उत्तर प्रदेश में बसपा की अध्यक्ष मायावती के जन्मदिन पर उनकी पार्टी के नेता विजय यादव ने एक बेहद विवादित बयान दिया है। मायावती के जन्म दिन पर जनसभा को संबोधित करते हुए विजय यादव ने कहा- “घबराने की जरूरत नहीं है, दौड़ा-दौड़ा कर मारेंगे बीजेपी को, मरी हुई नानी याद दिला देंगे।”
सपा-बसपा के गठबंधन के बाद दोनों पार्टियों के नेताओं में और उनके समर्थकों में एक अलग ही ‘स्तर’ का आत्मविश्वास देखने को मिल रहा है। लगातार हर तरफ ऐसे बयान सुनने में आ रहे हैं कि इस गठबंधन ने बीजेपी पार्टी से जुड़े लोगों की नींदें उड़ा दी हैं।
ANI द्वारा ट्विटर पर जारी किए गए वीडियो के एक हिस्से में विजय यादव कहते नज़र आ रहे हैं, “कॉन्ग्रेस ने एक तरफ जहाँ देश को राजीव गांधी, इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी के रूप में चार गाँधी दिए हैं। वहीं बीजेपी ने भी मोदी दिए हैं- नीरव मोदी, ललित मोदी और अंबानी की गोद में बैठा नरेंद्र मोदी।”
#WATCH BSP leader Vijay Yadav in Moradabad: Inn BJP waalon ko toh dauda dauda kar maarenge. Ghabrane ki zaroorat nahi hai. Aaj inhe nani yaad aagai hogi, mari hui nani, ki SP-BSP ek hogaye. (Note: Strong language) (15.01.2019) pic.twitter.com/Y5jkzB0Hs0
विजय यादव ने इस वीडियो में जनता को संबोधित करते हुए बोला, “अगर इस मोदी ने किसी के लिए कुछ किया है तो वो उद्योगपतियों के लिए किया है, बाकी किसी गरीब के लिए मोदी ने कुछ नहीं किया है।”
इस पूरे वीडियो में ऐसा लग रहा है कि सपा-बसपा के एक होने की खुशी विजय यादव से समेटे नहीं सिमट रही है। अपनी बात को रखने का अंदाज़ इस लहज़े में था कि अगर उन्हें कुर्सी नहीं मिली तो वो उसे छीन लेंगे।
लोकसभा चुनावों को मद्देनज़र रखते हुए अपनी इस बातचीत में उन्होंने श्रोताओं से कहा कि वे लोग फिक्र न करें, भारतीय जनता पार्टी वालों को तो सपा-बसपा दौड़ा-दौड़ा कर मारेगी।
विजय यादव ने यह भी बोला कि बीएसपी वालों को घबराने की जरूरत नहीं है। सपा-बसपा को साथ देखकर तो बीजेपी वालों को इनकी मरी हुई नानी याद आ गई हो गई।
जनता को न डरने की सलाह देते हुए नेता जी ने जय भीम बोलते हुए मुस्लिमों को अस्सलाम-वालेकुम कहा और हिन्दुओं को कहा राम-राम।
विजय यादव के ऐसे बयान के बाद लगता है कि सपा-बसपा के गठबंधन से पूरे देश में खुशी की लहर दौड़ी हो चाहे न दौड़ी हो, लेकिन पार्टी के सारे नेताओं में जीत को लेकर अत्याधिक विश्वास अभी से देखने को मिल रहा है। बता दें कि कॉन्ग्रेस का एक तरफ इस गठबंधन पर कहना है कि इन दोनों पार्टियों ने एक होकर वही काम किया है, जो बीजेपी चाहती थी कि सारे गुट एक हो जाएँ। वहीं बीजेपी के समर्थकों का इस गठबंधन पर कहना है कि उन्हें विश्वास है कि चाहे सारी पार्टियाँ एक क्यों न हो जाएँ, लोकसभा चुनावों में जीत उन्हीं की होगी।
‘फादर ऑफ़ मॉडर्न मार्केटिंग (Father Of Modern Marketing)’ कहे जाने वाले फ़िलिप कोटलर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना करते हुए कहा कि फ़िलिप कोटलरप्रेसिडेंशियल लीडरशिप अवार्ड के लिए जो भी पैमाने तय किए गए थे- मोदी उन सब पर खड़े उतरे। मार्केटिंग जर्नल को दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने इस पर खुल कर बात की। उन्होंने बताया कि आज के युग में एक नेता के क्या दायित्व होने चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि फ़िलिप कोटलर लीडरशिप अवॉर्ड उन्हीं को दिया जा सकता है जो:
प्रतिनिधित्व वाली सरकार और सामाजिक न्याय में विश्वास रखते हैं।
इस बात में विश्वास रखते हैं कि एक अच्छा समाज एक बेहतर व्यावसायिक वातावरण का निर्माण करेगा।
पूरी शिद्दत और ईमानदारी के साथ सबकी भलाई के लिए काम करते हैं।
बकौल कोटलर, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन सभी पैमानों पर बाकी वैश्विक नेताओं से काफ़ी आगे हैं। मोदी ने वैश्विक स्तर पर भारत की छवि में सुधार किया है। कोटलर ने कहा कि उपर्युक्त पैमानों को ध्यान में रखते हुए WMS (World Marketing Summit) की एक समिति ने इस पर मतदान किया और अंतिम निर्णय उनका था।
जब फ़िलिप कोटलर अवॉर्ड को लेकर चल रहे विवाद के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि विपक्ष द्वारा पीएम मोदी को अवॉर्ड दिए जाने की आलोचना करना ख़ेदजनक है। यह अवॉर्ड जितना पीएम मोदी का सम्मान है, उतना ही पूरे भारत का सम्मान भी है। उन्होंने कहा कि वो स्वास्थ्य कारणों से नरेंद्र मोदी को खुद अवॉर्ड देने भारत नहीं जा सके। इसी कारण उन्होंने अपने मित्र जगदीश सेठ को कहा कि वो भारत जाकर पीएम मोदी को यह अवॉर्ड प्रदान करें।
I congratulate PM @narendramodi for being conferred the first ever Philip Kotler Presidential Award. He has been selected for his outstanding leadership & selfless service towards India, combined with his tireless energy. (1/2)
