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मोहम्मद आलम ने बुक किया जो कमरा, उसमें मिली लड़की की क्षत-विक्षत लाश: गला रेत कर हत्या, शरीर के अन्य हिस्सों पर भी 5 बार चाकू से वार

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में एक लड़की की गला काट कर हत्या कर दी गई है। मंगलवार (20 अगस्त, 2024) को पीड़िता का क्षत-विक्षत शव एक होटल में मिला है। शरीर पर चाकुओं के कई घाव मौजूद थे। होटल का कमरा मोहम्मद आलम नाम के युवक की ID पर रविवार (18 अगस्त, 2024) से बुक था। मोहम्मद आलम सोमवार (19 अगस्त, 2024) से फरार है। आशंका जताई जा रही है कि उसी ने लड़की की हत्या की है। फ़िलहाल पुलिस मामले की जाँच और मोहम्मद आलम की तलाश कर रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना बरेली जिले के कोतवाली थाना क्षेत्र की है। यहाँ रोडवेज इलाके के होटल ‘प्रीत पैलेस’ में रविवार (18 अगस्त, 2024) को मोहम्मद आलम नाम के युवक ने 20 वर्षीया लड़की के साथ कमरा बुक करवाया। 1 दिन बाद सोमवार को वह कमरे से बाहर जाता हुआ दिखाई दिया। होटल के स्टाफ ने सोचा कि लड़की कमरे में ही है। अगर आलम कहीं जा भी रहा होगा तो लौट कर आ जाएगा। यह अनुमान गलत साबित हुआ और मोहम्मद आलम 24 घंटे बाद तक नहीं लौटा।

मंगलवार को होटल के कमरे से बदबू आने लगी। किसी अनहोनी की आशंका के चलते होटल के मैनेजर ने पुलिस को सूचित किया। पुलिस ने मौके पर पहुँच कर दरवाजा खुलवाया तो अंदर लड़की की लाश पड़ी मिली। लड़की की हत्या गर्दन काट कर दी गई थी। शरीर के कुछ अन्य हिस्सों पर भी पर चाकुओं के 5 वार थे। कमरे का पंखा और AC चल रहा था। एक कोने में पानी की बोतल पड़ी मिली है। पुलिस ने केस दर्ज कर के प्रथम दृष्टया मोहम्मद आलम को संदिग्ध मानते हुए जाँच शुरू कर दी।

पीड़िता की शिनाख्त के प्रयास किए जा रहे हैं। होटल स्टाफ से भी पूछताछ चल रही है। मोहम्मद आलम व लड़की द्वारा जमा किए गए पहचान पत्रों की भी सत्यता जाँची जा रही है। मौके पर फॉरेंसिक टीम को बुलाया गया। फॉरेंसिक टीम ने आशंका जताई है कि लड़की की हत्या या तो सोते हुए की गई है या बेहोश कर के। पुलिस को आशंका है कि मोहम्मद आलम पीडिता को कत्ल करने के ही मकसद से सोची-समझी साजिश बना कर कमरे में लाया था। वह मूलतः बरेली जिले के थाना क्षेत्र आजमनगर का रहने वाला है। पीड़िता के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है।

जिस अब्दुल समद ने UP की महिला कॉन्स्टेबल को कुचला, उसकी अम्मी ने स्कूल में घुस बच्चियों पर बरसाए थे हंटर: नाना ने आतंकियों को इनाम का किया था ऐलान

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में बसपा सरकार के मंत्री रहे हाजी याकूब के नाती (बेटी के बेटे) ने बाइक से UP पुलिस की महिला कॉन्स्टेबल को कुचलने का प्रयास किया है। आरोपित का नाम अब्दुल समद उर्फ़ साद है। साद के साथ इस करतूत में मुस्लिम समुदाय का एक अन्य नाबालिग भी शामिल था। पुलिस ने FIR दर्ज कर के दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। घायल सिपाही का अस्पताल में इलाज चल रहा है। घटना रविवार (18 अगस्त 2024) की है।

यह घटना मेरठ के थाना क्षेत्र नौचंदी की है। यहाँ की SHO आदेश कौर ने सोमवार (19 अगस्त, 2024) को अपने थाने में केस दर्ज करवाया है। शिकायत में उन्होंने बताया कि रविवार की रात वो अपने थाने के कुछ अन्य पुलिसकर्मियों के साथ गश्त और वाहनों की चेकिंग कर रहीं थीं। रात लगभग 10:22 पर हापुड़ अड्डे की तरफ से एक काले रंग की BMW बाइक तेज रफ्तार में आती दिखी। इस बाइक पर 2 लड़के सवार थे। पुलिस ने इस बाइक को रुकने का इशारा किया। आरोप है कि रुकने के बजाय आरोपितों ने महिला कॉन्स्टेबल जौहरा परवीन को जान से मार डालने की नीयत से उन पर बाइक चढ़ा दी।

बाइक की जोरदार टक्कर से महिला सिपाही जमीन पर गिर पड़ीं। उनको काफी चोटें आईं। साथी पुलिसकर्मी घायल सिपाही को बचाने में जुट गए। तभी एक अन्य सिपाही देवपाल ने भागने की कोशिश कर रहे दोनों बाइक सवारों में से एक को दबोच लिया। यह आरोपित मुस्लिम समुदाय का एक नाबालिग निकला जिसे गिरफ्तार कर लिया गया। दूसरा आरोपित बाइक ले कर भाग निकला। पूछताछ में हिरासत में लिए गए आरोपित ने अपने साथी का नाम अब्दुल समद उर्फ़ साद बताया।

पूछताछ के आधार पर पुलिस ने आरोपित अब्दुल समद को भी दबिश दे कर गिरफ्तार कर लिया। इन दोनों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 109, 121 (1) और 132 के तहत कार्रवाई की गई है। दोनों आरोपितों को कानूनी प्रक्रियाओं के बाद अदालत में पेश किया गया है। घायल महिला सिपाही का इलाज अस्पताल में चल रहा है। उनके सिर और आँखों के पास चोटें आईं हैं। फ़िलहाल कॉन्स्टेबल की हालत खतरे से बाहर है। पुलिस मामले में जाँच व अन्य जरूरी कार्रवाई कर रही है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है।

अब्दुल की अम्मी भी हंटर से पीट चुकी है बच्चियों को

जिस अब्दुल समद के खिलाफ मेरठ पुलिस की महिला सिपाही को कुचलने का आरोप लगा है उसकी अम्मी आशमा भी लेडी डॉन के तौर पर चर्चित रह चुकी हैं। 10 जुलाई 2017 को उन पर मेरठ के सदर बाजार थाने में FIR दर्ज हुई थी। इस FIR में एक नाबालिग बच्ची के पिता ने बताया था कि उनकी बेटी को पीटने के लिए आशमा अपने लगभग आधे दर्जन साथियों के साथ स्कूल में घुस गईं थीं। तब आशमा के हाथों में हंटर था जिस से उन्होंने नाबालिग छात्राओं की पिटाई की थी।

पुलिस ने इस मामले में IPC की धारा 504, 506, 323 और 147 के तहत FIR दर्ज की थी। ऑपइंडिया के पास यह FIR कॉपी भी मौजूद है। इसके अलावा आशमा पर स्कूल प्रशासन ने भी इसी केस में एक अलग से FIR दर्ज करवाई थी। तब हाजी याकूब कुरैशी ने वीडियो फुटेज में दिख रही महिला को अपनी बेटी की हमशक्ल बता कर बचाने का प्रयास किया था।

कट्टरपंथी याकूब ने किया था सिर तन से जुदा का समर्थन

बताते चलें कि हाजी याकूब मूलतः माँस बेचने का कारोबार करते हैं। उनकी मीट फैक्ट्री चलती है। उसका मेरठ में एक अस्पताल भी चलता था। याकूब ने फ्रांसीसी मैगजीन शार्ली एब्दो के पेरिस स्थित दफ्तर पर हुए हमले को भी सही ठहराते हुए कहा था कि इस्लाम धर्म और पैगंबर की शान में गुस्ताखी किसी भी सूरत में माफ नहीं की जा सकती। इसके हमलावरों को भी याकूब कुरैशी ने 51 करोड़ रुपए देने की घोषणा की थी। योगी सरकार आने के बाद याकूब की बदजुबानी पर लगाम लगाया गई।

