धार्मिक नेता शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने बुधवार (जनवरी 30, 2019) को बयान दिया कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की शुरुआत 21 फरवरी को होगी, चाहे फिर वहाँ सभा करने वालों को गोलियों का सामना करना पड़े।
प्रयागराज में कुंभ मेले में 3 दिनों की मंडली के अंत में राम मंदिर शिलान्यास करने की योजना बनाई गई थी। शंकराचार्य ने कहा कि साधु बसंत पंचमी (10 फरवरी) के बाद प्रयागराज से अयोध्या के लिए मार्च शुरू करेंगे। उन्होंने कहा कि वे गोलियों का सामना करने के लिए तैयार हैं और गिरफ़्तारी या इस प्रकार की अन्य किसी कार्रवाई से संतों के इस अभियान पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
शंकराचार्य ने भारतीय जनता पार्टी नेतृत्व वाली सरकार की मंदिर निर्माण के लिए कानून नहीं लाने के लिए आलोचना की, उन्होंने कहा कि उनके पास लोकसभा में पूर्ण बहुमत था फिर भी प्रयास नहीं किए गए। प्रयागराज में चल रहे कुंभ में आज वृहस्पतिवार से विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) की दो दिवसीय धर्म संसद की शुरुआत होने जा रही है। धर्म संसद के दौरान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत भी मौजूद होंगे।
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने यह घोषणा ऐसे समय में की है, जब केंद्र सरकार ने अयोध्या में विवादास्पद राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद स्थल के पास अधिग्रहण की गई 67 एकड़ जमीन को उसके मूल मालिकों को लौटाने की अनुमति माँगने के लिये उच्चतम न्यायालय का रुख किया था। एक नई याचिका में केन्द्र ने कहा कि उसने 2.77 एकड़ विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थल के पास 67 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया था।
याचिका में कहा गया कि राम जन्मभूमि न्यास (राम मंदिर निर्माण को प्रोत्साहन देने वाला ट्रस्ट) ने 1991 में अधिग्रहित अतिरिक्त भूमि को मूल मालिकों को वापस दिए जाने की माँग की थी। शीर्ष अदालत ने पहले विवादित स्थल के पास अधिग्रहण की गई 67 एकड़ जमीन पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। केंद्र सरकार ने 1991 में विवादित स्थल के पास की 67 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था।
केंद्रीय जाँच ब्यूरो ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सरकार पर करोड़ों रुपये के शारदा पोंजी घोटाले की जाँच में रुकावट डालने का आरोप लगाया है। सीबाआई ने आरोप लगाया है कि राज्य सरकार के ‘शत्रुतापूर्ण’ व्यवहार के चलते अंतिम आरोप पत्र दाखिल करने में देरी हो रही है।
“राज्य सरकार सीबीआई से शत्रुतापूर्ण व्यवहार कर रही है और शारदा घोटाले मामले में, राज्य स्तर के सरकारी तंत्र ने सभी सबूतों को नुक़सान पहुँचाया है।” यह बात सीबीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने रिपोर्टों के हवाले से कही थी। यही कारण है कि, अधिकारी ने कहा, चार्जशीट दाखिल करने में देरी हो रही है।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि बैंकिंग सुरक्षा धोखाधड़ी शाखा, विशेष अपराध शाखा और प्रीमियर जाँच एजेंसी के आर्थिक अपराधियों को ग़ैर-संचालित करार दिया था, क्योंकि पश्चिम बंगाल ने पिछले साल सीबीआई से सामान्य सहमति वापस ले ली थी। अधिकारी ने आगे कहा “केवल आर्थिक अपराध IV (चिट फंड जाँच विंग) राज्य में काम कर रहा है।”
इस महीने की शुरुआत में, सीबीआई ने रोज़ वैली चिट फंड घोटाले के सिलसिले में श्री वेंकटेश फिल्म्स के प्रमुख श्रीकांत मोहता को नामजद किया था। ऐसा आरोप लगाया जाता है कि मोहता के प्रोडक्शन हाउस को रोज़ वैली द्वारा 17 फ़िल्मों के निर्माण के लिए₹25 करोड़ का भुगतान किया गया था।
शारदा घोटाला 2013 में उजागर हुआ था। कई राजनीतिक नेता इस पोंजी योजना से जुड़े थे जो 200 से अधिक कंपनियों के सहयोग से चलाया गया था। शारदा समूह ने कथित रूप से लाखों छोटे निवेशकों से 200 बिलियन से अधिक रुपये इकट्ठे किए थे। यह समूह अप्रैल 2013 में ध्वस्त हो गया था और एक साल बाद, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने CBI को राज्य स्तर की SIT द्वारा जाँच कराए जाने का आदेश दिया था।
