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ओवैसी ने इकबाल के लिए माँगी थी सुषमा स्वराज से मदद, अब कह रहे हैं धन्यवाद

हमेशा से BJP की आलोचना करने के लिए पहचाने जाने वाले असदुद्दीन ओवैसी ने अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट करते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को धन्यवाद दिया है। ओवैसी द्वारा विदेश मंत्री को यह धन्यवाद कल न्यूजीलैंड में हमले का शिकार हुए लोगों के परिवार वालों को शीघ्र से शीघ्र वहाँ भेजने के लिए किए जाने वाले प्रयासों पर दिया गया।

दरअसल, कल (मार्च 16, 2019) न्यूज़ीलैंड में हुए हमले में जो लोग घायल हुए, उसमें हैदराबाद निवासी इक़बाल जहाँगीर के भाई अहमद जहाँगीर भी शामिल हैं। हमले की खबर सुनने के बाद इकबाल अपने भाई के परिवार को सहारा देने के लिए न्यूज़ीलैंड जाना चाहते थे। इसके लिए ओवैसी ने ट्वीटर के ज़रिए सुषमा स्वराज से माँग की थी कि इकबाल के न्यूजीलैंड जाने के लिए जरूरी प्रबंधन करा दें।

इस ट्वीट के कुछ देर बाद ही, इस मामले का अपडेट देने के लिए ओवैसी ने एक और ट्वीट किया। इसमें उन्होंने कहा कि वो सुषमा स्वराज का धन्यवाद करते हैं कि उन्होंने खुद उन्हें अहमद के परिवार वालों को समय से न्यूज़ीलैंड पहुँचाने संबंधी प्रयासों से अवगत कराया।

ओवैसी ने लिखा कि वो भारत के विदेश मंत्रालय से संपर्क में हैं और उन्होंने आश्वासन दिया है कि वे वीजा प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए सभी प्रयास कर रहे हैं।

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक अहमद जहाँगीर न्यूऑर्क में पिछले 15 सालों से हैदराबादी रेस्टरां चला रहे थे। शुक्रवार को अल-नूर मस्जिद में हुए हादसे के बाद वह गंभीर रूप से घायल हुए और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसके अलावा इस हमले में उन 9 भारतीय लोगों की सूची में एक नाम फरहाज अहसान का भी है, जो उस दिन मस्जिद में नमाज़ पढ़ने आए थे और तब से गायब हैं।

‘राम जन्मभूमि’ 29 मार्च को होगी रिलीज़, अब्दुल मेमन की धमकी के बावजूद सेंसर बोर्ड ने दी मंज़ूरी

शिया वक्फ बोर्ड उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष वसीम रिज़वी की फ़िल्म ‘राम जन्मभूमि’ को सेंसर बोर्ड की मंज़ूरी मिल गई है और 29 मार्च को रिलीज़ होने वाली है। रिज़वी द्वारा लिखित और निर्मित इस फ़िल्म में 1990 में राम मंदिर आंदोलन के बाद हुई घटनाओं को दर्शाया गया है। निक़ाह-हलाला जैसी सामाजिक बुराई को उजागर करने के लिए फ़िल्म में ख़ुद रिज़वी ने काम किया है।

रिज़वी ने बताया कि इस फ़िल्म की रिलीज़िंग से पहले ही उन्हें धमकियाँ मिल रही हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें टाइगर मेमन के भाई अब्दुल मेमन द्वारा धमकी दी गई थी, जो 1993 के मुंबई बम विस्फोट मामले में एक प्रमुख संदिग्ध था। फ़िल्म को कई धार्मिक समूहों के ग़ुस्से का सामना करना पड़ रहा है, जिससे इसके प्रदर्शन पर जमकर विरोध हो रहा है। इसके अलावा रिज़वी को राजकुमार याकूब हबीउद्दीन तुसी ने एक क़ानूनी नोटिस भेजा, जो ख़ुद को अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर की छठी पीढ़ी के वंशज होने का दावा करता है, ने रिज़वी को फ़िल्म रिलीज़ न करने की चेतावनी दी, क्योंकि उसे लगता है कि यह फिल्म मुगल सम्राट बाबर का तिरस्कार करती है।

बाबरी मस्जिद को ‘देश का कलंक’ कहने के बाद रिज़वी को इस्लामी मौलवियों के कोप का सामना भी करना पड़ा। पिछले साल अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के तीन संदिग्ध सहयोगियों को दिल्ली पुलिस के विशेष दल ने गिरफ़्तार किया था क्योंकि वे रिज़वी को मारने की योजना बना रहे थे। पुलिस ने तीनों संदिग्धों के पास से हथियार भी बरामद किए थे।

बता दें कि शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिज़वी ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर सभी मदरसों को बंद करने अपील की थी। इस पत्र में उन्होंने लिखा था कि मदरसों की शिक्षा छात्रों को आतंकवादी बनने के लिए प्रोत्साहित करती है। ऑल इंडिया फैज़ान-ए-मदीना काउंसिल (AIFMC) नामक एक मुस्लिम संगठन ने मदरसों पर अपनी टिप्पणी के बाद रिज़वी के सिर पर ₹10 लाख के इनाम की घोषणा कर दी थी।

सागरिका जी! आपके ‘लिबरल’ होने का मलतब ‘दक्षिणपंथियों’ का आतंकवादी होना नहीं है… समझिए वरना देर हो जाएगी!

कल न्यूजीलैंड में जो हमला हुआ वह किसी को भी भीतर तक झकझोर देने वाला है। काले कपड़े में मस्जिद में घुसा एक अनजान आदमी करीब 50 लोगों को मौत के घाट उतार कर चला गया। विश्व के कोने-कोने में इस कृत्य की निंदा हुई। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने जहाँ मरे हुए लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए राष्ट्रीय झंडा तक झुकवा दिया, वहीं पाकिस्तान तक के प्रधानमंत्री इमरान खान भी अपने बयान पर अटल रहे कि ‘आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता’। लेकिन ऐसे गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर भी भारत के कुछ तथाकथित लिबरलों से चुप्पी नहीं साधी गई।

हर मुद्दे में अपनी विचारधारा के मुताबिक एंगल ढूँढ लेने वाला यह लिबरल गिरोह एक तरफ़ जहाँ पुलवामा/उरी जैसे हमले पर सरकार से जवाब माँगता है और IAF के हमले पर सवाल उठाता है। वहीं न्यूज़ीलैड की घटना पर एकदम से निर्णायक बनकर उभरा। कल इस हमले के बाद रात में करीब साढ़े आठ बजे न्यूज़ जगत की महान हस्तियों में से एक सागरिका घोष का ट्विटर पर एक ट्वीट आया। जिसकी उम्मीद शायद लोगों को पहले से ही थी। उन्होंने अपने इस ट्वीट में हमले का कारण न केवल दक्षिणपंथियों को बताया बल्कि उन्होंने दक्षिण पंथियों को आतंकवादी ही घोषित कर दिया।