बुधवार (6 अप्रैल, 2022) को उसके अस्पताल को नियमों के विरुद्ध पाए जाने पर सील कर दिया गया था। इसी के साथ हाजी याकूब की मीट फैक्ट्री पर भी कार्रवाई की गई थी।

हिरोइनों के लिए नरक है फिल्म इंडस्ट्री, 15 मर्दों का ग्रुप ‘माफिया’ तय करता है सब कुछ: हेमा कमेटी की रिपोर्ट ने मलयालम सिनेमा को किया नंगा, चमक-दमक के पीछे यौन शोषण का अँधेरा

कास्टिंग काउच के मामलों से भरी पड़ी फिल्म इंडस्ट्री का काला सच क्या है ये कोई नहीं जानता। हम लोग मीडिया में आने वाली खबरों से केवल मामले का अंदाजा लगाते हैं लेकिन हकीकत उससे भी भयानक होती है। हाल में मलयालम फिल्म इंडस्ट्री के काले चेहरे को बयान करती हेमा कमेटी की रिपोर्ट पब्लिक हुई है। इस रिपोर्ट में सैंकड़ों महिला कर्मियों से बात की गई है जिन्होंने इसे बताया कि कैसे वो इस इंडस्ट्री का हिस्सा होते हुए यौन उत्पीड़न झेल रही हैं।

वैसे तो ये रिपोर्ट पाँच साल पहले ही केरल सरकार के पास पहुँच गई थी, लेकिन इसे सार्वजनिक अब किया गया है। कहा जा रहा है कि आरटीआई के दबाव में आकर केरल सरकार ने 295 पेजों की इस रिपोर्ट को जारी किया वो भी तब जब प्रारंभिक ड्रांफ्ट से 60 के आसपास पन्ने हटा दिए गए। ये रिपोर्ट न केवल फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं पर बीत रही आपबीती को बताती है बल्कि पुरुषों के उस समूह के राज भी खोलती है जिन्हें लेकर कहा जाता है कि वो ही इस इंडस्ट्री पर कब्जा किए हुए हैं।

आगे बढ़े उससे पहले जान लेते हैं कि हेमा कमेटी क्या है

दरअसल, साल 2017 में 14 फरवरी को मलयालम फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री अपनी कार से कोच्चि जा रही थीं, तभी उन्हें रास्ते में अगवा कर लिया गया और फिर उनका उन्हीं की कार में यौन उत्पीड़न हुआ। जानकारी जब खबरों में आई तो हर कोई सन्न रह गया। पुलिस ने उस समय तो आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया लेकिन इस घटना ने तमाम हिरोइनों की सुरक्षा पर सवाल उठा दिए। आंदोलन तेज होता गया।

जब दबाव सरकार पर पड़ा तो मजबूर होकर वारदात के पाँच महीने बाद जुलाई में केरल हाईकोर्ट की रिटायर्ड जस्टिस हेमा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी गठित हुई। इसी कमेटी को जो टास्क दिया गया उसमें पूरी मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में महिला कलाकारों, सहयोगियों और अन्य स्टाफ की सेवा शर्तें, काम के बदले समुचित मेहनताना, शूटिंग स्थल पर सुरक्षा के पर्याप्त इंतजामात आदि को लेकर रिपोर्ट देना था।

आदेशानुसार, कमेटी ने सैकड़ों की संख्या में महिला कलाकारों, टेक्नीशियन्स तथा अन्य से बातचीत की। उनके बयान रिकॉर्ड किए और फिर 2019 के आखिर में अपनी रिपोर्ट ले जाकर सीएम विजयन को दी। कमेटी ने इस रिपोर्ट के साथ इस मामले में विस्तृत जाँच के लिए न्यायाधिकरण के गठन की सिफारिश भी की। हालाँकि केरल सीएम ने उस पर सुनवाई तो दूर… इस रिपोर्ट को ही पब्लिक नहीं होने दिया।

लोगों ने इस मुद्दे को बार-बार उठाया, मगर सरकार ने इसे सार्वजनिक करने से मना कर दिया। विधानसभा में बताया गया कि अगर ये रिपोर्ट सार्वजनिक हुई तो निजता का उल्लंघन होगा। बाद में पांच आरटीआई कार्यकर्ताओं और मीडियाकर्मियों ने केरल राज्य सूचना आयोग से संपर्क किया तो उसने 6 जुलाई 2024 को आदेश दिया कि आयोग के सामने गवाही देने वालों की निजता बरकरार रखते हुए रिपोर्ट को कंट्रोल रिलीज किया जाए।

क्या-क्या है हेमा कमेटी की रिपोर्ट में

आज ये रिपोर्ट सार्वजनिक है। इस पर तमाम खबरें प्रकाशित हैं। इन्हीं स्रोतों को आधार बनाकर यदि बताएँ तो इस रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे मलयालम इंडस्ट्री को पुरुषों का एक समूह नियंत्रित करता है। वहीं महिलाएँ यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं वो भी उन लोगों द्वारा जिनका इंडस्ट्री में अच्छा खासा नाम है।

इसके अलावा इसमें ये भी बताया गया है कि इंडस्ट्री में शुरुआत से ही उनके साथ शोषण शुरू हो जाता है। उन्हें कभी ‘अडजस्ट’ करने को कहा जाता है तो कभी ‘कॉम्प्रोमाइज’ करने को। जब महिलाएँ इसका विरोध करती हैं तो उन्हें टॉर्चर झेलना पड़ता है। कभी बेसिक सुविधाओं से वंचित रखा जाता है तो कभी वेतन देने में भेदभाव किया जाता है।

कार्यस्थल पर उनके आगे नशे करना, दुर्व्यवहार करना, घटिया कमेंट करना भी रिपोर्ट पढ़कर सामान्य बातें लगती है। इसके अलावा कॉन्ट्रैक्ट में काम की जानकारी दिए बिन नग्न सीन कराने की शिकायत भी रिपोर्ट से पता चलती है।

जैसे, उदाहरण के लिए एक महिला एक्ट्रेस ने जानकारी दी कि उसे फिल्म के दौरान बताया ही नहीं गया था कि सीन के लिए कितना नग्न होना पड़ेगा। उसे बस कहा गया था कि उसमें उसकी बैक दिखाई जाएगी। हालाँकि बाद में जब सीन करना हुआ तो पता चला उसमें लिक-लॉक भी है और अन्य चीजें भी। एक्ट्रेस ने वो सीन करने से मना कर दिया और कहा कि उसे ये सब पहले नहीं बताया गया था।

इसी तरह एक मामले में तीन महीने की तैयारी की शूटिंग के बाद, एक निर्देशक ने अचानक एक अभिनेत्री को बताया कि उसे नग्न सीन करना होगा और लिप लॉक भी। महिला एक्ट्रेस ने मना किया बावजूद इसके उससे वो सीन कराया गया और अगले दिन बाथटब सीन के साथ अधिक रिवीलिंग सीन करने को कहा गया।

एक अन्य मामले में अभिनेत्री को एक शख्स के साथ सीन करने को मजबूर होना पड़ा जो पहले उसका शोषण कर चुका था। अभिनेत्री के चेहरे पर असहजता दिख रही थी लेकिन डायरेक्टर ने उससे वजह जानने की बजाय उसे सीन लेट करने के लिए फटकारा था।

इन सबके अलावा रिपोर्ट बताती है कि कैसे इंडस्ट्री में वेतन देते समय लिंग असमानता साफ झलकती है। बिन कॉन्ट्रैक्ट काम करवाया जाता है। वहीं जो कॉन्ट्रैक्ट साइन कराए जाते हैं उसमें अक्सर वेतन से जुड़ी बातें रेखांकित नहीं होतीं। बाद में महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले उचित वेतन तक नहीं मिलता। इसी तरह केवल महिला कलाकार इस भेदभाव को नहीं झेलते बल्कि कलाकारों के साथ तकनीशियनों को भी ये झेलना पड़ता है। कॉन्ट्रैक्ट न होने के कारण न उनके काम के घंटे तय होते हैं और न ही सैलरी। रिपोर्ट में एक मामला पढ़ने को मिलता है जहाँ एक अभिनेत्री को 32 दिन की शूटिंग के लिए उसे केवल 8 हजार रुपए दिए गए थे। वहीं दूसरे मामले में, एक अभिनेत्री को 20 दिनों के काम के लिए 50,000 रुपए देने का वादा किया गया था, लेकिन उसे मिले सिर्फ 4000 रुपए ही थे।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जाँच के दौरान निर्देशकों, निर्माताओं और अभिनेताओं समेत 15 बड़े शॉट्स से जुड़े एक पुरुष समूह का पता चला है। उनके अनुसार इंडस्ट्री में यही पावर ग्रुप तय करता है कि इंडस्ट्री में किसे रहना चाहिए और किसे फिल्मों में काम देना चाहिए। रिपोर्ट में इन शक्तिशाली समूह को माफिया भी बताया गया है जो अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों का करियर बर्बाद कर देते हैं।

