Home Blog Page 887

‘PM मोदी के शपथग्रहण समारोह में जाना सम्मान का विषय, ये ऐतिहासिक क्षण’: लाइन पर आ गए मालदीव के राष्ट्रपति मुहम्मद मुइज्जु

मालदीव के राष्ट्रपति मुहम्मद मुइज्जु भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे शपथग्रहण समारोह में शामिल होंगे, उन्होंने भारत का न्योता स्वीकार कर लिया है। ये इसीलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब इस साल की शुरुआत में लक्षद्वीप गए थे तो मालदीव नाराज़ हो गया था क्योंकि भारतीय पर्यटकों को पता चला कि मालदीव जितना सुंदर स्थल उनके अपने ही देश में है। अब एक बार फिर से दोनों देशों के संबंध सामान्य हुए हैं और ‘मोदी 3.0’ में ये हो रहा है।

नरेंद्र मोदी के लगातार तीसरी बार शपथ लेने को मालदीव के राष्ट्रपति मुहम्मद मुइज्जु ने ऐतिहासिक क्षण करार दिया। उन्होंने शनिवार (8 जून, 2024) को कहा कि ये दिखाता है कि द्विपक्षीय संबंध सही दिशा में जा रहे हैं। बता दें कि रविवार को शाम सवा 7 बजे नरेंद्र मोदी नई मंत्रिमंडल के साथ शपथ लेने वाले हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू उन्हें शपथ दिलाएँगी। मालदीव में भारत के हाई कमिश्नर मनु माहवार ने मुहम्मद मुइज्जु से मिल कर उन्हें आमंत्रण-पत्र सौंपा।

हाई कमिश्नर ने इस दौरान मालदीव के राष्ट्रपति मुहम्मद मुइज्जु को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से शुभकामनाएँ दी और उनसे कहा कि पीएम मोदी इस अत्यंत महत्वपूर्ण समारोह में शामिल होने के लिए उन्हें आमंत्रित किया। इस पर मुहम्मद मुइज्जु ने कहा कि ये उनके लिए सम्मान की बात है कि वो इस समारोह में शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि वो भारत के साथ अपने रिश्तों को मजबूत कर के भारत-मालदीवर रिश्ते को और सकारात्मक दिशा देने के लिए प्रयास करेंगे।

इस दौरान राष्ट्रपति मुहम्मद मुइज्जु ने ने भारत का हाई कमिश्नर को इसके लिए धन्यवाद दिया कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से आकर उन्हें आमंत्रण दिया है। इससे पहले मुहम्मद मुइज्जु ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनकी जीत पर शुभकामनाएँ भी दी थी। 17 नवंबर, 2023 को दोबारा सत्ता सँभालने के बाद ये पहला मौका होगा जब वो भारत दौरे पर आएँगे। लक्षद्वीप विवाद के दौरान पीएम मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी के लिए निलंबित कर दिया गया था।

मस्जिद में पढ़ाने के बहाने घर से ले गया छोटी बहन को, फिर गला घोंट कर मार डाला: होमगर्ड जवान के नाबालिग बेटे की करतूत का UP पुलिस ने किया खुलासा

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में एक भाई ने अपनी बहन की हत्या कर दी। आरोपित और मृतका दोनों ही नाबालिग हैं। इनके अब्बा उत्तर प्रदेश होमगार्ड विभाग में ड्यूटी करते हैं। हत्या के लिए आरोपित अपनी बहन को मस्जिद में पढ़ाने का बहाना बना कर साथ ले गया था। बाद में लड़की की लावारिश लाश बरामद हुई थी। आरोपित भाई अपनी बहन से अम्मी-अब्बू से अपने बारे में शिकायत करने से नाराज रहता था। घटना मंगलवार (4 जून, 2024) की है। आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस मामले की जाँच कर रही है।

यह घटना बागपत जिले के थाना क्षेत्र बिनौली की है। यहाँ के रहने वाले एक व्यक्ति ने 4 जून को पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई। शिकायत में पीड़ित ने बताया कि उनकी 7 वर्षीया बेटी अपने भाई के साथ बड़ी मस्जिद में गई थी। थोड़े समय बाद वह भाई को बताया कि वो अकेले घर जा रहा रही। काफी देर तब पीड़िता घर नहीं पहुँची तो परिजनों को चिंता हुई। उत्तर प्रदेश होमगार्ड विभाग में काम करने वाले लड़की के अब्बा ने पुलिस में शिकायत दी। पुलिस ने IPC की धारा 363 के तहत FIR दर्ज कर के जाँच शुरू कर दी।

पुलिस लड़की की तलाश में अभी जुटी थी थी कि 5 जून (बुधवार) को एक नाबालिग लड़की का लावारिश शव पड़े होने की सूचना मिली। जब इस शव की शिनाख्त करवाई गई तो यह 1 दिन पहले मस्जिद से वापसी में लापता हुई लड़की का निकला। फ़ौरन ही केस में हत्या की धारा IPC 302 लगाई गई। कातिलों को पकड़ने के लिए पुलिस ने प्रयास भी शुरू कर दिए। लड़की के नाबालिग भाई से भी पूछताछ की गई तो उसके जवाब संदिग्ध लगे। एक CCTV फुटेज में आरोपित अपनी बहन को सुनसान रास्ते पर ले जाता दिखा। इस से पुलिस का शक मृतका के भाई पर बढ़ गया।

