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पुलवामा का बदला: 11 घंटे की मुठभेड़ के बाद मास्टरमाइंड राशिद गाजी ढेर!

भारतीय सेना व सुरक्षाबलों ने पुलवामा में CRPF के काफ़िले पर हुए आत्मघाती हमले के मास्टरमाइंड को मार गिराया है। रविवार की देर रात से ही पुलवामा के पिंगलिना क्षेत्र में आतंकवादियों और सुरक्षाबलों के बीच मुठभेड़ जारी थी। इस मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने दो आतंकियों को मार गिराया गया है। सूचना है कि मारे गए आतंकियों में से एक जैश-ए-मोहम्मद का कमांडर गाजी रशीद भी है, जिसने पुलवामा हमले की साजिश रची थी।

पुलवामा के पिंगलिना में कुछ आतंकियों के छिपे होने की खबर सुरक्षाबलों को रात के 12 बजे मिली। इसके तुरंत बाद सुरक्षाबलों ने इलाके को घेर लिया और रात में ही साढ़े 12 बजे से ऑपरेशन शुरू कर दिया। इस ऑपरेशन को 55-राष्ट्रीय राइफल्स, CRPF और SOG के जवानों ने संयुक्त रूप से चलाया। भारी गोला-बारी के बीच सुरक्षाबलों ने उस बिल्डिंग को उड़ा दिया, जहाँ ये आतंकी छिपे बैठे थे।

आतंकियों और सुरक्षाबलों के बीच जहाँ मुठभेड़ हुई है, उस क्षेत्र में कई पत्थरबाज आ गए। किसी अप्रिय घटना से बचने के लिए सेना ने उनसे हटने की अपील भी की।

आपको बता दें कि जैश-ए-मोहम्मद का कमांडर गाजी राशिद ने अफगानिस्तान से ट्रेनिंग ली थी। पुलवामा अटैक की साजिश इसी ने रची थी जबकि आदिल अहमद डार आत्मघाती होकर सीआरपीएफ के काफिले पर हमला किया था।

हालाँकि दुखद यह है कि इस मुठभेड़ में सेना के एक मेजर सहित 4 जवान वीरगति को प्राप्त हुए जबकि एक जवान घायल भी हुआ है। गोली-बारी में एक स्थानीय नागरिक की भी मौत हुई है।

‘मुस्लिमों पर भरोसा जताना शुरू करें वरना अंजाम बुरा होगा’- फारूक अब्दुल्ला

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने आजतक के कार्यक्रम सीधी बात में पाकिस्तान और आतंकवाद पर बात की। यहाँ उन्होंने कश्मीर की समस्या को राजनीति की समस्या बताया। साथ ही कहा कि इस समस्या को सुलझाने के लिए सरकार को कश्मीरियों का पहले दिल जीतना होगा।

फारूक अब्दुल्ला की मानें तो केंद्र में जब से मोदी सरकार आई है, तब से कट्टरता में वृद्धि देखने को मिली है। उनका कहना है कि मुस्लिम युवकों को लगातार प्रताड़ित किया जाता रहा है, जिसके कारण मुश्किलें पैदा हो रही हैं। लगभग धमकी भरे शब्दों का प्रयोग करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री यहाँ तक बोल गए कि मुस्लिमों पर भरोसा जताना शुरू करें वरना अंजाम बुरा होगा। मुस्लिम कार्ड खेलते हुए फारूक ने केंद्र के ख़िलाफ़ जमकर हमला बोला।

पूरे साक्षात्कार में मोदी सरकार पर ऊँगली उठाने से फारूक कहीं भी नहीं चूके। फारूक ने कहा कि मोदी सरकार ने कश्मीरी पंडितों के लिए जो वादे किए थे, वो सिर्फ़ चुनाव जीतने के लिहाज़ से किए थे। वो उनके लिए कुछ नहीं करने वाले हैं।

पुलवामा हमले को केंद्र में रखते हुए फारूक ने कहा कि बदले के नाम पर कश्मीरी मुस्लिमों को प्रताड़ित करना बंद किया जाए। पाकिस्तान को सबक सिखाने से पहले अपने देश की परिस्थितियों को सही करने की सलाह भी फारूक ने कार्यक्रम में दी।

कश्मीर में गवर्नर शासन लगने पर फारूक ने कहा कि इससे पत्थरबाजी रुकी है लेकिन जैश-ए-मोहम्मद आगे बढ़ गया है। पुलवामा घटना के संदर्भ में सवाल पूछने के अंदाज़ में उन्होंने बहुत ही अमानवीय ढंग से एक बात कह दी – “पत्थरबाज बेहतर थे या जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी?” उनकी मानें तो घाटी में गवर्नर शासन पूर्णत: फेल रहा है, इसलिए घाटी में जनता का शासन होना चाहिए। जिसके लिए चुनावों में चोर मशीन का इस्तेमाल (ईवीएम) नहीं होना चाहिए।

अलगाववादी नेताओं से सुरक्षा छिन जाने पर जब उनसे सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि सरकार ने ख़ुद ही उन्हें सुरक्षा मुहैया कराई थी, जिसे अब छीन लिया गया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार ने नेश्नल कॉन्फ्रेंस के नेता और कॉन्ग्रेस के नेताओं से भी सुरक्षा छीन ली है। उनका कहना है कि अगर ऐसे ही सबसे सुरक्षा को वापस लिया जाता रहा तो कश्मीर घाटी में तिरंगे को कौन थामेगा?