इसके अलावे कोटलर ने संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बारे में बात करते हुए कहा कि वो ट्रम्प के आलोचक हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रॉन के बारे में उन्होंने कहा कि मैक्रॉन अभी ‘येलो जैकेट क्रांन्ति’ में व्यस्त हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी देश का नेता उस देश का ब्रांड गार्जियन होता है। वो कैसा व्यवहार करता है, इसका असर पूरे देश पर पड़ता है।
बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पहले फ़िलिप कोटलर प्रेसिडेंशियल अवार्ड से नवाजा गया है। नरेंद्र मोदी का चयन देश को उत्कृष्ट नेतृत्व प्रदान करने के लिए किया गया है। पीएमओ के अनुसार, यह अवार्ड ‘पीपुल, प्रॉफिट और प्लैनेट’ की अवधारणा पर केंद्रित है। हर साल यह अवॉर्ड किसी देश के नेता को दिया जाएगा। इस अवॉर्ड को दिए जाने के बाद राहुल गाँधी समेत कुछ विपक्षी नेताओं ने इसकी आलोचना की थी। इसके बाद केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने राहुल गाँधी को जवाब देते हुए कहा था कि ऐसा व्यक्ति यह बात कह रहा है, जिसके परिवार में किसी ने ख़ुद को ही भारत रत्न दे दिया था।
फ़िलिप कोटलर फ़िलहाल केल्लॉग स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में इंटरनेशनल मैनेजमेंट के प्रोफेसर हैं। उन्हें हाल ही में ‘मार्केटियर ऑफ़ द ईयर’ के अवॉर्ड से भी नवाज़ा जा चुका है।
सबसे पहले ट्विटर पर रवि नायर ने राफ़ेल की आधी कीमत वाले झूठ को फैलाया, जिसके बाद इसे ‘द वायर’ जैसे मीडिया पोर्टल्स ने आगे बढ़ाया। अब आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता आशुतोष की वेबसाइट सत्य-हिंदी ने इस फ़र्जी खबर को आधार बनाते हुए एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। इसमें कहा गया है कि फ्रांस भारत से आधी कीमत पर उन्नत राफ़ेल विमान खरीदने जा रहा है। जबकि यह सरासर झूठी ख़बर है।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया में 16 जनवरी की सुबह 7:57 पर भी एक ख़बर छपी है, जिसमें फ्रांस की सरकार द्वारा इस ख़बर का खंडन किया गया है। लेकिन आपका काम ही जब प्रोपेगंडा फैलाना बन जाए तो सुबह उठकर अख़बार या न्यूज़ वेबसाइट पढ़ने में दिलचस्पी कोई दिखाए क्यों? और यही काम आशुतोष और उसकी सत्य-हिन्दी टीम ने किया।
फ़्रांस ने रफाल का बेहतर विमान आधे से कम दाम पर ख़रीदा। सवाल – भारत ने क्यों कमतर विमान दुगुने दाम से ज़्यादा पर ख़रीदा? “सत्य” खबर ।।। https://t.co/RK09cRIUhR
आपको बता दें कि राफ़ेल लड़ाकू विमान के लिए F4 कॉन्फ़िगरेशन अभी भी ड्राइंग बोर्ड में है। यह वर्तमान में विकास के प्रारंभिक चरण में है। और 2023 तक F4 राफ़ेल को वितरित करना संभव नहीं है। क्योंकि F4 स्टैण्डर्ड कल 14 जनवरी 2019 को ही शुरू किया गया है। राफ़ेल को फ़्रांस सरकार से मिला €2 बिलियन का अनुबंध F4 मानक के विकास के लिए है। फ्रांसीसी सरकार ने दसाँ (Dassault) एविएशन की आरएंडडी गतिविधियों की फ़ंडिंग की है। राफ़ेल के F4 मानक के विकास के लिए यह अनुबंध तब कंपनी को प्रदान किया गया जब सशस्त्र बल के फ्रांसीसी मंत्री फ्लोरेंस पार्ली ने 14 जनवरी, 2019 को फ़्रांस के मेरिग्नैक में कंपनी के संयंत्र का दौरा किया। यह अनुबंध केवल उन्नत F4 कॉन्फ़िगरेशन के विकास के लिए है। इसमें विमान उत्पादन शामिल नहीं है।
मंगलवार को (जनवरी 15, 2019) ऑपइंडिया हिंदी ने इस मामले पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें यह बताया गया था कि राफ़ेल सौदे को लेकर कैसे एक ताजा झूठ फैलाया जा रहा है और इसमें कई मीडिया पोर्टल भी शामिल हैं। ऑपइंडिया ने अपने इस रिपोर्ट में बताया था कि कुछ लोगों ने एक ख़बर प्रसारित की है कि फ़्रांस ने 28 राफ़ेल विमानों को दसाँ (Dassault) एविएशन से €2 बिलियन का ऑर्डर दिया है। उनके अनुसार, ये विमान अगली पीढ़ी के F4 स्टैंडर्ड के होंगे और इस सौदे की प्रति यूनिट कीमत भारत F3R मानक के 36 राफ़ेल जेट विमानों के लिए चुकाए जा रहे क़ीमत की लगभग आधी है।
कोई भी धर्म, सम्प्रदाय, संस्था, राज्य और समाज कितना उदार है, इसे इस पैमाने पर मापा जा सकता है कि वहाँ महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार होता है। नारी को शक्ति के रूप में देखने वाली धरती और लैंगिक समानता का सन्देश देने वाले हिन्दू धर्म पर यह आरोप लगता रहा है कि यहाँ महिलाओं के साथ सही व्यवहार नहीं होता है। पश्चिमी सभ्यता के उदारवाद की दुहाई देते नहीं थकने वाले भारतीय समाज, हिन्दू जीवन-दर्शन और पुरातन भारतीय संस्कृति को इसी आधार पर हीन दृष्टि से देखते रहे हैं। लेकिन क्या ये सच है? क्या सच में क्रिश्चियनिटी, इस्लाम इत्यादि में महिलाओं को वो जगह मिली है, जिससे हिन्दू समाज ने आपने आपको वंचित रखा है? इसके लिए कुछ घटनाओं को देखना जरूरी है, तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है।
क्या एक महिला का महामंडलेश्वर बनाना बदलाव है?
