उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ऐलान किया है कि वह लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार का आरंभ ‘शाकम्भरी पीठ’ से करेंगे। मुख्यमंत्री योगी ने बसपा अध्यक्ष मायावती और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के देवबंद से लोकसभा चुनाव प्रचार करने की शुरुआत करने पर तंज कसा। उन्होंने कहा कि दोनों पार्टियों (सपा-बसपा) का चुनाव प्रचार ‘देवबंद’ से शुरू होना दर्शाता है कि उनकी नीति और प्राथमिकताएँ क्या हैं।
With Cong declaring Muslim candidates on 5 seats & more in offing, SP-BSP alliance focusses on such seats to prevent division of Muslim votes
Maya-AY to hence kick off their joint rallies on Apr 7 from UPs Muslim base of Deoband in Saharanpur
ख़बरे हैं कि महागठबंधन की नीतियों से उलट बीजेपी के भगवाधारी योगी आदित्यनाथ नाम वापसी की आखिरी तारीख़ के बाद 25 मार्च के आसपास शाकम्भरी पीठ पहुँचेंगे। एक तरफ़ जहाँ ‘देवबंद’ में इस्लामिक शिक्षण संस्थान दारुल उलूम स्थित है। वहीं शाकम्भरी पीठ पौराणिक हिन्दू मान्यता का केंद्र है, जहाँ देवी शाकम्भरी ने महिषासुर का वध किया था। देवी के यहाँ ध्यान लगाने की वजह से उनका मंदिर बनाया गया।
रविवार (मार्च 17, 2019) को एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि लोकसभा चुनावों में भाजपा सरकार फिर से प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाएगी। उनकी मानें तो वे इस बार 74+ का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। उनका कहना है कि वह इस दफा गोरखपुर, कैराना, आजमगढ़ और अमेठी में भी जीत दर्ज करेंगे।
योगी आदित्यनाथ के मुताबिक इस बार भाजपा के लिए चुनाव जीतना आसान है क्योंकि सपा-बसपा के कारनामों के बारे में सब अच्छे से जानते हैं। प्रियंका गाँधी के चुनाव में आने पर उन्होंने कहा कि इससे बीजेपी को कोई नुकसान नहीं होने वाला है। क्योंकि 2017 में भी दो लड़के (राहुल गाँधी-अखिलेश यादव) आए थे, जिन्हें जनता द्वारा स्वीकारा नहीं गया था। वहीं प्रियंका गाँधी के गंगा में नाव यात्रा पर जाने पर योगी ने कहा कि यह अच्छी बात है वहाँ सबको जाना चाहिए, प्रियंका को पीएम मोदी का शुक्रिया अदा करना चाहिए जिन्होंने वहाँ के लिए वाटर वे शुरू किया। उनके मुताबिक अगर राहुल, अखिलेश, मायावती भी नाव यात्रा पर जाएँगे तो उन्हें बहुत खुशी होगी।
इसे चुनावी मौसम का प्रभाव कहें या लिबरल्स की थकान का असर, होली आने में ज्यादा दिन नहीं बचे हैं और अभी तक सोशल मीडिया पर पानी बचाने को लेकर पोस्ट नहीं आए हैं। लोगों को याद होगा किस तरह होली से एक महीने पहले ही सूखी होली खेलने और पानी बचाने की सलाह के साथ कई ‘बड़े लोगों’ के पोस्ट वायरल हुआ करते थे। बड़े लोग इसीलिए, क्योंकि उनके पास सोशल मीडिया पर ब्लू टिक हुआ करते हैं। ये लोग दिवाली के समय पटाखे नहीं फोड़ने की सलाह देते हैं, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर दही-हांडी की ऊँचाई कम रखने की सलाह देते हैं, होली पर पानी का कथित अपव्यय न करने की सलाह देते हैं और महाशिवरात्रि के समय शिवलिंग पर दूध न चढ़ाने की सलाह देते हैं। इन्हें पहचानना बहुत आसान है। किसी भी हिन्दू त्यौहार में मीन-मेख निकाल लेना इनकी जन्मजात ख़ासियत है। ये एक गिरोह विशेष का भाग हैं, जो हर एक हिन्दू त्यौहार को मानवता के लिए चरम ख़तरे के रूप में देखता है।
This Holi lets pledge to make water conservation part of our daily lives.Store water, share water with those who don’t have it
ये वही लोग हैं जो होली पर तर्क देते हैं कि राक्षसराज हिरण्यकश्यप और भक्त प्रह्लाद के समय ये आर्टिफीसियल रंग नहीं होते थे। उनका तर्क होता है कि भगवान श्रीराम के समय त्रेतायुग में पटाखे नहीं हुआ करते थे। उन्हें जानना चाहिए कि उस समय युद्धकला और धनुर्विद्या से तो बिजली कड़का दी जाती थी तो क्या आज भी हम भयंकर इलेक्ट्रोस्टेटिक डिस्चार्ज से दिवाली मनाएँ? अगर लिबरल्स के उस गिरोह विशेष को त्रेता युग के तर्कों से ही हमें जवाब देना है तो उन्हें एक कार्य करना चाहिए। उन्हें किसी ऐसे भौगोलिक क्षेत्र में जाना चाहिए, जहाँ तूफ़ान आ रहा हो या तड़ित झंझा चल रही हो। वहाँ एक-दो ऐसी छोटी-मोटी चीजें होंगी, जिसके बाद उन्हें त्रेता वाले लॉजिक से तौबा हो जाएगी।
उस क्षेत्र के वातावरण में दो इलेक्ट्रिकली चार्ज्ड क्षेत्र आपस में बड़े अच्छे से टकराएँगे। उन दोनों के एक-दूसरे को इक़्वालाइज़ करते ही एक ऐसी बिजली कड़केगी जिस से लिबरल्स का मिजाज ठंडा हो जाएगा। एकदम त्रेता युग के राम-रावण युद्ध वाली फीलिंग आएगी।
ऐसे ही होली को लेकर वे बेढंगे तर्क देते हैं कि पहले कृत्रिम रंगों का प्रयोग नहीं किया जाता था। भगवान श्रीकृष्ण और राधा ने एक-दूसरे के चेहरे पर रंग लगाए थे। ब्रज की होली पूरे देश भर में सबसे प्रसिद्ध है। बेढंगे तर्क देने के लिए उस युग का सहारा लेने वालों को भगवान शिव से प्रेरित होकर पूरे शरीर में भस्म रगड़ कर चलना चाहिए। कितने ऐसे लिबरल्स हैं जो अपने पूरे शरीर में भस्म लगा कर होली खेलने आएँगे? इन ज्ञान बघारुओं से यही अपेक्षा भी है। वे बड़ी चालाकी से भगवद्गीता और रामायण का जिक्र तभी करते हैं जब राष्ट्रवादियों की बात काटने के लिए माओ और मार्क्स के पास इसका कोई जवाब नहीं हो। अंधविरोध में पागल हो गए इन लिबरल्स ने तो बैलून में सीमेन भरे होने की झूठी बात कह कर इसे नारीवादी मुद्दों से जोड़ने की कोशिश कर ख़ूब हंगामा मचाया था।
हाँ, तो हम होली की बात कर रहे थे। होली प्यार का त्यौहार है। राधा-कृष्णा के प्यार का, शिव-पार्वती के प्यार का त्यौहार है। इस रंग में भंग डालने वालों को अब शायद समझ आ गया है कि जनता होशियार हो चुकी है। किसी को बार-बार बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। अगर आपने दिल्ली या मुंबई के किसी बंगले में बैठ कर भारतीय त्योहारों को लेकर बेकार के ज्ञान देने के प्रयास किए तो सुदूर शिलॉन्ग के किसी कॉलेज का विद्यार्थी भी आपको सीधा करने की ताक़त रखता है। आप भले जावेद अख़्तर हों, सागरिका घोस हों या अनुष्का शर्मा हों, अगर आपने हिन्दू त्योहारों को लेकर ऐसी-वैसी बातें की तो आपको तर्कों के साथ काट दिया जाएगा। यह कार्य पुलिस, सरकार, न्यायालय और मीडिया नहीं करेगी। जनता जागरूक है, आपसे ज्यादा जानकार है, अब वह ऐसे लोगों को नहीं बख्शती।
When the ‘save water, don’t play Holi’ and ‘kids with pichkaris’ campaign didn’t work, fiberal cabal is now trying the ‘semen filled balllon and forced groping’ tactic to demonise #Holi. Don’t let them succeed. Have a colourful, fun, Holi!
