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मिशन शक्ति: भारत रहा अंतरराष्ट्रीय क़ानून के दायरे में, UN Space Treaty की प्रमुख बातें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आज बुधवार (मार्च 26, 2019) को भारत के अंतरिक्ष महाशक्ति बनने की घोषणा की गई। उन्होंने कहा कि भारत ने आज एक अभूतपूर्व सिद्धि हासिल की है। भारत ने आज अपना नाम ‘स्पेस पावर’ के रूप में दर्ज करा लिया है। अब तक रूस, अमेरिका और चीन को ये दर्जा प्राप्त था, अब भारत ने भी यह उपलब्धि हासिल कर ली है। दरअसल, हमारे वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में 300 किलोमीटर दूर LEO (Low Earth Orbit) में एक सक्रिय सैटेलाइट को मार गिराया है। ये लाइव सैटेसाइट जो कि एक पूर्व निर्धारित लक्ष्य था, उसे एंटी सैटेलाइट मिसाइल (A-SAT) द्वारा मार गिराया गया है।

ऐसे में आपके मन में ऐसे प्रश्न ज़रूर उठ रहे होंगे कि क्या ऐसा करने से भारत ने किसी अंतरराष्ट्रीय संधि का उल्लंघन किया है? इसका सपाट जवाब है, नहीं। भारत ने अंतरराष्ट्रीय दायरे में रहते हुए सबकुछ किया है। भारत और चीन में यही अंतर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सारी जानकारी देश-दुनिया को दे दी है। बता दें कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंतरिक्ष के नियम-क़ानून पर जो संधि है, उसे बाह्य अंतरिक्ष संधि (Outer Space Treaty) नाम दिया गया है। ये चन्द्रमा सहित सभी खगोलीय पिंडों पर लागू होता है। इसे 1967 में ड्राफ्ट किया गया था। अंतरिक्ष में हथियारों के प्रयोग को लेकर भी इस संधि में नियम-क़ानून बनाए गए थे।

अगर ये संधि नहीं होती तो हो सकता है कुछ देश विध्वंसक मिसाइलों या हथियारों को चन्द्रमा पर तैनात कर देते। यही वो संधि है, जो देशों को ऐसा करने से रोकती है। यहाँ तक कि आउटर स्पेस में भी हथियारों की तैनाती से रोकती है। इस संधि में कहा गया है कि कोई भी देश चाँद या किसी खगोलीय पिंड पर अपना अधिकार नहीं जता सकता। इन पर किसी भी प्रकार के सैनिक केंद्र की स्थापना नहीं कर सकता। कुल मिलकर सार यह कि बाह्य अंतरिक्ष में कोई भी देश अपना प्रभुत्व नहीं जता सकता।

अंतरिक्ष में परमाणु-शस्त्र और सामूहिक विनाश के दूसरे साधनों से सुसज्जित उपग्रहों, अंतरिक्ष यानों आदि के छोड़ने पर प्रतिबंध है। यह संधि इस बात की भी व्यवस्था करती है कि गलती से किसी दूसरे देश के सीमा क्षेत्र में उतर जाने वाले अंतरिक्ष यात्री उस देश को सौंप दिए जाएँगे जिसके वे नागरिक होंगे। अक्सर आपने सुना होगा कि फलाँ कम्पनी चाँद पर ज़मीन बेच रही है या फलाँ उद्योगपति ने वहाँ ज़मीन ख़रीदी। यह सब आउटर स्पेस ट्रीटी की अस्पष्टता के कारण होता है।

दुनिया की कोई भी सरकार चाँद पर ज़मीन के टुकड़ों के व्यापार की वैधता की गारंटी नहीं देती है, लेकिन चाँद पर ज़मीन की ख़रीद-बेच कर रही कंपनियों का मानना है कि 1967 की संयुक्त राष्ट्र बाह्य अंतरिक्ष संधि के एक अस्पष्ट प्रावधान के कारण उनका धंधा पूरी तरह क़ानून के अनुरूप है। दरअसल इस संधि में बाह्य अंतरिक्ष पिंड पर किसी देश या सरकार के दावे को तो ख़ारिज़ किया गया है, लेकिन इसमें यह सुनिश्चित नहीं किया गया है कि ऐसे किसी पिंड पर व्यक्तिगत या कंपनी विशेष के दावे की क्या क़ानूनी स्थिति होगी। संयुक्त राष्ट्र के वकीलों ने भी साफ़ किया है कि चाँद पर कंपनियों के दावे में कोई दम नहीं है।

ताजा हालात में भारत ने अंतरराष्ट्रीय दायरे में रह कर कार्य किया है। भारत ने अपने ही सैटेलाइट को मार गिराया है। इसके लिए जिस तकनीक का प्रयोग किया गया, उसे भी भारत में ही विकसित किया गया है। सबसे बड़ी बात यह कि भारत की इस कार्यवाही से किसी भी दूसरे देश के एयरस्पेस का कुछ भी लेना-देना नहीं है। प्रधानमंत्री ने यह भी साफ़ कर दिया है कि भारत अंतरिक्ष में शांति का वाहक है और तकनीकों का उपयोग कृषि, मेडिकल और विज्ञान आदि से सम्बंधित अच्छे कार्यों में होना चाहिए।

कन्हैया कुमार के समर्थन में केआरके, कहा ‘ईमानदार व्यक्ति को वोट देना चाहिए’

बॉलीवुड अभिनेता, निर्माता, और फिल्म विश्लेषक केआरके (कमाल आर खान) ने बेगूसराय से आगामी लोकसभा चुनाव लड़ने जा रहे युवा नेता कन्हैया कुमार को समर्थन देने की घोषणा की है