बता दें कि CBI ने हाल ही में शारदा चिट फंड घोटाले में पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम की पत्नी नलिनी चिदंबरम के ख़िलाफ़ भी आरोप पत्र दायर किया है।
पश्चिम बंगाल में CBI एकमात्र संस्थान नहीं है, जिसने राज्य सरकार पर इसका अनुपालन न करने का आरोप लगाया है। पिछले साल, एक आरटीआई के माध्यम से भी यह ख़ुलासा हुआ था कि पश्चिम बंगाल सरकार भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) को योजनाओं और ई-ख़रीद से संबंधित विवरण साझा करने से मना कर रही थी।
गत वर्ष (अक्टूबर 9-15, 2018) में हुई आर्मी कमांडर्स कॉन्फरेंस में भारतीय थलसेना के पुनर्गठन संबंधी चार अध्ययन रिपोर्ट प्रस्तुत की गईं जिन पर पर गहन विमर्श हुआ। थलसेना के पुनर्गठन और बदलते सामरिक परिवेश के अनुसार अत्याधुनिक ढाँचे में ढालने के लिए जनरल बिपिन रावत ने एक-एक लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के अधिकारी की अध्यक्षता में 25-25 सदस्यों वाली चार अध्ययन समितियाँ बनाई थीं जिन्हें अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी।
पहली रिपोर्ट भारतीय थलसेना को पुर्नसंगठित कर उसके आकार को छोटा किंतु अधिक मारक बनाने पर केंद्रित है। दूसरी अध्ययन रिपोर्ट सेना मुख्यालय के पुनर्गठन पर केंद्रित है। तीसरी रिपोर्ट अधिकारियों के कैडर रिव्यु और चौथी रिपोर्ट सेना को जवान और स्वस्थ रखने तथा मनोबल बढ़ाने के उपायों पर केंद्रित है। यह चारों रिपोर्ट जनरल रावत और रक्षा मंत्रालय को सौंप दी गई हैं। यदि इनपर अमल किया जाता है तो विगत 35 वर्षों में किया गया यह सबसे महत्वपूर्ण सैन्य सुधार होगा।
थलसेना के पुनर्गठन की योजना में सबसे महत्वपूर्ण घटक है इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप जो कि पाकिस्तान के विरुद्ध भारत की ‘कोल्ड स्टार्ट’ कही जाने वाली युद्धनीति का एक अंग है। कोल्ड स्टार्ट की अवधारणा तब बलवती हुई थी जब सन 2001 में पाकिस्तानी आतंकियों ने संसद पर हमला किया था। तब भारत ने प्रतिक्रियात्मक कार्यवाही में ऑपरेशन पराक्रम आरंभ किया था। ऑपरेशन पराक्रम के दौरान हमें अपनी स्ट्राइक कोर की कमियाँ दिखाई पड़ी थीं।
दरअसल 1971 के पश्चात भारत ने पाकिस्तान और चीन के विरुद्ध दो मोर्चों पर एक साथ युद्ध छिड़ने पर ‘strike-hold-strike’ की रणनीति अपनाई थी। इस नीति के अंतर्गत हम पहले पाकिस्तान पर हमला करते किंतु उस दौरान चीन के प्रति रक्षात्मक रहते। पाकिस्तान पर तीव्रता से हमला करने के साथ ही हम उत्तर-पूर्वी मोर्चे पर चीन को रोककर रखते। पाकिस्तान को नियंत्रण में लेने के बाद हम चीन पर हमलावर होते।
इस रणनीति के लिए भारतीय सेना ने दो प्रकार की कोर बनाई थी: स्ट्राइक और होल्डिंग कोर। स्ट्राइक कोर तुरंत हमला करने के लिए और होल्डिंग कोर रक्षात्मक प्रतिक्रिया के लिए थी। एक कोर में लगभग 50-60,000 सैनिक होते हैं। एक कोर में प्रायः तीन डिवीज़न, एक डिवीज़न में तीन ब्रिगेड तथा प्रत्येक ब्रिगेड में 3 बटालियनें होती हैं। सैनिकों की संख्या न्यूनाधिक हो सकती है लेकिन भारतीय थलसेना में बल की संरचना मोटे तौर पर इसी प्रकार की होती है।
कारगिल की लड़ाई और सन 2001-02 के बीच हुए ऑपरेशन पराक्रम में जब हमने सेना को सीमा पर मोबिलाइज़ करना प्रारंभ किया तो उस प्रक्रिया में आवश्यकता से अधिक समय लगा। तब हमें अपनी मिलिट्री डॉक्ट्रिन में कमियाँ पता चलीं और सेना ने अपनी सभी होल्डिंग कोर को ‘पिवट’ (pivot) कोर बनाने का निर्णय लिया। पिवट कोर का अर्थ था कि स्ट्राइक कोर तो अपना काम करेंगी ही लेकिन आदेश मिलते ही होल्डिंग कोर भी हमला करने को तैयार रहे उन्हें इस लायक बनाया गया।
ऑपरेशन पराक्रम से पहले भारत होल्डिंग कोर और कम से कम तीन स्ट्राइक कोर (मथुरा स्थित 1 Corps, अम्बाला स्थित 2 Corps और भोपाल स्थित 21 Corps) के साथ पाकिस्तान के क्षेत्र में भीतर तक हमला करने की रणनीति में विश्वास करता था। यह डॉक्ट्रिन इस प्रकार बनाई गई थी कि तुरंत आदेश मिलते ही भारतीय सेना की तीनों स्ट्राइक कोर पाकिस्तान की उत्तरी 1 कोर और दक्षिणी 2 कोर पर हमला कर रणनीतिक दृष्टि से पाकिस्तान के लिए अति महत्वपूर्ण संसाधनों पर कब्जा कर लेती। यह सिद्धांत 1981-82 में जनरल के वी के राव के समय अपनाया गया था और 1987 में ब्रासटैक्स सैन्य अभ्यास के समय इसका परीक्षण भी किया गया था।