पुलवामा: जैश आतंकियों के साथ मुठभेड़, मेजर समेत 4 जवान शहीद

पुलवामा से एक और दुखद ख़बर है। सोमवार की सुबह जम्मू-कश्मीर के इस क्षेत्र में सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ हुई। इस मुठभेड़ में सेना के एक मेजर सहित 4 जवान वीरगति को प्राप्त हुए जबकि एक जवान घायल भी हुआ है। गोली-बारी में एक स्थानीय नागरिक की भी मौत हुई है।

रविवार की देर रात से ही यह मुठभेड़ जारी है। इस मुठभेड़ में वीरगति को प्राप्त सभी जवान 55 राष्ट्रीय राइफल्स के थे। खब़र लिखे जाने तक मुठभेड़ जारी है। बताया जा रहा है कि पुलवामा के पिंगलिना क्षेत्र में दो से तीन आतंकी छिपे हुए हैं। सुरक्षाबलों ने इस पूरे क्षेत्र को घेर लिया है।

खबरों की मानें तो जिन आतंकियों को घेर कर सेना ने कार्रवाई शुरू की, वो जैश-ए-मोहम्मद के ही हैं। और ये सभी आदिल अहमद डार के साथी ही हैं। सूत्रों के हवाले से सेना को मिली सूचना के बाद पूरे इलाके की घेराबंदी की गई। सूचना यह भी है कि पुलवामा आतंकी हमले का मास्टरमांइड गाजी राशिद भी इसी इलाके में छिपा हुआ है।

आपको बता दें कि यह वही पुलवामा है जहाँ 14 फरवरी को CRPF के काफ़िले पर आत्मघाती हमला किया गया था और 40 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे।

एक फँसे हुए पत्रकार की देश के नाम मार्मिक अपील

जैसे बैंड वाले और पेट्रोमैक्स वाले शादी के मौसम की ओर, पंडे श्राद्ध के मौसम की ओर आशान्वित हो कर देखते हैं, पत्रकार आगामी चुनावों की ओर देख रहे थे। कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेतृत्व ने प्रियंका जी के दफ्तर और प्रियंका जी की नाक का उत्कृष्ट राजनैतिक विश्लेषण देखते हुए पत्रकारों को मुस्तैदी से पार्टी के चुनाव कार्य में जुट जाने पर साधुवाद भेजा था। हाय रे निठुर नियति, जब रोजगार का अवसर आया पुलवामा में हमला हो गया।

हमला अब भी हुआ, पहले भी हुआ था। आतंकी हमलों की रिपोर्टिंग कैसे हो, उस पर जनमानस कितना उद्वेलित हो, सब पत्रकारिता तय करती थी। पत्रकारिता जान आक्रोश की मर्यादाएँ तय करती थी। मन में फिर भी जोश था, कि जब तक लम्बी दूरी की सवारी न मिले, छोटे-छोटे दो-तीन ट्रिप मार दिए जाएँ। मने चुनाव के पहले पुलवामा में बयालीस हुतात्माओं पर दो-तीन लेख आत्मघाती आतंकवादी को नायक बना के लिख मारे जाएँ और चुनाव के बाद एक-आध विदेशी विश्वविद्यालय में भाषण की और वॉशिंगटन पोस्ट सरीख़े अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रों में डॉलरी सम्पादकियों के लिए अवसर सुनिश्चित कर लिए जाएँ। कुछ लेख लिखे भी गए, एक नरेटिव लगभग बना भी। आतंकी की माँ और बाप को ढूँढ के बाइट की व्यवस्था की गयी और एक भोले-भले नौजवान की छवि तैयार की गयी।

दिल्ली के जवाहर यूनिवर्सिटी के उमर ख़ालिद को गोद लेने की इच्छा रखने वाले प्राध्यापक भावुक सी भूमिका लिख चुके थे। हेडलाइट वाली ट्रेनों और जौ की खेती के विशेषज्ञ पत्रकार इम्पैक्ट एनालिसिस के द्वारा तय कर चुके थे कि बेचारा भटका हुआ कश्मीरी नौजवान दरअसल शिकार था और बयालीस हुतात्माएँ दरअसल आत्मघाती दस्ता थे जिन्होंने इस निर्दोष बालक के प्राण ले लिए। बुरा हो जैश ए मुहम्मद का की उसने पुलवामा हमले की जिम्मेदारी ले ली।

भला बताइए, जिस समय में पुलिस सुरक्षा की, नेता समर्थकों की और तो और माता-पिता संतानों की जिम्मेवारी नहीं लेते, जैश को क्या सूझी। हम पत्रकारों पर छोड़ देते, हम एक गाय दुर्घटना स्थल पर खड़ी कर के सेना के संघीकरण का ऐसा ख़ाक़ा बुनते की सफाई देते-देते सरकार बदल जाती और जब तक नीरा जी केआशीर्वाद से बना नैरेटिव निपटता, हम मंत्री पद का वितरण कर रहे होते। उधर जैश ने हड़बड़ी में जिम्मेदारी ले कर सब गुड़-गोबर कर दिया, बची-खुची कसर आतंकी महोदय ने गोमूत्र वगैरह पान करने वालों के विरोध में वीडियो बना कर पूरी कर दी।

अब हिन्दुओं से नफ़रत को रिकॉर्ड पे डालने की क्या आवश्यकता थी। बहुत लोग हिन्दू विरोधी हैं, इसमें वीडियो बनाने की क्या आवश्यकता है, खासकर तब जब आप पूर्व कश्मीर मुख्यमंत्री की भांति राज्य के इस्लामिक चरित्र की रक्षा का सार्वजनिक प्रण लिए बिना सेकुलरों का क्रोध झेले कर सकते हैं। आदमी है बोलने के लिए, लिखने के लिए, पर इसे तो वीडियो बनाना था।

बड़ी कठिनाइयों से आतंकवादी के पिता को ढूँढा गया। कच्चे पत्रकार ने इंटरव्यू लिया और यह एंगल भी फुस्स हो गया। पिता बोलने लगे कि उन्हें आभास ही नहीं था कि बेटा आतंकवादी बन के पाकिस्तान का नाम रौशन करने चल पड़ा और माँ बोल पड़ी कि तीन वर्ष से उसे आतंकवाद से बाहर निकालने का प्रयास कर रही थी। पत्रकारों को सहसा भान हुआ कि डायलॉग की आवश्यकता सिर्फ भारत-पाकिस्तान को नहीं बल्कि आदिल डार के माँ-बाप को अधिक है। सामंजस्य के अभाव ने नया बुरहान वानी बनाने का स्वर्णिम अवसर नष्ट कर दिया।