सीपीआई के टिकट पर मैदान में उतरे कन्हैया के समर्थन में केआरके ने लिखा, “कन्हैया कुमार के पास चुनाव लड़ने के लिए पैसे नहीं हैं इसलिए वे अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों से चंदा माँग रहे हैं। हम सब को उनकी मदद करनी चाहिए और ऐसे ईमानदार व्यक्ति को वोट देना चाहिए जो देश लूटने की बजाय लोगों की सेवा करने राजनीति में आ रहे हैं।”

आगे उन्होंने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी और राजद नेता तेजस्वी यादव को टैग करते हुए उनसे कहा कि यदि वे भी कन्हैया कुमार का समर्थन नहीं करते तो वे भी राजनीति देशसेवा के लिए नहीं कर रहे हैं। केआरके ने कन्हैया कुमार को ‘देशभक्त’, ‘ईमानदार’, और ‘शिक्षित’ उम्मीदवार बताया। साथ ही यह घोषणा भी की कि कन्हैया इन दोनों नेताओं के समर्थन के बिना भी चुनाव जीतेंगे क्योंकि वे बिना भय और लालच के जनता की सेवा करने जा रहे हैं।

उन्होंने कन्हैया कुमार की नेतृत्व क्षमता की भी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा कि गाँव और गरीब घर से आने वाले कन्हैया कुमार अगर जेएनयू के अध्यक्ष बन सकते हैं तो यह उनकी नेतृत्व क्षमता की निशानी है। उन्हें यह पद किसी और की वजह से नहीं मिला। उनकी पीएचडी डिग्री नकली नहीं है। अगर वह अध्यक्ष थे तो उनका विरोध भी था और जलने वाले लोग भी।


#मिशन_शक्ति: अभी न होता तो कभी न होता

भारत की सैटलाइट-रोधी हथियार-प्रणाली ‘मिशन शक्ति’ की तारीफों और उसे बधाईयों का ताँता तो लग ही रहा है, पर साथ ही औचित्य से लेकर टाइमिंग तक पर दबी जबान से सवाल भी उठने लगे हैं। ऐसे में इसकी टाइमिंग के बारे में जान लेना जरूरी है।

जारी है सौदेबाजी

यहाँ यह जान लेना जरूरी है कि यह क्षमता पहली ही तीन देशों- अमेरिका, चीन, और रूस, के पास है। और तीनों देश इस समय एक-दूसरे पर इसके दुरुपयोग के आरोप-प्रत्यारोप की नुरा-कुश्ती में लगे हैं। जेनेवा में स्पेस वेपेनाइज़ेशन पर होने वाली चर्चा और वैश्विक संधि से पहले ज़रूरी था यह भारतीय ASAT का परीक्षण। लगभग 25 देश इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि ये तकनीक और किसी देश के पास न हो, और इसके बहाने दूसरे देशों के इस दिशा में चल रहे शोध पर वैश्विक दवाब बने। यूरोपियन यूनियन का भी मूक समर्थन इस कवायद को हासिल है। पूरी खींचतान केवल इसीलिए हो रही है ताकि अंत में एक ऐसी जबरिया ‘संधि’ बनाई जाए जिससे इन देशों के अतिरिक्त और किसी के पास यह तकनीकी न आ पाए। और मुलम्मा इस्तेमाल होगा ‘अन्तरिक्ष में शांति और अप्रसार’ का। और सैटलाइट-रोधी हथियार-प्रणाली से लैस यह तीन देश बन बैठते अन्तरिक्ष में ‘सफाई’ के ‘थानेदार’।

इससे यह अमीर और ‘दबंग’ देश कई फायदे देख रहे हैं- एक तो भारत-सरीखे विकाशसील देशों को अगर अपने उपग्रहों का कचरा अगर साफ करना होता तो यह ‘थानेदार’ देश मनमाना दाम वसूल सकते थे, ठीक वैसे ही जैसे किसी रेगिस्तान में कुएँ का एकाधिकार खरीद बैठा दुकानदार आपसे मनमाना दाम वसूलेगा।

दूसरे, इस तकनीकी का प्रसार केवल अपने हाथ में रख कर यह देश दूसरे देशों को इस तकनीकी के उपयोग के बदले अपने सामरिक पाले में कर लेते। मसलन चीन कई छोटे-मोटे देशों के सामने यह शर्त रख सकता था कि यदि उन्हें अपना अन्तरिक्ष-कचरा चीन से साफ कराना है तो उन्हें अलाने-फलाने मामले में सुरक्षा परिषद में भारत के खिलाफ वोट डालना होगा।

तीसरा और सबसे जरूरी, चीन के लगातार आक्रामक होते जा रहे रवैये के चलते आज नहीं तो कल भारत-चीन सैन्य संघर्ष तय है। ऐसे में अगर चीन भारत के पास यह तकनीकी आने के पहले प्रतिबन्ध लगाने में सफल हो जाता तो हमारे सभी सैन्य-असैन्य उपग्रह चीन की उपग्रह-मारक मिसाइलों का निशाना होते और हम कुछ न कर पाते।

नाभिकीय अप्रसार के समय यही दोगली चालचली जा चुकी है

जिन्हें यह ‘conspiracy theory’ या कोरी गल्प लग रहा हो, उन्हें नाभिकीय अप्रसार संधि के मुद्दे पर भारत का रुख याद करना चाहिए। किसी मोदी या संघ नहीं, पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी के काल में (1968) भारत ने हस्ताक्षर करने से इसीलिए मना कर दिया था कि यह दोहरे मापदण्ड पर आधारित थी- उस समय तक नाभिकीय हथियार प्राप्त कर चुके देशों ने अपने हथियारों का जखीरा सलामत रखते हुए दूसरों के नाभिकीय हथियार बनाने पर रोक लगा दी थी।