लेकिन ऑपरेशन पराक्रम के दौरान कोर स्तर की सैन्य टुकड़ी को सीमा पर पहुँचाने में हुए विलंब ने आर्मी कमांडरों के कान खड़े कर दिए। तब ‘कोल्ड स्टार्ट’ डॉक्ट्रिन अपनाई गई जिसके दो महत्वपूर्ण घटक हैं: पहला तो यह कि पिवट कोर की क्षमता बढ़ाई जाए और उन्हें अधिक मारक (offensive) बनाया जाए।
दूसरा यह कि डिवीज़न से छोटी लेकिन ब्रिगेड से बड़ी तथा अत्याधुनिक युद्धक तकनीक से युक्त एक ऐसी मारक सैन्य टुकड़ी बनाई जाए जो आदेश मिलते ही अत्यंत तीव्र गति से पाकिस्तान के भीतर घुसकर उसे घुटने टेकने पर विवश कर दे। इसे ‘इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप’ (IBG) का नाम दिया गया है।
युद्ध के दौरान IBG का प्रयोग पाकिस्तान को परमाणु अस्त्र के बारे में सोचने से पहले ही उसके सैन्य संसाधनों को नष्ट करने की योजना पर आधारित है। एक IBG में इन्फैंट्री, एयर डिफेन्स, आर्टिलरी, आर्मर, सिगनल, मैकेनाइज़्ड इन्फैंट्री सहित सेना के सभी अंगों को समाविष्ट किया जाएगा। यह अपने आप में पूर्ण, सर्व संसाधन युक्त, तीव्र और स्वतंत्र युद्धक इकाई होगी। चीन और पाकिस्तान दोनों ही विरोधियों को एक साथ परास्त करने की रणनीति के अंतर्गत IBG बनाई जाएँगी।
थलसेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने कई साक्षात्कारों में यह स्वीकार किया है कि IBG का निर्माण युद्धस्थल की भौगोलिकता को ध्यान में रखकर किया जाएगा। ऐसी IBG बनाई जाएँगी जो राजस्थान के मरुस्थल से लेकर उत्तर भारत के मैदान और हिमालय के पहाड़ों पर भी उतनी ही दक्षता से लड़ सकें। एक IBG को मेजर जनरल रैंक का अधिकारी कमांड करेगा।
कुछ सामरिक चिंतकों का मानना है कि कोल्ड स्टार्ट डॉक्ट्रिन के अंतर्गत करीब 8-10 IBG बनाई जा सकती हैं। कुछ विचारकों का यह मानना है कि 14,000 सैनिकों वाली प्रत्येक इन्फैंट्री डिवीज़न को समाप्त कर 140 IBG बनाई जानी चाहिए। बहरहाल, जनरल रावत के बयान के अनुसार विभिन्न युद्धक परिस्थितियों में पहले सभी IBG का परीक्षण किया जाएगा और सब कुछ ठीक रहा तो यह प्रक्रिया वर्ष 2019 के अंत तक पूर्ण कर ली जाएगी।
लखनऊ में आज ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) ने स्मारक घोटाले मामले में कई जगहों पर छापेमारी की है। इस छानबीन में ईडी की टीम कई फर्म के साथ निर्माण निगम इंजीनियर्स के ठिकानों पर पहुँची। ईडी के सूत्रों की मानें तो स्मारक घोटाले में ईडी को मनी लॉन्ड्रिंग के सबूत मिले हैं।
बता दें कि बसपा प्रमुख मायावती के कार्यकाल के दौरान यूपी के लखनऊ और नोएडा में स्मारक निर्माण का कार्य हुआ था। इस निर्माण में क़रीब ₹1400 करोड़ का घोटाला सामना आया था। इस घोटाले की जाँच अब अंतिम पड़ाव पर है।
पाँच एजेंसियों से माँगी ईडी ने जाँच की सूची
इस पूरे मामले में ईडी ने यूपी की सभी जाँच एजेंसियों से पाँच करोड़ से ज्यादा के घोटालों से जुड़ी सूची माँगी है। सभी जाँच एजेंसियों को पत्र लिखे गए हैं।
सीबी सीआईडी, ईओडब्ल्यू, एसआईटी, विजिलेंस और ऐंटी करप्शन ऑर्गेनाइजेशन को लिखे पत्र में ईडी ने जानकारी माँगी है कि उनके यहाँ पाँच करोड़ से ज़्यादा के घोटाले के कौन-कौन से मामले हैं। साथ में पत्र में इन मामलों की क्या स्थिति है इसके बारे में भी पूछा है।
स्मारक घोटाले में ईडी के साथ विजिलेंस ने भी केस को दर्ज कर रखा है। पूरे मामले में अभी तक भी विजिलेंस की तरफ से कोई आरोप पत्र दाखिल नहीं किया गया है। इसके कारण इन मामलों में कोई छापेमारी और गिरफ़्तारी नहीं हुई है। इसी वजह से ईडी की जाँच भी आगे नहीं बढ़ पा रही है। बता दें ईडी स्मारक घोटाले जैसे मामलों पर एजेंसियों को भेजे गए पत्रों से ब्यौरा जुटाएगी।
दिग्गज़ नेता और अधिकारियों के ख़िलाफ़ है ये पूरा मामला
अब विजिलेंस (जाँच सतर्कता आयोग) इस मामले पर जल्द ही जाँच पूरी करने जा रही है। जिसके चलते बसपा सरकार के दो दिग्गज़ मंत्रियों नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी और बाबू सिंह कुशवाहा के साथ तीन दर्जन से ज़्यादा इंजीनियरों और अन्य विभागों के अधिकारियों का फंसना तय बताया जा रहा है।