इसकी शुरुआत कल या 15 जनवरी 2019 की ख़बर के साथ करते हैं। प्रयागराज में कुम्भ की शुरुआत हो गई है और सभी अखाड़े गंगा-यमुना-सरस्वती संगम में डुबकी लगा चुके हैं। इसी बीच श्री पंचायती तपोनिधि निरंजनी अखाड़े में केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण राज्यमंत्री निरंजन ज्योति का पट्टाभिषेक किया गया। अर्थात एक महिला महामंडलेश्वर के नेतृत्व में निरंजनी अखाड़े ने कुम्भ में स्नान किया। क्या यह एक सुखद बदलाव है? क्या यह एक ऐसा बदलाव है, जिसकी कामना कथित धर्मनिरपेक्ष ताकतें कर रही थीं? अगर हम कहें कि नहीं, ऐसा नहीं है तो शायद आप चौंक जाएँ लेकिन हमारे पास इसके लिए तर्क हैं, सबूत है, ऐतिहासिक विवरण है और झूठ बोल कर भारतीय संस्कृति को बदनाम करने वालों के पोल खोलने के लिए और भी बहुत कुछ है।
साध्वी निरंजन ज्योति को निरंजनी अखाड़ा का महामंडलेश्वर नियुक्त किया गया
अब बात महिला महामंडलेश्वर के इतिहास की! केंद्रीय मंत्री निरंजन ज्योति इस अखाड़े की महामंडलेश्वर बनने वाली पहली महिला नहीं हैं। इस से पहले 10 महिलाएँ इस अखाड़े का नेतृत्व कर चुकीं हैं। महिलाओं द्वारा धार्मिक कार्यों, सार्वजनिक त्योहारों, पारिवारिक अनुष्ठानों में अग्रणी भूमिका निभाने, उनका संचालन करने का ऐसा उदाहरण कहीं और नहीं मिलता है। अब इसकी तुलना ब्रिटेन जैसी मॉडर्न सोच वाली जगह पर स्थित एक मस्ज़िद से करते हैं। ऐसा करना इसीलिए जरूरी है क्योंकि जब तक हम दो अलग-अलग संस्कृतियों और स्थानों की तुलना नहीं करेंगे, तब तक हमें यह पता नहीं चल पाएगा कि कौन बेहतर है।
क्या हालात हैं मॉडर्न सोच वाले ब्रिटेन में?
शेलीना जनमोहम्मद ब्रिटेन की लेखिका हैं। दिसंबर 2018 में अंतरराष्ट्रीय मीडिया पोर्टल ‘द नेशनल’ के लिए लिखे लेख में उन्होंने एक अनुभव साझा किया है। जब वो ब्रिटिश यूनिवर्सिटी टाउन में नई-नई आई थीं, तभी उनके साथ एक ऐसा अनुभव हुआ, जिससे उन्हें इस्लाम में इक्कीसवीं सदी में भी चली आ रही रूढ़िवादी मानसिकता का पता चला। नमाज़ के समय पर वह पास के एक छोटे से मस्ज़िद में पहुँचीं। ब्रिटेन में कई घरों को छोटे-छोटे मस्ज़िदों में परिवर्तित कर दिया गया है, ये भी उनमें से ही एक था।
जब शेलीना ने मस्ज़िद के बंद दरवाज़े पर दस्तक़ दी तो एक शख़्स बाहर निकला, जिससे शेलीना ने अंदर नमाज़ अदा करने की इजाज़त मांगी।
“हमारे पास नमाज़ की जगह नहीं है।”- उस शख्स ने रूखेपन से जवाब दिया। जबकि शेलीना दरवाज़े से अंदर साफ़-साफ़ देख रही थीं कि वहाँ अच्छी-ख़ासी जगह खाली पड़ी है। उन्होंने उससे बस थोड़ी देर के लिए अंदर आने की अनुमति माँगी और खाली जगह की ओर इशारा करते हुए कहा कि मैं वहाँ पर नमाज़ अदा कर लूँगी। उसके बाद उस शख़्स ने ‘ना’ की मुद्रा में सर हिलाते हुए दरवाज़े को बंद कर लिया। इस लेख में उन्होंने कहा है कि ब्रिटेन में 25% से ज्यादा मस्ज़िदों में महिलाओं के लिए कोई जगह नहीं है।
अब तथाकथित मॉडर्न सोच के स्वयंभू वकीलों से ये पूछा जाना चाहिए कि भारतीय संस्कृति और हिन्दूत्व-दर्शन में जिस लैंगिक असमानता की वो बात करते हैं, वो किस जगह पाई जाती है। सच तो यह है कि उनके पास अपने तर्क़ों को आधार देने के लिए कोई सबूत ही नहीं है। भारतीय पूजा-पाठ, अनुष्ठानों और धार्मिक त्योहारों में महिलाओं की भूमिका समझने के लिए अब हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा।
भारतीय परंपरा में महिला संतों का रहा है पुराना इतिहास
हिन्दू धर्म में प्रकृति यानी कि समस्त मानवता की पोषक को स्त्री रूप में देखा गया है। देवी दुर्गा सहित कई देवियाँ हैं, जो स्त्री हैं लेकिन हम यहाँ उनकी बात नहीं करेंगे क्योंकि इस पर काफ़ी कुछ पढ़ा जा चुका है। यहाँ हम उन महिलाओं की बात करेंगे, जिन्होंने अपने हाथ में धार्मिक कार्यों की बागडोर संभाली और उसे बखूबी निभा कर अपनी नेतृत्व क्षमता से इतिहास में अमर हो गईं। आज 21वीं सदी में भी जब चर्च में महिलाओं को बिशप बनाने की बहस चल रही है, हम हजारों साल पहले जा कर देखेंगे कि कैसे भारत में महिलाएँ सदियों से इस क्षेत्र में हावी रही हैं।
भारत में बारहवीं सदी में जब बहुत सारे कवि व संत कालजयी रचनाएँ लिख कर भक्ति युग को नई दिशा दे रहे थे, तब महादेवी नाम की एक महिला संत हुईं, जो तुलनात्मक रूप से अन्य संतों के मुकाबले कम कविताएँ लिख कर भी उनसे ज्यादा प्रसिद्ध हुईं। इन्हें लिंगायत समुदाय में गुरु बसवन्ना के साथ रखा गया और ‘अक्का’ की उपाधि दी गई। अक्का का अर्थ होता है ‘बड़ी बहन’।