यही चीज़ एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप पर हमला करने वाली (आईसीबीएम) मिसाइलों के मामले में हुआ। खुद इनसे अच्छी तरह लैस होने के बाद अमेरिका-रूस ने दूसरों के पास इन्हें जाने से रोकने के लिए इन्हें भी विश्व-शांति के नाम पर प्रतिबंधित कर रखा है।

2007: जब सैटेलाइट को मार गिरा चीन बना था अंतरिक्ष महाशक्ति; पढ़िए क्या कुछ हुआ था उसके बाद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज बुधवार (मार्च 26, 2019) को भारत के अंतरिक्ष महाशक्ति बनने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि भारत ने आज एक अभूतपूर्व सिद्धि हासिल की है। भारत में आज अपना नाम ‘स्पेस पावर’ के रूप में दर्ज करा दिया है। अब तक रूस, अमेरिका और चीन को ये दर्जा प्राप्त था, अब भारत ने भी यह उपलब्धि हासिल की है। हमारे वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में 300 किलोमीटर दूर LEO (Low Earth Orbit) में एक सक्रिय सैटेलाइट को मार गिराया है। ये लाइव सैटेसाइट जो कि एक पूर्व निर्धारित लक्ष्य था, उसे एंटी सैटेलाइट मिसाइल (A-SAT) द्वारा मार गिराया गया है। यह मिशन सिर्फ़ 3 मिनट में पूरा कर लिया गया।

लेकिन, क्या आपको पता है कि 2007 में चीन ने भी कुछ इसी तरह के ऑपरेशन को अंजाम दिया था, जिसने दुनिया में हलचल मचा दी थी। सभी देशों ने इसपर चिंता जताई थी और अंतरिक्ष में युद्ध छिड़ने की आशंकाओं के कारण उनकी चिंता बहुत हद तक सही भी थी। आइए एक नज़र डालकर देखते हैं कि चीन ने क्या किया था और उसके बाद का घटनाक्रम क्या था? चीन ने ने जनवरी 2007 की शुरुआत ही इसी से की थी। उस महीने में चीन ने अपने एंटी-सैटेलाइट वेपन का पहली बार सफलतापूर्वक प्रयोग किया था। इसके बाद ही अंतरिक्ष मिलिट्री स्पेस में उसने प्रमुख भूमिका निभाने की अप्रत्यक्ष रूप से घोषणा कर दी थी। इस टेस्ट के कुछ दिनों बाद अमेरिका ने अंतरिक्ष में सैटेलाइट के कचरे को ट्रैक कर लिया था।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि चीन द्वारा ऐसा किए जाने के 27 वर्ष पहले तक किसी भी देश ने ऐसा कुछ नहीं किया था। 1980 के दशक के मध्य वाले दौर में जब रूस और अमेरिका ने ऐसा ही कुछ किया था, तब किसी को शायद ही लगा था कि आने वाले समय में कोई भी देश ऐसा करने की हिमाकत कर पाएगा या फिर इस तरह की तकनीक या क्षमता विकसित कर पाएगा। दोनों देशों ने एंटी-सैटेलाइट तकनीक विकसित कर अंतरिक्ष में स्पेसक्राफ्ट को मार गिराया था। लेकिन, चीन ने 3 दशक बाद ही सही लेकिन यह कर दिखाया। चीन के इस शक्ति प्रदर्शन को अंजाम दिए अभी एक दशक से कुछ ही अधिक हुआ और भारत ने अंतरिक्ष महाशक्ति के रूप में दमदार एंट्री ली है।

चीन ने एक उम्रदराज मौसम सैटेलाइट को मार गिरा कर ये उपलब्धि हासिल की थी। उस समय विशेषज्ञों ने भविष्यवाणी की थी कि एंटी-सैटेलाइट आर्म्स की दौर में ये एक गलत ट्रेंड की शुरुआत करेगा। आज भारत के लिए ये तकनीत विकसित करने का सही समय था क्योंकि चीन द्वारा सीमा पर उत्पन्न किए जा रहे संकटों के दौर में ये प्रतिद्वंद्विता शक्ति प्रदर्शन की है, तकनीक की है, तैयारी की है, और नेतृत्व की है। उस समय चीन पर अमेरिका ने कुछ तरह के हथियार प्रतिबन्ध भी लगा रखे थे, इसीलिए कुछ विश्लेषकों ने इसे तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश पर चीन द्वारा एक दबाव के रूप में देखा था।

हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी में राकेट लॉन्चिंग और अंतरिक्ष क्रियाकलापों पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञ जोनाथन मैकडोवेल ने इसे पिछले दो दशकों में ‘Space Weaponization’ की दिशा में किया गया पहला प्रयास बताया था। उन्होंने दावा किया था कि चीन की इस हरकत के साथ ही 20 वर्षों से इस क्षेत्र में जो शांति और संयम का दौर चल रहा था, वो अब ख़त्म हो चुका है। व्हाइट हाउस ने चीन के इस कार्य के लिए चिंता जताई थी और कहा था कि न सिर्फ़ अमेरिका बल्कि अन्य देश भी इससे चिंतित हैं। अमेरिका ने भले ही चीन का उस समय विरोध किया हो, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की ग्लोबल संधि के प्रयासों का अमेरिका ही विरोध करता रहा है। अमेरिका इस क्षेत्र में किसी ‘Global Treaty’ के ख़िलाफ़ रहा है।