कई मुश्किलों के बाद भी विजिलेंस इस मामले से जुड़ी रिपोर्टों को शासन को जल्द से जल्द सौंपने की तैयारी में है। सपा सरकार के लोकायुक्त की जाँच रिपोर्ट मिलने के बाद विजिलेंस को इस पूरे मामले की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। इस मामले पर हुई जाँच के बाद विजिलेंस ने प्रदेश की राजधानी के गोमतीनगर थाने में क़रीब 100 आरोपितों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की थी।
लेकिन, मुक़दमा दर्ज होने के तीन साल तक इस मामले पर ध्यान नहीं दिया गया। यहाँ तक इस मामले से जुडे़ पूर्व मंत्रियों के बयान तक दर्ज नहीं किए गए थे। लेकिन अब सत्ता बदलने के बाद स्मारक घोटाले की फाइलों को दोबारा से खोला जा रहा है। इस मामले पर पुख़्ता जाँच के लिए सात इंस्पेक्टरों की एक एसआईटी टीम का भी गठन हुआ है। ये टीम पूरे मामले के अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचकर अपनी रिपोर्ट को शासन को सौंपने की तैयारी में है।
स्मारक घोटाला
स्मारक घोटाले के बारे में आपको बता दें कि इस मामले में उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर हुई थी। इसमें अंबेडकर स्मारक परिवर्तन स्थल लखनऊ, गौतमबुद्ध उपवन, मान्यवर कांशीराम स्मारक स्थल, इको पार्क, रामबाई आंबेडकर मैदान स्मृति उपवन, नोएडा आंबेडकर पार्क आदि के निर्माण में 14,10,83,43,000 रुपए के घोटाले का आरोप लगाया गया था।
चुनाव आते जा रहे हैं, और धर्म को नकारने वाले, राम को मिथक कहकर झुठलाने वाले, अब राम और दुर्गा बनकर सामने आने लगे हैं। कल की ख़बर में राहुल गाँधी को राम के रूप में दिखाया गया था, और वहीं प्रियंका गाँधी को ‘गंगा की बेटी’ कहकर एक पोस्टर लगाया गया था।
आज प्रियंका गाँधी को दुर्गा के रूप में दिखाया जा रहा है। इस से पहले एक रोचक बात शशि थरूर के ट्विटर से आई थी जहाँ उन्होंने गंगा को हमाम और उसमें नहाने वालों को पापी और नंगा कहा था।
कॉन्ग्रेस का नेतृत्व कन्फ़्यूज़्ड है कि वो अपना जनेऊ दिखाता फिरे, या फिर नए-नए जोगी की सामाजिक स्वीकार्यता के लिए धूल और राख मिलाकर तुरत-फुरत में बनाई जटाओं को अपनी पहचान बनाए, या योगियों और संतों को गंगास्नान करते हुए देखने पर पापी कहता फिरे।
हम आपके लिए राहुल और प्रियंका की कुछ तस्वीरें छोड़ रहे हैं ताकि आप उन्हें देखकर शशि थरूर की भाषा में कॉन्ग्रेसियों की तरह पाप धो लें।
दुर्गा रूप में प्रियंका गंगा की बेटी प्रियंका राम के रूप में राहुल गाँधी भगवान परशुराम के वंशज राहुल रामभक्त पंडित राहुल गाँधी शशि थरूर का हिन्दू संतों और प्रतीकों को लेकर नज़रिया
भीमा कोरेगाँव मामले में आरोपी रहे प्रोफ़ेसर आनंद तेलतुम्बडे की अग्रिम ज़मानत याचिका पर विरोध दर्ज करते हुए, पुणे पुलिस ने दावा किया है कि ग़ैरक़ानूनी गतिविधियों (रोकथाम) के अपराधों के लिए उनकी विशिष्ट भूमिका का पता लगाने के लिए, तेलतुम्बडे को (अधिनियम) एक्ट के तहत हिरासत में रखने की ज़रूरत है।
पुलिस ने बॉम्बे हाई कोर्ट को बताया कि सबूत जुटाने के लिए जाँच एजेंसी को पर्याप्त अवसर देने की ज़रूरत है। अभियोजन पक्ष ने मंगलवार को अदालत के सामने दावा किया कि उनके पास प्रतिबंधित माओवादी संगठनों के माध्यम से सरकार को अस्थिर करने के लिए विद्रोही गतिविधियों में तेलतुम्बडे की भागीदारी को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं, जिसका वो सदस्य था।
इस मामले में पुणे पुलिस का प्रतिनिधित्व करने वाले विशेष लोक अभियोजक उज्ज्वला पंवार ने आरोप लगाया है कि तेलतुम्बडे, गोवा प्रबंधन संस्थान के एक प्रोफ़ेसर, अन्य सह-अभियुक्त एक आपराधिक साज़िश में शामिल थे। साज़िश के सिलसिले में सीपीआई के लिए ग़ैरक़नूनी गतिविधियों को अंजाम दिया था।
अभियोजन पक्ष द्वारा अदालत के समक्ष लिखित स्वरूप में बहस को प्रस्तुत किया गया। इसके मुताबिक ‘यह साज़िश शर्मिंदगी और दुश्मनी की भावना को बढ़ावा देने के इरादे से की गई थी। यह भारत या भारत सरकार के प्रति विद्रोह पैदा करने के लिए विभिन्न धर्मों, भाषाओं या धार्मिक समूहों, जाति या समुदायों के बीच सामंजस्य बनाए रखने के लिए घृणा या द्वेषपूर्ण व्यवहार था। इसके अलावा दंगों, हिंसक कार्य और आतंकवादी गतिविधियों जैसी ग़ैरक़ानूनी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने से भी संबंधित था’।