‘WHY I AM A LIBERAL’ की लेखिका और भारतीय समाचार जगत के सबसे ऊँचे नामों में से एक सागरिका का यह ट्वीट निसंदेह ही हास्यास्पद है, लेकिन इस पर गंभीर विचार करने की भी बहुत आवश्यकता है। लिबरलों का वह गिरोह जो भारत में एक आतंकी की मौत पर शोक मनाने की सलाह और संवेदनाओं पर लंबा-चौड़ा लेख लिख देता है। उसी गिरोह के लोग न्यूज़ीलैंड जैसे मौक़ों पर एकतरफा निर्णय देने से नहीं चूकते। चूँकि, कल न्यूज़ीलैंड के किसी मस्जिद में यह हमला हुआ और हमलावार के निशाने पर इस्लाम को मानने वाले लोग थे। तो सागरिका ने सीधा इसके तार ‘दक्षिणपंथी’ आतंक से जोड़ दिए। जबकि हमलावार ने खुद फेसबुक के जरिए बताया था कि इस हमला को किन कारणों से प्लान किया गया था।

आतंकवाद को मजहब से न जोड़ने की सलाह देने वाली विचारधारा के लोग सीधे दक्षिणपंथियों को आतंकवादी घोषित कर गए। बिना यह जानें कि जिस ब्रेंटन टैरंट का नाम इस हमले में आ रहा है वह खुद को स्कॉटिश, इंग्लिश और आयरिश पेरेंट्स की संतान बताता है। 2017 में एक आतंकी हमले का शिकार हुई एब्बा नाम की लड़की की मौत से आहत व्यक्ति ने अपने भीतर बदले की आग को अगर आतंकवादी हमले का रूप दे दिया तो इसमें दक्षिणपंथियों की भूमिका कैसे आ गई?

ट्विटर पर 280 शब्दों की शब्द सीमा इतनी भी कम नहीं है सागरिका जी कि आप यह न समझा पाएँ कि आपने दक्षिणपंथियों को आतंकवाद का रूप क्यों बताया? आपके लिबरल हो जाने से हर दूसरी विचारधारा आतंकी नहीं हो जाती। इस हमले पर कल से हर कोई शोक मना रहा है जो दर्शाता है कि मानवता अब भी लोगों में बरकरार है। लेकिन शायद तथाकथित लिबरलों को इससे कोई लेना-देना नहीं हैं। तभी उन्होंने इस ऐसे मामले पर भी अपना एंगल मेंटेन कर लिया।

सागरिका जैसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बात करने वाले लोग जब भूल जाते हैं कि उनके लिखे एक-एक शब्द का असर उनके पाठकों पर क्या पड़ रहा है तो उसे अतिवाद ही मान लेना चाहिए। क्योंकि ‘ऐसे’ समय में वो उस जनमत का निर्माण कर रहे होते हैं जो कि आने वाले समय में दो विचारधाराओं के बीच दंगे-फसाद का कारण बन सकता है। राजनैतिक और सामाजिक दृष्टि से किसी की भी हर मुद्दे पर दो राय हो सकती है लेकिन मानवता के लिहाज़ से कभी दो नज़रिए नहीं होते हैं। क्योंकि, उस लक्ष्य में भावनाओं को संरक्षित किया जाता है। इसको समझिए! परिस्थितियाँ चाहे कुछ भी हों, लेकिन आतंकवादी हमला करने वाले आतंकवादी ही कहलाते हैं। जो आप आज समाज को दे रहे हैं कल को समाज आपको वही लौटाएगा, और यह बात हर संदर्भ में प्रासांगिक है।

सोशल मीडिया पर पहले ही दो विचारधारा के लोगों को IT सेल की कार्यशैलियों द्वारा वॉर रूम के डिबेटर्स में तब्दील किया जा चुका है। अब व्यक्ति के भीतर तक ऐसे भावनाओं को मत उपजाएँ कि जाति-पाति से परेशान लोग सेकुलकर देश में एक दूसरे की धर्म और विचारों से तंग आकर खतरनाक रूप ले लें। सागरिका के ट्विटर से ही मालूम पड़ा कि उन्हें ऑक्सफॉर्ड यूनियन में वक्ता के रूप में बुलाया गया है। उम्मीद है कि वह वहाँ जाकर अपने ट्वीट की तरह लोगों को बाँटने का प्रयास नहीं करेंगी। और याद रखेंगी कि आपके लिबरल होने का मतलब दक्षिणपंथियों का या उनकी विचारधारा का आतंकी होना नहीं है।

बिन बुर्क़े बाहर जाओगी तो हल्ला मच जाएगा: आईसिस ने यज़ीदी सेक्स स्लेव से यही कहा

इस्लामी आतंकियों और सेक्स कुंठा से भरे समाज के कई हिस्सों के बारे में जब कुछ बातें सामने आती हैं तो आश्चर्य होता है कि विरोधाभास और विडम्बना कहाँ तक जा सकती हैं। कल एक वीडियो सामने आया जहाँ यज़ीदी महिलाएँ, जो आईसिस द्वारा सेक्स स्लेव के रूप में हर दिन बलात्कार का शिकार होती रहीं थीं, बुर्कों को जला रही थीं।

इसके पीछे का कारण यह था कि आईसिस इस्लाम के उन तौर तरीक़ों में पूरी आस्था दिखाता है जो उसकी मर्ज़ी के हों। जैसे कि बुर्क़ा पहनना चाहिए, काफ़िरों को काट देना चाहिए, उन्हें बमों से उड़ा देना चाहिए, बलात्कार करना चाहिए आदि। बुर्क़ा पहनने के पीछे जो क्यूट कारण बताते हैं ये आतंकवादी, वो सुनकर कान से ख़ून निकल आता है, “ऐसे बाहर मत निकलो। मर्दों के आस-पास ऐसे मत दिखना।”

अब आप कहिए ‘वॉव, जस्ट फकिंग वॉव!’ 

शब्दों के लिए माफ़ी नहीं माँगूँगा क्योंकि ये सब जानने के बाद और कोई प्रतिक्रिया निकल नहीं पाती। पिछले सप्ताह कई सेक्स स्लेव (बलात्कार करने हेतु ग़ुलाम बनाई गई युवतियाँ और बच्चियाँ) इन आतंकियों के चंगुल से बाहर निकलकर आईं और रेगिस्तान में पंक्तिबद्ध खड़े होकर अपने बुर्क़ो को आग लगाया। हम या आप इन लड़कियों के अनुभव को समझ नहीं कर सकते क्योंकि इनकी यातना शरीर और दिमाग से परे इनकी निश्छल आत्माओं तक है। ये घाव हर स्तर पर गहरे हैं, और इनकी जिजीविषा से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।

इस वीडियो में एक यज़ीदी लड़की कहती है, “जब उन्होंने पहली बार मुझे वह (बुर्क़ा) पहनने के लिए विवश किया, तो मुझे अपना दम घुटता सा लगा। मुझे उसमें काफ़ी परेशानी हो रही थी। मैं बुर्क़ा पहनना नहीं चाहती थी पर उन्होंने इसे उतारने की अनुमति नहीं दी। वो कहते थे कि हर कोई पहन रहा है। जब भी मैं अकेली होती थी तो उसे उतार फेंकती थी। वह कहते थे, ‘ऐसे बाहर मत निकलो।’ ‘मर्दों के आस-पास ऐसे मत दिखना।’ पर जब भी वे मुझे अकेले में छोड़ते थे, मैं उसे उतार देती थी। अब मैं (यहाँ) आ गई हूँ और इसे उतार दिया है, और जला दिया है। यह क़िस्सा ख़त्म कर दिया है, ईश्वर की कृपा से। काश मैं दएश (आईसिस) को यहाँ ला पाती और जला पाती, जैसे मैंने अपने उन कपड़ों को जला दिया है।”

यजीदी लड़कियाँ बता रही हैं आपबीती

इस विचारधारा की जड़ में इस्लाम को दुनिया पर स्थापित करने की पुरानी ज़िद है। लेकिन आज का विश्व आँख मूँद कर इस आतंक को ‘आतंक का कोई रिलीजन नहीं होता’ कहते हुए शुतुरमुर्ग की तरह नकार रहा है। उनके झंडे पर उनके मज़हब का नारा बुलंद है, उनके कुकर्मों से पहले ‘अल्लाह’ के नाम का जयघोष होता है, और आप कहते हैं कि आतंक का कोई मज़हब नहीं होता!