चीन ने इस चीज को बहुत ही गुप्त रखा था। यहाँ तक कि टेस्ट हो जाने के एक सप्ताह बाद भी अमरीका को पूरी तरह नहीं पता था कि ये सब कैसे हुआ? अगस्त 2006 में जॉर्ज बुश द्वारा एक नई राष्ट्रीय नीति अधिकृत की थी जिसमें इस तरह के परीक्षणों पर वैश्विक प्रतिबन्ध की बात को नकार दिया गया था। उस नीति में कहा गया था कि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका अंतरिक्ष में अपने अधिकारों, कष्टों और कार्रवाई की स्वतन्त्रता को संरक्षित रखेगा। विडंबना देखिए कि उसी नीति में अमेरिका ने यह भी कहा था कि अगर कोई अन्य देश उन अधिकारों को बाधित करने का प्रयास करता है या फिर ऐसा करने की क्षमता विकसित करने की कोशिश करता है, तो अमेरिका उसे ऐसा करने से मना करेगा, रोकेगा।

सालों से चीन और रूस इस मामले में एक वैश्विक संधि की वकालत करते रहे हैं, जो इस तरह के परीक्षणों पर प्रतिबन्ध लगाए। कई विश्लेषकों ने माना था कि चीन द्वारा ये हरकत दूसरे महाशक्तियों को इस संधि के पक्ष में करने के लिए की गई थी। ये पुराना हथकंडा रहा है जिससे ऐसे शक्ति-प्रदर्शनों कर के दूसरे देशों को ‘Negotiation Table’ पर लाया जाता है। कोल्ड वॉर के समय से ये हथकंडा अपनाया जाता रहा है। चीन ने भी कुछ ऐसा ही किया ताकि अंतरिक्ष के Weaponization पर अमेरिका को बातचीत के टेबल पर लाया जा सके। आइए अब एक नज़र डालते हैं कि चीन ने क्या और कैसे इस टेस्ट को किया था।

दरअसल, चीन ने जिस सैटेलाइट को ध्वस्त किया था, उसे 1999 में रिलीज किया गया था और वो उस सीरीज का तीसरा सैटेलाइट था। वो एक घन (Cube) के आकार का था, जिसके हर एक साइड का माप 4.6 फ़ीट था। इसके सोलर पैनल की लम्बाई 28 फीट के क़रीब थी। बता दें कि सूर्य से ऊर्जा लेने के लिए सैटेलाइट्स में सोनल पैनल (Photovoltaic Solar Panel) का प्रयोग किया जाता रहा है। बाहरी सौरमंडल (Outer Solar System) में, जहाँ सूर्य का प्रकाश काफ़ी कम होता है, वहाँ ‘Radioisotope Thermoelectric Generators (RTGs)’ को उपयोग में लाया जाता है। ये सोलर पैनल प्रकाश (Sunlight) को Electricity में कन्वर्ट करता है।

उस टेस्ट में चीन ने एक ज़मीन आधारित (Ground Based) इंटरसेप्टर का प्रयोग किया था। इसने Warhead में विस्फोट करने की बजाय ‘Sheer Force Of Impact’ का प्रयोग कर सैटेलाइट के परखच्चे उड़ा दिए थे। उक्त सैटेलाइट रिटायरमेंट की उम्र में पहुँच चुका था लेकिन मार गिराए जाने के समय वह इलेक्ट्रॉनिक रूप से ज़िंदा था, जिस से इसे एक ‘Ideal Target’ माना गया होगा। कैम्ब्रिज के वैज्ञानिक डेविड सी राइट ने अनुमान लगाया था कि ये सैटेलाइट 800 फ़्रैगमेन्ट्स में टूटा था, जो कि 4 इंच के आसपास के माप वाले थे। चौंकाने वाली बात अब सुनिए। डेविड के मुताबिक़, कचरे के रूप में उस सैटेलाइट के करोड़ों टुकड़े हुए थे जो कि अंतरिक्ष में बिखर गए। इसे ‘Space Debris’ कहा जाता है।

अब थोड़ी सी बात रूस और अमेरिका के परीक्षणों के बारे में कर लेते हैं। सोवियत यूनियन ने 1968 और 1982 के बीचे ऐसे दर्जनों एंटी-सैटेलाइट परीक्षण किए थे। कहा नहीं जा सकता कि इनमें से कितने सफल रहे और कितने असफल। राष्ट्रपति रीगन के शासनकाल में अमेरिका ने 1985-86 में ऐसे परीक्षण किए थे। अमेरिका में लेजर हथियार बनाने के लिए सालों से रिसर्च चल रहा है और लेजर हथियारों को भविष्य में अंतरिक्ष युद्ध की स्थिति में सबसे प्रभावी माना जाता रहा है। भारत शांतिप्रिय देश रहा है और इसीलिए भारत ने ईमानदारी से सारी चीजों को सार्वजनिक रूप से वैश्विक पटल पर रख दिया है। लेकिन चीन के विषय में ऐसा कुछ नहीं हुआ था। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने तो इसे मीडिया की चर्चा बताते हुए कहा था कि उन्हें इन सब चीजों पर बयान देने के लिए समय नहीं है।

जापान ने चीन के परीक्षण के बाद कहा था कि सभी देशों को अंतरिक्ष का शांतिपूर्वक उपयोग करना चाहिए। रूस ने कहा था कि वो हमेशा से अंतरिक्ष का सैन्यीकरण के विरुद्ध रहा है। ब्रिटिश शासन ने तो चीन से अपना विरोध तक दर्ज कराया। उन्होंने अंतरिक्ष में कचरे के दुष्प्रभाव को लेकर चिंता जताई थी। ये चिंता जायज थी क्योंकि उस कचरे ने पिछले 50 वर्षों में सबसे ख़तरनाक Fragmentation को अंजाम दिया था। उस कचरे के अधिकतम 3850 किलोमीटर तक की दूरी तक फ़ैल जाने का अंदेशा जताया गया था, जो कि धरती के पूरे लो ऑर्बिट को कवर करता है।

‘लोगों ने आम आदमी पार्टी को वोट ही क्यों दिया’ – क्या दिल्ली की जनता ने ऐसा करके गलती की?