अगर पुरातन भारतीय संस्कृति का गहन अध्ययन करें तो पता चलता है कि वेदों के रचयिता सिर्फ़ पुरुष ऋषि-मुनि ही नहीं, बल्कि महिलाएँ भी रही थीं। क्या किसी अन्य धर्म या संस्कृति में कहीं भी ऐसा देखने को मिला है, जहाँ उनकी प्राथमिक पुस्तक लिखने में किसी महिला का योगदान रहा हो? अगर हम बाइबिल और क़ुरानशरीफ़ की बात करें तो उन दोनों पवित्र पुस्तकों को लिखने में किसी महिला का योगदान नहीं रहा है। जबकि दुनिया की सबसे पुरानी पुस्तकों में से एक- ऋग्वेद में कई श्लोक महिलाओं द्वारा भी लिखे गए हैं।
ऋग्वेद के दस ऐसे श्लोक हैं, जिन्हे महिला मुनि मैत्रयी द्वारा लिखा गया है। इसी तरह वाचकन्वी गार्गी भी ऐसी महिला संत हुईं हैं, जिन्होंने ऋग्वेद का एक भाग लिखा। ऋग्वेद के कुछ अंश लिखने में लोपमुद्रा का भी योगदान माना जाता है। जब हमारी सनातन परम्परा की प्रथम पुस्तक को लिखने में ही महिलाओं का योगदान रहा है- तो किस मुँह से इस पर सवाल उठाए जाते हैं कि हिन्दू धर्म के कर्ता-धर्ताओं में महिलाओं की भागीदारी नहीं रही है। विश्व में कहीं भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता, जहाँ महिलाओं ने धर्म की दशा एवं दिशा तय करने में पुरुषों के साथ ऐसे बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया हो।
ईसाई पंथ में जब एक महिला उभर कर सामने आईं
ईसाई पंथ और सम्प्रदाय में महिलाओं के उभरने के बाद उनका क्या हश्र किया जाता है, उसका एक उदाहरण हमें हिपेशिया के रूप में देखने को मिलता है। अलेक्सेंड्रिया हिपेशिया एक ऐसा नाम है- जिसकी कहानी सुन कर आज अनेकों चर्च में ननों के साथ हो रहे निर्मम व्यवहार भी फीकी लगनी लगेगी। गणित, दर्शन सहित कई विषयों की विद्वान रही हिपेशिया चौथी-पाँचवी सदी में पूर्वी रोमन साम्राज्य के मिस्र में एक जानी-पहचानी नाम थीं। उनके आधुनिक विचार और उनका ज्ञान क्रिश्चियनिटी के स्वयंभू पंडितों को काटने दौड़ता था।
फिर एक दिन ऐसा आया, जब क्रूरता अपनी सारी हदें पार कर गई। पीटर नाम के लेक्टर ने कुछ लोगों के साथ उसका अपहरण कर लिया। उसके बाद उसे एक धार्मिक स्थल में लाए गए, जहाँ उन्होंने ऑस्ट्राका (मिट्टी के कड़े बर्तनों को तोड़ कर बनाया गया हथियार) से उसकी हत्या कर दी। निर्ममता अपनी सारी हदें तब पार कर गई, जब उसके शरीर को इतने टुकड़ों में काटा गया कि शायद उनका कोई रिश्तेदार भी उन्हें पहचान नहीं पाया होगा।
हिपेशिया : एक महिला गणितज्ञ और दार्शनिक, जिनकी मॉब लिंचिंग एक लेक्टर द्वारा की गई (फोटो साभार: HSW Static )
ये मॉब-लिंचिंग का सबसे भयावह दृश्य था। लेक्टर के नेतृत्व में भीड़ ने उसके क्षत-विक्षत शव को पूरे शहर में घुमाया और फिर एक ख़ास जगह पर ले जा कर उसमें आग लगा दी। ये इतना डरावना था, इतना भयावह था- कि इसने बिना सोशल मीडिया वाले उस युग में भी मिस्र सहित पूरे रामन साम्राज्य को हिला दिया था। भीड़ द्वारा हत्या का यह एक ऐसा जीवंत उदाहरण है, जो आज-कल की लाशों पर आग जलाकर प्रोपेगंडा से अपना हाथ सेंकने वाले कथित एक्टिविस्ट्स की सारी पोल खोल देगी।
इतिहास को देखें या संदर्भ की बात करें; महामंडलेश्वर कोई महिला भारत की धरती पर ही बन सकती है, बनती रही हैं, बनती रहेंगी। वेदों से लेकर अन्य धार्मिक पुस्तकों तक- उन्होंने इन सब के लेखन में अपना योगदान दिया है, दे रही हैं और देती रहेंगी। लैंगिक समानता का यह उदाहरण कहीं और नहीं मिलेगा- किसी धर्म में नहीं, अन्यत्र कहीं नहीं।
कुम्भ मिलन का पर्व है। सनातन की उस समूची ज्ञान परम्परा का जो भारतीय संस्कृति के कण-कण में विराज़मान है। ज्ञान, चेतना, वैराग्य और संसार का परस्पर मंथन कुम्भ मेले का वो महत्वपूर्ण आयाम है जो आदि-अनादि काल से ही हिन्दू परम्परा और संस्कृति की जागृत चेतना को, बिना किसी आमन्त्रण के स्वतः आकर्षित करता है।
कुम्भ पर्व का उद्देश्य कभी भी इतिहास की निर्मिति नहीं था। फिर भी काल ने इसका इतिहास स्वयं ही रच दिया। कोई भी धार्मिक परम्पराएँ अगर आज भी जीवित है तो वो जनमानस के आस्था एवं विश्वास के बल पर है, न कि इतिहास के बल पर। ठीक ही कहा गया है कि कुम्भ जैसा भव्य एवं विशालतम आयोजन सदा से संस्कृतियों को एक सूत्र में पिरोए रखने के लिए ही आयोजित होता आया है।
आज की पीढ़ी के लिए इतना बड़ा आयोजन शायद फ़िज़ूल लग सकता है क्योंकि युवाओं की एक बड़ी संख्या अपने धर्म-संस्कृति एवं परम्पराओं के इतिहास से वंचित है। उसे इतिहास के नाम पर चंद खंडहरों और मुगलों के इतिहास तक ही सीमित कर दिया गया है। चलिए इस बात से भी अवगत होते हैं कि आज विश्व के सबसे बड़े आयोजन कुम्भ के पीछे पौराणिक सनातन मान्यता क्या है? क्या है इसका महत्त्व?