ग्लैमर की दुनिया का सच

235 पन्नों की रिपोर्ट से ये कुछ बिंदु हैं जो अभी तक उभर कर सामने आए हैं। इसे देख भले ही मन में सवाल उठें कि आखिर एक इंडस्ट्री से इतनी घटनाएँ सामने आती हैं और कोई कुछ कहता कैसे नहीं, लेकिन हकीकत यह है कि ये समस्या सिर्फ मलयालम फिल्म इंडस्ट्री की नहीं है। ये समस्या बॉलीवुड इंडस्ट्री में भी है और सामान्य कॉर्पोरेट जगत में भी। हेमा कमेटी की रिपोर्ट ने तो बस इस बिंदु को और पुख्ता किया है कि कार्यक्षेत्रों में लिंग असमानता और कास्टिंग काउच जैसी बातें हवाई नहीं हैं।

वेतन असमानता की समस्या महिलाएँ ग्लैमर की दुनिया में भी झेल रही हैं। उनके साथ दुर्व्यवहार और उत्पीड़न के मामले वहाँ भी हो रहे हैं जहाँ कोई सोच नहीं सकता। बस इन पर चर्चा इसलिए नहीं क्योंकि सोशल मीडिया पर इतनी चमक-दमक दिखाई जाती है कि हम मानने को तैयार ही नहीं होते कि ये भी एक कड़वा सच है। अगर कोई खुलकर इस मुद्दे पर बोले भी तो हम सोशल एक्टिविटी से अंदाजा लगाते हैं कि उसके साथ जो हो रहा है वो सही है या नहीं। नतीजा ये होता है कि महिलाएँ बोलने से घबराने लगती हैं कि कहीं पुलिस तक बात जाने पर उनके चरित्र पर ही सवाल न खड़े हो जाएँ।

क्या है लेटरल एंट्री, कब से हुई इसकी शुरुआत, क्यों मोदी सरकार ने UPSC को भर्ती विज्ञापन पर रोक का दिया आदेश: जानिए सब कुछ

यूपीएससी में लेटरल एंट्री को लेकर बहस छिड़ने के बीच मंगलवार (20 अगस्त 2024) को केंद्र सरकार ने लेटरल एंट्री के विज्ञापन पर रोक लगाने का आदेश दिया है। इस संबंध में कार्मिक मंत्री ने यूपीएससी चेयरमैन को पत्र लिखकर कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के निर्देश पर सीधी भर्ती के विज्ञापन पर रोक लगाई जाए। कार्मिक मंत्री ने पत्र में कहा कि सरकार ने यह फैसला लेटरल एंट्री के व्यापक पुनर्मूल्यांकन के तहत लिया है।

केंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्री जितेंद्र सिंह की ओर से यूपीएससी के चेयरमैन को जो पत्र भेजा गया है, उसमें कहा गया है कि ये पद विशेषीकृत हैं। ऐसी नियुक्‍तियों में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं रहा है। सामाजिक न्‍याय सुनिश्‍चित कराने के प्रधानमंत्री के लक्ष्‍य के मद्देनजर इस तरह की नियुक्‍तियों की समीक्षा करने और इसमें सुधार लाने की जरूरत है, इसलिए यूपीएससी से लेटरल एंट्री के विज्ञापन को निरस्‍त करने का अनुरोध किया जाता है।

केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने जो लेटर यूपीएससी को लिखा है, उसमें कॉन्ग्रेस पर भी जमकर निशाना साधा गया है। लेटर में केंद्रीय मंत्री ने कहा है कि सैद्धांतिक तौर पर सीधी भर्ती की अवधारणा का समर्थन 2005 में गठित प्रशासनिक सुधार आयोग की तरफ से किया गया था, जिसकी अध्यक्षता वीरप्पा मोइली की तरफ से की गई थी।

इस पत्र में कहा गया है कि अधिकतर लेटरल एंट्रीज 2014 से पहले की थी और इन्हें एडहॉक स्तर पर किया गया था। प्रधानमंत्री का विश्वास है कि लेटरल एंट्री हमारे संविधान में निहित समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के समान होनी चाहिए, विशेष रूप से आरक्षण के प्रावधानों के संबंध में किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए।

इस मामले में केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा, “आज प्रधानमंत्री जी ने सामाजिक न्याय को ध्यान में रखते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है, पिछले 3-4 दिनों से लेटरल एंट्री का मामला चल रहा था। हमारे PMO में राज्य मंत्री जो DoPT भी देखते हैं, उन्होंने UPSC को पत्र लिखा है कि जब तक आरक्षण का पूरा प्रावधान नहीं हो जाता, तब तक आप इसे वापस ले लें। इससे पता चलता है कि प्रधानमंत्री जी सामाजिक न्याय के लिए प्रतिबद्ध हैं। हालाँकि ये सच है कि लेटरल एंट्री की शुरुआत कॉन्ग्रेस के जमाने से हुई। आरक्षण के मुद्दे पर प्रधानमंत्री जी हमेशा गरीबों के साथ खड़े नजर आते हैं। इस फैसले में भी प्रधानमंत्री जी SC, ST और पिछड़ों के साथ खड़े नजर आते हैं।”

क्या है लेटरल एंट्री?

नौकरशाही मे लेटरल एंट्री सरकार के पीछे सरकार की मंशा है कि निजी क्षेत्र के लोगों के अनुभव का लाभ भी उसे मिले। ऐसे अनुभवी लोगों की भर्ती के लिए ही सरकार यह कदम उठा रही है। इसके अंतर्गत सरकार अनुभव के आधार पर इन लोगों की भर्ती करती है। इनको केंद्र सरकार में सचिव स्तर के पद और सुविधाएँ दी जाती हैं। ऐसे आवेदकों की भर्ती के लिए सरकार उनके अनुभव और साक्षात्कार के आधार पर होती है। इनकी सेवा भी नियमित अवधि के लिए होती है और संविदा पर की जाती है। वर्तमान भर्ती में यह सीमा 3 वर्ष रखी गई है।

किसने दिया था लेटरल एंट्री का सुझाव?

UPA सरकार ने वर्ष 2005 में प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) का गठन किया था। इसके अध्यक्ष केन्द्रीय मंत्री वीरप्पा मोईली थे। वीरप्पा मोईली की अध्यक्षता वाले इस पैनल ने देश के कई क्षेत्रो में सुधार को लेकर अपने सुझाव दिए थे। इन्हीं सुझावों में एक रिपोर्ट प्रशासनिक सुधारों पर आधारित थी। यह रिपोर्ट नवम्बर 2008 में केंद्र सरकार को सौंपी गई थी। लगभग 380 पन्नों की इस रिपोर्ट में लेटरल एंट्री के सुझाव का जिक्र है। इस रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर लिखा है कि ARC नौकरशाही के पदों पर लेटरल एंट्री का सुझाव देती है।

रिपोर्ट में केंद्र सरकार के कुछ पदों पर 3 वर्षों के लिए लेटरल एंट्री की बात कही गई थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि निजी क्षेत्र के लोगों को सरकार में काम करने का मौक़ा दिया जाना चाहिए और इसी तरह सरकारी अफसरों को भी बाहरी क्षेत्र में काम करने की छूट दी जानी चाहिए। लेटरल एंट्री की भर्तियो को लेकर आयोग ने कहा था कि इससे उच्च पदों पर काम करने के लिए सरकार को ऐसे लोग मिलेंगे जो उस क्षेत्र के विशेषज्ञ होंगे। इसके लिए अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देशों का उदाहरण भी दिया गया था।

कब हुई लेटरल एंट्री की शुरुआत?