अरविन्द केजरीवाल, दिल्ली के मुख्यमंत्री, आम आदमी पार्टी के संयोजक, और कुछ दिन पहले तक कॉन्ग्रेस से गठबंधन को उत्सुक, ने एक बार फिर कॉन्ग्रेस पर जोरदार हमला बोला है। अपनी पूर्ववर्ती शीला दीक्षित सरकार पर दिल्ली के विकास की अनदेखी करने का आरोप लगाते हुए केजरीवाल ने कहा कि उनकी पार्टी आप का जन्म कॉन्ग्रेस की विफलताओं से हुआ है।

केजरीवाल उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के रोहिणी में एक जनसभा में कहा, “मुझसे लोग पूछते हैं कि अगर शीला जी ऐसे (बिना पूर्ण राज्य के दर्जे के) सरकार चला सकतीं हैं, तो आप क्यों नहीं?’ मैं उनसे पूछता हूँ कि क्या शीला दीक्षित सच में सरकार चला रहीं थीं? अगर ऐसे ही सरकार चलानी होती तो हम भी चला सकते थे। अगर वो इतना अच्छा ही कर रहीं थीं तो लोगों ने हमें क्यों चुना? लोगों ने आम आदमी पार्टी को वोट ही क्यों दिया?”

उन्होंने आगे कहा, “यह देश सत्तर सालों तक आपके (कॉन्ग्रेस के) राज में ही था। अगर आपने सचमुच अच्छा काम किया होता, तो आम आदमी पार्टी का अस्तित्व ही न होता।”

दिल्ली को पूर्ण राज्य के दर्जे की माँग को दोहराते हुए केजरीवाल ने दावा किया कि इससे स्वास्थ्य, शिक्षा, और आधारभूत ढाँचे को बेहतर बनाने में आसानी होगी। उन्होंने यह भी दावा किया कि 2015 में चुनाव जीतने के बाद से उनकी सरकार ने अधिकांश क्षेत्रों में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है, पर कई जगह उन्हें पूर्ण राज्य न होने से दिक्कतें आ रहीं हैं। ऐसे क्षेत्रों में कानून व्यवस्था, घरों की समस्या, और शिक्षा में आरक्षण है। गौरतलब है कि हाल ही में केजरीवाल ने दिल्ली में शिक्षा और रोज़गार में 85% आरक्षण की योजना एक चुनावी सभा में सामने रखी थी।

ASAT तकनीक 2012 से ही थी भारत में, कॉन्ग्रेस के लचर नेतृत्व के कारण फाँक रही थी धूल

आज का दिन ऐतिहासिक है। भारत के लिए, विश्व के लिए और विज्ञान के लिए भी। आज 27 मार्च को भारत दुनिया का चौथा ऐसा देश बना, जिसने सफलतापूर्वक ऐंटी सैटलाइट वेपन (A-SAT) लॉन्च किया। आज से पहले यह उपलब्धि सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन ने ही हासिल की थी।

‘जय जवान, जय किसान’ वाले देश को ‘जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान’ वाला देश बनते देखना एक सुखद अहसास है। यह इतने बड़े गर्व की बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्र के नाम संदेश जारी करना पड़ा। लेकिन यह जानकर आप सभी को बहुत आश्चर्य होगा कि जिस तकनीक को हम 2019 में सफल होते देख पाए, दरअसल वो तकनीक हमारे वैज्ञानिकों के पास 2012 से ही उपलब्ध थी।

ख़बर पक्की है, लेकिन विश्वास करने में थोड़ा समय लगेगा और कुछ पुरानी जानकारियों की भी जरूरत पड़ेगी। और यही हमारा काम है – आप तक जानकारियों को पहुँचाना। THE DIPLOMAT नाम की एक प्रतिष्ठित न्यूज पोर्टल है। 14 जून 2016 को इसमें India’s Anti-Satellite Weapons नाम का एक आर्टिकल छपा था। यह आर्टिकल 2013 में चीन के द्वारा डॉन्ग नेंग-2 (Dong Neng-2) ऐंटी सैटलाइट वेपन की सफलतापूर्वक टेस्टिंग और उसके कारण अंतरिक्ष रक्षा-सुरक्षा में वैश्विक होड़ के ऊपर लिखी गई थी।

कहानी 2007 से

चीन की बात करें तो उसने सफलतापूर्वक 2007 में सबसे पहला ऐंटी सैटलाइट वेपन टेस्ट कर लिया था। पड़ोसी और विकास के रास्ते में प्रतिद्वंद्वी होने के कारण भारत में इसकी चर्चाएँ तब शुरू हो गईं थीं। समय के साथ तकनीक की जरूरतों पर बल देते हुए 2008 में तब के थल सेना अध्यक्ष जनरल दीपक कपूर ने भारत की अपनी ऐंटी सैटलाइट वेपन की आवश्यकता पर चर्चा की थी। तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी द्वारा शुरू किए गए ‘इंटिग्रेटेड स्पेस सेल’ पर तंज कसते हुए जनरल कपूर ने तब ‘स्टार वॉर्स’ के लिए तैयार रहने और उसकी तकनीक को पाने पर अपनी बात रखी थी।