एक तरफ इस्लाम को स्थापित करने की चाह, एक तरफ बुर्क़ा पहनाकर महिलाओं को यह बताना कि मर्दों के आस-पास शरीर को ढक कर रखना चाहिए, और दूसरी तरफ बलात्कार? दिन-रात बलात्कार कर रहे हों और ज्ञान दे रहे हो कि बाहर बुर्क़े में रहा करो क्योंकि मर्दों के सामने ऐसे नहीं जाना चाहिए! ये उच्च क़िस्म का घटिया नशा है जो शायद इन्होंने एक साथ सीरिया के किसी कच्चे तेल के कुएँ से पीकर पाया होगा, क्योंकि लॉजिक तो घास ही चरता दिख रहा है! 

ऐसे ही एक वीडियो देखा था जिसमें कई महिलाएँ (अलग-अलग जगहों पर) हिजाब पहनकर, कई अरबी/ इस्लामी कपड़ों में बैठे मर्दों के बीच उत्तेजक नृत्य कर रही थी। मैं कपड़ों का ज़िक्र कर रहा हूँ क्योंकि वीडियो से मज़हब का पता लगाना मुश्किल है। अंग्रेज़ी में इसे सिडक्टिव डान्स कह सकते हैं। क़ालीन बिछा हुआ है, मर्द घेरे पड़े हैं, टोपियाँ सर पर हैं, लड़की ने हिजाब से सर ढक रखा है और उसके कूल्हे थिरक रहे हैं। ये विचित्र स्तर का मानसिक दिवालियापन है कि सेक्सी नाच भी देखना है, और लड़की के संस्कार भी क़ायम रखने हैं। आप यूट्यूब पर वो वीडियो ख़ुद ढूँढ लीजिए क्योंकि वो इतना घटिया है कि मैं यहाँ रख नहीं सकता।

मतलब, समाज और मज़हबी जानकार कहते हैं कि महिला को सर ढक कर रखना चाहिए। इसलिए गर्दन से नीचे टू-पीस बिकिनी चलेगा, सेक्सी नाच चलेगा लेकिन सर तो ढका ही होना चाहिए क्योंकि मौलवी जी ने कहा है! ऐसे उदाहरणों पर आप न तो हँस सकते हैं, न गम्भीर हो सकते हैं। हँस इसलिए नहीं सकते कि हर व्यक्ति की भावनाएँ होती हैं, जज़्बात होते हैं, उन्हें उत्तेजक नृत्य देखना ज़रूरी लगता है, तो वो अपने मज़हबी बातों से रास्ता निकाल कर अपनी इच्छा की पूर्ति करते हैं।

गम्भीर इसलिए नहीं हो सकते कि आख़िर ये हो क्या रहा है! देखना है तो पूरा देख लो ठीक से कि नाचने वाली महिला ही है या किसी ने बुर्क़ा पहनकर पागल तो नहीं बनाया! ये कैसी मानसिकता है जिससे एक तरफ तो मज़हब का भी सम्मान हो रहा है और दूसरी तरफ अपनी ठरक का भी। जी, सही शब्द ‘ठरक’ ही है क्योंकि किसी महिला को उस तरह से घेरकर नचाना आपकी कुंठा की परिणति ही है, न कि आपके अंदर बैठा कला-प्रेमी जाग गया है।

ये इस विचारधारा का सत्य है। जो भी ऐसे आतंकियों के विरोध में नहीं हैं, वो इन्हें सहमति देने वाले हैं। क्योंकि किसी मसीहा और दूत के नाम पर बलात्कार, क़त्ल, ग़ुलामी आदि को जायज़ बताने को धिक्कार नहीं पाना बताता है कि आप भीतर से क्या चाहते हैं।

भारत के मुस्लिमों को पाकिस्तान भेज दो: सुप्रीम कोर्ट में याचिका पर जज साहब ने लिए ‘मजे’

भारत एक लोकतांत्रिक देश है। हर प्रकार की कला-संस्कृति को फलने-फूलने का एकसमान अवसर मिलता है यहाँ। अभिव्यक्ति की आजादी भी है यहाँ। लेकिन कुछ विकृत मानसिकता वाले लोग भी यहाँ मौजूद हैं, जो अपनी उल-जलूल हरक़तों से बाज नहीं आते और अधिकारों का हवाला देकर अक्सर ऊट-पटांग सवाल कर बैठते हैं जिनका कोई औचित्य ही नहीं होता।

ऐसा ही एक मामला देश की शीर्ष अदालत की चौखट तक पहुँचा, जिसमें भारतीय मुस्लिमों को पाकिस्तान भेजने की माँग करने संबंधी एक याचिका सामने आई। इस याचिका पर न्यायमूर्ति रोहिंग्टन एफ नरीमन की अध्यक्षता वाली पीठ ने कड़ा रुख़ अख़्तियार किया और याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील से पूछा कि आपको अंदाज़ा भी है ये किस तरह की याचिका है? पीठ ने लगभग चेतावनी देते हुए यह भी कहा कि हम दलील सुनने के लिए तैयार हैं लेकिन आप इसका अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहिएगा। इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने दलील पेश न करने में ही भलाई समझी। इसके बाद कोर्ट ने उस याचिका को ख़ारिज कर दिया।

कोर्ट से परे भी चले ख़ारिज वाला डंडा

आइए अब लौटते हैं इस तरह की मानसिकता वाले लोगों पर। ऐसे लोग प्रमाणित करते हैं कि खाली दिमाग वाकई शैतान का होता है और उसी दिमाग की उपज होती है इस तरह की वाहियात याचिकाएँ। ऐसा ही कुछ ‘सूचना के अधिकार (RTI)’ नियम के साथ भी होता है। इसके तहत कई बार ऐसी सूचनाएँ माँगी जाती हैं, जिनका कोई सिर-पैर ही नहीं होता।

ख़ासतौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय का RTI विभाग आए दिन अजीबोगरीब आवेदनों से परेशान है। माँगी गई जानकारियों की जरा लिस्ट देखिए। और सोचिए कि इस तरह की जानकारियों का भला क्या मक़सद हो सकता है!