कथा यह है कि, ऋषि दुर्वासा के शाप के कारण जब देवताओं ने अपनी शक्ति खो दी, तब असुरों ने उन पर हमला कर दिया। देवता पराजित हो, अपनी शक्ति पुनः प्राप्त करने के लिए प्रजापिता ब्रह्मा और आदिदेव शिव की शरण में गए। शिव ने समाधान के लिए भगवान विष्णु के शरण में जाने की सलाह दी। तब भगवान विष्णु ने क्षीरसागर का मंथन कर अमृत निकालने का उपाय सुझाया। भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर संपूर्ण देवतागण, दैत्यों के साथ संधि करके क्षीरसागर के मंथन की योजना में जुट गए।
संस्कृति ग्राम, प्रयागराज, में स्थापित समुद्र मंथन की झाँकी (तस्वीर: अनूप गुप्ता)
मथना था समुद्र (क्षीरसागर) तो मथनी और नेति (रस्सी) भी उसी हिसाब की चाहिए थी। ऐसे में मंदराचल (मंदर) पर्वत मथनी बना और नाग वासुकी नेति। समुद्र मंथन से कुल चौदह रत्नों की प्राप्ति हुई। जिन्हें देव और असुरों ने परस्पर बाँट लिया। परन्तु जब भगवान धन्वन्तरि ने अमृत कलश देवताओं को दे दिया तो फिर भीषण युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई। समाधान के लिए तब भगवान विष्णु ने स्वयं मोहिनी रूप धारण कर सबको अमृत-पान कराने की बात कही और अमृत कलश का दायित्व इंद्र-पुत्र जयंत को सौपा। अमृत-कलश को प्राप्त कर जब जयंत दानवों से अमृत की रक्षा हेतु भाग रहा था।
तब दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेशानुसार दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा किया और घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ लिया। तत्पश्चात, अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक अविराम युद्ध चलता रहा। पुराणों में इसे देवासुर संग्राम कहा गया। युद्ध के इसी क्रम में अमृत की बूँदे पृथ्वी पर चार स्थानों पर गिरीं- हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और प्रयागराज।
चूँकि, विष्णु की आज्ञा से सूर्य, चन्द्र, शनि एवं बृहस्पति भी अमृत कलश की रक्षा कर रहे थे और विभिन्न राशियों (सिंह, कुम्भ एवं मेष) में विचरण के कारण ये सभी कुम्भ पर्व के द्योतक बन गये। इस प्रकार ग्रहों एवं राशियों की सहभागिता के कारण कुम्भ पर्व ज्योतिष का पर्व भी बन गया।
एक अन्य कथा के अनुसार, चूँकि जयंत को अमृत कलश को स्वर्ग ले जाने में 12 दिन का समय लगा था और माना जाता है कि देवताओं का एक दिन पृथ्वी के एक वर्ष के बराबर होता है। यही कारण है कि कालान्तर में ऊपर वर्णित स्थानों पर ही ग्रह-राशियों के विशेष संयोग पर 12 वर्षों में कुम्भ का आयोजन होता है।
तीसरी कथा के अनुसार, अमृत प्राप्ति के लिए देव-दानवों में परस्पर बारह दिन तक निरंतर युद्ध हुआ था। देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के तुल्य होते हैं। अतएव कुम्भ भी बारह होते हैं। उनमें से चार कुम्भ पृथ्वी पर होते हैं और शेष आठ कुम्भ देवलोक में होते हैं। जिन्हें देवगण ही प्राप्त कर सकते हैं, मनुष्यों की वहाँ पहुँच नहीं है। इसलिए मनुष्य योनि के लिए ये चार कुम्भ बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
जिस समय में चंद्र आदि ग्रहों ने कलश की रक्षा की थी, उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं। उस समय कुम्भ का योग होता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में, जहाँ-जहाँ अमृत बूँद गिरी थी, वहाँ-वहाँ कुम्भ के पर्व का आयोजन होता है।
ज्योतिष गणना के क्रम में कुम्भ का आयोजन चार प्रकार से माना गया है
1- बृहस्पति के कुम्भ राशि में तथा सूर्य के मेष राशि में प्रविष्ट होने पर हरिद्वार में गंगा-तट पर
2- बृहस्पति के मेष राशि चक्र में प्रविष्ट होने तथा सूर्य और चन्द्र के मकर राशि में आने पर अमावस्या के दिन प्रयागराज में त्रिवेणी संगम पर
3- बृहस्पति एवं सूर्य के सिंह राशि में प्रविष्ट होने पर नासिक में गोदावरी तट पर
4- बृहस्पति के सिंह राशि में तथा सूर्य के मेष राशि में प्रविष्ट होने पर उज्जैन में क्षिप्रा तट पर
धार्मिकता एवं ग्रह-दशा के साथ-साथ कुम्भ पर्व को पुनः तत्वमीमांसा की कसौटी पर भी कसा जा सकता है। जिससे कुम्भ की उपयोगिता स्वयं सिद्ध होती है। कुम्भ पर्व का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि यह पर्व प्रकृति एवं जीव तत्व में सामंजस्य एवं सन्तुलन स्थापित कर उनमें जीवनदायी शक्तियों को समाविष्ट करने का उपक्रम भी है। प्रकृति ही जीवन व मृत्यु का आधार है। ऐसे में प्रकृति से सामंजस्य अति-आवश्यक हो जाता है।
कहा भी गया है “यद् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे” अर्थात जो शरीर में है, वही ब्रह्माण्ड में है, इस लिए ब्रह्माण्ड की शक्तियों के साथ पिण्ड (शरीर) कैसे सामंजस्य स्थापित करे। उसे जीवनदायी शक्तियाँ कैसे मिले इसी रहस्य का पर्व है कुम्भ। विभिन्न मतों-अभिमतों-मतान्तरों के व्यावहारिक मंथन का पर्व है कुम्भ, और इस मंथन से निकलने वाला ज्ञान-अमृत ही कुम्भ-पर्व का महाप्रसाद है।
सोमवार (जनवरी 14,2019) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पहला ‘फ़िलिप कोटलर प्रेज़िडेंशियल अवॉर्ड’ दिया गया है, जिस पर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने इस अवॉर्ड को लेकर पीएम मोदी पर ट्विटर पर कटाक्ष करने का प्रयास किया।
राहुल गाँधी ने मंगलवार (जनवरी 15,2019) को ट्वीट किया, “मैं अपने प्रधानमंत्री जी को वर्ल्ड फेमस कोटलर प्रेसिडेंशियल अवॉर्ड हासिल करने की बधाई देता हूँ। यह पुरस्कार इतना प्रसिद्ध है कि इसकी कोई ज्यूरी ही नहीं है, इससे पहले किसी को दिया नहीं गया और अलीगढ़ की एक गुमनाम कंपनी इसे स्पॉनसर करती है। इसके इवेंट पार्टनर: पतंजलि और रिपब्लिक टीवी हैं।”
I want to congratulate our PM, on winning the world famous “Kotler Presidential Award”!
In fact it’s so famous it has no jury, has never been given out before & is backed by an unheard of Aligarh company.