2012 में आया मोड़

तब DRDO के प्रमुख वीके सारस्वत थे। एक दिन उन्होंने देश को चौंका दिया, यह घोषणा करके कि भारत के पास Low Earth Orbit और Polar Orbit में परिक्रमा करने वाले सैटेलाइट को निष्क्रिय करने लायक ऐंटी सैटलाइट वेपन की सारी तकनीक और उसे बनाने के लिए सारे कल-पूर्जे मौजूद हैं। तब सारस्वत ने सुझाव दिया था कि भारत की ऐंटी-बैलिस्टिक मिसाइल (एबीएम) रक्षा कार्यक्रम का उपयोग एक ऐंटी सैटलाइट वेपन के रूप में किया जा सकता है। सारस्वत ने तब यह बात तुक्के में नहीं कही थी। क्योंकि उनके कहने के बाद DRDO द्वारा भी इस बात की पुष्टि की गई थी, जिसमें कहा गया था कि भारतीय की बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा कार्यक्रम को ऐंटी सैटलाइट वेपन को विकसित करने में शामिल किया जा सकता है।

ऐसा नहीं था कि DRDO की इस घोषणा के बाद सारे लोग गर्व से फूले समा रहे थे। कुछ लोग ऐसे भी थे, जो सवाल खड़े (जो हमेशा से होता है) कर रहे थे। तब देश में यूपीए की सरकार थी। सरकार चाहती तो इस ऐतिहासिक घोषणा को तेजी देने के लिए और धरातल पर उतारने के लिए बहुत कुछ कर सकती थी – स्पेशल बजट देकर, वैज्ञानिकों की टीम बनाकर – विदेशी एडवांस तकनीक को देश में डेवलप करवाया जा सकता था। लेकिन ऐसा किया नहीं गया।

प्रतिबंध के द्वंद्व में नीति निर्माता

अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध को हौवा के रूप में देखने वाली कॉन्ग्रेस ने अटल बिहारी वाजपेयी के दृढ़ नेतृत्व से भी कोई सीख नहीं ली थी। और ऐसा तब किया गया जब देश अच्छा-खासा मजबूत हो चुका था – आर्थिक और सैन्य दोनों रूपों से। ऐंटी सैटलाइट वेपन को डेवलप करने और उसके सफलतापूर्वक टेस्ट करने की बात तो छोड़ दीजिए। UPA सरकार ने तब इतना भी जज्बा नहीं दिखाया था कि किसी सैटेलाइट को डायरेक्ट हिट करने के बजाय fly-by test ही कर लिया जाए। इसमें अंतरिक्ष में कचरा भी नहीं फैलता (क्योंकि इसमें सैटेलाइट को वेपन से हिट करने के बजाय उसके पास से गुजारना होता है) है और आप अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध के दायरों में भी नहीं आते हैं। और तो और, इसकी टेस्टिंग किसी सैटेलाइट को स्पेस बेस्ड लेज़र से जैम करके भी की जा सकती थी। लेकिन अफसोस वो भी UPA से हो न सका।

परमाणु परीक्षण हो या अंतरिक्ष में महाशक्ति बनने की राह – भाजपा नीत NDA सरकार ने हमेशा से देशहित को सर्वोपरि रखा है। ऐंटी सैटलाइट वेपन को धरातल पर उतारना और सफलतापूर्वक टेस्टिंग करना इसी की एक कड़ी है।

Hey न्यूयॉर्क टाइम्स f**k you, फिर से!

साल 2014 की बात है जब मंगल मिशन के अंतर्गत भारत पहले ही प्रयास में मंगल पर पहुँचने वाला दुनिया का पहला देश बना था। इसके बाद न्यूयॉर्क टाइम्स में एक कार्टून छपा था, जिसकी सोशल मीडिया से लेकर भारतीय समाचार पत्रों में जमकर आलोचना हुई थी।

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए मोदी सरकार के नेतृत्व में सितंबर 2014 का महीना ऐतिहासिक साबित हुआ था। मंगलयान (मार्स ऑर्बिटर) ने पहली ही कोशिश में मंगल की कक्षा में प्रवेश कर रिकॉर्ड बनाया था। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO), अमेरिकी नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA), रूसी संघीय अंतरिक्ष एजेंसी (RFSA) और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के बाद मंगल तक पहुँचने वाली चौथी अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी बनकर उभरी थी। इस मिशन की ख़ास बात यह थी कि यह दुनिया का सबसे किफायती मंगल अभियान है। इसमें करीब ₹450 करोड़ खर्च हुए और इस तरह से अपने मंगल मिशन में भारत ने चीन को भी पछाड़ दिया था। वो इसलिए, क्योंकि चीन और जापान अपने पहले मंगल मिशन में नाकामयाब रहे थे।