  • प्रधानमंत्री कार्यालय में कितने सिलेंडर इस्तेमाल होते हैं
  • वहाँ सब्ज़ी कौन लाता है
  • पीएम मोदी कौन सा मोबाइल इस्तेमाल करते हैं
  • पीएम मोदी को खाने में क्या पसंद है

ऐसा ही एक मामला सेंट्रल बैंक से भी है। यहाँ RTI के माध्यम से सूचना माँगी गई कि कितने पोल्ट्री फार्म्स में Battery Cages का प्रयोग किया जाता है। बता दें कि Battery Cages उन पिंजरों का संग्रह होता है, जिसका उपयोग अण्डा देने वाली मुर्गियों के आवास के लिए किया जाता है।

इस सूचना का जवाब देने के लिए एक लंबी प्रक्रिया का पालन करना पड़ेगा। बैंक इसके लिए विभिन्न स्तरों पर जानकारी जुटाएगा, तब जाकर इसका जवाब जानकारी माँगने वाले तक पहुँचाया जाएगा। सूचना माँगने वाले को तो शायद इस बात का अंदाज़ा भी नहीं होगा कि एक लाइन में माँगी गई जानकारी को जुटाने में बैंक का कितना समय बर्बाद होगा। फिर अगर कोई त्रुटि या देरी हो जाए तो यह कहने में देरी नहीं होगी कि बैंक कोई काम ही नहीं करता।

कई बार RTI का दुरुपयोग भी होता है, जिसका इस्तेमाल ब्लैकमेल करने के लिए किया जाता है। बेहतर होता कि RTI के सही इस्तेमाल पर ध्यान दिया जाए। फिर भी अगर इस तरह के वाहियात और बेबुनियाद सवाल पूछे जाते हैं तो उनका जवाब भी उसी ढंग से देना चाहिए, जिससे पूछने वाले को उसका स्तर पता चल सके।

तुम बदसूरत हो, मर्दों जैसी दिखती हो; कोई तुम्हारा बलात्कार क्यों करेगा – रेप पीड़िता से महिला जजों की बेंच

बलात्कार शब्द जेहन में आते ही सामान्य तौर पर किसी लड़की की ही छवि उभर कर सामने आती है, ये सोचकर कि उसके साथ किसी लड़के ने दुष्कर्म किया होगा। आम तौर पर लोग यही सोचते हैं कि रेप सिर्फ लड़कियों का ही होता है, लड़कियाँ सुरक्षित नहीं है। मगर ऐसा नहीं है। आज की दुनिया में, इस समाज में कोई भी इंसान सुरक्षित नहीं है। ना तो लड़के, ना लड़कियाँ, ना महिलाएँ और ना ही बच्चे। हर दिन यौन हिंसाओं जैसी घटनाओं के बारे में सुनने में आता रहता है। आज के दौर में घर हो या फिर सड़क, कहीं पर भी लड़का या लड़की दोनों ही सुरक्षित नहीं हैं। कहीं ना कहीं कोई दरिन्दा अपनी मानसिक विकृति को लेकर हवस का मुंह फैलाए किसी कोने में छुपा होता है और मौका देखकर वो इस जघन्य अपराध को अंजाम दे देता है। या तो इन दरिन्दों को पता नहीं होता है कि वो क्या कर रहे हैं या फिर वो मानसिक रूप से इतने बीमार होते हैं कि वो जान बूझकर ये करते हैं। ऐसा देखा गया है कि दुष्कर्म के मामले में बहुत कम दोषियों को ही सजा मिल पाती है। अधिकतर आरोपी इतना बड़ा गुनाह करने के बाद भी खुले आम घूम रहा होता है, किसी और को अपना शिकार बनाने के लिए। ऐसा नहीं है कि हमारी कानून व्यवस्था कमजोर है, मगर कभी साक्ष्य की कमी की वजह से तो कभी किसी बेतुके से तर्क के आधार पर ये आरोपी बरी हो जाते हैं।

लड़की बदसूरत तो नहीं हो सकता रेप

ऐसा ही एक मामला सामने आया है इटली से। यहाँं साल 2016 में निचली अदालत ने पेरुवियन मूल के 2 लोगों को दुष्कर्म का दोषी करार दिया था। मगर अपीलीय अदालत ने इस फैसला को पलटते हुए दुष्कर्म आरोपी को ये कहते हुए बरी कर दिया कि महिला बदसूरत है और पुरुषों जैसी दिखती है, इसलिए इसके साथ रेप नहीं हो सकता। आपको बता दें कि ये फैसला जजों के उस पैनल ने सुनाया, जिसमें सारी जज महिलाएँ थीं।

क्या होता है बलात्कार?

अब यहाँ पर मन में एक सवाल यह उठता है कि क्या बलात्कार सुंदरता के आधार पर होता है? तो आइए सबसे पहले हम ये जान लें कि बलात्कार होता क्या है?

बलात्कार का मतलब होता है किसी इंसान की सहमति या अनुमति के बिना उसके साथ संबंध बनाना या जबरन किसी फॉरेन ऑब्जेक्ट का पेनिट्रेशन (forceful penetration of foreign object) करना। फिर चाहे वो पुरुष हो, महिला हो, बच्चा/बच्ची हो या फिर कोई प्रौढ़ महिला। कोई भी, कभी भी इसका शिकार हो सकता है। बलात्कार करने वाला इंसान सामने वाला की सुंदरता या उम्र नहीं देखता। ये तो उसकी मानसिक विकृति होती है। वरना क्यों किसी पुरुष, किसी बच्चे/बच्ची या फिर बुजुर्ग महिला के साथ ऐसा होता?

पुरुषों का भी होता है बलात्कार

ऐसा देखा गया है कि लोगों को लगता है कि रेप या बलात्कार केवल महिलाओं के साथ ही होता है। कुछ हद तक इसकी वजह यह भी है कि संचार माध्यमों और समाचारों में हम केवल यही देखते और सुनते हैं कि बलात्कार केवल महिलाओं के साथ ही होता है। पुरुषों के साथ हुए बलात्कार की बातें सामने नहीं आती हैं। लेकिन हम आपको बता दें कि यह पुरुषों के साथ भी होता है। एक पुरुष के साथ शारीरिक शोषण ना सिर्फ एक पुरुष कर सकता है बल्कि एक महिला भी पुरुष का बलात्कार (सेक्स से जुड़े खिलौनों का इस्तेमाल कर) कर सकती है। पुरुषों को भी बलात्कार की शिकार महिला पीड़ित की तरह ही मानसिक पीड़ा से होकर गुजरना पड़ता है। वास्तव में एक पुरुष होने के बावजूद बलात्कार का शिकार होने की शर्म, अविश्वास और इससे जुड़ी शर्मिंदगियों का पुरुषों पर अधिक प्रभाव डालता है। शायद यही वजह है कि आमतौर पर वो इसके खिलाफ शिकायत दर्ज़ नहीं करवाते। इसलिए पुरुषों के बलात्कार से जुड़े बेहद कम आँकड़े दर्ज हुए हैं।

भारत में पुरुषों के साथ रेप पर कोई कानून नहीं

हैरानी की बात तो ये भी है कि भारत, पाकिस्तान सहित चीन, इंडोनेशिया ऐसे एशियाई देश हैं, जहाँ पुरुषों के साथ रेप के खिलाफ कोई कानून नहीं है। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 354 A, 354 B, 354 C, 354 D के तहत यौन उत्पीड़न, किसी को घूरना, किसी का पीछा करना आदि जुर्म माना गया है। लेकिन ये सभी कानून महिलाओं के पक्ष में है। इसके साथ ही धारा- 375 में भी रेप और उसके खिलाफ कानूनी प्रावधान की बातें कही गई हैं, लेकन यहाँ भी पुरूषों के साथ होने वाले रेप के बारे में कोई बात नहीं कही गई है। मगर चाहे वो महिला हो या पुरुष दोनों को ही पूरा अधिकार है कि वो अपने साथ हुए अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएँ और यह कानून की ज़िम्मेदारी है कि दोनों के सम्मान की पूरी तरह सुरक्षा करे।