कॉन्ग्रेस सरकार के अलावा नीति आयोग ने भी 2017 में ऐसी ही सिफारिश की थी। नीति आयोग ने 40 पदों पर लेटरल एंट्री के जरिए भर्ती करने की सिफारिश की थी। 2018 में मोदी सरकार ने पहली बार लेटरल एंट्री के जरिए विशेषज्ञों को सरकार में शामिल करने के लिए विज्ञापन निकाले थे। इसी क्रम में ही इस बार भी 45 अलग-अलग पदों पर भर्ती निकाली गई है, जिसे फिलहाल सरकार ने रोक दिया है।

रेप के बाद हुई जिसकी हत्या उसके परिजनों से डॉक्टर बन मिले ममता बनर्जी के ‘समर्थक’, सुप्रीम कोर्ट की याचिका बता करवाए दस्तख़त: पीड़ित परिवार के वकील का खुलासा

कोलकाता के RG Kar मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में बलात्कार के बाद हत्या की शिकार बनी अंडर ट्रेनी डॉक्टर के परिजनों के साथ जालसाज़ी का प्रयास किया गया है। यह आरोप पीड़िता के पिता द्वारा नियुक्त वकील विकासरंजन भट्टाचार्य ने लगाए हैं। मंगलवार (20 अगस्त, 2024) को एक फेसबुक पोस्ट के जरिए उन्होंने बताया कि कुछ धोखेबाजों ने खुद को डॉक्टर बता कर पीड़िता के परिजनों से संपर्क किया। वकील के नाम पर कुछ कागजातों पर दस्तख़त भी करवाए गए हैं। एडवोकेट भट्टाचार्य ने ममता बनर्जी की भी आलोचना की है।

सीनियर अधिवक्ता विकासरंजन भट्टाचार्य ने 20 अगस्त को अपनी फेसबुक प्रोफ़ाइल पर एक पोस्ट किया है। उन्होंने लिखा कि जब वो दिल्ली हवाई अड्डे पर पहुँचे तो उन्हें पता चला कि कुछ संदिग्ध लोगों ने डॉक्टर के वेश में पीड़िता के घर वालों से मुलाकात की है। ये जालसाज अपने साथ कोई कागज लाए थे जिसे वो सुप्रीम कोर्ट की याचिका बता रहे थे। उन्होंने इस पर दस्तख़त करवाने के लिए विकास रंजन भट्टाचार्य का नाम लिया। इन जालसाज़ों को ममता बनर्जी का कट्टर समर्थक बताते हुए वकील ने आशंका जताई है कि वो लोग ममता बनर्जी के ‘भक्त’ थे।

बिकासरंजन भट्टाचार्य की फेसबुक पोस्ट

एडवोकेट विकासरंजन भट्टाचार्य ने माँग की है कि इस पूरे मामले की जाँच और जालसाजों पर कार्रवाई होनी चाहिए। उनका दावा है कि जालसाजों के पास कई गुप्त राज भी हो सकते हैं। वकील भट्टाचार्य ने पीड़िता के परिजनों को पैसे की पेशकश करने वाली ममता बनर्जी की भी आलोचना की। उन्होंने लिखा, “आप देखिए, पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री की भूमिका बहुत निंदनीय है। जहाँ भी बलात्कार होता है, वह तुरंत पीड़ित के परिवार से संपर्क करने की कोशिश में जुट जातीं हैं और उन्हें पैसे दे कर कहती हैं कि सब कुछ खत्म हो गया है।”

एडवोकेट विकासरंजन भट्टाचार्य ने आगे लिखा, “दुर्भाग्य से उन्होंने (ममता बनर्जी) ने रेप पीड़िताओं के लिए रेट कार्ड तय कर रखे हैं।” वकील का मानना है कि बलात्कार की पीड़िताएँ कानूनी तौर पर मुआवजे के हकदार ज़रूर हैं, लेकिन जाँच पूरी होने तक इंतजार करना चाहिए। वकील का आरोप है कि के केस में गवाहों को भी खरीदने की कोशिश होती है। बकौल विकसरंजन आरजी कर मेडिकल कॉलेज पीड़िता के साथ भी यही हुआ था लेकिन पीड़िता के परिजनों ने पैसे लेने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि वो मुख्यमंत्री के खेल का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे।

अधिवक्ता विकासरंजन भट्टाचार्य भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से राज्यसभा सांसद भी हैं। बताते चलें कि कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान, उन्होंने उल्लेख किया कि अस्पताल पर हमला करने वाली भीड़ का मकसद उस सेमिनार वाले कमरे को खराब करना था जहाँ ये घृणित अपराध हुआ था। हालाँकि, यह भीड़ भटक कर उस मंज़िल पर पहुँच गई थी। यहाँ भीड़ ने उस कमरे को तहस-नहस कर दिया था ताकि अपराध के सबूतों को मिटाया जा सके। इस हमले का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था।

वायरल हो रहे इस वीडियो में एक व्यक्ति को यह कहते सुना गया, “चलो सेमिनार वाले कमरे में चलते हैं। “इसके बाद भीड़ ने कमरे में तोड़फोड़ शुरू कर दी थी। इस तोड़फोड़ का शिकार इमारत में मौजूद कुल 18 विभाग हुए थे। इन विभागों में इमरजेंसी रूम, गहन देखभाल इकाई और उच्च निर्भरता इकाई के साथ-साथ भंडारण कक्ष, पुरुष वार्ड, वॉशरूम शामिल हैं। भीड़ में मौजूद लगभग 7000 हमलावरों ने CCTV कैमरों को भी तोड़ डाला था। इस दौरान अस्पताल में तैनात पुलिसकर्मियों ने वॉशरूम में छिप कर अपनी जान बचाई थी। तब अस्पताल की नर्सों ने पुलिसकर्मियों की छिपने में मदद की थी।

डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए नेशनल टास्क फोर्स, आर जी कर अस्पताल CISF के हवाले: कोलकाता हॉरर पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, FIR में देरी पर बंगाल सरकार से पूछे सख्त सवाल

कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में महिला डॉक्टर के साथ हुए रेप और हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जाँच ब्यूरो से 22 अगस्त तक स्टेटस रिपोर्ट माँगी है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल टास्क फोर्स का गठन किया है। ये अस्पतालों में काम कर रहे डॉक्टर्स की सुरक्षा को लेकर रिपोर्ट देगा। टास्क फोर्स 3 सप्ताह में अंतरिम रिपोर्ट देगी, जबकि 2 महीने के भीतर फाइनल रिपोर्ट सौंपेगी।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, कोलकाता रेप-मर्डर मामले में सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने सुनवाई की। सीजेआई ने कहा कि डॉक्टर्स की सुरक्षा व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए टास्क फोर्स बना रहे हैं, इसमें 9 डॉक्टर्स को शामिल किया गया है, जो मेडिकल प्रोफेशनल्स की सुरक्षा, वर्किंग कंडीशन और उनकी बेहतरी के उपायों की सिफारिश करेगी। टास्क फोर्स में केंद्र सरकार के पाँच अधिकारी भी शामिल किए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने जिस टास्ट फोर्स का गठन किया है, उसका नेतृत्व सर्जन वाइस एडमिरल आरती सरीन एवीएसएम, वीएसएम करेंगे। नेशनल टास्क फोर्स मेडिकल पेशेवरों की सुरक्षा, कार्य स्थितियों और कल्याण से संबंधित सिफारिशें करेगा। नेशनल टास्क फोर्स को तीन सप्ताह में अंतरिम रिपोर्ट और 2 महीने के भीतर अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।

टास्ट फोर्स में इन्हें किया गया शामिल

आरके सरियन, सर्जन वाइस एडमिरल, डॉ. नागेश्वर रेड्डी, मैनेजिंग डायरेक्टर एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ नेशनल गैस्ट्रोलॉजी, डॉ. एम. श्रीनिवास, डायरेक्टर AIIMS, दिल्ली, डॉ. प्रतिमा मूर्ति, NIMHANS, बेंगलुरू, डॉ. गोवर्धन दत्त पुरी, डायरेक्टर, AIIMS, जोधपुर, डॉ. सौमित्र रावत, गंगाराम अस्पताल के मैनेजिंग मेंबर, प्रोफेसर अनीता सक्सेना, कार्डियोलॉजी हेड, AIIMS, दिल्ली, प्रोफेसर पल्लवी सापरे, डीन- ग्रांट मेडिकल कॉलेज, मुंबई और डॉ. पदमा श्रीवास्तव, न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट, AIIMS। इसके अलावा भारत सरकार के कैबिनेट सचिव, भारत सरकार के गृह सचिव, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव, नेशनल मेडिकल कमीशन के अध्यक्ष और नेशनल बोर्ड ऑफ इग्जामिनर्स के अध्यक्ष होंगे।