आपको याद होगा कि होली के कई दिनों पहले से कैसा कुटिल अभियान शुरू हो जाया करता था? होली पर पानी की बर्बादी होने की बात कही जाती थी। सबसे बड़ी बात कि ऐसा वही लोग कहते थे जो थूक फेंकने के बाद भी बाथरूम के फ्लश से 25 लीटर पानी बहा दिया करते हैं। कहा जाता था कि होली के कृत्रिम रंग चेहरे को नुकसान पहुँचाते हैं। ऐसे लोगों के लिए अभी-अभी एक ख़बर आई है। एक महिला को कैंसर होने के कारण जॉनसन एन्ड जॉनसन को $29.3 मिलियन का हर्ज़ाना भरना पड़ा। ऐसे 14,000 मामले आए हैं, जहाँ लोगों की शिकायत है कि जॉनसन एन्ड जॉनसन के प्रोडक्ट्स का प्रयोग करने के कारण उन्हें कैंसर हो गया। होली का विरोध करने वाले कितने लिबरल्स ने जे एन्ड जे की निंदा की?
यह एक अमेरिकन मैन्युफैक्चरिंग कम्पनी है, पाश्चात्य है। इसीलिए वह जो भी करे, क्षम्य है। लिबरल्स को फर्क नहीं पड़ता। होली पर चुटकी भर रंग के पैकेट से शायद ही किसी को बुख़ार भी हुआ हो, लेकिन उस पर हंगामा मचाने वाले गिरोह विशेष के लोग उस कम्पनी के प्रोडक्ट्स को लेकर चुप हैं, जिसके कारण कैंसर जैसी बीमारी हुई। इसी को हिपोक्रिसी कहते हैं। इनके पास सबूत नहीं होते, बस ज्ञान होता है। इसके पास असली ख़बरें नहीं होतीं, बस फेक नैरेटिव होते हैं। इसके पास सही तर्क नहीं होते, बस एक घिसी-पिटी धारणा होती है। इसके पास ऐतिहासिक तथ्य नहीं होते, बस झूठी आशंकाएँ होती हैं।
#HappyHoli. Don’t play Holi with water. Instead play with lots of colour. And then remove all the colour with lots of water. Oh wait…
होलिका दहन क्यों? होली क्यों? देश के हर एक भाग में इसके अलग-अलग कारण हैं और कहानियाँ हैं। इन सबके पीछे का ध्येय वही है, माहात्म्य समान है, भले ही किरदार अलग हों। हमने इन त्योहारों से जुड़ी कई प्रेरणादायी कहानियाँ पढ़ी हैं, सुनी है, सुनाई हैं। लिबरल गिरोह को इन सबमें कोई रुचि नहीं है। उन्हें लोगों का साथ घुल-मिल कर रंग खेलना खटकता है। और वे सबका ठेका लेने वाले कौन होते हैं? अगर कोई व्यक्ति रंगों के साथ होली खेलना चाहता है तो वह खेलेगा। अगर उसी के परिवार में कोई गुलाल से खेलना चाहता है तो वह भी खेलेगा। अगर कोई रंग-गुलाल-पानी इन सभी से खेलना चाहता है तो वह भी खेलेगा। उसी परिवार में कोई ऐसा भी व्यक्ति होगा, जो होली नहीं खेलेगा। लेकिन, ये चारों एक-दूसरे को अपने तौर-तरीकों को जबरन अपनाने को नहीं कह सकते।
Happy Holi!!!!!!!!!!!! Save water and save our syncretic culture! Here is a Holi ki qawwali! https://t.co/g81GEIOKTd
फिर लिबरल के गिरोह विशेष को क्या दिक्कतें हैं? आप रंग से खेलो, गुलाल से खेलो, पानी से खेलो, राख से खेलो या गोबर में नहाओ- दूसरों को तो वैसा करने दो, जैसा वे चाहते हैं। वे देश का नियम-क़ानून नहीं तोड़ रहे न, खुशियाँ ही तो मना रहे। इस होली ऐसे लोगों की बोलती बंद हो गई है। उनमें से अधिकतर ने अभी तक होली पर पानी बचाने और रंगों के कथित दुष्प्रभाव को लेकर ट्वीट्स नहीं किए। स्पेन में जाकर सड़े टमाटरों से खेल कर ये होली में रंग न खेलने की सलाह देते हैं। आइए देखते हैं कि अब इनकी बोलती क्यों बंद है?