इस पर केन्द्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति इरानी ने भी जवाब देते हुए ट्वीट किया कि ये बात एक ऐसा व्यक्ति कह रहा है, जिसके परिवार के कई लोगों ने स्वयं को ही ‘भारत रत्न’ दिया है।
Rich !!! Coming from a person whose illustrious family decided to confer the ‘Bharat Ratna’ on themselves. https://t.co/ipzyRrXNiX
प्रधानमंत्री मोदी को मिले इस अवार्ड ने वामपंथी खेमे में नई बहस पकड़ ली है। सरकार विरोधी ‘प्रोपगंडा’ चलाने के लिए मशहूर ‘द वायर‘ ने राहुल गाँधी के ट्वीट के बाद एक लेख लिखा है, जिसमें वो लिखते हैं कि भाजपा के बड़े नेता PM की एक ऐसे अवार्ड के लिए सराहना कर रहे हैं, जिसमें ना तो कोई सार्वजनिक ज्यूरी है, ना ही किसी को इसकी प्रक्रिया पता है। और यह एक ऐसे मार्केटिंग समूह द्वारा दिया जाता है, जिसके आयोजकों ने इसके बावत सवाल पूछने पर इसे एक गोपनीय अवार्ड (कॉन्फीडेंशियल) बताया है।
सवाल यह है कि अगर यही पुरस्कार राहुल गाँधी या इन प्रोपेगंडा-परस्त समूहों के किसी नेता को दिया जाता, क्या तब भी वो इस तल्लीनता से इस पुरस्कार की प्रक्रिया को गलत साबित करने का प्रयास करते? एक ख़ास वर्ग इस देश में, विशेषकर 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से सक्रिय हुआ है, जिसका प्रथम उद्देश्य अपने प्रधानमंत्री को सिर्फ इसलिए नीचा दिखाने का है क्योंकि वो उनकी विचारधारा से अलग विचार रखता है?
फ़िलिप कोट्लर ने ट्वीट कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पहला फ़िलिप कोट्लर अवार्ड जीतने के लिए बधाई दी है। उन्होंने लिखा है, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों से भारत में असाधारण आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी विकास हुआ है। उनका पहला फ़िलिप कोटलर प्रेज़िडेंशियल अवार्ड जीतना भविष्य में यह पुरस्कार प्राप्त करने वालों के लिए मानक बढ़ा देता है।”
Prime Minister Modi’s efforts in India have resulted in extraordinary economic, social and technological advances in India. His winning the first Philip Kotler Presidential award raises the bar for future recipients.”
विपक्ष द्वारा इस अवार्ड पर प्रश्न उठाने के जवाब में इन्टरनेट पर जवाहर लाल नेहरु के स्वयं खुद को ‘भारत रत्न’ घोषित करने पर सवाल पूछे जाने पर ‘द वायर’ एक ‘फैक्ट चेक़’ के साथ अन्य लेख लाता है, जिसका उद्देश्य जवाहर लाल नेहरु को खुद को ही भारत रत्न घोषित करने पर क्लीन चिट देना है। जबकि सारा देश इस बात से भली-भाँति परिचित है कि वंशवाद में लिप्त एक परिवार, बोफ़ोर्स घोटालों में विश्व प्रसिद्ध नेता स्वयं को भारत रत्न दे चुका है तथा एक आपतकाल के नाम पर अव्यवस्था की जिम्मेदार महिला खुद को भारत रत्न दे चुकी है।
घोटाले, नरसंहार और लोकतंत्र के असल मायनों में प्राण घोंटने वाले लोगों में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक फ़िलिप कोटलर प्रेज़िडेंशियल अवार्ड मिलने पर इतनी छटपटाहट क्यों हो जाती है? क्या यह इस बात का संकेत है कि कॉन्ग्रेस पार्टी और वामपंथी गिरोह उस आत्ममुग्धता और निहिलिज़्म के खो देने के भय से इस तरह का व्यवहार करते हैं जिसके दम पर इन्होंने देश की जनता को गुमराह किया है और उन पर शासन किया है?
शायद वास्तव में यह परिवार यह बात स्वीकारने में अभी वक़्त लगाएगा कि इस देश पर किसी एक परिवार का हक नहीं बल्कि संविधान और देश के उस ‘आख़िरी आदमी’ का है जिसका ज़िक्र महात्मा गाँधी जी नेहरु से किया करते थे।
सबरीमाला मंदिर से पूजा करके लौटने वाली कनकदुर्गा के मामले में एक नया ट्विस्ट सामने आया है। पहले मीडिया के ज़रिए यह ख़बर सामने आ रही थी कि सबरीमाला से लौटने के बाद कनकदुर्गा की पिटाई उसकी सास ने की थी। जबकि नई जानकारी के अनुसार इस मामले में कहानी बिल्कुल उल्टी है।
कनकदुर्गा को उसकी सास ने नहीं बल्कि कनकदुर्गा ने ही अपनी सास की पिटाई की है। केरला के BJYM सेक्रेटरी संदीप वॉरियर ने फ़ेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट करके यह दावा किया कि सबरीमाला मंदिर से लौटने के बाद कनकदुर्गा ने ही अपनी सास पर, जो कि अयप्पा की भक्त हैं, हमला किया था। वीडियो में 80 वर्षिय वृद्धा को हॉस्पिटल में बेड पर लेटे हुए देखा जा सकता है।
इससे पहले मीडिया में कुछ इस तरह ख़बर चल रही थी
इससे पहले मीडिया में यह ख़बर चल रही थी कि 800 वर्षों की परंपरा को तोड़ कर सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने की वजह से सास ने कनकदुर्गा की बुरी तरह से पिटाई की है। सुप्रीम कोर्ट ने सितम्बर 2018 में महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने की इजाज़त दे दी थी जिसके बाद श्रद्धालुओं ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया था। उच्चतम न्यायलय के उस निर्णय के बाद कनकदुर्गा सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने वाली पहली महिला थी। 39 वर्षीय कनकदुर्गा ने एक अन्य महिला के साथ सबरीमाला की सैकड़ों साल पुरानी परंपरा को धता बताते हुए मंदिर में प्रवेश किया था।
ताज़ा ख़बर के अनुसार मंदिर में प्रवेश करने के बाद पहली बार घर पहुँची कनकदुर्गा पर उनकी सास ने हमला कर दिया। उसकी सास ने उसे इतनी बुरी तरह पीटा कि कनकदुर्गा को तुरंत अस्पताल पहुँचाना पड़ा। अभी उसकी हालत स्थिर बनी हुई है। सबरीमाला मंदिर में प्रवेश कर वापस लौटने के बाद कनकदुर्गा कई दिनों से घर नहीं पहुँची थी और किसी गुप्त स्थान पर छिपी हुई थी। लोगों को लगा था कि वो शायद प्रदर्शनकारियों से बचना चाह रही हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार कनकदुर्गा जैसे ही अपने घर पहुँची, उस से नाराज़ उसकी सास ने लकड़ी के तख्ते से उसपर हमला कर दिया और उसकी पिटाई शुरू कर दी। उसके बाद उन्हें आनन-फानन में पेरिंथलमन्ना के सरकारी अस्पताल में भर्ती किया गया जहाँ अभी भी उसका इलाज चल रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार उसकी सास ने लकड़ी के तख्ते से उसके सिर पर वार किया। फ़िलहाल पुलिस ने इस मामले में केस दर्ज कर लिया है और आगे की करवाई की जा रही है।