कोर्ट ने सीबीआई से 22 अगस्त तक स्टेटस रिपोर्ट और राज्य सरकार से घटना की रिपोर्ट माँगी है। आरजी कर अस्पताल की सुरक्षा का जिम्मा सीआईएसएफ को दिया गया। केस की अगली सुनवाई 22 अगस्त को होगी।

सुरक्षा की जिम्मेदारी सीआईएसएफ पर

इस मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा, “15 अगस्त की रात को जब आरजी कर अस्पताल में तोड़फोड़ की घटनाएँ हुईं, तो भीड़ ने पुरुष और महिला डॉक्टरों पर हमला किया। पश्चिम बंगाल के डॉक्टरों के संगठन (प्रोटेक्ट द वॉरियर्स) की ओर से पेश अपराजिता सिंह ने एक वरिष्ठ रेजिडेंट द्वारा घटना का विवरण देते हुए एक ईमेल रिकॉर्ड पर रखा है। अस्पताल में 700 रेजिडेंट डॉक्टर हैं। ज्यादातर रेजिडेंट अपनी ड्यूटी छोड़ चुके हैं और अब 30-40 महिला और 60 पुरुष डॉक्टर रह गए हैं। डॉक्टरों के लिए अपनी ड्यूटी करने के लिए सुरक्षित माहौल बनाए रखना जरूरी है। इसलिए हमें एसजी मेहता ने आश्वासन दिया है कि सुरक्षा में सीआईएसएफ की तैनाती की जाएगी।”

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, “हमने इस मामले को स्वत: संज्ञान लेने का फैसला इसलिए किया, क्योंकि यह कोलकाता के अस्पताल में हुई किसी विशेष हत्या से संबंधित मामला नहीं है। यह पूरे भारत में डॉक्टरों की सुरक्षा से संबंधित व्यवस्थागत मुद्दों को उठाता है। सबसे पहले, सुरक्षा के मामले में हम सार्वजनिक अस्पतालों में युवा डॉक्टरों खासकर महिला डॉक्टरों के लिए सुरक्षा की स्थिति के अभाव के बारे में बहुत चिंतित हैं, जो काम की प्रकृति और लिंग के कारण अधिक असुरक्षित हैं। इसलिए हमें राष्ट्रीय सहमति विकसित करनी चाहिए। काम की सुरक्षित स्थिति बनाने के लिए एक राष्ट्रीय प्रोटोकॉल होना चाहिए। अगर महिलाएँ काम की जगह पर नहीं जा सकतीं और सुरक्षित महसूस नहीं कर सकतीं तो हम उन्हें समान अवसर से वंचित कर रहे हैं। हमें यह सुनिश्चित करने के लिए अभी कुछ करना होगा कि सुरक्षा की स्थिति लागू हो।”

सीजेआई ने कहा कि न्यायालय महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरे देश में अपनाए जाने वाले तौर-तरीकों पर सिफारिशें देने के लिए पूरे देश के डॉक्टरों को शामिल करते हुए “राष्ट्रीय टास्क फोर्स” बना रहा है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि महाराष्ट्र, केरल, तेलंगाना आदि जैसे कई राज्यों ने डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा से निपटने के लिए राज्य कानून बनाए हैं। हालाँकि, ये कानून संस्थागत सुरक्षा मानकों की कमियों को दूर नहीं करते हैं। अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “जैसे-जैसे अधिक से अधिक महिलाएं कार्यबल में शामिल होती जा रही हैं…..देश जमीनी स्तर पर चीजों को बदलने के लिए एक और बलात्कार का इंतजार नहीं कर सकता।”

आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम मुद्दे उठाए, जिनमें…

  • नाइट ड्यूटी करने वाले मेडिकल पेशेवरों को आराम करने के लिए पर्याप्त कमरे नहीं दिए जाते हैं। महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग ड्यूटी रूम नहीं हैं।
  • इंटर्न, रेजीडेंट और सीनियर रेजीडेंट से 36 घंटे की ड्यूटी करवाई जाती है, जहाँ अक्सर स्वच्छता और सफाई की बुनियादी स्थितियाँ नहीं होती हैं।
  • अस्पतालों में सुरक्षा कर्मियों की कमी अपवाद से कहीं अधिक आम बात है।
  • मेडिकल देखभाल पेशेवरों के पास पर्याप्त शौचालय की सुविधा नहीं है।
  • मेडिकल पेशेवरों के ठहरने के स्थान अस्पतालों से दूर हैं और परिवहन सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं।
  • अस्पतालों की निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरों का न होना या उनका ठीक से काम न करना।
  • मरीजों और उपस्थित लोगों के लिए सभी जगहों पर बेरोकटोक पहुंच है।
  • प्रवेश द्वार पर हथियारों की जाँच का अभाव।
  • अस्पताल के अंदर डिंग और खराब रोशनी वाली जगहें।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रिंसिपल के आचरण, एफआईआर दर्ज करने में देरी और 14 अगस्त को सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन के दौरान अस्पताल में हुई तोड़फोड़ पर भी राज्य से सवाल पूछे। सीजेआई ने कहा, “सुबह-सुबह अपराध का पता चलने के बाद अस्पताल के प्रिंसिपल ने इसे आत्महत्या का मामला बताने की कोशिश की। माता-पिता को कुछ घंटों तक शव देखने की अनुमति नहीं दी गई…।”

सिब्बल ने कहा कि यह गलत जानकारी है। उन्होंने कहा कि राज्य सभी तथ्यों को रिकॉर्ड में रखेगा। सीजेआई ने सवाल किया कि आरजी कर अस्पताल से इस्तीफा देने के बाद प्रिंसिपल को दूसरे अस्पताल का प्रभार क्यों दिया गया। इसके बाद पीठ ने एफआईआर के समय के बारे में सवाल किया। सिब्बल ने कहा कि “अप्राकृतिक मौत” का मामला तुरंत दर्ज किया गया था और दावा किया कि एफआईआर दर्ज करने में कोई देरी नहीं।

सीजेआई ने बताया कि शव का पोस्टमार्टम दोपहर 1 बजे से शाम 4.45 बजे के बीच किया गया। शव को अंतिम संस्कार के लिए रात करीब 8.30 बजे माता-पिता को सौंप दिया गया। हालाँकि, एफआईआर रात 11.45 बजे ही दर्ज की गई। सीजेआई ने पूछा, “रात 11.45 बजे एफआईआर दर्ज की गई? अस्पताल में कोई भी एफआईआर दर्ज नहीं करता? अस्पताल के अधिकारी क्या कर रहे थे? क्या पोस्टमार्टम से यह पता नहीं चलता कि पीड़िता के साथ बलात्कार किया गया और उसकी हत्या की गई?”