बच्चे और बुर्जुर्ग महिला भी अछूते नहीं इस सामाजिक विकृति से

हमारे सामने कई ऐसी खबरें आती हैं, जिसमें हम पाते हैं कि छोटे-छोटे मासूम बच्चे, जिन्होंने अभी-अभी दुनिया को देखना-समझना शुरू किया ही था कि किसी दरिंदे ने उसे अपनी दरिंदगी का शिकार बना लिया। कभी स्कूल में शिक्षकों के द्वारा, कभी रिश्तेदारों-दोस्तों के द्वारा और कभी तो पिता के द्वारा ही इस घटना का शिकार हो जाती है। यानी कि बच्चियाँ अपने घर में भी सुरक्षित नहीं हैं। कठुआ और उन्नाव में बच्चियों के साथ होने वाले दुष्कर्म की घटना भी इसी के उदाहरण हैं, जो कि हमें हिलाकर रख देते हैं। इतना ही नहीं बुजुर्ग महिलाएँ भी महफ़ूज नहीं हैं आज के माहौल में। क्योंकि आए दिन हमें कभी 75 साल की, कभी 80 साल की, तो कभी 85 साल की महिला के साथ भी दुष्कर्म की घटनाएँ सुनने को मिल जाती है, जो हमें सोचने पर मजबूर कर देती है।

MeToo अभियान- यौन शोषण के खिलाफ एक लड़ाई

मी टू एक ऐसा अभियान है, जिसमें महिलाओं ने अपने यौन शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाई। ये अभियान एक तरह की लड़ाई थी, जिसमें महिलाएँ अपने ऊपर हुए अत्याचारों के खिलाफ एक जुट होकर लड़ीं और दोषियों को सामने भी लाया। बता दें कि, Metoo की शुरुआत साल 2006 में हुई थी, लेकिन चर्चा में आई यह 2017 में। इसकी शुरुआत अमेरिकी सिविल राइट्स एक्टिविस्ट तराना बर्क ने पहली बार 2006 में की थी। तराना बर्क के खुलासे के 11 साल बाद 2017 में यह सोशल मीडिया में खूब वायरल हुआ।

तराना बर्क के साथ भी हुआ है रेप और यौन उत्पीड़न

भारत में इसकी शुरुआत बॉलीवुड अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने की थी। उन्होंने अभिनेता नाना पाटेकर पर गलत तरीके से छूने का आरोप लगाया था। भारत में ‘मी टू’ अभियान शुरू होने के बाद कई बड़े बॉलीवुड हस्तियों के नाम सामने आए। नाना पाटेकर के साथ ही जिन पर आरोप लगाए गए, उनमें विकास बहल, चेतन भगत, रजत कपूर, कैलाश खैर, जुल्फी सुईद, आलोक नाथ, सिंगर अभिजीत भट्टाचार्य, तमिल राइटर वैरामुथु से लेकर एमजे अकबर और सुहेल सेठ आदि तक का नाम शामिल है।

किसी के भी साथ दुष्कर्म उसकी सुंदरता के आधार पर नहीं होता है। इसलिए इटली की अदालत में जिस बेतुके तर्क के आधार पर दोनों रेप आरोपी को बरी किया गया है, वो वाकई शर्मनाक है। अगर अदालत साक्ष्य ना मिलने के कारण या फिर गुनाह साबित ना हो पाने की वजह से बरी करे तो बात समझ में आती है। मगर इसे ये कहकर कि लड़की बदसूरत है और पुरूषों की तरह दिखती है, इसलिए इसका रेप नहीं हो सकता काफी निंदनीय है। अदालत के इस फैसले के बाद अदालत के बाहर ‘शर्म करो’ के नारे भी लगाए गए। हालाँकि देश भर में इस फैसले के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन के बाद न्याय मंत्रालय ने फैसले की जाँच के आदेश दिए हैं।

‘परिवारवाद’ से नहीं उबर पा रही है कॉन्ग्रेस, तीसरी लिस्ट में भी दो बड़े नेता-पुत्र किए गए शामिल

देश में स्वतंत्रता को चाहे कितने ही साल क्यों न बीत जाएँ लेकिन कॉन्ग्रेस को देखकर लगता है कि वो अपनी मूल नीतियों से कभी भी डगमगा नहीं सकती। हमेशा से ‘परिवारवाद’ को बढ़ावा देने वाली कॉन्ग्रेस सरकार में आज भी यह दौर चालू है। पहले इसकी बढ़ती सीमा सिर्फ़ हमें गाँधी परिवार तक ही देखने को मिलती थी, लेकिन अब पार्टी से जुड़े नेताओं में भी ‘परिवारवाद’ के प्रति यकीन देखने को मिल रहा है।

लोकसभा चुनावों को मद्देनजर रखते हुए कॉन्ग्रेस ने शुक्रवार (मार्च 16, 2019) को उम्मीदवारों की तीसरी लिस्ट जारी की। इस लिस्ट में असम, मेघालय, नागालैंड, सिक्किम, तेलंगाना और यूपी की 18 सीटों पर खड़े होने वाले उम्मीदवारों के नाम घोषित किए गए। इस तीसरी सूची में एक नाम तनुज पुनिया का भी है। तनुज पुनिया के बारे में बता दें कि वह यूपी के बाराबंकी लोकसभा सीट से कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद पीएल पुनिया के बेटे हैं।

पिछले कुछ दिनों से आंतरिक सर्वेक्षण में पीएल पुनिया का नाम आने के बाद वह माँग कर रहे थे कि उनके बेटे तनुज पुनिया को इस बार टिकट दिया जाए। ऐसे में आखिरकार पार्टी ने अपनी ‘रीत’ को आगे बढ़ाते हुए पी एल पुनिया की माँग सुन ली और तनुज पुनिया के नाम पर मुहर लगाते हुए उन्हें टिकट दे दिया। तनुज के अलावा कलियाबोर से कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता तरुण गोगोई के बेटे गौरव गोगोई को भी उम्मीदवार के रूप में उतारा गया है।

स्पष्ट है ‘परिवारवाद’ कॉन्ग्रेस में अब सीमित न रहकर अपने विस्तार की ओर आगे बढ़ रहा है। बाक़ी नेताओं ने भी कॉन्ग्रेस में रहकर इसकी राह पकड़ ली है। बता दें कि इस सूची में इन दोनों उम्मीदवारों के अलावा कॉन्ग्रेस ने असम के करीमगंज से स्वरूप दास, सिल्चर से श्रीमती सुष्मिता देव, जोहराट से सुशांत बोरगोहेन, डिब्रूगढ़ से पवन सिंह घटोवार को टिकट दिया है।