लेकिन भारत के मंगल मिशन को लेकर अमेरिकी अखबार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने अपनी अभिजात्य मानसिकता को छुपा नहीं पाया था और एक विवादित कार्टून को माध्यम बनाकर भारत के अंतरिक्ष अभियानों पर कटाक्ष करने का प्रयास किया। इस कार्टून में पगड़ी पहने हुए एक भारतीय शख्स को गाय के साथ ‘एलीट स्पेस क्लब’ का दरवाजा खटखटाते दिखाया गया था। भीतर क्लब के कमरे में संभ्रात से दिख रहे कुछ लोग बैठे हैं और एक सदस्य को अखबार पढ़ते दिखाया गया, जिसमें भारत का मंगल मिशन टॉप हेडलाइन था। कमरे में बैठे दोनों ही सदस्य बाहर के शख्स के दरवाजा खटखटाने से खुश दिखाई नहीं दे रहे थे। इस कार्टून की चौतरफा आलोचना हुई।

यह कार्टून उन पुराने दिनों की याद दिलाता है, जब ब्रिटिश उपनिवेशवाद के समय इसी तरह एलीट क्लब हुआ करते थे, जिसमें सफेद चमड़ी वाले लोगों को ही प्रवेश मिलता था। (न्यूयोर्क टाइम्स, 2014)

शायद अमेरिकी अखबार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने यह कार्टून उन पुराने दिनों की याद दिलाने के लिए जारी किया था, जब भारत पर अंग्रेजों का शासन था और श्वेत-अश्वेत के बीच भेदभाव अपने चरम पर था। अखबार के इस कार्टून की आलोचना खूब हुई थी क्योंकि यह एक कार्टून मात्र न होकर ‘नस्लीय टिप्पणी’ के तौर पर देखा गया था, जो एक विकासशील देश के नागरिकों की बड़ी कामयाबी से जन्मी असहजता का प्रतीक था। यह कार्टून हर हाल में घमंडी और नस्लीय मानसिकता की उपज था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज राष्ट्र को संबोधित करते हुए ऐंटी सैटलाइट वेपन A-SAT सफलतापूर्वक लॉन्च किया और DRDO के सभी वैज्ञानिकों को इसके लिए बधाई भी दी। भारत ने अंतरिक्ष में आज एक और कामयाबी का परचम लहराया है और मिशन शक्ति (Mission Shakti) की सफलता के साथ अमेरिका, चीन, रूस के बाद भारत दुनिया का चौथा सबसे शक्तिशाली देश बन गया है। खास बात यह रही कि भारत ने किसी अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन भी नहीं किया है। मिशन शक्ति, विश्वभर की सभी शक्तियों के लिए मोदी सरकार द्वारा दिया गया एक बेहतरीन सन्देश है।

वहीं, दूसरी ओर इस देश के विपक्ष में बैठे कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इस बड़ी उपलब्धि में भी परिवारवाद के नशे में चूर हैं। कॉन्ग्रेस पार्टी ने तुरंत इस कामयाबी का श्रेय भी बिना समय बर्बाद किए राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी की दादी इंदिरा और जवाहरलाल नेहरू को देते हुए जता दिया कि देश के हर बड़े-छोटे संस्थान, बौद्धिक केंद्र पर गाँधी परिवार ने सत्ता में रहकर एहसान किया है। ये वही पार्टी है जिसका मानना था कि पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक करने नरेंद्र मोदी नहीं बल्कि सेना गई थी। हालाँकि, नरेंद्र मोदी ने ये छटपटाहट कभी नहीं दिखाई और श्रेय हमेशा सेना, रक्षा संस्थानों, DRDO और ISRO को ही दिया है।

देखा जाए तो न्यूयॉर्क टाइम्स में छपा हुआ वह कार्टून कॉन्ग्रेस की अभिजात्य मानसिकता को दर्शाता है, जिसमें क्लब में बैठे हुए कुछ सभ्रांत लोग सिर्फ इसलिए असहज हो जाते हैं क्योंकि कोई आम नागरिक प्रधानमंत्री बनकर खुद को देश का प्रधानसेवक कहकर अपने हर कार्य को राष्ट्र को समर्पित करता है।

गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने डिप्टी सीएम को मंत्रिमंडल से हटाया, BJP में शामिल हुए 2 MLA

गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने डिप्टी सीएम सुदीन धवलीकर को मंत्रिमंडल से हटा दिया है। एमजीपी नेता सुदीन धवलीकर सावंत के नेतृत्व वाली गोवा कैबिनेट में परिवहन और सार्वजनिक निर्माण विभाग को संभाल रहे थे।सुदीन धवलीकर को एमजीपी विधायक दीपक पावस्कर और गोवा के पर्यटन मंत्री मनोहर अजगांवकर ने एमजीपी से अलग कर दिया और बुधवार की सुबह भाजपा के साथ अपने विधायी विंग का विलय कर दिया।

पावस्कर और अजगांवकर ने एमजीपी विधायक दल को भाजपा के साथ गोवा विधानसभा अध्यक्ष माइकल लोबो के साथ विलय करने का पत्र सुबह 1 बजे दिया। बता दें कि इससे पहले बुधवार को बीजेपी ने एमजीपी विधायकों के पार्टी में विलय पर चर्चा के लिए पणजी में अपने मुख्य कार्यालय में अपने विधायकों और पदाधिकारियों की एक आपात बैठक बुलाई।

इस विलय ने गोवा विधानसभा के 36-सदस्यीय सदन में भाजपा की ताकत 12 से बढ़ाकर 14 कर दी, जिससे अब बीजेपी में विधायकों की संख्या विपक्षी कॉन्ग्रेस के बराबर हो गई है।