सीजेआई ने आगे पूछा, “प्रिंसिपल क्या कर रहे थे? पहले इसे आत्महत्या के रूप में पेश करने का प्रयास क्यों किया गया?” सीजेआई ने राज्य से 14 अगस्त को “रात को वापस लो” विरोध अभियान के दौरान अस्पताल में हुई तोड़फोड़ की घटनाओं पर भी सवाल किया।

जिस बच्ची से मोईद-राजू खान ने किया रेप, उसे मारने अस्पताल में घुस गया था सपा नेता: अब निरस्त हो सकता है राशिद खान का शस्त्र लाइसेंस, पुलिस ने घर पे चस्पाया नोटिस

उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले में नाबालिग बच्ची से गैंगरेप के आरोपित मोईद खान के मददगार सपा नेता राशिद खान के खिलाफ भी प्रशासन ने कार्रवाई तेज कर दी है। जिला प्रशासन राशिद खान के शस्त्र लाइसेंसों को निरस्त कर सकता है। इस बाबत पुलिस ने उनके घर पर मंगलवार (20 अगस्त 2024) को बाकायदा ‘कारण बताओ नोटिस’ भी चस्पा कर दी है। नोटिस का जवाब देने के लिए राशिद खान को 29 अगस्त तक का समय दिया गया है। अखिलेश यादव के करीबी माने जाने वाले राशिद खान पर 1 अगस्त को पीड़िता को अस्पताल में घुस कर केस वापस लेने की धमकी देने की FIR दर्ज है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, समाजवादी पार्टी से भदरसा के नगर पंचायत अध्यक्ष के आवास पर मंगलवार की सुबह कोतवाली नगर पुलिस सहित अन्य प्रशासनिक अधिकारी पहुँचे। उनके हाथ में ‘कारण बताओ नोटिस’ थी जिसे उन्हें राशिद खान को तामील करवाना था। राशिद खान घर पर मौजूद नहीं था, इसीलिए नियमानुसार नोटिस को उसके घर पर चस्पा करवा दिया गया है। इस नोटिस में राशिद खान को जवाब देने के लिए इसी माह 29 अगस्त तक की समय सीमा दी गई है।

बताते चलें कि राशिद खान को अपना बयान दर्ज करवाने के लिए अयोध्या पुलिस पहले ही नोटिस भेज चुकी है। इस नोटिस के बावजूद राशिद पुलिस के आगे बयान दर्ज करवाने नहीं गए। अपने खिलाफ दर्ज FIR में अग्रिम जमानत लेने के लिए राशिद खान अदालत भी गए थे। हालाँकि, अदालत ने उनकी अपील ख़ारिज कर दी थी और पुलिस के आगे पेश हो कर जाँच में सहयोग करने के लिए कहा था। हालाँकि अदालत से मिली 3 दिनों की समयसीमा के बावजूद राशिद खान अब तक पुलिस के आगे पेश नहीं हुए।

बताते चलें कि शिकायत कॉपी में आरोप है कि राशिद खान ने पहले पीड़िता के घर जा कर मुकदमे को वापस लेने की धमकी दी थी। अपनी बात न मानने पर उसने लड़की व उसके परिवार वालों को खत्म करने की धमकी दी थी। जब उसकी बात नहीं मानी गई तब वो अपने 2 साथियों सहित गुरुवार (1 अगस्त 2024) की रात 11 बजे महिला जिला अस्पताल के उस कमरे के पास पहुँच गया था जिसमें पीड़िता का इलाज चल रहा था। आरोप है कि राशिद व उसके साथी पीड़िता की हत्या करना चाहते थे।

इस शिकायत पर राशिद व उसके 2 सहयोगियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता 2023 (BNS) की धारा 333 (जबरदस्ती किसी के घर में घुसने) और बीएनएस की धारा 351(3) (आपराधिक धमकी देने) के तहत मुकदमा दर्ज किया है। पुलिस ने इसी केस में राशिद खान को पहले भी नोटिस जारी कर के बयान देने के लिए बुलाया था लेकिन वो हाजिर नहीं हुए। गौरतलब है कि राशिद खान का समाजवादी पार्टी में काफी ऊँचा रुतबा है। वह अखिलेश यादव से हाथ मिलाता है और समाजवादी पार्टी के तमाम बड़े नेताओं के साथ मंच को साझा करता है।

32 साल बाद अजमेर सेक्स स्कैंडल के 6 दोषियों को उम्रकैद, कुछ रिहा हो गए तो कोई विदेश में बैठा है: 1992 में दरगाह के खादिमों-कॉन्ग्रेस नेताओं ने खेला था घिनौना खेल

1992 के अजमेर सेक्स स्कैंडल में स्पेशल पॉक्सो कोर्ट के जज रंजन सिंह ने 6 दोषियों को सज़ा सुनाई है। इन सभी को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई है, साथ ही 5-5 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है।

32 वर्ष पुराने अजमेर सेक्स स्कैंडल में 6 को अदालत ने दोषी माना है। 1992 के इस प्रकरण को भारत के काले अध्यायों में से एक में गिना जाता है। इस मामले में नफीस चिश्ती, नसीम उर्फ़ टार्जन, सलीम चिश्ती, इकबाल भाटी, सोहेल गनी और सैयद जमीर हुसैन को दोषी ठहराया गया है। राजस्थान के अजमेर स्थित विशेष न्यायालय में इस मामले की सुनवाई चल रही थी। इकबाल भाटी को एम्बुलेंस के जरिए दिल्ली से अजमेर लाया गया, वहीं 1 दोषी को तबीयत खराब होने के कारण पेश नहीं किया जा सका।

इस मामले में 23 जून, 2001 को ही चार्जशीट दायर की गई थी। पॉक्सो कोर्ट में भी इस मामले की सुनवाई चल रही थी। बता दें कि ये मामला 1992 का है जब 100 से भी अधिक लड़कियों के साथ न सिर्फ सामूहिक बलात्कार की घटनाएँ हुई थीं, बल्कि उनकी नग्न तस्वीरें भी फैला दी गई थीं। इस मामले में कुछ लड़कियों ने आत्महत्या भी की थी। अजमेर की लड़कियों की शादी होनी बंद हो गई है। इस मामले में दरगाह के खादिमों और कॉन्ग्रेस नेताओं का हाथ सामने आया था।

एक आरोपित अभी तक फरार है, जिसका कोई अता-पता नहीं चल सका है। इतना ही नहीं, एक कारोबारी के बेटे तक के साथ कुकर्म किया गया था। फिर तस्वीरों के जरिए ब्लैकमेल कर उसे उसकी गर्लफ्रेंड के साथ पॉल्ट्री फार्म पर बुलाया और उसका गैंगरेप किया था। उस लड़की को न्यूड तस्वीरों के जरिए ब्लैकमेल कर सहेलियों को लाने का दबाव बनाया गया। एक लैब में इन्होंने तस्वीरें उतारने के लिए दी थीं, उसके कुछ कर्मचारियों ने तस्वीरें सर्कुलेट कर दी, इसकी जेरोक्स कॉपी कइयों को बेचीं गई और फिर उन लड़कियों को ब्लैकमेल कर उनका यौन शोषण किया गया।

इस मामले में सबसे पहले 18 आरोपितों पर ट्रायल चला था – कलर लैब का मैनेजर हरीश डोलानी, यूथ कॉन्ग्रेस का प्रेजिडेंट रहा फारूख चिश्ती, वाईस प्रेजिडेंट नफीस चिश्ती, जॉइंट सेक्रेटरी अनवर चिश्ती, लैब डेवलपर पुरुषोत्तम उर्फ़ बबली, इकबाल भाटी, कैलाश सोनी, सलीम चिश्ती, सोहेल गनी, जमीर हुसैन, अल्मास महाराज, इशरत अली, परवेज अंसारी, मोइजुल्लाह उर्फ़ पूतन इलाहाबादी, नसीम उर्फ़ टार्जन, कलर लैब का मालिक महेश डोलानी, ड्राइवर शम्शू उर्फ़ माराडोना, नेता जउर चिश्ती।

इनमें से 5 अपनी सज़ा काट चुके हैं, वहीं 6 को अब सज़ा सुनाई गई है। इशरत अली, अनवर चिश्ती, मोइजुल्लाह उर्फ़ पूतन इलाहाबादी और शमशुद्दीन उर्फ़ माराडोना की उम्रकैद की सज़ा को सुप्रीम कोर्ट ने 10 वर्ष के कारावास में बदल दिया। इन्हें 2003 में सज़ा हुई थी, फ़िलहाल सभी रिहा हो गए हैं। परवेज अंसारी, महेश लोदानी, हरीश तोलानी और कैलाश सोनी को 1998 में निचली अदालत ने उम्रकैद दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने इन्हें बरी कर दिया। पुरुषोत्तम उर्फ़ बबली 1994 में ही आत्महत्या कर चुका है।

फारूख चिश्ती को 2007 में उम्रकैद तो मिली, लेकिन 2013 में उसे रिहा कर दिया गया। अल्मास महाराज के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी है, वो विदेश चला गया है। 6 लड़कियों ने प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या की थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत की सरकार ने CB-CID को मामले की जाँच सौंपी थी। 32 साल बाद भी इस मामले में ठीक से इंसाफ नहीं हो पाया है, पुलिस ने इस मामले में आरोपितों के खिलाफ अलग-अलग चार्जशीट पेश की थी। 7 आरोपितों ने तो घटना के 11 साल बाद 2003 में आत्मसमर्पण किया।