प्रोफ़ेसर ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपील दायर की थी कि अदालत ने उनके ख़िलाफ़ पुणे पुलिस द्वारा दायर प्राथमिकी को रद्द करने का अनुरोध किया था। इसे अदालत ने 14 जनवरी को ख़ारिज कर दिया था। लेकिन उन्हें ग़िरफ़्तारी से पहले अदालत ने सुरक्षा और ट्रायल कोर्ट के समक्ष ज़मानत के लिए आवेदन करने की अनुमति दी थी। इसके बाद उन्होंने 18 जनवरी को बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष अग्रिम ज़मानत के लिए आवेदन किया था।
महाराष्ट्र पुलिस ने पिछले साल कई कथित शहरी नक्सलियों पर छापा मारा था और आरोप लगाया था कि एल्गर परिषद ने भीमा कोरेगाँव हिंसा का नेतृत्व किया था।
हरियाणा के भिवानी में एक सभा आयोजित की गई थी, जिसके मुख्य अतिथि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल थे। इसे लेकर पोस्टर भी छपवा दिया गया था और इलाक़े में जोर-शोर से प्रचार-प्रसार भी किया गया था। लेकिन अफ़सोस, केजरीवाल के आने की ख़बर सुन कर भी सभा में लोग नहीं पहुँचे। भिवानी की नई अनाज मंडी में दयानन्द गर्ग नामक व्यक्ति ने अभिभावक सम्मलेन आयोजित किया था। सभा में केजरीवाल के न पहुँचने के निर्णय की ख़बर सुनते ही गर्ग फुट-फूट कर रो पड़े।
गर्ग ने रोते-रोते मीडिया को अपनी दुःख भरी दास्तान सुनाते हुए कहा कि उनके पास पैसे नहीं थे, लेकिन उन्होंने ब्याज पर पैसे उधार लेकर इस सभा का आयोजन किया था। उन्होंने कहा कि अरविन्द केजरीवाल के न आने से उनका पैसा तो डूबा ही है, साथ ही उनके सम्मान को भी ठेस पहुँची है। इतना ही नहीं, रोते हुए गर्ग इसके बाद सभास्थल पर ही धरने पर बैठ गए।
केजरीवाल की सभा में खाली कुर्सियाँ।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार इस आयोजन की तैयारियाँ पिछले 15 दिनों से पूरे जोर-शोर से चल रही थी। आयोजक दयानन्द गर्ग ने, इस आयोजन को सफल बनाने के लिए दिन-रात एक कर दिया था और अपने पूरे पैसे झोंक दिए थे। उन्होंने जी-तोड़ मेहनत कर सभा के आयोजन की तैयारियाँ पूरी की थी। उन्होंने दिल्ली सीएम को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि केजरीवाल ने उन्हें कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा। उन्होंने यहाँ तक कहा कि इस सम्मलेन के लिए उन्होंने अपने परिवार तक को समय नहीं दिया। उनकी बेटी 10 दिनों से एक पेंसिल की माँग कर रही थी लेकिन सभा की तैयारियों में व्यस्त होने के कारण उन्होंने वो भी नहीं ख़रीद सके।
आम आदमी पार्टी के हरियाणा दफ़्तर ने ऑपइंडिया को बताया कि उन्हें सभा में केजरीवाल के न पहुँचने के निर्णय के पीछे का कारण पता नहीं है। AAP के प्रवक्ता जतिन राजा ने बताया कि यह पार्टी का कार्यक्रम नहीं था।
ऐसे समय में जब गायक राहत फ़तेह अली ख़ान एक बार फिर फॉरेन करेंसी स्मगलिंग के मामले में चर्चा में आ गए हैं, हम लाए हैं एक किस्सा, जो भारतीय राजनयिकों के गलियारे में ख़ूब चर्चा में रहा है। ये किस्सा है 1990 का, जब पाकिस्तान के एक मशहूर ग़ज़ल गायक और उस दौरान इस्लामाबाद में पोस्टेड एक भारतीय राजनयिक साथ में हवाई सफ़र कर रहे थे।
भारतीय राजनयिक इस ग़ज़ल गायक के फ़ैन तो थे ही, आस-पास ही बैठे होने के कारण बातचीत का माहौल भी बना हुआ था। ग़ज़ल गायक को लगा कि शायद ये पाकिस्तान के ही राजनयिक हैं और भारत में होने वाले उनके दौरों पर बात करते हुए भारत के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था। इसी माहौल में वो ‘काफ़िर’ भारतीय लोगों पर खूब बरस भी रहे थे, साथ ही उन्होंने कहा था कि एक ‘मोमिन’ होने के नाते वो भारत देश के काफ़िरों की सिर्फ शराब, शबाब और और पैसा पसंद करते हैं और इसमें उन्हें कोई परेशानी नहीं होती।
प्लेन से अपने हवाई सफ़र से उतरने के बाद जब राजनयिक ने उनसे बताया कि वो पाकिस्तानी नहीं बल्कि भारतीय राजनयिक हैं तो भारतीय शराब, शबाब और रूपए के शौक़ीन ग़ज़ल गायक ने फ़ौरन उनसे माफ़ी माँगी, गिड़गिड़ाए और इस नासमझी के लिए उनसे माफ़ी भी माँगी।
राजनयिक की सिफ़ारिश पर तत्कालीन भारत सरकार द्वारा इस ग़ज़ल गायक को कई वर्षों के लिए भारत में ‘ब्लैकलिस्ट’ कर दिया गया और ‘काफ़िरों’ के इस देश में परफॉर्म करने की अनुमति देने से मना कर दिया।
ऐसे में जब ग़ज़ल गायक के पास ‘काफ़िरों’ से पैसे आने बंद हो गए और ‘पाक़’ जमीं पर गाने-बजाने के लिए कोई ख़ास धन और अवसर थे नहीं, तो स्वाभाविक है कि रुपयों की तंगी गायक को सताने लगी।
