता दें कि कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र में कई कोरी बातें कही गई हैं, जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है। इसके अलावा सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी पार्टी द्वारा अनाप-शनाप बका गया है। शायद इसीलिए इस बार आलोचकों को पहले ही चुप कराने के लिए राहुल गाँधी ने कह दिया कि उनके घोषणापत्र में झूठ के लिए कोई जगह नहीं है। असुरक्षा की भावना से घिरे राहुल गाँधी ने पहले ही इसका जिक्र कर दिया, क्योंकि उन्हें पता था कि उनके झूठ को पकड़ लिया जाएगा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर रोज बड़ी संख्या में झूठ बोलने का आरोप लगाया।

कॉन्ग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में सेना को बदनाम करने, जवानों पर आरोप लगाने के लिए अलगाववादी सुर अपना लिया, लेकिन कश्मीरी पंडितों के निष्काषन और उन पर अत्याचार के रूप में हुए एक ऐतिहासिक बर्बरता को ठीक करने के बारे में बात नहीं की है। कॉन्ग्रेस को याद होगा कि किस तरह घाटी के मुस्लिम चरमपंथियों ने हिंदुओं का नरसंहार किया था, यह घोषणा पत्र अपने आप में कॉन्ग्रेस के कश्मीर के प्रति छिपे मंसूबों का खतरनाक दस्तावेज है।

‘दुश्मन’ J&K पुलिस निहत्थे लोगों का करती है क़त्ल, हिटलर हैं PM मोदी: ग़ुलाम नबी आज़ाद

जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद ने राज्य की पुलिस पर निशाना साधते हुए उस पर एक से बढ़कर एक आरोप लगाए हैं। कॉन्ग्रेस नेता ने न सिर्फ़ जम्मू कश्मीर पुलिस को दुश्मन बताया बल्कि कहा कि वो निहत्थे लोगों का क़त्ल करती है और ज़्यादतियाँ करती है। ग़ुलाम नबी आज़ाद ने कहा:

“जम्मू कश्मीर पुलिस भी कम दुश्मन नहीं है। उन्होंने कोई कम ज़्यादतियाँ नहीं की हैं। मैं उन पुलिसवालों को तो सलाम करता हूँ जिन्होंने अपनी जानें दी, लेकिन उसमें भी कुछ नासूर ऐसे थे जो अपने प्रमोशन और पैसे के लिए निहत्थे लोगों का क़त्ल करते थे। क्या वजह है कि 2014 तक हालात ठीक हो गए थे? क्या वजह है कि 2014 से लेकर आज तक हालात 1990-91 वाले हो गए हैं। उसके लिए अगर कोई ज़िम्मेदार है तो वो है देश का पीएम नरेंद्र मोदी।”

ग़ुलाम नबी आजाद का ये बयान काफ़ी चौंकाने वाला है क्योंकि वो राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। आज़ाद यूपीए और कॉन्ग्रेस सरकारों के दौरान कई अहम मंत्रालय भी संभाल चुके हैं। ऐसे में, एक राष्ट्रीय नेता की तरफ से जम्मू कश्मीर पुलिस की आलोचना और उन पर गंभीर आरोप लगाना अप्रत्याशित है। इस से पहले इस तरह की भाषा कश्मीर के अलगाववादी और आतंकी प्रयोग करते रहे हैं। ग़ुलाम नबी आज़ाद यहीं नहीं रुके, उन्होंने पीएम मोदी की तुलना हिटलर से कर डाली।

कुपवाड़ा में चुनावी जनसभा को सम्बोधित करते हुए ग़ुलाम नबी आज़ाद ने कश्मीर समस्या के लिए पीएम मोदी को जिम्मेदार ठहराते हुए जम्मू कश्मीर पुलिस के लिए पाकिस्तान से मिलता-जुलता बयान दिया। इस से पहले जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख़्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राज्य के लिए अलग प्रधानमंत्री की व्यवस्था वाली बात कही थी। राज्य की एक अन्य पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती भी कुछ इसी तरह के बयान दे चुकी हैं। उन्होंने कहा था कि अगर आर्टिकल 35A से कोई छेड़छाड़ की गई तो कश्मीर के लोग तिरंगा छोड़कर न जाने कौन सा झंडा उठा लेंगे।