इस मामले में 16 पीड़िताएँ कोर्ट में पेश हुईं। अब तक तो इनमें से कई दादी भी बन चुकी हैं। कई पीड़िताएँ सामाजिक कारणों से बाद में मुकर गईं। तत्कालीन DIG ओमेंद्र भारद्वाज ने बिना जाँच ही लड़कियों के चरित्र पर सवाल उठा दिए थे, जिस पर कोर्ट ने आपत्ति जताते हुए सरकार से उनके खिलाफ भी जाँच कराने को कहा था। सोहैल गनी तो 2018 में गिरफ्तार हुआ, जिसके बाद ट्रॉयल फिर रुकी और फिर चार्जशीट पेश हुआ था। अब तक 104 गवाह पेश किए जा चुके हैं।

1992 में जब अजमेर में स्कूली लड़कियों के साथ बलात्कार उन्हें ब्लैकमेल करने का मामला सामने आया था, तब साप्ताहिक समाचार पत्र ‘लहरों की बरखा’ चलाने वाले मदन सिंह ने इस पूरे मामले को बड़े पैमाने पर उठाया था। इस कारण पहले उन्हें धमकियाँ मिलीं। लेकिन, बाद में गोली मारकर हत्या कर दी गई। श्रीनगर रोड पर मदन सिंह पर हमला किया गया था। घायल होने के बाद उन्हें अजमेर के जेएलएन अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन अस्पताल के वार्ड में ही गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई।

करीब 30 साल बाद 7 जनवरी 2023 को इस दिवंगत पत्रकार के दो बेटों ने एक शख्स को गोलियों से भून​ दिया। चिल्लाकर बताया कि अपने पिता की मौत का बदला ले लिया है। जुलाई 2023 में इस घटना पर बनी फिल्म ‘अजमेर 92’ भी रिलीज हुई थी। इस फिल्म में सुमित सिंह, मनोज जोशी, करण वर्मा, राजेश शर्मा, जरीना वहाब और शालिनी कपूर महत्वपूर्ण भूमिका में हैं। फिल्म का लेखन पुष्पेंद्र सिंह, ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह और सूरजपाल पाठक ने किया है। फिल्म के डायरेक्टर पुष्पेंद्र सिंह हैं। वहीं, उमेश कुमार तिवारी और करण वर्मा ने मिलकर फिल्म को प्रोड्यूस किया है।

इस्लामी भीड़ ने इस फिल्म के खिलाफ जम कर विरोध प्रदर्शन किया था। अजमेर दरगाह से जुड़े कई खादिम आज भी नहीं सुधरे हैं, जब भाजपा नेता रहीं नूपुर शर्मा के खिलाफ ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगे थे और उदयपुर में कन्हैया लाल तेली की गला रेती गई थी उनका समर्थन करने के कारण, तब इस हत्याकांड से गौहर चिश्ती को गिरफ्तार किया गया था। इसी तरह सलमान चिश्ती ने नूपुर शर्मा की हत्या के लिए उकसाया था। 1992 के अजमेर रेप-कांड की शिकार अधिकतर स्कूल और कॉलेज जाने वाली लड़कियाँ थीं। 

उस वक़्त अजमेर में 350 से भी अधिक पत्र-पत्रिका थी और इस सेक्स स्कैंडल के पीड़ितों का साथ देने के बजाए स्थानीय स्तर के कई मीडियाकर्मी उल्टा उनके परिवारों को ब्लैकमेल किया करते थे। इस केस पर बाद में टीवी मीडिया पर शो से लेकर किताबें तक लिखी गईं लेकिन एक चीज जो आज तक कहीं नहीं दिखा, वो है- न्याय। अगर उस समय पुलिस ने इस केस में आरोपितों पर शिकंजा कसा होता तो शायद उन्हें फाँसी की सज़ा भी मिल सकती थी।

फाँसी लगाकर मर गई 15 साल की वह ST लड़की जिससे शाहिद अनवर ने किया रेप: घर पर हमला कर पुलिस के पास जाने से रोका, पंचायत ने इज्जत की ₹1.35 लाख लगाई ‘कीमत’

झारखंड के साहिबगंज के संथाल परगना में एक नाबालिग लड़की ने आत्महत्या कर ली। बताया जा रहा है कि उसके पड़ोसी शाहिद अनवर ने उसे जान से मारने की धमकी देकर उसके साथ दुष्कर्म किया था। इसी के बाद लड़की ने ये कदम उठाया। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी ने इस घटना को लेकर ट्वीट किया है। उन्होंने अखबार में छपी खबर का स्क्रीनशॉट साझा करते हुए झारखंड में अलग-अलग जगहों पर हुई घटनाओं का जिक्र करते हुए सवाल उठाया है कि आखिर कब तक मुसलमानों के वोटबैंक खिसकने के डर से हेमंत सरकार ऐसी घटनाओं की निंदा करने से बचेगी।

बता दें कि राधानगर थाना क्षेत्र में 15 साल की किशोरी ने 18 अगस्त को अपने दुपट्टे से फाँसी लगाई। 15 अगस्त को उसको शाहिद अनवर ने जान से मारने की धमकी देते हुए उसके साथ दुष्कर्म किया था। जब लड़की के घरवालों को इस संबंध में पता चला तो उन्होंने विरोध किया, शिकायत दर्ज कराने की बात कही, लेकिन आरोपित के परिवार ने उन्हें धमकी दी और फिर 18 अगस्त को पंचायत बैठी। आरोपित से सवाल जवाब हुए। पंचायत में उसने स्वीकार लिया कि उसने लड़की के साथ गंदी हरकत की है। इसके बाद पंचायत ने आरोपित पक्ष पर 1.35 लाख रुपए का जुर्माना लगाया लेकिन लड़की के घरवालों ने ये पैसे लेने से मना कर दिए। बच्ची पंचायत के इस फैसले से बहुत आहत हुई और उसने देर रात फंदे पर लटक अपनी जान दे दी।

सुसाइड की खबर सुन आरोपित परिवार फरार

बच्ची की सुसाइड की खबर सुनने के बाद से आरोपित परिवार फरार है। पुलिस उनकी तलाश में छापेमारी कर रही है। पीड़ित परिवार ने ये भी बताया है कि 16 अगस्त को वो इस पूरे मामले की शिकायत थाने में देने जा रहे थे लेकिन तभी शाहिद का परिवार घर आ गया। उन लोगों ने मामले को रफा-दफा करने को कहा। हालाँकि पीड़ित परिवार ने जब नहीं सुनी तो रिपोर्ट के मुताबिक अलाउद्दीन शेख, तस्लीम शेख, लाखन शेख, आजाद शेख, शहजाद शेख सहित आरोपित के घर के 15-16 सदस्यों ने मिलकर मारपीट की। साथ ही धमकी भी दी।

इसी घटना के बाद 18 अगस्त को पंचायत हुई थी। पंचायत में जब बच्ची ने सुना कि उसके साथ जो हुआ उसकी कीमत लग रही है तो उसने आहत होकर अपनी जान दे दी। सुबह जब घरवाले उठे और कमरे में झांक कर देखा तो बच्ची फंदे पर लटकी थी। अब पुलिस ने इस मामले में मृतिका की माँ की शिकायत पर शाहिद अनवर समेत उसके परिजनों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। जल्द ही आरोपितों को गिरफ्तार करने का आश्वासन भी दिया गया है।

बाबू लाल मरांडी ने उठाए सवाल

बाबू लाल मरांडी ने इस घटना की बाबत अपने पोस्ट में लिखा- “संथाल परगना की एक और बेटी दुष्कर्म की भेंट चढ़ गई। शाहिद अनवर नाम के दरिंदे ने साहिबगंज की 15 वर्षीय नाबालिग युवती से दुष्कर्म किया, जिससे आहत होकर पीड़िता ने अपनी जान दे दी।”