अब इन्हें जनता के जागरूक होने का डर सता रहा है। साल दर साल प्रोपेगेंडा परस्ती करते-करते इन्हें अब बदलाव नज़र आ रहा है। अगर ये होली पर ज्ञान बघारने से बच रहे हैं तो राष्ट्रवादियों के लिए यह एक बड़ी सफलता है। सोशल मीडिया का ज़माना है। अब गाँव के खेतों में बैठे बाबाजी और दादी-नानी की कहानियाँ सुन कर बड़ा हुआ कोई बच्चा भी ऐसे फालतू ज्ञान देने वालों को अपने गूढ़ तर्कों से पानी पिला सकता है। ख़ुद को ज्ञान का भण्डार समझने वाले इन पाखंडियों को अब चुनौती मिल रही है, देशवासियों से, देश से। अब ये फूँक-फूँक कर क़दम रखते हैं क्योंकि इन्हें पता है कि उन पर नज़र रखी जा रही है और उनके हर एक्शन का रिएक्शन होगा ही।
एक्शन का रिएक्शन का अर्थ यहाँ हिंसक कतई नहीं है। झूठ फैलाने वालों को सच का आइना दिखाना भी एक्शन का रिएक्शन है। इन तथाकथित मठाधीशों को तो किसी की बात सुनने की आदत ही नहीं थी, वे सबसे बड़े ज्ञानी जो ठहरे। अब सोशल मीडिया के ज़माने में इनकी बात काटी जा रही है, इनके तर्कों को सिलसिलेवार ढंग से गलत साबित किया जा रहा है। ये बौखला गए हैं। इस बौखलाहट में कइयों ने तो सोशल मीडिया पर ट्रोल का रूप धारण कर लिया है। कई सोशल साइट्स छोड़ कर ही भाग गए। कई अभी भी थेथरई में लगे हैं लेकिन समय-समय पर उनकी पोल खुलती रहती है। रही बात अभी की, तो राष्ट्रवादियों के लिए यह जश्न का समय है क्योंकि लिबरल गैंग होली पर प्रोपेगंडा फैलाने से डर रहा है। क्रिया की प्रतिक्रिया अपना काम कर रही है।
आपको लड्डू अच्छे लगते हैं। आपने एक लड्डू लिया और बड़े चाव से खा लिया। आपको लड्डू बहुत ही ज्यादा अच्छे लगते हैं तो आपने दोनों हाथों में लड्डू लिए और एक-एक करके खा लिए। लेकिन, तब आपको लगता है कि ऐसे न तो दिल भर रहा है न ही पेट और कुछ ‘मजा’ टाइप भी फील नहीं हो रहा है तो आपने अपने एक असिस्टेंट की मदद ली, अपना बड़ा मुँह खोला और असिस्टेंट के जरिये मुँह में एक दर्जन लड्डू भरवा लिए।
अब अगर आपको ऐसा करने से ‘मजा’ आ रहा हो तो अलग बात है, लेकिन इस स्थिति में लड्डू आप से न तो निगलते बनेंगे और न ही उगलते। जबकि यही लड्डू आपके फेवरेट हुआ करते थे। और ऐसा ही कुछ माजरा राहुल गाँधी के साथ घटित होने जा रहा है, जहाँ उनका फेवरेट ‘चौकीदार चोर है’ उनके लिए ‘लड्डू’ साबित होने वाला है।
ईश्वर की असीम अनुकम्पा से एक तो उनके टॉप फ्लोर में ज्यादा लोड नहीं है, दूसरा अगर वे स्पीच के नाम पर ‘पोसम पा भई पोसम पा, डाकिए ने क्या किया’ भी सुना दें तो कॉन्ग्रेसी कहने लगते हैं कि इतना बेहतर तो नेहरू जी ने ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में भी नहीं लिखा था।
और यही वजह रही है कि जब राहुल गाँधी ने पीएम मोदी को उनके कार्यकाल के शुरुआत में ‘सूट-बूट’ के नारे से घेरने की कोशिश की तो कॉन्ग्रेसीयों ने उनको यकीन दिला दिया कि मोदी इसी नारे से ‘ध्वस्त’ हो जाएगा और सरकार गिरे न गिरे लेकिन सूट-बूट पहनना तो जरूर ही भूल जाएगा लेकिन ‘भक्तों’ ने इस दौरान राहुल गाँधी और उनके खानदान को उस वक्त सूट-बूट मय कर दिया, जब उनके सूट-बूट-कोट-पेंट और टाई में सजे हुए फोटोज से सोशल मीडिया को भर दिया गया।
फिर अचानक एक दिन राहुल गाँधी ने मोदी के ‘चौकीदार’ को पकड़ लिया। और, कह डाला कि “चौकीदार चोर है”, लेकिन फिर से कॉन्ग्रेसीयों ने उनको यह फील करवा दिया कि मोदी जो अपनी सभाओं में ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम्’ बुलवाता है, यह उसी की काट है।
और राहुल गाँधी भी अपनी हर सभा में ‘चौकीदार चोर है’ का नारा लगवाने लगे। इससे भक्त गण भी कुछ परेशान भी हुए कि यह कैसा ढीठ इंसान हैं, जो एक ही नारे से चिपक गया है। तब इस बार कमान फिर से मोदी जी ने संभाली और उन्होंने “मैं भी चौकीदार’ अभियान शुरू कर दिया। उनके देखा-देखी, मोदी समर्थकों, सरकार के मंत्रियों ने भी इसमें सक्रियता से भाग लेना शुरू कर दिया। और कमाल तो तब हो गया जब पीएम, भाजपा अध्यक्ष, गृह मंत्री, सरकार के अन्य वरिष्ठ मंत्री, भाजपा के शीर्ष पदाधिकारियों, और सोशल मीडिया पर पार्टी के समर्थकों ने अपने नाम के आगे ‘चौकीदार’ जोड़ लिया।
तब हैरान परेशान राहुल गाँधी ट्वीट करते हैं कि मोदी को ‘गिल्ट’ फील होने लगा है, और मोदी सरकार के सीनियर मंत्रियों मसलन गडकरी, जेटली, सुषमा स्वराज ने आपने नाम के आगे चौकीदार लगाया ही नहीं, क्या वे मोदी के चौकीदार नहीं हैं। शाम होते होते गडकरी और जेटली भी चौकीदार हो गए।
बन्दे को फिर भी चैन नहीं, उसने रात को फिर ट्वीट किया, क्यों चौकीदार साहब…बाकी सब तो ठीक है, ये सुषमा जी अब तक चौकीदार क्यों नहीं बनीं, कहीं कुछ खतरा तो नहीं है आपको!
इसके कुछ देर बाद सुषमा जी का ट्विटर हैंडल देखा तो सुषमा जी भी चौकीदार बन चुकी थीं। इसका अर्थ यह था कि अब पीएम से लेकर एक वेल्ला भक्त तक चौकीदार हो चुके हैं। चौकीदार, जो कि रक्षा, चौकसी, ईमानदारी और वफ़ादारी का प्रतीक माना जाता है, उसे आप कितनी बार और कहाँ-कहाँ चोर कहोगे!