इनके अलावा भरत बसनेट को सिक्किम से प्रत्याशी और केएल चिश्ती को नगालैंड से उम्मीदवार बनाया गया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री विंसेट एच पाला को शिलॉन्ग से प्रत्याशी बनाया गया है। तेलंगाना की बात करें तो पेडापल्ली से ए चंद्रशेखर, दिलाबाद से रमेश राठौड़, करीमनगर से पोन्नम प्रभाकर, जहीराबाद से के मदन मोहन राव, मेडक से गली अनिल कुमार, मलकाजगिरी से ए रेवंथ रेड्डी को, कोंडा विश्वेश्वर रेड्डी को चेवेला से जबकि पोरिका बलराम नायक महमूदाबाद से प्रत्याशी बनाया गया है।

कॉन्ग्रेस की वेबसाइट पर सेक्स टेप की तस्वीर, इससे पहले भी अपनी ही पार्टी को कहा था ठगों की पार्टी

कल शुक्रवार (मार्च 16, 2019) को एक खबर आई कि पाटीदार नेता हार्दिक के कॉन्ग्रेस से जुड़ने के बाद पार्टी ने अपनी वेबसाइट पर उनकी सेक्स टेप की तस्वीरों को लगाकर अपने नए नेता का स्वागत किया। लेकिन आज खबर आ रही है कि ऐसा गुजरात कॉन्ग्रेस की वेबसाइट हैक होने के कारण हुआ था। पूरा मामला देखकर लग रहा है जैसे हैकर्स ने सिर्फ़ हार्दिक का ‘ऐसा’ स्वागत करने के लिहाज़ से ही वेबसाइट को हैक किया।

इस घटना के सामने आने के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी हरकत में आई और वेबसाइट को तुरंत बंद कराया, इसके बाद नेताओं ने वेबसाइट की जाँच पर बात कही। नवभारत टाइम्स में छपी रिपोर्ट के अनुसार गुजरात प्रवक्ता मनीश दोशी ने उनके सहयोगी अखबार इकनॉमिक टाइम्स से इस मामले पर बात की और बताया कि उनकी वेबसाइट को हैक कर लिया गया है।

मनीष ने बताया कि इस घटना के बाद वेबसाइट को अस्थाई रूप से बंद कर दिया गया है, जाँच के बाद इसे फिर से लाइव किया जाएगा। मनीष का कहना है कि यह हरकत उन लोगों द्वारा की गई है, जो हार्दिक के कॉन्ग्रेस पार्टी में शामिल होने से खुश नहीं हैं।

कुछ दिनों पहले ही, हार्दिक पटेल, जो गुजरात में पाटीदार आंदोलन के दौरान उपद्रव करने के लिए प्रसिद्ध हुए और दंगों के दोषी भी पाए गए, आधिकारिक तौर पर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की उपस्थिति में कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए हैं।

ख़ैर, गुजरात कॉन्ग्रेस की आधिकारिक वेबसाइट का अपनी पार्टी कॉन्ग्रेस की ही मिट्टी पलीद करने का एक और भी दिलचस्प इतिहास है। जानकारी के लिए बता दें कि इससे पहले, उन्होंने कॉन्ग्रेस को ठगों की पार्टी कहा था। यह भी कहा था कि पार्टी ने 70 साल तक भारत को लूटा। क्या पता सच गलती से ही सही, लेकिन बाहर आ गया था उस वक्त!

कॉन्ग्रेस औंधे मुँह गिरने को तत्पर, मोदी को कोसने के सिवा नहीं बचा कोई काम

राजनीतिक गलियारे में हड़कंप का माहौल या खींचतान का होना कोई नई और अचंभित कर देने वाली बात नहीं। यह हड़कंप उस समय अपने चरम पर होता है जब देश में चुनाव का माहौल गरमाया हो। चुनावी दौर में आरोप-प्रत्यारोपों का दौर चल निकलता है, फिर भले ही वे आरोप मनगढ़ंत ही क्यों न हों। एक-दूसरे को नीचा और कमतर दिखाने की होड़ लग जाती है। राजनीतिक सभाएँ और रैलियाँ किसी जंग के मैदान से कम नहीं होतीं।

ख़ैर, यह सब तो स्वाभाविक ही है क्योंकि चुनाव में जीत हासिल कर सत्ता पर क़ाबिज़ होना हर कोई चाहता है। इसके लिए सभी अपने-अपने तौर-तरीक़ों का इस्तेमाल करते हैं। सत्ता में दो तरह के लोग आना चाहते हैं, एक वो जो सही मायने में देश-हित चाहते हैं और उसके लिए वे अपनी सटीक रणनीति का इस्तेमाल कर देश को विकास की राह पर ले जाना चाहते हैं, और दूसरे वो जो केवल सत्ता की भूख और लालसा को शांत करना चाहते हैं।

सदमे से उबरने में कॉन्ग्रेस अब तक नाक़ामयाब

फ़िलहाल कॉन्ग्रेस पार्टी का यही हाल है। वो सत्ता खो देने के सदमे से अब तक उबर नहीं पाई है। सदमे से न उबर पाने का एक महत्वपूर्ण कारण उसका पुश्तैनी रूप से राजनीति में बने रहना भी है, जिसकी उसे आदत हो गई थी। जिस तरह घर के बड़े-बुज़ुर्ग अपने पीछे विरासत स्वरूप धन-सम्पत्ति छोड़ जाते हैं और अगली पीढ़ी उस पर अपना हक़ जताकर उसे पूर्णत: अपना मान लेती है ठीक उसी प्रकार कॉन्ग्रेस को भी यही लगता है कि भारतीय राजनीति उनके पुरखों द्वारा छोड़ी गई ऐसी ही कोई विरासत है, जिस पर केवल उसी का एकछत्र राज होना चाहिए। कॉन्ग्रेस अपने इसी सपने को वर्षों से जीती आई है, जिसकी उसे ऐसी लत लग गई है कि वो अब राजनीति में बने रहने के लिए कुछ भी कर गुजरने और किसी भी हद को पार करने से पीछे नहीं हटेगी। इसी का जीता जागता प्रमाण उसके वो घोटाले हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ करके वो फिर से अपनी वापसी का ख़्वाब संजोए बैठी है, लेकिन इस ख़्वाब के पूरे होने में वो सबसे बड़ा रोड़ा प्रधानमंत्री मोदी को मानती है।

भारतीय राजनीति को अपनी जेब में रखकर चलने वाली कॉन्ग्रेस को साल 2014 में उस समय तगड़ा झटका लगा, जब केंद्र में मोदी सरकार आई। मोदी लहर कॉन्ग्रेस के उन सभी मनसूबों को बहाकर ले जाने में कामयाब रही, जिसके बीज कॉन्ग्रेस ने अपने शासनकाल के दौरान बोए थे। और तब के मनसूबों पर पानी फिरने की वजह से कॉन्ग्रेस अब तक पीएम मोदी को सिर्फ़ एक दुश्मन की नज़र से देखती है।

कब लगेगा गाँधी-वाड्रा परिवार के घोटालों की फेहरिस्त पर विराम

केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद एक-एक करके कॉन्ग्रेस के वो सभी काले चिट्ठे सामने आने लगे जो वर्षों से दबे पड़े थे। घोटालों की एक ऐसी फेहरिस्त बनती चली गई, जिस पर से धीरे-धीरे पर्दा उठता चला गया और कॉन्ग्रेस के ‘राजकुमार’ राहुल गाँधी समेत पूरे परिवार पर जाँच के काले घेरे मँडराने लगे। परिवारवाद की छवि वाली कॉन्ग्रेस पार्टी जो दूध की धुली होने का दावा करती थी, उसके कारनामे जगज़ाहिर होने लगे। इन काले कारनामों में टैक्स चोरी, मनी लॉड्रिंग, अगस्ता-वेस्टलैंड, खाद घोटाले से लेकर बोफ़ोर्स और पनडुब्बियों तक के हर घोटाले में कॉन्ग्रेस का हाथ शामिल था।