यहाँ तक तो ठीक था पर उधर नैरेटिव अपने-आप बनने लगा, सो भी कश्मीरी अलगाववादियों के विरोध का। एक पत्रकार ही समझ सकता है की स्वाभिमानी पत्रकारों के लिए कैसी परीक्षा की घड़ी आई थी। जब सर्वहारा स्वयँ अपने विचारों की दशा और दशा निर्धारित करने लगे तो एक जिम्मेदार पत्रकार के अस्तित्व पर प्रश्न उठ जाता है। आक्रोश चरम पर था और तिरंगे गलियों में निकल आए। फे़क न्यूज़ का चहुँ ओर नाना प्रकार से विरोध करने वाले पत्रकारों को अंतिम उपाय झूठे संवाद में ही दिखा। अलगाववाद का सारा नैरेटिव सहसा फिसलता दिख रहा था और उसी के साथ तमाम पाँच-सितारा सेमिनारों की सम्भावनाएँ इस स्वजनित आक्रोश में डूबती दिखी।

ऐसे ही हताशा के वातावरण में प्रताड़ित कश्मीरियों का नैरेटिव उत्पन्न हुआ, जिसने पुनः डूबते हुए सेमिनारों को उबारने का आश्वासन दुःखीजनों को प्रदान किया। महान पत्रकारों ने पहले भारतीय नागरिकों द्वारा कश्मीरी नागरिकों की प्रताड़ना की कथा निर्मित की, फिर लोगों से आह्वाहन किया कि हे कश्मीरियों, हम ने कह तो दिया कि तुम असहिष्णु भारतीय नागरिकों के मध्य संकट में हो, अब यह तुम्हारा महती कर्त्तव्य है कि हमारे ट्विटर के डीएम पर, फ़ोन पर इस समाचार से मेल खाते आशय को रिकॉल करो। जुनैद के झगडे को हमने हिंदुत्ववादी हिंसा बनाया, रोहित वेमुला को दलित बना के हमने दलित-विरोधी शासन का नैरेटिव बनाया। इन कपोल-कल्पनाओं के गिर्द हमने सेमिनार और साहित्य-सम्मलेन खड़े किए।

सो हे कश्मीरी युवा, पत्रकारिता के पुनीत व्यवसाय पर उतरे इस संकट के क्षणों में स्वयं को दलित एवं मानवाधिकार संगठनों के स्तर पर आ कर पत्रकार बंधुओं के हाथ मज़बूत करें। अगर आपने तीन महीनों से मकान का किराया नहीं दिया हो, आपकी सब्ज़ी में रेस्टॉरेंट वाले ने नमक अधिक डाल दिया हो, आपके मास्साब ने कैलकुलस के कठिन प्रश्न होमवर्क में दे दिए हों, तो हे भटके हुए कश्मीरी युवा, क्योंकि आप मुख्यभूमि में हैं आप पथराव नहीं कर सकते; आप अपने निकटवर्तीय पत्रकार से संपर्क कर के उसके निर्बल नैरेटिव को बल दें। यह सब हिंदुत्व आतंकवाद है, जो आप समझ नहीं पा रहे हैं।

बयालीस आत्मघाती सैनिकों ने भोले-भाले कश्मीरी युवक के प्राण ले लिए, आपका अधिकार है उस धर्मनिरपेक्ष युवक का साथ देने का। कौन होते हैं ये भारतीय नागरिक, जो कश्मीरी नागरिकों के इस मूलभूत अधिकार का विरोध करते हैं? आपको अलग राष्ट्र का नागरिक घोषित करने के साथ ही महानायिका पत्रकार, बरखा दत्त आपके भारतीय नागरिकों की छाती पर मूंग दलने के अधिकार की रक्षा के लिए आपके साथ कन्धे से कन्धा जोड़ कर लड़ने को तैयार है।

कम्बख्तों, फ़ोन तो करो। हमने एक खूंटा बाँध दिया है, जिससे हम भारतीय आक्रोश को बुझा सकते हैं। इससे ख़बर रुपी भैंस बाँधना अब आपकी जिम्मेदारी है। आप पर ही निर्भर है कि आपका कश्मीरी विवाद और हमारा सेमिनार सर्किट चिरंजीवी रहे। जेएनयू वालों का तो कुछ नहीं जाता, उनसे तो चंदे का हिसाब माँगो तो सोशल मीडिया से निकल लेते हैं, हमें तो झूठी मर्यादा का फ़र्ज़ी भ्रम बनाए रखना है। अब तो नीरा माता का वरद-हस्त भी माथे पे नहीं रहा।

राजदीप जी, थोड़ी शरम बची हो तो हथेली पर थूक कर उसी में नाक डुबा के मर जाइए

इससे पहले कि हेडलाइन पढ़कर मुझे पत्रकारिता के आदर्शों की बात आप बताने लगें, मैं बताना चाहूँगा कि यह एक (कम) प्रचलित कहावत है, जो मैंने ही ऐसे ख़ास मौक़ों के लिए ईजाद की है। दूसरी बात, मैं लुट्यन दिल्ली का पत्रकार नहीं हूँ कि अंग्रेज़ी में लिखने के चक्कर में सामने पड़े पत्र में BSF को CRPF पढ़ लूँ, या फिर बेगैरतों की तरह आँख में चमक लेकर यह स्वीकार लूँ कि आतंकी हमलों पर मैं ख़ुश हो जाता हूँ। जो इस तरह की तुच्छ हरक़त करेगा, उसके लिए मुहावरे भी ऐसे ही इस्तेमाल होंगे, और बाय गॉड, हिन्दी में नीचता के लिए मुहावरों की कमी नहीं है। 