पिछली बार आपने ‘चायवालों’ को मोदी का समर्थक बना दिया था और इस बार सुना है कि मुंबई की सिक्यूरिटी गार्ड्स (चौकीदारों) की एसोसिएशन ने भी राहुल गाँधी पर, उनको लगातार चोर कहने के लिए मुकदमा कर दिया है।
तो इस अभियान से आपको हासिल क्या हुआ है और आगे क्या होने जा रहा है! क्योंकि, आप विरोध के नाम पर सिर्फ ‘सस्ती जुमलेबाजी’ और ‘हवाई फायर’ कर रहे हो। आपके पास प्रमाणिक रूप से यह बताने के लिए कुछ भी नहीं है कि मोदी सरकार ने क्या गलतियाँ कीं, उससे देश को क्या नुक़सान हुआ और अगर आपकी सरकार आ गई, तो आप मोदी सरकार से क्या बेहतर करोगे?
और फिर जनता क्या यह नहीं देखेगी कि ‘चौकीदार’ को ‘चोर’ कौन कह रहा है ? वही जो ‘5000 करोड़ रुपए’ के ‘नेशनल हेराल्ड केस’ में ख़ुद अपनी माताजी सहित जमानत पर चल रहा है, जिनके जीजाजी देश के सबसे बड़े ‘भू-माफिया’ हैं, जिनके पिताजी की ‘बोफोर्स घोटाले’ में संलिप्तता थी, जिनकी दादी ने 1983 में भ्रष्टाचार को लेकर कहा था कि यह उनके लिए कोई मुद्दा ही नहीं है क्योंकि यह तो पूरी दुनिया में फैला हुआ है।
अभी तो जबकि चौकीदार ने अपनी प्रस्तावित 200 रैलियों और एक लाख करोड़ रुपए के चुनावी बजट का आगाज भी नहीं किया है, तब आप सोचिए कि आगे चौकीदार आपको कहाँ तक खदेड़ेगा, कैसे खदेड़ेगा और कहाँ ले जाकर छोड़ेगा।
15 साल तक दिल्ली की सीएम रहने के बाद जब शीला दीक्षित आम आदमी पार्टी (आप) से चुनाव हार गईं, तब बताते हैं कि जब भी उनके आस-पास लोग, आपस में ‘आप’ करके बात करते थे, तो वे चौंक जाती थीं। उनके मोतीलाल नेहरू मार्ग स्थित सरकारी आवास पर कई दिनों तक, कोई सफाईकर्मी उनके सामने ‘झाड़ू’ लगाता हुआ नजर नहीं आता था। बहुत मुमकिन है कि 23 मई के बाद श्रीमान राहुल गाँधी को भी ‘चौकीदारों’ से ऐसी ही दहशत हो जाए।
गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के निधन के बाद राज्य में उपजे सियासी हालात के बीच बीजेपी की तरफ से प्रमोद सावंत सबसे दमदार दावेदार बन कर उभरे हैं। पार्टी ने औपचारिक घोषणा नहीं की है और सस्पेंस बरकरार रखा है लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो सावंत पर सहमति लगभग तय है।
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स प्रमोद सावंत के अलावा विश्वजीत राणे के नाम को भी प्रबल दावेदार बता रही है। इस बीच एकाध रिपोर्ट ऐसे भी हैं, जो राज्य में राष्ट्रपति शासन की संभावनाओं पर लिखे गए।
मनोहर परिकर के निधन से उपजे शून्य के बीच कॉन्ग्रेस ने भी गोवा में सियासत करने की कोशिश की। बता दें कि कॉन्ग्रेस के 14 विधायकों ने राजभवन में राज्यपाल से मुलाकात की माँग की थी। बाद में कॉन्ग्रेस के नेताओं ने मुलाकात की और सरकार बनाने का दावा पेश किया।
आपको बता दें कि विपक्षी दल ने शुक्रवार को सरकार बनाने का दावा पेश करते हुए राज्यपाल को पत्र लिखा था और रविवार को फिर से पत्र लिखा। कावलेकर ने कहा, ‘‘हम सदन में बहुमत वाली पार्टी हैं और फिर भी मुलाकात का समय लेने के लिए संघर्ष करना पड़ा। हम माँग करते हैं कि हमें पर्रिकर के निधन के बाद भाजपा सरकार के ना रहने की स्थिति में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाए।’’
गोवा में अभी सीटों की गणित पर बात करें तो कॉन्ग्रेस राज्य में अभी सबसे बड़ी पार्टी है। 40 सदस्यीय विधानसभा में उसके पास 14 विधायक हैं जबकि भाजपा के पास 12 विधायक हैं। इस साल की शुरुआत में भाजपा विधायक फ्रांसिस डीसूजा के निधन और रविवार शाम को पर्रिकर के निधन तथा पिछले साल दो कॉन्ग्रेस विधायक सुभाष शिरोडकर और दयानंद सोप्ते के इस्तीफे के कारण विधानसभा में सदस्यों की संख्या 36 रह गई है। गोवा फॉरवर्ड पार्टी (जीएफपी), महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी (एमजीपी) के पास तीन-तीन विधायक हैं जबकि राकांपा के पास एक विधायक है। तीन निर्दलीय विधायक भी हैं। जीएफपी, एमजीपी और निर्दलीय विधायक पर्रिकर सरकार का हिस्सा थे।
लोकसभा चुनावों की राजनीतिक सरगर्मी बढ़ने के साथ ही सट्टा बाजार में भी गहमागहमी आ गई है। चुनाव में किस पार्टी को जीत मिलेगी, इस बात को लेकर कयास लगाने शुरू हो गए हैं। इसके साथ ही 17वीं लोकसभा में कौन-सी पार्टी कितने सीटों पर बाजी मारेगी, इसे लेकर भी सट्टा बाजार में भविष्यवाणी होने लगी है।
इसी कड़ी में राजस्थान बाजार में भी सट्टेबाजी चल रही है और अगर यहाँ हो रही भविष्यवाणियों को मानें तो केंद्र में अगली सरकार एनडीए की बनने जा रही है। जोधपुर के फलोदी स्थित सट्टा बाजार में लोग केंद्र में एनडीए की सरकार बनने पर सट्टा लगा रहे हैं। सट्टा बाजार के मुताबिक इस बार लोकसभा चुनाव में भाजपा को 250 से ज्यादा सीटें मिल सकती हैं, जबकि एनडीए के खाते में 300 से 310 सीटें जा सकती हैं।