हमारे देश में फिर एक समय आया, जब कविता, काव्य और ग़ज़लों के शौक़ीन प्रधानमन्त्री ने इस ग़ज़ल गायक को फिर से भारत आने का मौका दिया और काफ़िरों से आने वाले रूपए पर फिर से चाँदी लूटी जानी लगी।
बचपन में एक कहानी पड़ी थी, बिच्छू की प्रवृत्ति डंक मारने की ही होती है, लेकिन इंसान की प्रवृत्ति उस पर दया कर के उसे बचाने की होनी चाहिए।
पाकिस्तान के जाने-माने सिंगर और पाकिस्तानी गायक नुसरत फ़तेह अली ख़ान के भतीजे राहत फ़तेह अली खान पर सरकार ने फॉरेन करेंसी स्मगलिंग मामले में शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। ईडी (इंफोर्समेंट डायरेक्टरेट) ने FEMA (फ़ॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट) के तहत राहत फ़तेह अली ख़ान को ‘शो-कॉज’ नोटिस यानी कारण बताओ नोटिस जारी किया है और जाँच में शामिल होने को कहा है। आरोप हैं कि राहत फ़तेह अली ख़ान 3 सालों से फॉरेन करेंसी की स्मगलिंग के धंधे में लिप्त थे।
राहत फ़तेह अली ख़ान के साथ करेंसी स्मलिंग का ये दूसरा मामला है। इससे पहले 2011 में दिल्ली के इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर रेवेन्यू इंटैलीजेंस की टीम ने राहत फ़तेह अली ख़ान को फॉरेन करेंसी के साथ पकड़ा था, जिसकी कोई रसीद या सबूत राहत के पास नहीं था। राहत के साथ 2 और लोगों को हिरासत में लिया गया था। तब राहत को पूछताछ के बाद छोड़ दिया गया था। लेकिन इस बार ईडी राहत को बख्शने के मूड में नहीं दिखती।
हैरानी की बात है कि ऐसे समय में जब भारत देश में रह रहे कुछ कलाकारों को, जिनकी यहाँ पर बहुत बड़ी फ़ैन फ़ॉलोइंग भी है, को लगता है कि इस देश में लोगों के अंदर धार्मिक असहिष्णुता का माहौल है, पाकिस्तानी कलाकार यहाँ आकर अपने ‘टैलेंट’ को साबित करने के लिए मरे जाते हैं। संगीत और कला के प्रति भारत देश की आसक्ति हमेशा से ही दिलचस्म मुद्दा रही है।
जींद उपचुनाव में भाजपा को बड़ी सफलता मिली है। भाजपा के उम्मीदवार कृष्णा मिड्ढा ने जननायक जनता पार्टी के दिग्विजय चौटाला को 12,248 मतों से हराया। वहीं कॉन्ग्रेस उम्मीदवार रणदीप सुरजेवाला तीसरे स्थान पर रहे और उन्हें विजयी उम्मीदवार को मिले मतों से आधे मत नहीं मिल पाए। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने भी मतगणना के दौरान कहा था कि भाजपा जींद उपचुनाव आसानी से जीत लेगी। इसके बाद राज्य की 90 सदस्यीय विधानसभा में 47 विधायक हो गए हैं।
रणदीप सुरजेवाला कॉन्ग्रेस पार्टी के कम्युनिकेशन प्रभारी हैं और हरियाणा के कैथल से विधायक हैं। जिंद चुनाव परिणाम आने के बाद उन्होंने अपनी हार स्वीकारते हुए कहा:
“मुझे उम्मीद है कि मनोहर लाल खट्टर और कृष्णा मिड्ढा जी,जींद के लोगों के सपनों को पूरा करेंगे। मुझे पार्टी द्वारा एक जिम्मेदारी दी गई थी जिसे मैंने अपनी क्षमताओं के अनुसार पूरा किया, मैं कृष्ण मिड्ढा जी को बधाई देता हूं।”
रणदीप सुरजेवाला का हारना कॉन्ग्रेस के लिए हरियाणा में एक बुरा संकेत माना जा रहा है। विपक्षी पार्टियों ने लगातार दावा किया था कि राज्य में खट्टर सरकार की लोकप्रियता कम होते जा रही है, लेकिन हाल के मेयर चुनावों और ताज़ा विधानसभा उपचुनाव में भाजपा को मिली जीत कुछ अलग ही कहानी कहती है। बता दें कि 2018 के दिसंबर में हरियाणा में हुए म्युनिसिपल चुनाव के परिणाम आए थे, जिसमे सभी पाँच सीटों पर भाजपा ने परचम लहराया था। यहाँ तक कि राज्य में कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा के गृह क्षेत्र रोहतक में भी कॉन्ग्रेस समर्थित उम्मीदवार को मुँह की खानी पड़ी थी।
वहीं राजस्थान के रामगढ़ में कॉन्ग्रेस की जीत हुई। अब राज्य में कॉन्ग्रेस के विधायकों की संख्या 100 पहुँच गई है। कॉन्ग्रेस के ज़ुबेर खां ने भाजपा के सुखवंत सिंह को 12,228 वोटों से मात दी। दोनों ही सीटों पर 28 जनवरी को चुनाव संपन्न हुए थे। जींद में मतगणना के दौरान एक उम्मीदवार के समर्थकों ने हंगामा भी किया, जिसके बाद स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा।