हुआ यूँ कि पुलवामा आतंकी हमले पर ‘छप्पन इंच’ और ‘हाउ इज़ द जैश’ की नौटंकी के बाद जब ‘कश्मीरियों को पीटा जा रहा है’ का नैरेटिव भी फुस्स हो गया, तो राजदीप ने किसी सैकात दत्ता नामक पत्रकार का एक ट्वीट अपने ज्ञानगंगा की कुछ बूँदों के साथ पब्लिक में परोसा। जो भी हो, उद्देश्य यही है कि ‘लोन वूल्फ़’ अटैक का ठीकरा किसी भी तरह से सरकार पर फोड़ा जाए, और उसके लिए जितना गिरा जा सकता है, गिर जाएँगे।

बिल्लौरी चमक के साथ, धूर्तों वाली मुस्कान लिए (मैं उनकी इसी रूप में कल्पना कर पाता हूँ) राजदीप ने लिखा कि सरकारों के पास चमकीले सरकारी विज्ञापनों के लिए अथाह पैसा है, लेकिन हमारे जवानों को बाहर लाने के लिए हेलिकॉप्टर या वायुयान के लिए नहीं! उसके बाद सबको पढ़ने की नसीहत देते हुए राजदीप ने ‘एंटी-नेशनल’ की डुगडुगी बजाते हुए अपना फ़र्ज़ीवाड़ा पब्लिक में बेचने की कोशिश की। 

ज़माना अब टीवी वाला तो रहा नहीं लेकिन काइयाँ पत्रकार, जिसकी दुम स्टूडियो में कुर्सी पर बैठते-बैठते टेढ़ी हो चुकी हो, वो तो यही सोचेगा कि इनके शब्दबाण तो स्पीकर से निकल गए, तो निकल गए। लेकिन सोशल मीडिया के ज़माने में लोग पकड़ लेते हैं, तीन सेकेंड में। राजदीप भी धर लिए गए, और सैकात दत्ता का तो सैराट झाला जी हो गया। 

दरअसल, सैकात ने एक डॉक्यूमेंट शेयर किया जिसमें बीएसएफ़ की तरफ़ से ‘छूट गए/फँसे हुए’ जवानों के लिए एयरलिफ्टिंग (यानी, हवाई मार्ग से उन्हें बाहर निकालने की बात) के लिए गृह मंत्रालय को आवेदन भेजा गया था। यहाँ तक तो ठीक था, लेकिन जब आप उस डॉक्यूमेंट को पढ़ेंगे तो उसमें मंत्रालय ने साफ़-साफ़ लिखा है कि बीएसएफ़ के ही एयर विंग के साथ बात करने के बाद यह फ़ैसला लिया गया है कि जनवरी और फ़रवरी के दो महीनों में C17 हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल ‘फीजीबल’ (व्यवहार्य, संभव, तर्क संगत) नहीं लगता। 

इसी पत्र के दूसरे बिंदु पर मंत्रालय ने लिखा कि बीएसएफ़ चाहे तो एयरफ़ोर्स से इस संदर्भ में बात करते हुए, उनके यानों के प्रयोग की अनुमति हेतु आवेदन कर सकता है अगर ऐसी ज़रूरत आन पड़े तो। ये दोनों बातें बीएसएफ़ के संदर्भ में है। और मंत्रालय ने बीएसएफ़ के ही एयर विंग से सलाह करने के बाद हेलिकॉप्टर इस्तेमाल की अनुमति देने में अपनी असमर्थता जताई। 

स्टूडियो में बैठे पत्रकारों को लगता है कि जैसे ‘ये जो कैलाश है, वो एक पर्वत है’ की ही तरह ‘ये जो हेलिकॉप्टर होता है, वो हवा में उड़ता है’ कोई सीधी-सी बात है। इसके अलावा, वो और कुछ नहीं सुनना चाहते। उन्हें ये जानने में कोई रुचि नहीं कि हो सकता है मौसम ख़राब होने के कारण इन दो महीनों में उड़ान संभव नहीं। हो सकता है कि सिक्योरिटी थ्रेट हो जिसके कारण हवाई उड़ान संभव नहीं। या, और भी कोई कारण रहें हों।

अगली बात यह है कि ये पूरा का पूरा संदर्भ बीएसएफ़ के लिए था, न कि सीआरपीएफ़ के लिए। उसमें भी, अगर राजदीप ने अपने बुज़ुर्ग होते दिमाग पर थोड़ा ज़ोर डाला होता तो याद कर पाते कि 2500 जवानों को पुलवामा आतंकी हमले के दिन ले जाया जा रहा था। और, इस डॉक्यूमेंट में ‘स्ट्रैंडेड पर्सनल’ यानी ‘छूट गए/फँसे हुए’ बीएसएफ़ जवानों के लिए एयरलिफ़्ट की मदद माँगी गई थी। 

लेकिन, इतना कौन देखता है। जब ‘होम मिनिस्ट्री’, ‘ऑफिशियल डॉक्यूमेंट’, ‘हेलिकॉप्टर नहीं दे सकते’ आदि बातें आपको चरमसुख दे रही हों तो ट्वीट टाइप करने में रैज़डीप्स टाइप लोग फ़ैक्ट तो छोड़िए बेसिक इंग्लिश भी भूल जाते हैं। राजदीप ने चरमसुख के चक्कर में न तो आर्टिकल पढ़ा, न ये देखा कि उस लेटर में किस फ़ोर्स का ज़िक्र है, न यह कन्फर्म करने की कोशिश की कि क्या 2500 जवानों को ऐसे ख़राब मौसम में एयरलिफ़्ट करना संभव है। 