वहीं अगर राजस्थान की बात करें तो सट्टा बाजार के अनुसार यहाँ पर भाजपा को 25 में से 18-20 सीटें मिल सकती है। राजस्थान सट्टा बाजार के सट्टेबाजों का मानना है कि जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले के जवाब में भारत की तरफ से पाकिस्तान के बालाकोट में किए गए एयर स्ट्राइक के बाद से लोगों का मूड बदल गया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से आतंकवाद के खिलाफ कड़ा कदम उठाया, उससे लोगों के दिलों में फिर से उम्मीद जग गई, और लोगों का बीजेपी की तरफ फिर से झुकाव बढ़ गया। यहाँ के सट्टेबाजों का कहना है कि एयर स्ट्राइक से पहले एनडीए को 280 सीटें मिलने की संभावना थी, जबकि बीजेपी को 200 सीटों पर संतोष करना पड़ता, मगर एयर स्ट्राइक के बाद माहौल बदल गया है।
दूसरी तरफ, अगर कॉन्ग्रेस की बात की जाए, तो कॉन्ग्रेस की स्थिति काफी खराब है। एयर स्ट्राइक से पहले यहाँ पर कयास लगाए जा रहे थे कि कॉन्ग्रेस को 100 सीटें मिलेंगी, लेकिन अब ये अनुमान लगाया जा रहा है कि कॉन्ग्रेस 72 से 74 सीटों तक ही सिमट जाएगी।
चुनावों को धनबल से प्रभावित करने की कोशिश पर चुनाव आयोग गिद्धदृष्टि रखे हुए है। चुनाव आयोग ने हर राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) से उन लोकसभा क्षेत्रों की सूची तैयार करने को कहा है जिनमें धनबल का दुरुपयोग कर चुनावी नतीजों को प्रभावित करने या वोटरों को लालच दे वोट वसूल करने की आशंका है। ऐसे क्षेत्रों में चुनाव आयोग विशेष ‘व्यय पर्यवेक्षकों’ की नियुक्ति करेगा। यह व्यय-पर्यवेक्षक ‘व्यय-संवेदनशील’ लोकसभा क्षेत्रों में जा कर विशेष दलों का निर्माण करेंगे जिनका कार्य जमीनी हरकत पर नज़र रखने का होगा।
अभी सभी राज्यों के मुख्य चुनाव अधिकारियों के उत्तर न आने के कारण चुनाव आयोग का अनुमान है कि अंतिम संख्या 150 के आस-पास पहुँचेगी।
कमी नहीं है तरीकों की
चुनाव में वोटरों को रिश्वत देने के कई तरीके होते हैं- सीधे-सीधे कैश बाँटने के अलावा उपहार में उपकरण देने से लेकर शराब और नशीले पदार्थ बाँटने तक के हथकंडे राजनीतिक दल अपनाते हैं। 2014 के लोकसभा चुनावों में जब्त 1200 करोड़ रुपए में से केवल 300 करोड़ रुपए ही नकदी के रूप में था, जबकि पंजाब से 700 करोड़ रुपए मूल्य के ड्रग्स बरामद किए गए थे। 2014-18 के कालखण्ड में चुनाव आयोग 21 विधानसभा चुनावों में भी 1800 करोड़ रुपए से ज्यादा जब्त कर चुका है।
2018 के अंत में हुए 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में ही लगभग 300 करोड़ रुपए चुनाव आयोग ने जब्त की थी।
पूरा तमिलनाडु-तेलंगाना रडार पर, आंध्र-गुजरात को लेकर भी सतर्कता
तमिलनाडु के मुख्य चुनाव अधिकारी ने तमिलनाडु की सभी 39 लोकसभा सीटों व पुडुचेरी को ‘व्यय-संवेदनशील’ घोषित कर उनके लिए पर्यवेक्षक टीमों की माँग की है। इसी प्रकार आंध्र से अलग हो बने तेलंगाना राज्य की भी सभी 17 सीटों पर वहाँ के मुख्य चुनाव अधिकारी को वोटरों को रिश्वत दिए जाने का अंदेशा है।
इसके अलावा आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, और कर्नाटक की भी आधे से ज्यादा सीटों को व्यय-संवेदनशील मानने की अनुशंसा केन्द्रीय चुनाव आयोग को प्राप्त हुई है। आंध्र की जहाँ 175 में से 116 विधानसभा सीटें व 25 में से लोकसभा सीटें चुनाव आयोग के निशाने पर हैं, वहीं बिहार की 40 में 21 सीटें चिह्नित की गईं हैं। गौतलब है कि पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान मिली 300 करोड़ रुपए नकदी में से 124 करोड़ रुपए का ‘योगदान’ केवल आंध्र का ही था।
झारखण्ड के 2, उत्तराखण्ड के 4/5, हरियाणा व छत्तीसगढ़ के 3-3, गोवा के 1/2, राजस्थान के 5, व पंजाब के 6 लोकसभा क्षेत्रों को व्यय-संवेदनशील घोषित करने की अनुशंसा की गई है। उत्तर-पूर्व में मणिपुर के 2 (8 विधानसभा क्षेत्र), मेघालय के 3 (23 विधानसभा क्षेत्र), व नागालैंड के 1 (7 विधानसभा क्षेत्र) लोकसभा क्षेत्रों पर चुनाव आयोग की विशेष नज़र रहेगी।
आयकर विभाग ने भी 400 अधिकारी केवल गुजरात के लोकसभा चुनावों में काले धन के हस्तक्षेप को रोकने के लिए तैनात किए हैं। बता दें कि गुजरात के 26 में से 18 लोकसभा क्षेत्र ‘व्यय-संवेदनशील’ माने गए हैं।
प्रत्याशियों के आधार पर तय करेगा यूपी, बंगाल को चाहिए पर्यवेक्षक बिना सीट बताए
यूपी के मुख्य चुनाव अधिकारी ने यह बताया है कि वहाँ प्रत्याशी घोषित होने के बाद ही ‘व्यय-संवेदनशील’ क्षेत्रों की सूची तय हो पाएगी।
मध्य प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, त्रिपुरा, असम, और केरला के मुख्य चुनाव अधिकारियों ने अपने यहाँ धनबल के दुरुपयोग की सम्भावना से इंकार करते हुए कोई व्यय-पर्यवेक्षक माँगने से इंकार कर दिया है, पर चुनाव आयोग द्वारा उनके इस दावे की पुनर्समीक्षा संभव है।
बंगाल के चुनाव अधिकारियों ने एक ओर किसी भी लोकसभा क्षेत्र में ऐसा कुछ होने की सम्भावना से भी इंकार किया है, पर व्यय-पर्यवेक्षक अवश्य माँगे हैं।