साल 2008 में राहुल गाँधी ने ज़मीन ख़रीदी और उसे साल 2012 में अपनी बहन प्रियंका गाँधी को बतौर तोहफ़े में दे दी। गाँधी-वाड्रा परिवार का सीधा संबंध हथियार डीलर संजय भंडारी से भी था। भंडारी ने तोहफे वाली उसी ज़मीन को अधिक क़ीमत देकर फिर से ख़रीद लिया। इसके पीछे राहुल गाँधी, रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गाँधी वाड्रा के आपसी भाईचारा और एक गहरा रिश्ता तो उभरकर सामने आता ही है, साथ में दिखती है दलालों से संबंध की एक लंबी और कॉम्पलेक्स जोड़।

राहुल गाँधी का एक बेहद प्रगाढ़ रिश्ता HL पाहवा के साथ भी सामने आया। यह वही भंडारी है जिसके घर ED की छापेमारी के दौरान रक्षा सौदों से संबंधित गोपनीय दस्तावेज़ों की फोटोकॉपी बरामद हुई थी। मतलब साफ है कि यूपीए के शासनकाल में एक बिचौलिए की इतनी पहुँच थी कि वो बेहद संजीदा दस्तावेज़ों की फोटोकॉपी तक अपने पास रखता था। इससे साफ पता चलता है कि गाँधी-वाड्रा का परिवार मिलकर रक्षा सौदों में घालमेल करने की फ़िराक में था।

राहुल गाँधी ने 2008 में हसनपुर, पलवल में महेश कुमार नागर के माध्यम से ज़मीन ख़रीदी और फिर उस ज़मीन की क़ीमत को बढ़ाकर रॉबर्ट वाड्रा को बेच दिया गया। 2008 में मात्र ₹15 लाख में ख़रीदी गई ज़मीन को केवल 3 साल 10 महीने बाद ₹84.15 लाख में बेचा गया। इस तरह के ज़मीनी सौदों में गाँधी-वाड्रा परिवार की धोखाधड़ी का कनेक्शन सीधे तौर पर साफ़ नज़र आता है। ऐसे और भी कई ज़मीनी सौदे हुए, जिनमें गाँधी-वाड्रा परिवार के ज़मीन सौदागरों के साथ प्रगाढ़ रिश्ते उजागर हुए। इनमें एक नाम सीसी थम्पी का भी है, जिसने ज़मीन ख़रीद के लिए संजय भंडारी को धन की आपूर्ति की थी।

आरोपों से घिरी कॉन्ग्रेस को प्रधानमंत्री मोदी की साफ छवि कहाँ भाएगी

राहुल गाँधी जिस राफ़ेल को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के इस्तीफ़े की माँग कर रहे थे, उस वक़्त उन्होंने मौन क्यों धारण कर लिया था जब राफ़ेल की असल क़ीमत पर से पर्दा उठा कि मोदी सरकार के दौरान हुई राफ़ेल डील यूपीए सरकार की तुलना में प्रति विमान ₹59 करोड़ सस्ती है। ऐसे हर आरोप पर राहुल गाँधी को मुँह की खानी पड़ी है, जब उन्होंने मोदी के ख़िलाफ़ बेवजह के मुद्दों को हवा देने की कोशिश की जबकि वो ख़ुद अपने भ्रष्ट आचरण को किसी से नहीं छिपा पाए। ये राहुल गाँधी का ओवर कॉन्फ़िडेंस ही है, जो ख़ुद तमाम विवादों में घिरे होने के बावजूद मोदी सरकार को घेरने से नहीं चूकते, फिर भले ही वो आरोप बेबुनियाद ही क्यों न हों।

राफ़ेल विवाद में एक बड़ा मोड़ तब आया, जब वीवीआईपी हेलीकॉप्टर अगस्ता वेस्टलैंड डील में बिचौलिया रहा क्रिश्चिन मिशेल का वो प्रकरण सामने आया, जिसमें ख़ुलासा हुआ कि वो राफ़ेल के ख़िलाफ़ सौदेबाज़ी कर रहा था। 2007 में जब भारत की तरफ से 126 मीडियम मल्टी रोल एयरक्राफ्ट ख़रीदने की बात कही गई थी तो उस समय कई कंपनियों ने बोली लगाई थी। साल 2011 आते-आते तक सिर्फ़ दो ही विमान आमने-सामने थे, एक दसौं की राफ़ेल और दूसरा यूरोफाइटर टाइफून। दलाल मिशेल यूरोफाइटर टाइफून की लॉबियिंग कर रहा था। आपको याद दिला दें कि अगस्ता-वेस्टलैंड सौदे में सोनिया गाँधी का कनेक्शन सामने आया था। इस पर ख़ुद को बचाने के लिए कॉन्ग्रेस ने मिशेल को बचाने के लिए अपने वकील को मैदान में उतारा था।

आरोपों से बचने के लिए कॉन्ग्रेस को पीएम मोदी में दिखता है अपना दुश्मन

चुनावी माहौल में अपने कारनामों को छिपाने के लिए कॉन्ग्रेस किसी न किसी बहाने बचने का रास्ता तलाशती रहती है। अपने इन प्रयासों में वो कभी कंधार प्रकरण में अजीत डोभाल पर आरोप मढ़ती दिखती है, तो कभी प्रधानमंत्री की छवि को ग़लत रूप से प्रचारित करने का दुस्साहस करती दिखती है। कभी चीन का रुख़ करके मोदी को कोसती है कि मसूद अज़हर पर प्रतिबंध लगाने में वो क्यों नाकामयाब हैं?

अब बात अगर प्रतिबंध की ही की जाए तो ऐसा पहली बार तो हुआ नहीं है, जब चीन ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जाने से इनकार किया हो या मसूद अज़हर को वैश्विक स्तर पर आतंकवादी घोषित करने से अपने पैर पीछे किए हों। यह बात विश्व-विख्यात है कि चीन और पाकिस्तान के मध्य कई व्यापारिक समझौते हैं, जिसकी वजह से चीन हमेशा पाकिस्तान के साथ अपना दोस्ती का रिश्ता निभाता चला आया है।

भारत के प्रति चीन का दोहरा रवैया तो काफी साल पुराना है। यह तब भी था जब केंद्र में कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार थी। कॉन्ग्रेस ने उस समय क्यों नहीं चीन को डरा धमका कर मसूद अज़हर पर प्रतिबंध लगवाया लिया? इसका जवाब तो कॉन्ग्रेस के पास तब भी नहीं था, जब वो सत्ता में थी और आज भी नहीं है जब सत्ता में उसकी वापसी का कोई ओर-छोर नहीं दिखता।