आर्टिकल के भीतर जाकर पढ़ने पर मीडिया का पुराना खेल देखने को मिला जिसमें ‘सूत्रों के हवाले’ से कुछ भी लिखा जा सकता है। भीतर में एक जगह पर किसी ‘अधिकारी’ ने कहा कि अगर हेलिकॉप्टर दे दिए जाते तो ‘शायद’ ऐसा होने से बचाया जा सकता था। हालाँकि, सीआरपीएफ़ पर स्टोरी करने वाले सैकात भी पीले डॉक्यूमेंट का रंग देखकर भूल गए कि वो बीएसएफ़ के लिए था और चालीस दिन पहले का (जनवरी 7) था जिसमें ‘विंटर सीज़न’ का ज़िक्र है। 

आगे उनकी ही स्टोरी में उसी अधिकारी ने यह भी माना है कि यह (हेलिकॉप्टर न मिलना) आतंकी हमले का असली कारण नहीं था। उस स्टोरी में ऐसा कहीं ज़िक्र नहीं है कि सीआरपीएफ़ ने भी कभी हेलिकॉप्टर से एयरलिफ़्ट करने का आवेदन किया था। हो सकता है किया हो, पर इस डॉक्यूमेंट में तो ऐसा नहीं है, न ही सैकात के ग्राउंड रिपोर्ट में। 

ख़ैर, आगे बढ़ते हैं और समझने की कोशिश करते हैं कि पत्रकारों का जो ये समुदाय विशेष है, ये जो धूर्तों का गिरोह है, ये जो शातिर लम्पटमंडली है, वो आख़िर कब तक लोगों को ‘कौआ कान लेकर भाग गया’ कहकर दौड़ाती रहेगी? आज बरखा दत्त ने ऐसे ही लिख दिया कि कश्मीरी विद्यार्थियों पर देशभर में हमले हो रहे हैं, और उसे ‘टेरर अटैक’ तक कह दिया। जबकि, ऐसा कोई केस नहीं दिखा है कि किसी भी कश्मीरी पर कहीं भी ‘हमला’ हुआ हो। कुछ जगहों पर उनके द्वारा पुलवामा आतंकी हमले पर जश्न मनाने या आपत्तिजनक बातें कहने पर पुलिस ने संज्ञान ज़रूर लिया है। 

सैकात ने लिखा कि वो देखो कौआ, राजदीप ने भी ज़ोर से कहा कि कौआ कान लेकर भाग रहा है, लेकिन ट्विटर वाले अब चालाक हो गए हैं। उन्होंने राजदीप को न सिर्फ़ उनके बेकार अंग्रेज़ी की समझ पर सवाल किए बल्कि यह भी बताया कि वो जिसको कौआ बोल रहे हैं, वो उन्हीं के सर पर बैठा है और झूठ बोलने पर काट लेगा। बहुतों ने उन्हें आज काटा, ये बात और है कि सिसिफस और प्रोमिथियस की तरह इस आदमी ने आजकल अपने दैनिक दुखों में ही आनंद लेना शुरू कर दिया है। 

ये सब भी हटा लें, तो राजदीप जैसे लोग क्या क्लेम करना चाहते हैं? सरकार जागरुकता के लिए विज्ञापन देना बंद करे दे जबकि ‘स्वच्छता अभियान’ से लेकर ‘बेटी बचाओ, बेची पढ़ाओ’ जैसे जीवन बदलने वाले सरकारी अभियानों की सफलता प्रचार पर बहुत हद तक निर्भर करती है। क्या ‘हेलिकॉप्टर हैं और उसका इस्तेमाल किया जा सकता था’ का मतलब यह है कि किसी आतंकी द्वारा ट्रक से विस्फोटकों से लदी कार भिड़ा दी जाए? 

मोदी विरोध में ऐसे मानसिक रूप से विक्षिप्त हो चुके पत्रकार तर्क की कौन-सी शाखा से चलते हैं कि वो इस तरह की बातें खोज लाते हैं? अमरनाथ यात्रा पर भी हमला हुआ था, उनको भी हेलिकॉप्टर से उठा लेते? उरी में सेना के कैंप पर हमला हुआ था, उसको शायद इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर शिफ्ट किया जा सकता था? क्योंकि सरकार के पास विज्ञापनों पर ख़र्च करने के लिए बहुत पैसा है! 

आप सोचिए भला कि किस तरह से नैरेटिव बनाया जा रहा है। हमला होने के आधे घंटे में सरकार की क़ाबिलियत से लेकर उसकी गम्भीरता और प्रतिकार की क्षमता पर सवाल उठाए जाने लगे थे। उसके बाद जब मोदी सरकार ने पाकिस्तान से ‘मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन’ का स्टेटस वापस लिया, अलगाववादियों की सुरक्षा हटा ली, इंटरनेशनल प्रेशर बनाना शुरू किया, सेना को स्वतंत्रता दे दी कि योजना बना कर निपटे, राजनयिकों को तलब किया, तो इस गिरोह को लगा कि ये आदमी तो सीरियस ही हो गया! 

तब इन्होंने ‘शांति’ की अपील करनी शुरु की लेकिन देश में अभी वैसा माहौल है नहीं कि शांति की बात कोई भी राष्ट्रभक्त व्यक्ति सुनना चाह रहा हो। मैं युद्ध के ख़िलाफ़ हूँ, लेकिन शांति की बात पाकिस्तान से तो नहीं ही कर सकता। उसके बाद मीडिया का गिरोह सक्रिय होकर आतंकी और उसके माँ-बाप को ऐसे दिखाने लगा जैसे वो लोग आम भारतीय नागरिकों की तरह आईपीएल देखा करते थे। टेररिस्ट के बाप को यह कहते दिखाया गया कि उनका दुःख उस जवान के परिवार के दुःख के समान ही है!  