शिक्षा एक ऐसा माध्यम है जिससे व्यक्ति न सिर्फ़ अपनी सोच-समझ को विकसित कर पाता है बल्कि समाज को जागरूक करने में भी अपना योगदान देता है। शिक्षित लोग ही एक सभ्य समाज की नींव रखते हैं जो देश को बुनियादी तौर पर मज़बूत करने में सहायक साबित होता है। वहीं अशिक्षित होना किसी अभिशाप से कम नहीं होता। कई ऐसे मौक़े आते हैं जब अशिक्षित होने की वजह से शर्मसार भी होना पड़ जाता है।
ऐसी ही एक घटना बिहार के मधुबनी ज़िले की है जहाँ पंडौल गाँव में एक दुल्हन ने दूल्हे से शादी के करने से इनकार कर दिया क्योंकि वो अशिक्षित ही नहीं अनपढ़ भी था। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि दुल्हन को दूल्हे के अनपढ़ होने की बात वरमाला पहनाने के बाद पता चली जिसके बाद उसने शादी न करने का फ़ैसला किया।
दरअसल पंडोल प्रखंड के ब्रह्मोत्तरा गाँव के लड़के की शादी रहिका प्रखंड के मोमीनपुर गाँव की लड़की के साथ 13 मार्च को होनी तय हुई थी। बारात अपने तय दिन पर निर्धारित स्थान पर पहुँची और वरमाला होने के बाद शादी की रस्मों के दौरान दुल्हन की सहेलियाँ दूल्हे से बातें करने लगीं और बातों ही बातों में सहेलियों को शक हुआ कि दूल्हा अशिक्षित है।
अपने शक़ को यकीन में बदलने के लिए दुल्हन की सहेलियों ने दूल्हे को 100 रुपए के 10 नोट गिनने के लिए दिए जिन्हें गिनने में उसे दिक्कत होने लगी। काफी मशक्कत करने के बावजूद वो उन 10 नोटों को गिनने में असफल रहा। इसके बाद दूल्हे से उसका और गाँव का नाम पूछा गया जिससे पता चल गया कि वो पढ़ा-लिखा नहीं है। असलियत जानने के बाद दुल्हन ने दूल्हे से शादी करने से मना कर दिया।
बता दें कि दुल्हन बनी लड़की के इस फैसले का गाँव वालों ने स्वागत किया। लड़की द्वारा शादी न करने के फ़ैसले की तारीफ़ करते हुए शादी में उपस्थित एक व्यक्ति ने अपने पढ़े-लिखे बेटे से शादी का प्रस्ताव रखा और पूछा कि मेरा बेटा पढ़ा-लिखा है क्या आप उससे शादी करेंगी? लड़की वालों ने इस प्रस्ताव पर हामी भर दी।
गोवा के यशस्वी मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर का कैंसर की बीमारी से जूझते हुए 63 साल की उम्र में रविवार को निधन हो गया था। मनोहर पर्रिकर अग्नाशय कैंसर से जैसी असाध्य बीमारी से पीड़ित थे। बता दें कि मनोहर पर्रिकर के निधन पर सोमवार (मार्च 18, 2019) को केंद्र सरकार ने एक दिन का वहीं गोवा की राज्य सरकार ने सात दिनों का शोक घोषित किया है।
प्रधानमंत्री मोदी सहित मंत्रिमंडल के कई नेताओं ने पूर्व रक्षामंत्री और गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर को श्रद्धांजली अर्पित की। साथ ही प्रधानमंत्री ने मनोहर पर्रिकर के परिवार वालों से भी मुलाकात की।
Prime Minister Narendra Modi, Defence Minister Nirmala Sitharaman and Governor Mridula Sinha meet family of Goa CM #ManoharParrikar, in Panaji. pic.twitter.com/X11DkUJofU
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने बताया कि राष्ट्रीय राजधानी, केंद्र शासित प्रदेशों और राज्य की राजधानियों में राष्ट्रध्वज आधा झुका रहेगा। मनोहर पर्रिकर का राजकीय सम्मान के साथ सोमवार शाम 5 बजे अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा। इससे पहले सुबह 9.30 बजे से 10.30 बजे तक पणजी के बीजेपी ऑफिस में उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था।
शाम 4.00 बजे तक आम लोग अपने नेता को भावभीनी श्रद्धांजलि दे सकेंगे। शाम 4 बजे कला अकेडमी से मीरामार तक मनोहर पर्रिकर की अंतिम यात्रा निकलेगी और 5 बजे उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा।
जब आप किसी भी काम में आगे बढ़ते हैं, तो अमूमन आपकी इच्छा होती है कि आप सबसे ऊपर तक पहुँचे। भले ही आप नकारे हों, आपको पता हो कि आप उस लायक नहीं हैं, आपको पता हो कि आप बहुत ज़्यादा भी जाएँगे तो बीच तक पहुँचेंगे, फिर भी ख़्वाब देखने से किसने मना किया है। ये एक फ़ंडामेंटल मानवीय उम्मीद है।
भले ही कभी एक्टिंग न की हो लेकिन आदमी बंद कमरे में बैठकर सोचता है कि एक नेशनल अवॉर्ड मिल जाता तो कितना सही रहता। क्रिकेट की लेदर बॉल कभी हाथ में पकड़ी न हो, लेकिन इच्छा होती है कि तीन बॉल में तीन विकेट लेकर इतिहास बना दिया जाए। कहने का तात्पर्य यह है कि अगर संसाधन न हों, तब भी व्यक्ति बहुत आगे तक सोच लेता है।
वैसे तो राजनीति कोई कार्य नहीं माना जाता, फिर भी ये एक ऐसी जगह है जहाँ देवगौड़ा प्रधानमंत्री और प्रतिभा पाटिल राष्ट्रपति बन जाते हैं। ये वैसी जगह है जहाँ जादूगर और नशेड़ी लोग संयुक्त राष्ट्र संघ की हरी दीवारों के बैकड्रॉप में भारत की तरफ से भाषण देते हुए खुद को देखते हैं। अजीब बात यह है कि ऐसा संभव हो सकता है, ऐसा संभव हो चुका है। वरना राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाना महिला सशक्तिकरण तो नहीं ही कहा जा सकता!