‘मणिकर्णिका’ जैसी फ़िल्म का बनना और सुपरहिट होना भारतीय सिनेमा व बॉलीवुड के लिए एक अच्छा संकेत है। समीक्षकों के एक गिरोह द्वारा इसे नकारने के बावज़ूद दर्शकों का फ़िल्म को इतना प्यार देना, यह दिखाता है कि आज का दर्शक अपने इतिहास को लेकर संज़ीदा हो रहा है और अपनी गौरव गाथा को नए सिरे से याद करने की कोशिश कर रहा है। भारत एक विशाल देश है और उस से भी बड़ा है इसका इतिहास। और, अगनित भारतीय वीरों की गौरव गाथाएँ को समेटे वह इतिहास, जो आज तक पुस्तकालयों की भारी-भरकम किताबों में दबा हुआ था, अब धीरे-धीरे जनमानस की चर्चा का विषय बन रहा है। यही ‘मणिकर्णिका’ जैसी फ़िल्मों की कामयाबी है।
मणिकर्णिका: यह ‘वीरे दी वेडिंग’ नहीं है
जैसा कि ट्रेलर देखने से ही प्रतीत हो गया था, कंगना रनौत ने झाँसी की रानी के किरदार को अदा नहीं किया है, बल्कि हर एक दृश्य में उसे जिया है। रानी लक्ष्मीबाई एक माँ हैं, एक रानी हैं, और एक पिता की पुत्री भी हैं। मराठा साम्राज्य में पली-बढ़ी मनु कैसे उत्तर प्रदेश के एक राज्य का दिल जीत लेती है, ग्वालियर की सेना के अंदर देशभक्ति जगा देती है, और अंग्रेज़ों के दाँत खट्टे कर देती है- इसे फ़िल्म ने काफ़ी अच्छी तरह से उकेरा है। यहाँ हम फ़िल्म की कहानी की चर्चा नहीं करेंगे क्योंकि ऐसी फिल्मों को बनाने मे झोंकी गई मेहनत और बजट को देखते हुए आपको इसे सिनेमा हॉल में अनुभव करना चाहिए।
यहाँ हम फ़िल्म की थीम, प्रभाव, अदाकारी और इसको लेकर फैलाए जा रहे प्रोपगेंडा की बात करेंगे और परत दर परत समीक्षकों के उस गिरोह की पोल खोलेंगे, जिसने देशभक्ति से ओत-प्रोत फ़िल्म में भी खोट ढूँढ कर इसे बदनाम करने की असफल कोशिश की। सबसे पहले ‘द प्रिंट’ के शरण्या मुंशी की बात करते हैं, जिन्होंने अपनी समीक्षा में कहा है कि फ़िल्म में महारानी लक्ष्मीबाई तलवार तो उठाती हैं, लेकिन पितृसत्ता से लड़ाई नहीं करती।
फ़िल्म के एक दृश्य में कंगना को नाना साहेब और तात्या टोपे जैसे वीरों के साथ लड़ते हुए दिखाया गया है (मैत्रीपूर्ण तलवार युद्ध क्योंकि सभी एक साथ ही पले-बढे थे), जिसमे रानी उन पर भी भारी पड़ती है। इस युद्ध में प्रेम है, वीरता है, एक लड़की का साहस है- अगर इसे पितृसत्ता से लड़ाई वाले दृष्टिकोण से देखें तो भी यह एक लड़की के तीन पुरुषों पर भारी पड़ने वाली बात है। लेकिन नहीं, अगर राष्ट्रभक्ति और बलिदान की गाथा का चित्रण करने वाली इस फ़िल्म में रानी सिगरेट फूँक कर उनका धुआँ हवा में नहीं उड़ाती है, वह दारू की बोतल लिए टल्ली होकर लड़खड़ाते हुए और उलूलजलूल कुछ भी बकते हुए अपने बॉयफ्रेंड के साथ रातों में नहीं घूमती हैं- शायद यही कारण है कि तीन-तीन वीरों पर भारी पड़ने के बावज़ूद, वह पितृसत्ता से नहीं लड़ पाती।
रानी के एक नहीं, कई पहलू हैं
रानी अपने पालक पिता से नखरे करती हैं, वह उनका अधिकार है। रानी अपने पति का आदर-सम्मान करती हैं, क्योंकि वह राजा हैं और उम्र में उनसे बड़े हैं। इसमें पितृसत्ता नहीं, एक बेटी का अपने पिता के सामने नटखटपन और एक पत्नी का अपने पति के सामने शालीन, सहज और सौम्य व्यवहार वाला दृष्टिकोण है। वह व्यवहार जो राजा का भी अपनी पत्नी के लिए है। रानी अपने पति की मृत्यु की सोच कर ही भयभीत हो उठती है। इसमें उनका उनके पति के प्रति स्नेह है, लगाव है, अपनों के लिए किसी अनहोनी की आशंका का भय है। वह ‘ब्रेक अप के बाद पार्टी’ वाली महिला नहीं है, बल्कि बीमार पति की तन-मन-धन से सेवा करने वाली आदर्श हैं।
पति की मृत्यु के बाद शोकाकुल रानी एक पत्नी का फ़र्ज़ निभाती हैं। ऐसी कठिन परिस्थितियों में भी राजाविहीन झाँसी की चिंता कर वह एक रानी का फ़र्ज़ निभाती हैं। विधवाओं के लिए समाज के एक वर्ग में तय किए गए आडम्बरपूर्ण नियम-क़ानून की धज्जियाँ उड़ा कर एक समाज-सुधारक की भूमिका निभाती हैं। रानी के कई आयाम हैं, इतने कि उनके सामने आजकल प्रचलित किए जाने वाले पितृसत्ता, धर्मनिरपेक्षता और अंधराष्ट्रवाद जैसे शब्दों का कोई मोल नहीं है। वह इन सब से परे हैं, वह इन परिभाषाओं को तय करती हैं, इनके दायरे में नहीं बंधती।
विधवा होने के बाद तमाम आडम्बरों को धता बताते हुए (जो कि एक महिला द्वारा ही उन पर थोपे जा रहे थे, किसी पुरुष द्वारा नहीं) राजकाज संभालने वाली रानी को पितृसत्तात्मक नज़रिए से देखना अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय देने के सामान है। वह हज़ारों लोगों के सामने एक विधवा को कुमकुम लगा कर समाज के एक वर्ग द्वारा ढोए जा रहे आडम्बरों को धता बताती हैं। हर एक जोड़े की तरह, राजा-रानी को भी एक संतान की इच्छा है। यहाँ हम इतिहास को नहीं, फ़िल्म की कहानी के हिसाब से पितृसत्ता का मूल्यांकन करेंगे क्योंकि उंगली फ़िल्म पर ही उठाई गई है।