बात यहीं तक नहीं रुकी, राजदीप ने अपने घर के दरवाज़े कश्मीरियों के लिए खोल दिए और बरखा ने ट्विटर पर एक मैनुफ़ैक्चर्ड झूठ के आधार पर कश्मीरियों पर देश में ‘टेरर अटैक’ होता दिखा दिया। शेहला रशीद जैसे फ़्रीलान्स बेसिस पर विरोध प्रदर्शन करने वाली महिला ने 15-20 लड़कियों को देहरादून के किसी संस्थान में बंधक बनवा दिया जिसे पुलिस निकाल नहीं पा रही थी! 

नैरेटिव को ‘पुलवामा में एक आतंकी ने 40 जवानों की नृशंस हत्या कर दी, जिनके चिता की अग्नि अभी ठंडी न हुई हो और कब्र की मिट्टी ठीक से दबी न हो’, वहाँ से उठाकर ‘कश्मीरियों को ‘भारत’ में मारा जा रहा है’ बनाने की कोशिश की गई। भला हो सोशल मीडिया का कि पुलिस सक्रिय होकर ऐसे लोगों पर एफआईआर कर रही है। और, जैसा कि होना था कार्डों में श्रेष्ठ ‘विक्टिम कार्ड’ को लेकर बेचारी शेहला ने कश्मीरियत के लिए अपने आप को एक बार फिर से क़ुर्बान कर दिया। पिछली बार जब किया था, तब उन पर कठुआ पीड़िता के फ़ंड के हरे-फेर का आरोप लगा था। 

इसलिए, आप यह मत देखिए कि मैं एक ट्वीट पर इतना लिख रहा हूँ। आप यह सोचिए कि इन लोगों का एक ट्वीट ही कितना घातक होता है। इन लोगों के द्वारा ट्वीट की गई एक फ़र्ज़ी ख़बर पूरे भारत का सर बिग बीसी टाइप के प्रोपेगेंडा पोर्टलों पर स्माइली के साथ नीचा करा देती है। ये लोग वाक़ई में बहुत ही निम्न स्तर के ट्रोल हैं जिन्होंने कई साल तथाकथित पत्रकारिता की थी। 

इसलिए, इनके एक ट्वीट पर, इनके हर शब्द का सही मतलब निकाल कर, तह दर तह छील देना है। जब तक इन्हें छीलेंगे नहीं, ये अपनी हरक़तों से बाज़ नहीं आएँगे। इसलिए, इनके ट्वीट तो छोड़िए, एपिडर्मिस, इन्डोडर्मिस से लेकर डीएनए तक खँगालते रहिए क्योंकि बाय गॉड, ये लोग बहुत ही बेहूदे क़िस्म के हैं। 

Fact Check: कश्मीरी मुस्लिमों के नाम पर रॉयटर्स फैला रही फ़ेक ख़बर

पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले से जहाँ एक तरफ देश में आक्रोश का माहौल है, वहीं कुछ ऐसी ख़बरें भी सामने आ रही हैं जिसका सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है। अफ़वाह फैलाने जैसी ख़बरों को कई बार सच मान लिया जाता है, जिसके परिणाम भयंकर भी हो जाते हैं। ऐसी ही एक ख़बर रॉयटर्स न्यूज़ एजेंसी ने अपनी वेबसाइट पर ‘Kashmiri Muslim evicted, threatened after deadly attack on indian forces’ शीर्षक से लिखी है।

रॉयटर्स जैसी बड़ी और अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसी कैसे ख़बरों के साथ फ़र्ज़ीवाड़ा करती है, इसे नीचे के दो स्क्रीनशॉट के माध्यम से समझा जा सकता है। भारत की एक न्यूज़ एजेंसी में काम कर रहे हमारे एक साथी (नाम न छापने की शर्त पर) ने रॉयटर्स की इसी गंदगी का पर्दाफाश किया है।

भारतीय न्यूज़ एजेंसी में काम कर रहे हमारे एक साथी द्वारा शेयर किया गया चैट

भारतीय न्यूज़ एजेंसी में काम कर रहे हमारे एक साथी द्वारा शेयर किया गया चैट

रॉयटर्स ने अपनी इस ख़बर में पुलवामा में हुए हमले के बारे में तो बताया ही साथ में हरियाणा और उत्तराखंड के कश्मीरी मुस्लिमों के प्रति अपने इस फ़र्ज़ी दर्द को भी उजागर किया कि वो किस तरह की साम्प्रदायिक स्थिति का सामना कर रहे हैं।

रॉयटर्स ने इस ख़बर में जिन-जिन जगहों और व्यक्ति-विशेष का उदाहरण दिया है वो या तो झूठ है या फिर उन लोगों ने सही में भारतीय कानून को ताक पर रख कर जुर्म किया था। पुलवामा जैसे आतंकी हमले के बाद सोशल मीडिया पर देशद्रोही पोस्ट लिखना अमानवीय और गैर-कानूनी भी है।

रॉयटर्स की यह ख़बर पूरी तरह से झूठी है। इस तरह की ख़बरे लोगों को भड़काने और बेवजह परेशान करने के लिए लिखी जाती हैं।

₹33,000+ करोड़ की योजनाएँ, 3 मेडिकल कॉलेज: झारखंड-बिहार में 1 दिन में PM मोदी का योगदान

रविवार (जनवरी 17, 2019) को पीएम मोदी बिहार और झारखंड के दौरे पर पहुँचे। यहाँ पहुँचकर प्रधाममंत्री ने 33 हजार करोड़ रुपयों से अधिक की परियोजनाओं की सौगात दी। इसमें पटना शहर को स्मार्ट बनाने से जुड़े प्रोजेक्ट हैं, बिहार के औद्योगिक विकास और युवाओं को रोज़गार से जुड़े प्रोजेक्ट हैं और बिहार के लिए स्वास्थ्य सुविधाएँ बढ़ाने वाली परियोजनाएँ हैं।