लोकसभा चुनावों के समय दो-तीन शब्द ऐसे हैं जो हर पाँच साल में, चुनावों से 6-8 महीने पहले से खूब चर्चा में आते हैं। महागठबंधन, थर्ड फ़्रंट, साम्प्रदायिक ताक़तें आदि वो शब्द और विशेषण हैं जिनकी वास्तविकता हर चुनाव में औंधे मुँह गिरती है, लेकिन नेता लोग अपने आप को पागल बनाना बंद नहीं करते।
जिस देश में सेकेंड फ़्रंट ठीक से बन नहीं पा रहा, थर्ड और फोर्थ फ़्रंट की बात करना बेवक़ूफ़ी तो है लेकिन सुनने में सेक्सी लगता है। इसीलिए बोला जाता है। इसीलिए कभी पटनायक से बनर्जी की मुलाक़ात होती है, कभी केजरीवाल से कोई मिल लेता है, कभी ममता की मुलाक़ात चंद्र बाबू से होती है, कभी कमल हासन ओपन माइंडेड रहते हैं।
लेफ़्ट वालों की बात नहीं करूँगा। उन्हें वक्त ने भी सताया है, और अर्धसैनिक बल भी उनके काडरों के जंगलों में घुस गए हैं। बचा था यूनिवर्सिटी में वल्नरेबल और सीधी लड़कियों को विचारधारा के नाम पर जोड़कर सीडी दिखाकर बलात्कार करना, अब वो भी सोशल मीडिया के समय में बाहर आ जाता है।
बाहर आने तक तो ठीक है, वायरल हो जाता है। जंगलों में नक्सलियों के साथ ‘क्रांति’ करने गई लड़कियाँ जब सेक्स स्लेव का जीवन गुज़ारकर, किसी तरह बाहर पहुँचती हैं तो बताती हैं कि वहाँ महिला काडरों से कम्यून को देह सौंपकर क्रांति में सहयोग कैसे दिलवाई जाती है। अब ये बेचारे कैक्टस लेकर घूमते हैं और फ़्रस्ट्रेशन में यहाँ-वहाँ रगड़कर खुद को कष्ट देते हैं।
आज सुबह ख़बर आई कि बंगाल में कॉन्ग्रेस का गठबंधन नहीं हो पाया, अकेले लड़ेगी चुनाव। यूपी में आपको पता ही है कि परिवार वालों की सीटें छोड़कर बाकी हर सीट पर तथाकथित महागठबंधन का छोटा बंधन, सपा-बसपा, बनकर निकला है। कॉन्ग्रेस को वहाँ भी सबने अकेले छोड़ दिया। तेलंगाना में जो हुआ वो सबको दिख ही गया। कर्नाटक में मुख्यमंत्री अपने आप को क्लर्क कहकर रोता है, उसका बाप अपने बेटे की दुर्गति पर रोता है।
दिल्ली में दो सौ पन्नों के सबूत के नाम पर केजरीवाल ने जो लहरिया लूटा था, वो शीला जी को याद है और माकन समेत कई कॉन्ग्रेसी नेताओं की दलीलों के बाद भी यहाँ गठबंधन बनते नहीं दिख रहा। देखना यह है कि बंगाल में तृणमूल की ममता कॉन्ग्रेस के साथ कितनी दया करती है। क्योंकि कॉन्ग्रेस तो दया की ही पात्र बन कर रह गई है।
वो मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि जब देश की सबसे पुरानी और सबसे ज़्यादा समय सत्ता में रहने वाली पार्टी, क्षेत्रीय पार्टियों के उनके बिना माँगे ही उनके पीछे सपोर्ट देने के लिए अड़ जाए, तो लगता है कि वी डू लिव इन डेस्पेरेट टाइम्स, एंड डेस्पेरेट टाइम्स नीड डेस्पेरेट मेजर्स! हिन्दी में कहें तो हताश कॉन्ग्रेस के लिए हाथ-पाँव मारकर, नदी में विसर्जन का नारियल निकालने के चक्कर में मरे हुए आदमी की काई जमी खोपड़ी का भी मिल जाना एक उपलब्धि ही है।
मध्य प्रदेश और राजस्थान के विधानसभा चुनावों पर मत जाइए। भारत का वोटर अब चालाक हो गया है। वो उड़ीसा की विधानसभा किसी को देता है, लोकसभा किसी और को। और तो और, चुनावों के समय ही बता देते हैं कि ‘राजे तेरी खैर नहीं, मोदी तुझसे बैर नहीं’। तो अब मतदाताओं को मूर्ख समझना, उनको गलत आँकने जैसा है।
वैसे, भारत के 38.5% मतदाताओं को कॉन्ग्रेस ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से ‘स्टूपिड’ कहा ही है जबकि उनके अध्यक्ष आलू से सोना बनाते हैं और खेत में दवाई की फ़ैक्टरी लगाते हैं। इस तरह की बातें करके आप इंटरनेट पर वायरल हो सकते हैं, लेकिन अब इलेक्शन मैनेजमेंट करने वाली कम्पनियों की सुविधा छोटे दल भी लेते हैं, और उन्हें भी पता है कि किस बात से वोटर आपको घेरेगा।
जब आप लगातार सर्जिकल और एयर स्ट्राइक पर सवाल करते हैं, जब आप भारत की एक तिहाई जनसंख्या को जिसने मोदी को वोट दिया, उसे मूर्ख कहते हैं, जब आप खुद राफेल को निजी हितों को साधने के लिए यहाँ आने से रोकना चाहते हैं, तब आपकी विश्वसनीयता गिरती है, और कोई भी आपके साथ होने से कतराता है।
जो लोग कॉन्ग्रेस को समझदार और अनुभवी पार्टी बताते हैं, उनसे मेरा यही सवाल है कि इस पार्टी के मुखिया ने कौन से मुद्दे उठाए हैं सरकार को घेरने के लिए? राफेल इनके लिए राष्ट्रीय नहीं, बल्कि निजी मुद्दा है, इसलिए उसे इतनी बार उठाया कि लोग बोर हो गए हैं। रोजगार पर सवाल किए, पता चला कि मोदी सरकार ने कई एजेंसियों के मुताबिक़ करोड़ों नौकरियाँ सृजित की हैं। अब इस पर आँकड़े आने के बाद चुप्पी छाई हुई है।
महागठबंधन का दुर्भाग्य हमेशा से यही रहा है कि इनके साथ आने का लक्ष्य किसी फासीवाद ताक़त, साम्प्रदायिक विचारधारा, भ्रष्ट सरकार और तमाम नकारात्मक मुद्दों को लेकर नहीं होता, इनका लक्ष्य होता है कि कैसे शॉर्टकट से प्रधानमंत्री बना जाए। यहाँ कोई पैदाइश से ‘योग्य’ है, कोई एक राज्य में सबसे ज्यादा सीट लाने के कारण खुद को योग्य पाती है। कोई राज्यसभा में है, लेकिन दावा करती है कि दलितों का कोई है तो वही है।
कोई सिर्फ इसलिए पीएम बनने के ख़्वाब देखता है कि उसके पास वो दो सीटें होंगी जिसके कारण विश्वास प्रस्ताव जीता और हारा जा सकेगा। आपको मेरी बात मजाक लगेगी, लेकिन क्या यह सत्य नहीं है? लोकतंत्र की हत्या का राग अलापने वालों ने क्या एक वोट से सरकार गिराकर इस देश को चुनाव में नहीं ढकेला है?