जब आतंकवादियों पर उमड़ा राहुल गाँधी का ‘जी’ भरकर प्रेम

हैरान कर देने वाली बात तो यह है कि मसूद अज़हर पर प्रतिबंध लगाने की बात करने वाले राहुल गाँधी तो आतंकवादियों को ‘जी’ भर-भर कर इज़्जत परोसते हैं। उनकी पार्टी के दिग्विजय सिंह उर्फ़ दिग्गी आतंकवादियों को ‘ओसामा जी और हाफ़िज सईद साहब’ बोलकर उनके सम्मान में चार चाँद लगाते हैं। भले ही राहुल गाँधी आतंकवादियों से अपनी इस बेइंतहा मोहब्बत पर कुछ न कहें लेकिन आतंकवादियों से उनका यह ‘अपनेपन’ का रिश्ता तो जगज़ाहिर हो ही गया है। राहुल गाँधी का यह प्यार भरा एहसास तो चीन जैसा ही जान पड़ता है, माने ऊपर से कुछ और अंदर से वही दोमुँहापन।

असल बात तो यह है कि सत्ता से दूर होने और वापसी का कोई रास्ता न बन पाने की बौखलाहट में कॉन्ग्रेस अपना आपा पूरी तरह से खो चुकी है। इसीलिए कोई रास्ता न सूझता देख राहुल गाँधी को ले-देकर केवल मोदी ही नज़र आते हैं। इसलिए वो कभी 56 इंच के सीने का जुमला रटते हैं तो कभी जनता को बेवजह भरमाने का काम करते हैं और कहते हैं कि वर्तमान केंद्र सरकार ने अपने शासनकाल में देश-हित में कुछ नहीं किया।

सच पूछें तो इस सवाल का जवाब कॉन्ग्रेस बखूबी जानती है कि मोदी ने जिस कुशलता के साथ अपने कार्यकाल को पूरा किया है, वो कॉन्ग्रेस से 70 सालों में नहीं हो सका। राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी का गिरता स्तर पता नहीं कब क्या नया बखेड़ा खड़ा कर दे, इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।

वो दिन दूर नहीं जब प्रधानमंत्री मोदी को बदनाम करने के लिए राहुल गाँधी उनकी फोटो को पोर्नोग्राफी के लिए भी इस्तेमाल कर लें। अपनी धूमिल होती छवि के सदमे में गाँधी परिवार पता नहीं कब पीएम मोदी को गाली-गलौच देने पर उतारू हो जाए क्योंकि सत्ता से दूरी कॉन्ग्रेस को हजम नहीं हो पा रही है और अपनी वापसी के लिए उसे केवल मोदी को कोसने का ही मार्ग दिख रहा है, जिस पर वो बड़ी तेज़ी से बिना कुछ सोचे-समझे लगातार बढ़ती जा रही है। लेकिन यह तेज़ी कॉन्ग्रेस को बड़ी महँगी साबित होगी क्योंकि हताशा के इस आलम में राहुल और उनकी पार्टी किंकर्तव्यविमूढ़ हो चुकी है। अब शायद उनकी चेतना लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद ही आने की संभावना है।

2014 के बाद एक आम आदमी के जीवन में जो सुधार आया है, पहले केवल उसकी कल्पना ही की जा सकती थी। देश के भीतर तो मोदी सरकार ने अनेकों लाभकारी योजनाओं से जन-जीवन को सुधारने के अपने लक्ष्य को तो पूरा किया ही, साथ में वैश्विक स्तर पर अन्य देशों से जो संबंध आज भारत के साथ स्थापित हैं, उन्हें सही दिशा और मज़बूती भी प्रदान की।

आज भारत के साथ हर बड़ी शक्ति कंधे से कंधा मिलाकर डटकर खड़ी है फिर चाहे वो व्यापार को लेकर हो या आतंकवाद जैसे मुद्दे को लेकर हो। विश्व में भारत की छवि एक ताक़तवर देश के रूप में बनकर उभरी है। इसका श्रेय निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही जाता है क्योंकि यह उनकी सूझबूझ और सटीक रणनीति का ही परिणाम है।

अभी हाल ही में कॉन्ग्रेस ने उन मतदाताओं को आड़े हाथों लिया, जिन्होंने 2014 में बीजेपी को वोट दिया था। जो राजनीतिक पार्टी अपने ही देश के मतदाताओं को एक दुश्मन की नज़र से देखे, इसे उसका पागलपन न कहा जाए तो और क्या कहा जाए! क्योंकि इस तरह का व्यवहार आज तक किसी देश में किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा नहीं किया गया।

ऐसी स्थिति में कॉन्ग्रेस देश की जनता के समक्ष भला किस मुँह से जाएगी और किस आधार पर जनता से अपने पक्ष में वोट माँगने का साहस जुटा पाएगी, ये देखना बाक़ी है?

मनमोहन सिंह ने मोदी के सबसे ‘ताकतवर’ मंत्री को दिया ‘गब्बर सिंह टैक्स’ अवॉर्ड

देश में जीएसटी लागू होते ही विपक्षी दलों ने इसका भरपूर विरोध किया था। इसमें कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी सबसे आगे रहे थे। उन्होंने हमेशा ही इसे ‘गब्बर सिंह टैक्स’ कहा। मगर इस सब से इतर दिल्ली में एक अवॉर्ड शो के दौरान एक अलग ही तरह का नजारा देखने को मिला। यहाँ वित्त मंत्री अरूण जेटली को जीएसटी काउंसिल के लिए अवॉर्ड दिया जा रहा था। इस अवॉर्ड फंक्शन की खास बात यह रही कि जेटली को अवॉर्ड देने वाले कोई और नहीं बल्कि पूर्व प्रधानमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता मनमोहन सिंह थे।

मीडिया संस्थान हिन्दू बिजनेस लाइन की तरफ से आयोजित चेंजमेकर अवॉर्ड्स में जीएसटी काउंसिल को ‘चेंजमेकर ऑफ द ईयर अवार्ड’ दिया गया। वित्त मंत्री अरूण जेटली ने जीएसटी काउंसिल का चेयरमैन होने के नाते इस अवॉर्ड को रिसीव किया।

बता दें कि जीएसटी काउंसिल को यह अवॉर्ड ‘वन नेशन वन टैक्स’ की दिशा में काम करने के लिए दिया गया। जीएसटी काउंसिल की खास बात यह है कि इसने संघवाद के सिद्धांतों पर काम करते हुए अलग-अलग राजनीतिक दलों को एक साथ लाया और पूरे देश में इसे सफलतापूर्वक लागू करवाया। इसके साथ ही इसकी कामयाबी को इस तरह से भी देखा जा सकता है कि इसे विवादित मुद्दों को सुलझाने के लिए कभी भी वोटिंग का सहारा नहीं लेना पड़ा। इस काउंसिल के सामने जितने भी विवाद या असहमति के मुद्दे आए, सभी सदस्यों ने आपसी सहमति से ही इसे सुलझाया।

हालाँकि राहुल गाँधी ने हमेशा इसका विरोध ही किया और इसे लागू करने के तरीके को लेकर हमेशा मोदी सरकार पर उँगली उठाई। सरकार को घेरने की कोशिश की। लेकिन आज जब जीएसटी काउंसिल को चेंज मेकर ऑफ द ईयर का अवॉर्ड दिया गया तो यह बात साफ हो जाती है कि ना तो जीएसटी ‘गब्बर सिंह टैक्स’ है और ना ही इसे लागू करने के तरीके में कहीं कोई कमी रही। इस अवॉर्ड के साथ ही जीएसटी को लेकर जनता को गुमराह करने और राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए राहुल गाँधी की झोली में से एक और मुद्दा कम हो गया।