पूरा घटनाक्रम ये रहा कि सरकार में अहम सहयोगी रही महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी का मंगलवार आधी रात के बाद भारतीय जनता पार्टी में ‘विलय’ हो गया। MGP के 2 विधायकों, मनोहर अजगांवकर और दीपक पावस्कर ने अपनी पार्टी को बीजेपी में शामिल कर लिया। 3 में सें 2 विधायकों ने विधायी शाखा का विलय किया है। इसका अर्थ यह हुआ कि वे दल-बदल विरोधी कानून के दायरे में आने से बच गए हैं। क्योंकि इस कानून के तहत यह अनिवार्य है कि विलय के लिए दो तिहाई सदस्यों की सहमति हो। विधायकों ने मंगलवार को MGP से अलग होकर MGP (2) समूह बनाया था और अब उन्होंने विधायी इकाई का BJP में विलय कर दिया। लोबो ने इस बात की पुष्टि की कि उन्हें विलय के संबंध में देर रात पौने एक बजे पत्र मिला। उन्होंने बताया कि इस पत्र पर सुदीन धवलीकर के हस्ताक्षर नहीं हैं। 

#मिशन_शक्ति: क्या ख़ास है इसमें, जिसने भारत को बना दिया अंतरिक्ष महाशक्ति – मुख्य बिंदु

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आज बुधवार (मार्च 26, 2019) को भारत के अंतरिक्ष महाशक्ति बनने की घोषणा की गई। उन्होंने कहा कि भारत ने आज एक अभूतपूर्व सिद्धि हासिल की है। भारत ने आज अपना नाम ‘स्पेस पॉवर’ के रूप में दर्ज करा लिया है। अब तक रूस, अमेरिका और चीन को ये दर्जा प्राप्त था, अब भारत ने भी यह उपलब्धि हासिल कर ली है।

बकौल प्रधानमंत्री, हमारे वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में 300 किलोमीटर दूर LEO (Low Earth Orbit) में एक लाइव सैटेलाइट को मार गिराया है। ये लाइव सैटेसाइट जो कि एक पूर्व निर्धारित लक्ष्य था, उसे एंटी सैटेलाइट वेपन (A-SAT) द्वारा मार गिराया गया है। यह मिशन सिर्फ़ 3 मिनट में पूरा कर लिया गया।

मिशन शक्ति के बारे में प्रमुख बातें

पीएम ने बताया कि भारत ने ‘ऑपरेशन शक्ति’ के माध्यम से अंतरिक्ष शक्ति के रूप में ख़ुद को स्थापित कर लिया है और हमें भविष्य की चुनौतियों का सामना करने और अपने नागरिकों के जीवन स्तर में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए आधुनिक तकनीकों को अपनाना ही होगा।

पीएम ने बताया कि भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में जो काम किया है, उसका मूल उद्देश्य भारत की सुरक्षा, आर्थिक विकास और तकनीकी प्रगति है। आज का यह ‘मिशन शक्ति’ इन सपनों को सुरक्षित करने की ओर एक अहम कदम है।

मिशन शक्ति के बारे में प्रमुख बातें

पीएम ने कहा, “मैं मिशन शक्ति से जुड़े सभी अनुसंधानकर्ताओं और अन्य सहयोगियों को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ, जिन्होंने इस असाधारण सफलता को प्राप्त करने में योगदान दिया है। हमें हमारे वैज्ञानिकों पर गर्व है।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सम्बोधन के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने एक-दूसरे को बधाइयाँ दी। यह सचमुच ख़ास है क्योंकि यह पराक्रम इस से पहले विश्व में सिर्फ़ 3 देश (अमेरिका, रूस और चीन) ही कर सके हैं।

मिशन शक्ति: सैटेलाइट को मार गिरा भारत बना अंतरिक्ष महाशक्ति, दुनिया का चौथा देश

पीएम नरेंद्र मोदी ने आज राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा, “ऐंटी सैटलाइट वेपन A-SAT सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया। मैं इसके लिए डीआरडीओ के सभी वैज्ञानिकों को इसके लिए बधाई देना चाहता हूं।”

“भारत ने अपना नाम अंतरिक्ष महाशक्ति के रूप में दर्ज करा लिया है। अब तक अमेरिका, रूस और चीन को ही यह उपलब्धि हासिल है। भारत चौथा देश है जिसने आज यह सिद्धि प्राप्त की है। हमारे वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में 300 किलोमीटर दूर (Low Earth Orbit) में एक सैटेलाइट को मार गिराया। यह एक पूर्व निर्धारित लक्ष्य था। इसे सिर्फ़ 3 मिनट में मार गिराया गया। इसका नाम मिशन शक्ति था। यह एक अत्यंत कठिन ऑपरेशन था। इसके लिए उच्च कोटि की तकनीकी क्षमता की आवश्यकता थी। हमारे लिए यह गर्व की बात है। यह पराक्रम भारत में ही विकसित मिसाइल से पूरा किया गया। इसके लिए इस से जुड़े सभी लोगों को बधाई।”

अंतरिक्ष हमारे जीवनशैली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। कृषि से लेकर संचार और मौसम, शिक्षा, मेडिकल तक उपग्रहों का लाभ हमें मिल रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज बुधवार (मार्च, 2019) को सोशल मीडिया पर बताया कि वो 12 बजे दोपहर को देशवासियों के बीच एक सन्देश लेकर आएँगे। उसके बाद से ही कयास लगाए जा रहे थे कि यह सन्देश किस बारे में होगा? मोदी के देश के नाम सन्देश देने से पहले उनके साथ वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों की भी उपस्थिति थी। विश्लेषकों ने बताया कि सुरक्षा से सम्बंधित सभी अधिकारियों व मंत्रियों ने पीएम के साथ एक बैठक की। सन्देश पहले ही रिकॉर्ड कर लिया गया था।