आपको क्या सच में लगता है कि इतनी महात्वाकांक्षाएँ एक साथ खड़ी हो पाएँगी? क्या आपको सच में लगता है कि ये लोग किसी साम्प्रदायिक ताक़त, भ्रष्ट सरकार, फासीवाद सरकार को हराकर देश और संविधान की रक्षा करने इकट्ठे हुए थे? ऐसा कुछ नहीं है। यो लोग चोरों की जमात हैं, जिनकी पतलून का नाड़ा किसी और के हाथ में है। सब एक-दूसरे का नाड़ा थामकर नंगे होने से बचना चाहते हैं।
इन नामों को गौर से सुनिए और याद कीजिए कि अभी हाल में इन्होंने क्या किया है: मायावती, अखिलेश, चंद्र बाबू नायडू, ममता, लालू, तेजस्वी, कुमारस्वामी आदि। याद कीजिए, नहीं याद आए तो इंटरनेट पर खोजिए। हर नाम के बाद करप्शन लिखिए, सही जगह पहुँच जाएँगे।
ये सब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। देश सेवा ढोंग है इनके लिए, वरना देश और संविधान की क़समें खाने वाले लोग ये नहीं पूछते कि सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो दो, एयर स्ट्राइक में पेड़ टूटे या आदमी मरे। देश जैसी संस्था की परिकल्पना ये कर ही नहीं पाते, या समझ नहीं है। आप देश के नाम का नारा लगाते हुए अपनी ही सेना को कैसे ह्यूमिलिएट कर सकते हैं? आप पाकिस्तान के टीवी पर भारत के खिलाफ कैसे बोलते दिख जाते हैं? आप ऐसी बातें क्यों बोलते हैं जिसे पाकिस्तान की मीडिया ये कहकर चलाती है कि भारत में तो सत्तारूढ़ पार्टी के साथ बाकी पार्टियाँ हैं ही नहीं।
ये गठबंधन नहीं, ये बंधन है, जिसमें कई गाँठें हैं। गाँठें कैंसर का परिचायक होती हैं।
पड़ोसी देश चीन ने आतंकवाद से लड़ाई के मुद्दे पर वाइट पेपर जारी किया है। चीन पर शिंजियांग प्रान्त में मानवाधिकार हनन के आरोप लगते रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सत्ता संभालने के बाद मानवाधिकार हनन के मामले और ज्यादा हो गए हैं। अब चीन ने दावा किया है कि उसने पिछले पाँच वर्षों में शिंजियांग प्रान्त से 13,000 इस्लामिक आतंकियों को गिरफ़्तार किया है। चीन का शिंजियांग प्रान्त अलगाववाद और कट्टरवाद की चपेट में है। चीन के इस पश्चिमी प्रांत में रह रहे उईगर मुस्लिम ख़ुद को तुर्क के क़रीब मानते हैं लेकिन चीन ने “The Fight Against Terrorism and Extremism and Human Rights Protection in Xinjiang” नामक रिपोर्ट में कहा है कि 20वीं सदी की शुरुआत में ही यहाँ पैन-इस्लामिक और पैन-तुर्की सोच हावी हो गई थी।
चीन की आतंकियों पर बड़ी कार्रवाई
रिपोर्ट में चीन ने कहा है कि इस क्षेत्र में इस्लाम के आने के साथ ही यहाँ की धार्मिक संरचना में बदलाव आ गया और शासकों ने युद्ध और जबरदस्ती इस्लाम को फैलाया। चीन ने साथ ही यह भी दावा किया कि उसने क्षेत्र में मानवाधिकार की रक्षा की है। यह संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की ‘वर्ल्ड रिपोर्ट 2018‘ में कही गई बातों के एकदम विपरीत है। यूएन ने कहा था कि चीन उईगर मुस्लिमों के तौर-तरीकों और परम्परा को ख़तरनाक मानता है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा था कि चीन ने क्षेत्र के कुछ हिस्सों में लोगों को जबरन एक सरकारी सर्विलेंस ऐप डाउनलोड करने को मजबूर किया।
संयुक्त राष्ट्र ने चीन की भर्त्सना की थी
जबकि, चीन ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि उसने 2014 से अब तक 12,995 आतंकियों को गिरफ़्तार किया, 2,052 विस्फोटक सामग्री को जब्त किया, 1,588 हिंसक एवं आतंकी गैंगों को नेस्तनाबूत किया, 30,645 लोगों को 4,858 अवैध धार्मिक गतिविधियों (illegal religious practices) के लिए दण्डित किया। चीन ने आँकड़े गिनाते हुए कहा कि कई तो ऐसे आतंकी थे जिन्होंने दंड पाने के बावजूद फिर से वही कार्य किया। ऐसे लोगों पर और भी अधिक कार्रवाई की गई। चीन ने कहा है कि शासन से लेकर स्कूलों तक, हर जगह धार्मिक बीज बोए जा रहे थे, जिसपर क़ाबू पाने के लिए हरसंभव प्रयास किए गए।
चीन ने कहा कि इस्लाम के आने के बाद यहाँ युद्ध जैसी स्थिति बन गई
चीन ने क्षेत्र में रोज़गार सहित कई विकास कार्यों को गिनाते हुए दावा किया कि उसने आतंक और अलगाववाद को समाप्त करने के लिए जनता के लिए विकास कार्यों का सहारा लिया है। चीन ने अपने प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि इन्ही सब उपायों के कारण पिछले 2 वर्षों से शिंजियांग में कोई हिंसक आतंकी गतिविधि नहीं हुई है। चीन ने दावा किया कि उसने इसके लिए किसी भी धर्म विशेष या उसकी रीति-रिवाजों को निशाना नहीं बनाया। चीन ने दावा किया कि कम्युनिस्ट पार्टी के शासनकाल में शिंजियांग के लिए यह आर्थिक व सामाजिक उत्थान का दौर है।
“It is indisputable that Xinjiang is an inseparable part of Chinese territory,” said the white paper, titled “The Fight Against Terrorism and Extremism and Human Rights Protection in #Xinjiang.” https://t.co/yGCrabTHrEpic.twitter.com/JzogdlYB4i
हालाँकि, चीन के इन आँकड़ों से पता चलता है कि चीन भले ही मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकी घोषित करने में लगातार अड़ंगा लगाता रहा हो लेकिन अपने देश में उसने आतंकवाद को लेकर मानवाधिकारों का हनन करने के साथ-साथ सभी हथकंडे अपनाए हैं। चीन के अनुसार, उसके देश में आतंकवाद वही है जो उसने अपनी परिभाषा के हिसाब से तय किया है। उस आतंकवाद को निरस्त करने के लिए चीन संयुक्त राष्ट्र से लेकर अपने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं तक की भी नहीं सुनता। ऐसे कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को ‘क्रैकडाउन 709’ का प्रयोग कर जेल में डाल दिया गया।