का परिवार उस से तभी से नाराज़ चल रहा था जब से उसके सबरीमाला में प्रवेश करने की ख़बर आई थी। उसके भाई ने इसे CPM और केरल पुलिस की साजिश बताया था। ज्ञात हो कि केरल के मुख्यमंत्री पिन्नाराई विजयन ने सबरीमाला में प्रवेश करने वाली इन महिलाओं को पूरी सुरक्षा प्रदान करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद इन्हे पुलिस प्रोटेक्शन के साथ उसे आधी रात को मंदिर की सीढ़ियों पर ले जाया गया। रात के क़रीब तीन बजे कनकदुर्गा एक अन्य महिला के साथ सबरीमाला के अंदर घुसने में सफल हो गई थी। उसके साथ गई महिला का नाम बिंदु है जो केरल में सत्ताधारी पार्टी CPM की कार्यकर्ता है।
केरल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबरीमाला मुद्दे को लेकर केरल की मौजूदा LDF (लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट) सरकार को निशाना बनाया। उन्होंने अपने भाषण में सबरीमाला मुद्दे पर LDF सरकार के रवैये को इतिहास में सबसे शर्मनाक व्यवहार बताया। प्रधानमंत्री ने कहा कि UDF और LDF, दोनों एक ही सिक्के के 2 पहलू हैं, ये दोनों नाम में भले ही भिन्न हों लेकिन भ्रष्टाचार, जातिवाद और साम्प्रदायिकता में दोनों एक समान हैं। PM मोदी ने कहा कि दोनों ने ही केरल की सांस्कृतिक छवि को नुकसान पहुँचाया है, साथ ही उन्होंने कहा कि ये दोनों राजनितिक हिंसा में भी समान हैं।
The conduct of Kerala’s LDF govt on Sabarimala issue will go down in history as one of the most shameful behaviours by any party and govt. The UDF is no better. Congress has multiple stands.
Our stand has always been clear and the actions of our party match our words: PM Modi pic.twitter.com/hdr8O5vams
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोल्लम में कोल्लम, अलाप्पुझा और मवेलिक्कारा निर्वाचन क्षेत्रों से भाजपा कार्यकर्ताओं की एक सार्वजनिक रैली का उद्घाटन करते हुए कहा, “पिछले कुछ महीनों से पूरा देश सबरीमाला पर चर्चा कर रहा है। हम जानते हैं कि कम्युनिस्ट भारतीय इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिकता का सम्मान नहीं करते हैं। लेकिन किसी को भी इस तरह की नफ़रत की उम्मीद नहीं थी।”
केरल में राष्ट्रीय राजमार्ग-66 पर 13 किलोमीटर लंबे दो लेन वाले कोल्लम बाईपास के उद्घाटन के अवसर पर नरेंद्र मोदी ने जनता को बधाई देते हुए कहा, “हमारे देश में हम अक्सर देखते हैं कि उद्घाटन के बाद कई आधारभूत परियोजनाएँ रूक जाती हैं और बड़ी मात्रा में जनता का पैसा बेकार हो जाता है।”
पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि उन्होंने विकास परियेाजनाओं का निरीक्षण किया और सभी विभाग सचिवों तथा राज्य के मुख्य सचिवों के साथ बैठक की। उन्होंने बताया कि केरल के लोगों के साथ वो ‘नमो ऐप’ के ज़रिए भी बात करते रहते हैं और बीते साल केरल में आई बाढ़ के दौरान भी वो वहाँ आए थे, साथ ही कहा कि भाजपा सरकार तब केरल के लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलकर खड़ी रही।
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कॉन्ग्रेस पर भी हमला बोलते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस के कई चेहरे हैं, उन्होंने कहा, “वह संसद में कुछ कहती है और पथनमथिट्टा (भगवान अय्यप्पा मंदिर स्थल) में कुछ और कहती है।”
आगे उन्होंने कहा कि केरल और उसकी संस्कृति के साथ सबसे आगे कोई पार्टी रही है, तो वह भाजपा है। साथ ही UDF को इस मुद्दे पर अपना पक्ष स्पष्ट रूप से बताने की चुनौती देते हुए उन्होंने कहा कि उनका दोमुँहा व्यवहार खुलकर सामने आ चुका है।
नरेंद्र मोदी ने कहा कि, “केरल के लोग जाग गए हैं। वे भाजपा को अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने वाली पार्टी के रूप में देखते हैं। हम उनके सपनों को पूरा करने और एक मजबूत, समृद्ध और समावेशी भारत का निर्माण करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।”
मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि देश भर के 40,000 कॉलेज व 900 यूनिवर्सिटी में इसी साल से सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए 10% आरक्षण कोटा लागू किया जाएगा। मंत्री ने अपने बयान में कहा कि छात्रों को सरकारी व ग़ैर-सरकारी, दोनों ही तरह के, संस्थानों में आरक्षण का लाभ मिलेगा। इसके आलावा मंत्री ने यह भी कहा कि वर्तमान कोटे में किसी तरह से छेड़छाड़ किए बिना 10% अतिरिक्त कोटा के ज़रिए इस कैटेगरी के छात्रों को आरक्षण का लाभ दिया जाएगा। प्रकाश जावड़ेकर ने यह भी कहा कि आरक्षण कोटा को लागू करने के लिए कॉलेज व यूनिवर्सिटी में 25% सीटों में भी वृद्धि की जाएगी।
झारखंड सामान्य वर्ग के लिए आरक्षण लागू करने वाला दूसरा राज्य
भाजपा शासित राज्य झारखंड ने समान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए आरक्षण लागू कर दिया है। झारखंड सरकार ने केंद्र सरकार द्वारा समान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को सरकारी नौकरी व शिक्षा में दिए जाने वाले 10% आरक्षण को लागू कर दिया है। राज्य सरकार के इस फ़ैसले के बाद अब झारखंड में रहने वाले समान्य वर्ग के लोगों को 15 जनवरी 2019 के बाद आरक्षण का लाभ मिल सकेगा। झारखंड सरकार ने अपने घोषणा पत्र में कहा “15 जनवरी 2019 के बाद ज़ारी होने वाली बहाली में समान्य वर्ग के लोगों को 10 फ़ीसद आऱक्षण का लाभ मिल सकेगा।”
Jharkhand government approves 10% reservation given by Central Government in government jobs and education to economically weaker section in the general category pic.twitter.com/WEpoc8iUCH
गुजरात ने समान्य वर्ग के लिए सबसे पहले लागू किया आरक्षण
सामान्य वर्ग (आर्थिक रूप से कमजोर) आरक्षण बिल के तहत शिक्षा और रोज़गार के क्षेत्र में मिलने वाले आरक्षण को गुजरात की भाजपा सरकार ने लागू कर दिया है। इस फ़ैसले के साथ ही गुजरात देश का पहला राज्य बन गया है, जहाँ पर सामान्य वर्ग आरक्षण बिल को सबसे पहले लागू किया गया हो।
राज्य के मुख्यमंत्री विजय रुपानी ने रविवार (जनवरी 13, 2019) को ट्वीट के जरिए इस बात की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि 14 जनवरी 2019 को मकर संक्रांति के अवसर पर आर्थिक रूप से कमज़ोर सामान्य वर्ग के लोगों के लिए लाए गए आरक्षण बिल को सभी सरकारी नौकरियों में और उच्च शिक्षा में लागू कर दिया जाएगा।
Happy to state that the Government Of Gujarat has decided to implement 10% EWS reservation benefits from 14th January, 2019. It will be implemented in all ongoing recruitment process too wherein there is only Advertisement published but first stage of examination is yet to held.