उन्होंने दुमका की घटना, साहिबगंज की में हुई रूह कंपा देने वाली हैवानियत का जिक्र करते हुए कहा, “इस घटना ने फिर से जख्मों को कुरेदने का काम किया है… दिलदार अंसारी, मो. शाहरुख, शाहिद अनवर जैसे कौम विशेष के दरिंदे गरीब जनजातीय लड़कियों को हवस का शिकार बना रहे हैं। बेटियों को कभी पेट्रोल डालकर जिंदा जलाया जा रहा है, तो कभी टुकड़ों में काटकर फेंक दिया जा रहा है।”

उन्होंने कहा, “पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की बजाय मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और झारखंड मुस्लिम मोर्चा की सरकार वहशी दरिंदों को बचाने के लिए हमेशा आगे आई है। मुसलमानों का वोटबैंक खिसकने के डर से हेमंत सोरेन ने कभी भी खुलकर इन शर्मनाक घटनाओं की निंदा तक नहीं की, आरोपितों पर कठोर कारवाई करना तो दूर की बात है।”

उन्होंने गौर कराया, “ताजा प्रकरण में भी मुख्य आरोपित शाहिद अनवर और उसके परिवार के 15- 16 सदस्यों ने पीड़िता और उसके घरवालों के साथ मारपीट कर बर्बाद करने की धमकी दी, फिर आराम से सभी फरार भी हो गए। एकसाथ आरोपित का पूरा परिवार बिना पुलिस प्रशासन के मिलीभगत और सरकार के संरक्षण के फरार नहीं हो सकता। जनजातीय समाज को समझना होगा कि मुसलमानों की गोद में बैठकर राजनीति करने वाले हेमंत कभी भी जनजातीय बेटियों को न्याय नहीं दिला सकते। जनजातीय समाज को अपनी बेटियों की इज्जत बचाने के लिए खुद आगे आना होगा।”

पाकिस्तान के चीफ जस्टिस का सिर काटने पर 1 करोड़ रुपए, इस्तीफे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में घुसी ‘भीड़’: ईशनिंदा में अहमदिया व्यक्ति को बरी करने से भड़के इस्लामी कट्टरपंथी

पाकिस्तान के चीफ जस्टिस काजी फैज ईसा के सिर पर 1 करोड़ का ईनाम रख दिया गया है, जिन्होंने एक अहमदिया व्यक्ति मुबारकी सानी को ‘राइट टू रिलीजन’ के तहत ‘ईशनिंदा’ के आरोपों से बरी कर दिया था। यही नहीं, अब हजारों कट्टरपंथियों की भीड़ सुप्रीम कोर्ट में घुस आई है और चीफ जस्टिस काजी फैज ईसा के इस्तीफे की माँग कर रही है। उन्हें पीछे ढकेलने के लिए वॉटर कैनन और लाठीचार्ज का सहारा लेना पड़ा है।

काजी फैज ईसा पिछले साल ही पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस नियुक्त किए गए थे, लेकिन फरवरी 2024 में उनके एक फैसले की वजह से आज उनकी जान पर बन आई है। इस मामले में उन्होंने फरवरी में उसकी सजा पर रोक लगाई थी और फिर 29 मई को मामले की सुनवाई पूरी करते हुए फैसला सुरक्षित रख लिया था। उनके साथ सुप्रीम कोर्ट की बेंच में जस्टिस इरफान सआदत खान और जस्टिस नईम अख़्तर अफगान भी शामिल थे।

ताजा विरोध प्रदर्शन 24 जुलाई को शुरू हुए, जब उन्होंने इस मामले में पंजाब सरकार की याचिका स्वीकार कर ली। इसके साथ ही कई इस्लामी संगठनों ने भी याचिकाएँ दायर की और सुप्रीम कोर्ट से अपने फैसले की समीक्षा की माँग की। इन मामलों में सुनवाई 22 अगस्त 2024 को होगी, लेकिन उससे पहले ही हजारों कट्टरपंथियों की भीड़ ने इस्लामाबाद के अति सुरक्षित रेड-जोन को पार कर लिया और सुप्रीम कोर्ट के बाह पड़ाव डालकर प्रदर्शन शुरू कर दिया है।

इस्लामिक कट्टरपंथियों की नाराजगी की वजह

जानकारी के मुताबिक, 19 अगस्त 2024 को इस्लामिक कट्टरपंथियों के बड़े समूह ने इस्लामाबाद के आत्यधिक सुरक्षित माने जाने वाले रेड-जोन की सुरक्षा को तोड़ दिया और सुप्रीम कोर्ट के गेट पर धावा बोल दिया। इस्लामिक कट्टरपंथियों की माँग है कि चीफ जस्टिस तुरंत इस्तीफा दें। दरअसल, फरवरी के फैसले में जस्टिस ईसा ने अहमदिया व्यक्ति मुबारक अहमद सानी को जमानत दे दी थी, जिस पर साल 2019 में ईशनिंदा का आरोप लगा था। उसने अहमदियों से जुड़े पर्चे बाँटे थे। सानी को पंजाब पवित्र कुरान (प्रिंटिंग एंड रिकॉर्डिंग) (संसोधन) एक्ट, 2021 के तहत सजा सुनाई गई थी।

हालाँकि जस्टिस ईसा की अगुवाई में तीन सदस्यीय बेंच ने कहा कि सानी को उस कानून के तहत सजा दी गई है, जो साल 2021 से पहले थी ही नहीं। इसके बाद कोर्ट ने सानी को जमानत देते हुए उसकी तुरंत रिहाई का आदेश दिया था। इसके तुरंत बाद तहरीक-ए-लब्बैक-पाकिस्तान और अन्य इस्लामिक संगठनों ने काजी फैज ईसा के खिलाफ नफरती अभियान चलाना शुरू कर दिया। फरवरी 2024 में पेशावर में 3 हजार से अधिक इस्लामिक कट्टरपंथियों ने रोड़ ब्लॉक करके ‘कादियानों को मौत’ के नारे लगाए। इस प्रदर्शन के बाद सुप्रीम कोर्ट को बाकायदा बयान जारी कर अपने फैसले पर सफाई देनी पड़ी थी।

चीफ जस्टिस का सर काटने पर 1 करोड़ का ईनाम

पाकिस्तान के कट्टरपंथी इस्लामी संगठन तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) ने पाकिस्तान के चीफ जस्टिस ईसा के सिर पर 1 करोड़ का ईनाम घोषित किया है। टीएलपी के दूसरे नंबर के नेता पीर जहीरुल हसन शाह ने ये ईनाम घोषित किया। उसने अपने बयान में कहा, “टीएलपी को छोड़िए, एक मोमिन और प्रोफेट मोहम्मद का गुलाम होने के तौर पर, मैं अपनी हैसियत से घोषणा करता हूँ कि जो फैज ईसा का सिर कलम करेगा, उसे मैं 1 करोड़ रुपए दूँगा।” उसने अहमदियों को मरजई भी कहा।

इस बीच, सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने शाह की भड़काऊ टिप्पणी का एक वीडियो साझा किया और कहा, “पाकिस्तान राज्य में इस तरह के बयानों के लिए कोई जगह नहीं है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। काजी साहब ने किसी समूह या समूह के पक्ष में कोई फैसला नहीं दिया। जिस आधार पर यह घृणित कथा प्रचारित की जा रही है, हम इस तरह के बयानों की कड़ी निंदा करते हैं और इसका पुरजोर खंडन करते हैं, ऐसी मानसिकता पाकिस्तान को गंभीर नुकसान पहुँचा रही है। इस झूठे नरेटिव के पीछे राजनीतिक मकसद हैं।”

गौरतलब है कि पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय के लोगों को 1974 में राज्य द्वारा औपचारिक रूप से गैर-मुस्लिम घोषित किए जाने के बाद से ही गंभीर उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है और उनके खिलाफ नियमित रूप से ईशनिंदा कानून का इस्तेमाल किया जाता है। यहाँ अहमदिया समुदाय को काफिर माना जाता है। ये विडंबना ही है कि जिस अहमदिया समुदाय ने पाकिस्तान के निर्माण में सबसे ज्यादा अहम भूमिका निभाई थी, आज वही पाकिस्तान में गैर-मुस्लिम हो गए हैं। वैसे, इस्लामिक कट्टरपंथियों के दबाव की वजह से सुप्रीम कोर्ट बैकफुट पर दिख रहा है। ऐसे में इस बात की संभावना कहीं अधिक है कि सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले को बदल दे और आरोपित अहमदिया व्यक्ति को फिर से जेल में डाल दे।

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