पितृसत्तात्मक अँगरेज़ हैं, और रानी उनसे लड़ती हैं। अंग्रेज़ पितृसत्तात्मक हैं क्योंकि आक्रांता डलहौजी की हड़प नीति में किसी पुत्र के न होने पर राज्य का अंग्रेजी शासन में विलय करने की बात कही गई थी, यह उनकी पितृसत्तात्मकता दिखाती है। एक महिला के शासन को मान्यता न देना, यह उनकी पितृसत्तात्मकता को दिखाता है। एक ‘हिन्दू महिला के विधवा होने के बाद काशी जाने की कामना करना, यह उनकी पितृसत्तात्मकता का परिचायक है। राजनैतिक अंधविरोध में पागल हो चुके समीक्षकों को आजकल सबकुछ उलटा ही नज़र आता है, जिसके परिणामस्वरूप हो सकता है कि उन्हें अंग्रेज़ों की पितृसत्तात्मकता ‘कूल’ लगी हो और रानी का विधवा आडंबरों को धता बताना रास न आया हो।
वह महिला नहीं, पहले भारतीय हैं
ऐसा इसीलिए, क्योंकि उन्होंने पितृसत्तात्मकता की एक परिभाषा तय कर ली है, अपने अजेंडे के हिसाब से नए मानदंड तैयार कर लिए हैं। रानी इनके इन मानदंडों से परे हैं, वह ऐसी गिरी हुई मानसिकता वाले लोगों के द्वारा तय किए गए एक दायरे में बँध कर रहना नहीं जानती, वह लोहा लेना जानती है। झाँसी की जनता के बीच मिल-बैठ कर सत्ता और जनता के बीच संवाद का माध्यम स्थापित करने वाली रानी को लोग सहज स्वीकार करते हैं। राज्य के सभी स्त्री-पुरुष उनके पीछे हो लेते हैं, यह किसी महिला की कामयाबी नहीं है, यह पितृसत्ता के ख़िलाफ़ लड़ाई नहीं है- यह एक देशभक्त भारतीय की आक्रांताओं के ख़िलाफ़ संघर्ष छेड़ने की कहानी है। मणिकर्णिका परिवार, राज्य और मातृभूमि- तीनो की मर्यादाएँ सिखाती है।
अपने पुत्र की मृत्यु पर शोकाकुल रानी धीरज नहीं रख पाती, वह रोती-बिलखती है, गम के सागर में डूब कर अपने मृत पुत्र को भी बाहों में समेटे रहती है। संतान की मृत्यु का गम किसी भी महिला के लिए इतना दुखदाई है, जिसकी परिकल्पना हम-आप नहीं कर सकते। पुत्र-शोक से ग्रसित रानी अपने शोक को मिटाने के लिए किसी क्लब में नहीं जाती- जो कि आजकल के समीक्षकों को खुश करने का एक ज़रिया हो सकता था। वह अपने बीमार पति की देखभाल में समय व्यतीत करती हैं, झाँसी की भावी रणनीति पर चर्चा करते हुए अपनी क्षमता दिखाती है।
मणिकर्णिका क्रूर अंग्रेज़ों के सामने सर नहीं झुकाती है। वह अपने पिता के लिए मणिकर्णिका हैं, पति के लिए मनु हैं, राज्य के लिए लक्ष्मी हैं और इतिहास के लिए एक वीरांगना हैं, झाँसी की रानी हैं। वह बात-बात में अंग्रेज़ी शब्द दुहरा कर अपनी बौद्धिकता का परिचय नहीं देती, बल्कि अंग्रेज़ी को एक ‘mere language’ बता कर अपनी मातृभाषा का सम्मान करने सिखाती है। पुस्तकों की प्रेमी मणिकर्णिका पठान-पाठन में समय व्यतीत करती हैं, उनके पुस्तकालय में आग लगा कर अंग्रेज़ अपनी मानसिकता का परिचय देते हैं।
मणिकर्णिका ट्रेलर (साभार: Zee Studios)
ग़ुलाम गौश ख़ान को गौश बाबा कहने वाली रानी उनका सम्मान करती है। गौश बाबा एक मुस्लमान नहीं है, वह भी एक भारतीय हैं जो अपनी मातृभूमि में दफ़न होने की कामना रखते हैं। पीर अली ग़द्दार है, वह देश का नमक खाता है लेकिन उसके मन में ज़हर भरा है। गौश बाबा की मृत्यु के वक़्त भावुक रानी वहाँ उपस्थित रहती है। ख़ान मरते वक़्त रानी को ‘विजयी भव’ का आशीर्वाद देते हैं। एक देशभक्त और बुज़ुर्ग की इज्ज़त करना जानती है रानी, इसे पितृसत्ता और धर्म के नज़रिए से आँकने वालों के मुँह पर तमाचा मारती है।
सार यह, कि अगर आपने मणिकर्णिका नहीं देखी तो आपको देखनी चाहिए। अगर आपने देख ली है, तो आपको इतिहास में झाँक कर उस गौरव गाथा के बारे में और जानना चाहिए, समीक्षकों की बेहूदगी पर सवाल खड़े करने चाहिए। फ़िल्म ऐतिहासिक रूप से भले ही शत प्रतिशत प्रामाणिक न हो, लेकिन कहानी वही है जो हमें दशकों से प्रेरणा देती आई हैं। कंगना इस फ़िल्म के निर्देशक हैं, बाहुबली के लेखक विजयेंद्र प्रसाद ने कहानी लिखी है और सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसूनजोशी ने डायलॉग्स लिखे हैं। फ़िल्म देखिए, उस गौरव गाथा को री-विजिट कीजिए और इन सबका धन्यवाद कीजिए।