कहते हैं फ़िल्में समाज का आईना होती हैं। अवसाद को बेचने में गिरोहों को कैसी महारत हासिल होती है, इसका एक नमूना ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ नाम की पुरस्कृत फ़िल्म में दिखा था। ज्यादा भीख मिल सके इसके लिए फ़िल्म में एक गिरोह, अच्छा गाने वाले एक लड़के को अंधा बनाना चाहता था। उनका ख़याल था कि अंधा भिखारी अच्छा गाता हो तो ज़्यादा भीख मिलेगी। कुछ इसी तर्ज़ पर एक तथाकथित छात्र नेता भी अवसाद बेचने निकले तो उन्होंने बताया कि उनकी माँ की तनख़्वाह तीन हज़ार रुपये है।
फ़रवरी 2016 के जिस दौर में कन्हैया कुमार इस दावे के साथ सामने उतरे थे उनके पास सहानुभूति बटोरने की कोशिशों की वजह भी थी। ये वो दौर था जब भारत में सोशल मीडिया काफ़ी सज़ग हो चुका था और जनता को समझ में आने लगा था कि अगर उनके मुद्दे परम्परागत पेड मीडिया नहीं उठाता है तो वो ख़ुद इसे सोशल मीडिया के ज़रिए लोगों के सामने ला सकते हैं। सोशल मीडिया की दी हुई इसी ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का फ़ायदा एक स्त्री ने उठाया। जब अभिजात्यों का वर्ग नए पोस्टर बॉय के इंटरव्यू के दौरान कॉन्डोम की तलाश में लगा था तो उन्होंने जुर्माने की चिट्ठी सार्वजनिक कर दी!
I spent morn in JNU,had nimbu chai, spoke to boys facing sedition.Found no condoms,Did the BJP MLA take them away:) pic.twitter.com/Yd3GJw9SFt
उसके बाद तो वही हुआ जो होना था। गिरोहों का सबसे पहला काम होता है कि अभियुक्त अगर अपने पक्ष का हो तो सामाजिक रूप से पीड़िता का ही चरित्रहनन करने में जुट जाओ। अदालतों में ऐसे मामलों में पीड़िता के चरित्र पर सवाल उठाना भारी पड़ सकता है, लेकिन आम बातचीत में गिरोहों को ऐसा करने से कौन रोकता? जब झूठे होने और मीडिया लाइमलाइट के लिए मक्कारी करने जैसे आरोप आने लगे तो यूनिवर्सिटी से ज़ारी काग़ज़ भी आरोप लगाने वाली लड़की ने सार्वजनिक कर दिए।
आख़िरकार, अभिजात्य गिरोहों को झुकना पड़ा और पहले टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने, और फिर अगले ही दिन 11 मार्च 2016 को द हिन्दू और द पायनियर ने इस ख़बर को अपने पन्नों पर जगह दी। पीड़िता ने शिक़ायत यूनिवर्सिटी के चीफ़ प्रॉक्टर के पास दर्ज करवाई थी। इस शिक़ायत के मुताबिक़ 10 जून 2015 की सुबह जब पीड़िता सुबह जॉगिंग के लिए निकली थी तो पूर्वांचल रोड पार करते वक़्त उन्होंने ब्रह्मपुत्र छात्रावास में रहने वाले कन्हैया कुमार को सड़क पर पेशाब करते पाया।
उन्होंने छात्र नेता को ये कहते हुए मना किया कि हॉस्टल में इतनी जगह है तो वो बाहर सड़क पर ये अश्लील हरक़त क्यों कर रहा है? इसपर भड़ककर कन्हैया कुमार उनके काफ़ी पास आ गया, लड़की से अभद्रता की, धमकाने वाले अभद्र इशारे किये, और ‘देख लूँगा’ की धमकी देता हुआ गया। जब जाँच में इन आरोपों को सही पाया गया तो लड़की से “अभद्रता” करने के जुर्म में कन्हैया कुमार पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने जुर्माना लगाया था। कमलेश ने इस मामले पर लिखा था कि कैसी विडंबना है कि महिलाओं से “अभद्रता” करने वाला विमेंस डे पर भाषण दे रहा है! इस ग़रीब ने बिलकुल उतना ही जुर्माना भरा है, जितनी वो अपनी माँ की तनख़्वाह बताता रहता है।
बाक़ी, दास्तानगोई वाले महमूद फ़ारूकी का मामला हो या तहलका काण्ड के कुख्यात पत्रिका संचालक को बचाने की मुहीमें, गिरोहों के लिए अपने साथियों को बचाने की कोशिशें नई तो बिलकुल नहीं हैं। हाँ ग़लती और अपराध में आम लोग अब अंतर याद दिला देते हैं, ये और बात है।