बरौनी पहुँचकर पीएम मोदी ने रिमोट कंट्रोल से पटना मेट्रो की आधारशिला रखी। जिसपर 13,365 करोड़ रुपए की लागत आएगी। साथ ही पुलवामा हमले को लेकर पीएम मोदी ने कहा कि जो आग देशवासियों के दिल में है, वही आग उनके दिल में भी है। बरौनी के बाद पीएम हजारीबाग पहुँचे। यहाँ पर उन्होंने 800 करोड़ की योजनाओं का शिलान्यास किया और 3 मेडिकल कॉलेजों का भी उद्घाटन किया।

उन्होंने जनता को संबोधित करते हुए कहा कि उन्होंने पिछले साढ़े चार साल से झारखंड के विकास के लिए जो काम किया जा रहा है, उसको गति देने आए हैं। उन्होंने कहा कि मेडिकल कॉलेज, अस्पताल, इंजीनियरिंग कॉलेज, पाइप लाइन, नमामि गंगे प्रोजेक्ट के शिलान्यास और लोकार्पण से झारखंड में मूलभूत सुविधाओं को ताकत मिलने वाली है।

बरखा दत्त, शेहला रशीद, मनीष सिसोदिया, क्विंट आदि मीडिया गिरोह के नए झूठ और नैरेटिव

कई वामपंथी अजेंडाबाज़ और पत्रकारों का समुदाय विशेष पुलवामा आतंकी हमले के बाद नए नैरेटिव लाने की पुरज़ोर कोशिश कर रहा है जहाँ ऐसा लगे कि ये लड़ाई कश्मीरी बनाम भारतीय है। जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं है। किसी भी कश्मीरी छात्र को कहीं भी पीटा नहीं गया। बरखा दत्त ने इसे ‘कश्मीरी टेरर अटैक’ तक कह दिया। कई मीडिया वाले आतंकियों के ‘मानवीय’ चेहरे को दिखाना चाह रहे हैं।

जानिए सच क्या है वीडियो में:

Pak को उसके खिलाड़ी-कलाकार मुबारक, जवानों की मौत के साथ नहीं चाहिए ऐसे सुर और शॉट्स

कश्मीर के पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले में 40 जवानों के बलिदान और दो दर्जन से अधिक घायलों की ख़बर से देश सदमे में है। देश का ऐसा कोई कोना बाक़ी नहीं जहाँ वीरगति को प्राप्त इन जवानों को नम आँखों से विदा न किया गया हो। शायद ही कोई देश-प्रेमी होगा जिसके ख़ून में उबाल न आई हो।

पाकिस्तान का दोहरा रवैया एक बार नहीं सैकड़ों बार उजागर हो चुका है। भारत ने हमेशा ही पाकिस्तान के साथ शांति क़ायम रखने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया है। लेकिन पाकिस्तान हमेशा से पीठ पर छुरा घोंपने का काम करता आया है। साथ ही, आतंकी संगठनों का गढ़ होने के बावजूद पाकिस्तान इस बात को नकारता आया है। बारूद पर बैठे पाकिस्तान की हक़ीकत को दुनिया अच्छी तरह से जानती है और इसीलिए पुलवामा हमले के बाद विश्वभर के देशों ने भारत का साथ देने पर अपनी सहमति जताई है।

पुलवामा हमले के बाद से ही देश के कोने-कोने में विरोध की लहर चल निकली है। खेल जगत से लेकर फ़िल्म जगत तक में पाकिस्तान के इस छद्म वार की घोर निंदा हो रही है।

प्रतिष्ठित क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया (CCI) ने शनिवार को कश्मीर के पुलवामा में CRPF के क़ाफ़िले पर हुए आतंकी हमले के विरोध में ग़ुस्सा दिखाते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की फोटो को ढक दिया। पाकिस्तान के ख़िलाफ़ अपने विरोध में इमरान ख़ान के फोटो को ढक देने भर से क्या दो देशों के बीच कड़वाहट ख़त्म होगी? एक तरफ सीमा पर तैनात जवान पाकिस्तान के वार का समना करते हैं और दूसरी तरफ भारत कला-संस्कृति के आदान-प्रदान और खेलों के माध्यम से हमेशा पाकिस्तान को सपोर्ट करता आया है। लेकिन फायदा शायद ही कुछ हुआ हो!

पुलवामा हमले के बाद बॉलीवुड के जावेद अख़्तर और शबाना आज़मी ने पाकिस्तान में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल होने से मना कर दिया था। सोनू निगम और कंगना रनौत ने भी हमले के बाद तीखी प्रतिक्रिया दर्ज की थी। सोनू निगम ने तो दोहरा रवैया अपनाने वालों को पाकिस्तान का हितैषी करार दिया था और उनके नाम एक वीडियो भी जारी किया था।

वहीं अपनी प्रतिक्रिया में कंगना ने शबाना आज़मी पर तंज कसा और कहा कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान ने भारतीय कलाकारों को बैन कर दिया था तब कराची जाकर शबाना आज़मी ने एक कार्यक्रम का आयोजन क्यों किया था? जब दो देशों के बीच कटुता इतना विकराल रूप धारण कर चुकी हो तो किसी भी तरह के सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर रोक लग जानी चाहिए।

इसी कड़ी में म्यूज़िक कंपनी टी-सीरिज का भी नाम शामिल है, जिसने पाकिस्तानी गायक आतिफ़ असलम के एक गाने को यूट्यूब पर अनलिस्ट कर दिया। बता दें कि यह गीत 12 फ़रवरी को रिलीज किया गया था। हालाँकि इस बात की जानकारी ऑफ़िशियली नहीं दी गई है। हमले के बाद से ही पाकिस्तानी सिंगर को बैन करने की माँग भी तेजी से बढ़ी है। कई ट्विटर यूज़र्स ने अपने ट्वीट के ज़रिए जवानों के बलिदान को याद करते हुए पाकिस्तानी सिंगर को बैन करने के लिए अपनी आवाज़ बुलंद की है।

अब बात करते हैं पाकिस्तानी गायक अदनान सामी की, जिन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक की सफलता पर प्रधानमंत्री मोदी को ट्वीट किया था और इसके बाद वो विवादों में आ गए थे। हालात इतने गंभीर हो गए थे कि अदनान सामी ने यह तक कह दिया था कि सर्जिकल स्ट्राइक से भारत ने पाकिस्तान के कचरे को साफ़ करने का काम किया है। बता दें कि अदनान ने पाकिस्तान की नागरिकता छोड़कर भारत की नागरिकता अपना ली थी। इसके अलावा वो असहिष्णुता मुद्दे पर भारत के पक्ष में बयान दे चुके हैं।

ऐसे में यह कहना लाज़मी बन पड़ता है कि जिस भारत को पाकिस्तान पानी पी-पीकर कोसता है, जिसकी बर्बादी का ख़्वाब वो पल-पल देखता है वो ख़ुद अपनी कला-संस्कृति को बचाने में पूरी तरह से विफल है, केवल आतंक फैलाना ही उसका एकमात्र ध्येय है। क्योंकि अगर ऐसा न होता तो पाकिस्तान के कलाकार यहाँ कभी फल-फूल न पाते।

यह हो सकता है कि कुछ लोग मेरी राय से इत्तेफ़ाक़ न रखते हों और यह मानते हों कि सीमा के विवाद को कला-संस्कृति और खेल से नहीं जोड़ना चाहिए। लेकिन मेरी अंतरात्मा इस बात को कभी स्वीकार नहीं करेगी कि एक तरफ तो पाकिस्तान सीमा पर हमारे वीरों की बलि चढ़ाता रहे, उनके मस्तक काटकर ले जाए और दूसरी तरफ खेलों व सांस्कृतिक आदान-प्रदान के नाम पर गाना-बजाना और खेलना-कूदना भी जारी रखे।

पाकिस्तान अपने दोहरे रवैये से आपसी रिश्तों को कभी नहीं सुधार पाएगा। एक तरफ दोस्ती का हाथ और दूसरी तरफ छद्म युद्ध पाकिस्तान की मंशा को पूरी तरह से स्पष्ट करता है।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान कब अपनी इन नापाक हरक़तों से बाज आएगा। इतना होने के बावजूद भी खेलों और सांस्कृतिक गतिविधियों में शिरक़त के बहाने आपसी रिश्तों की कड़वाहट क्यों छिपाने की कोशिश की जाए? समय रहते अब पाकिस्तान को सचेत हो जाना चाहिए कि भारत उसकी किसी भी बहलाने-फुसलाने वाली चाल में नहीं फँसेगा और उसे उसके किए की सज़ा जल्द से जल्द देगा।

कश्मीरी छात्राओं की पत्थरबाजी और Pak-जिंदाबाद के नारों से गरमाया देहरादून का माहौल

एक तरफ जहाँ श्रीनगर में भारतीय सुरक्षाबल हेल्पलाइन नंबर देकर कोशिश कर रही है कि कश्मीर के लोगों को किसी भी तरह की मुसीबत का सामना न करना पड़े, वहीं कुछ कश्मीरी स्वयं ही अपनी ओछी हरकतों के कारण लोगों का गुस्सा अपनी तरफ आकर्षित करने का लगातार प्रयास कर रहे हैं।

ख़बर है कि देहरादून में पढ़ रही कई कश्मीरी छात्राओं ने हॉस्टल की छत से कैंडल मार्च में नारेबाजी करते हुए जाते लोगों पर न केवल पत्थर उछाले बल्क़ि पाकिस्तान के समर्थन में नारे भी लगाए। इसके बाद कश्मीरी छात्राओं की इस हरक़त से गुस्साए वहाँ के स्थानीय लोगों ने हॉस्टल को घेर लिया। ये घटना मांडूवाला रोड पर एक निजी संस्थान के पास बने हॉस्टल की है, जिसमें 24 कश्मीरी छात्राएँ रहती हैं।

हिन्दुस्तान अख़बार के हरिद्वार संस्करण में 17 फरवरी 2019 को प्रकाशित ख़बर

मामले में बढ़ती तनातनी को देखकर पाँच थानों की पुलिस को वहाँ मौक़े पर बुलाया गया। पुलिस की मौजूदगी में इन छात्राओं द्वारा भारत जिंदाबाद के नारे लगाने के बाद माहौल शांत हुआ और भीड़ वहाँ से हटी। घटनास्थल पर विधायक सहदेव पुंडीर भी पहुँचे।

घटना के विरोध में कार्रवाई की माँग को लेकर लोगों ने सुद्दोवाला सड़क पर जाम लगा दिया था। साथ ही मोमबत्तियाँ जलाकर बलिदान हुए जवानों को श्रद्धांजलि भी दी गई। पुलिस ने बाद में किसी तरह से लोगों को शांत कराते हुए जाम खुलवाया।

इसके अलावा आतंकी हमले के बाद प्रेमनगर क्षेत्र में भी कुछ कश्मीरी छात्रों की ऐसे पोस्ट सामने आए, जिसमें जवानों पर हुए हमले का समर्थन किया गया था। यह तीनों ही छात्र प्रेमनगर थाना क्षेत्रों के अलग-अलग संस्थानों से हैं। इन तीनों ही छात्रों को इनके संस्थानों से निकाल दिया गया है।

दून में रहते हुए देश विरोधी प्रतिक्रियाओं पर पुलिस ने मुकदमों को दर्ज करना शुरू कर दिया है। ऐसे छात्रों के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 505(2) के तहत मुकदमों को दर्ज किया जा रहा है। इस धारा में दोष सिद्ध होने के तहच पूरे पाँच साल की सज़ा होने का प्रावधान है।