कुछ ही समय की पूछताछ में नाबालिग आरोपित टूट गया और उसने अपनी बहन की हत्या करना कबूल कर लिया। आरोपित भाई ने पुलिस को बताया कि उनकी बहन आए दिन अम्मी-अब्बा से उसकी शिकायत किया करती थीं। इस वजह से आरोपित को कई बार घर में डाँट पड़ती थी। 4 जून को लड़के के अब्बा भी घर पर नहीं थे और उसकी अम्मी भी कहीं बाहर चली गईं। जब लड़के की अम्मी लौटीं तब लड़की ने एक बार फिर अपने भाई की शिकायत की। शिकायत में मृतका ने बताया कि उनके भाई ने उन्हें मारा है।

इस शिकायत पर एक बार फिर से आरोपित को बहुत डांट पड़ी। उसने अपनी बहन को मार डालने का मन बना डाला। 4 जून को आरोपित अपनी बहन को मस्जिद में पढ़ाने के बहाने घर से बाहर ले गया। यहाँ उसने अपनी बहन के दुपट्टे को हथियार बनाया और इसी से उसका गला घोंट दिया। लाश फेंक कर वह अनजान बन कर घर आ गया। आखिरकार पुलिस ने सच्चाई का पता लगा लिया और आरोपित भाई को हिरासत में ले लिया। आरोपित को बाल सुधार गृह भेज दिया गया है। जाँच में यह भी पता चला कि मृतका और उसका भाई अपने अम्मी-अब्बू द्वारा अलग-अलग मौकों अलग-अलग जगहों से गोद लिए गए थे।

सपा की इकरा हसन की जीत के बाद सैकड़ों समर्थकों का उपद्रव, सड़क भी कर दिया जाम: अब यूपी पुलिस ने 110 के खिलाफ दर्ज की FIR, शोर मचा कर बाइक से स्टंट

लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश के शामली जिले की कैराना सीट से समाजवादी पार्टी की इकरा हसन ने जीत दर्ज की है। उन्होंने निकटतम प्रतिद्वंदी भाजपा के प्रदीप चौधरी को हराया है। इकरा हसन की जीत के बाद उनके सैकड़ों समर्थकों ने गुरुवार (4 जून, 2024) को विजय जुलूस निकाल कर सड़कों पर उपद्रव किया था। इस उपद्रव के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं जो पुलिस तक पहुँच गए। अब शामली पुलिस ने शनिवार (8 जून) को 110 उपद्रवियों के खिलाफ FIR दर्ज कर के उनकी पहचान के प्रयास शुरू कर दिए हैं।

यह मामला शामली के थानाक्षेत्र आदर्श मंडी का है। यहाँ तैनात सब इंस्पेक्टर विनय कुमार ने अपने ही थाने में तहरीर दी है। तहरीर में उन्होंने बताया कि 8 जून को उनके मोबाइल में व्हाट्सएप के जरिए एक वीडियो आई। यह वीडियो मतगणना के दिन यानी 4 मई का निकला। वीडियो में एक सड़क पर जा रहे कुछ लोगों को शोर मचाते और मार्ग में रुकावट डालते देखा गया। आरोप है कि वाहनों से स्टंट किए गए। पुलिस ने इसे आचार संहित का उल्लंघन माना है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है।

स्टंट के वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं। इसमें बिना वजह कई लोगों को हॉर्न बजाते सुना जा सकता है। बाइक सवार जोर-जोर से शोर मचा रहे हैं। पुलिस के मुताबिक भीड़ में 110 के आसपास लोग मौजूद थे। अभी तक इनकी पहचान नहीं हो पाई है। CCTV फुटेज व गाड़ियों के नंबर इत्यादि से पुलिस आरोपितों तक पहुँचने के प्रयास में जुटी है। अब तक 110 अज्ञात व्यक्तियों पर IPC की धारा 188, 143 और 341 के साथ लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 126 ख के तहत FIR दर्ज की गई है। फिलहाल अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हो पाई है।

गौरतलब है कि शामली के पड़ोसी जिले सहारनपुर में भी इसी प्रकार का मामला सामने आया था। तब कॉन्ग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद की जीत का जश्न मनाने वाली एक भीड़ ने सड़कों पर हुड़दंग किया था। महिलाओं को अश्लील इशारे तक हुड़दंगियों ने किए थे। पुलिस ने इस मामले में भी FIR दर्ज कर की है। आरोपितों को चिह्नित कर के आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

छत्रपति शिवाजी महाराज और BR आंबेडकर के नाम पर झूठ, मराठा आरक्षण की आग, एक फिल्म और केंद्र सरकार को लेकर भ्रम: चुनाव से पहले महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस का खतरनाक खेल

महाराष्ट्र में नवंबर 2024 में विधानसभा चुनाव होना है। भाजपा लोकसभा चुनाव में राज्य में झटका मिलने के कारण ज़रूर तनाव में होगी, लेकिन उधर झूठ को हथियार बना कर I.N.D.I. गठबंधन वालों ने सत्ता हथियाने के लिए अपना अभियान शुरू कर दिया है। इसके लिए न सिर्फ छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे युगपुरुष, बल्कि दलितों में पैठ बनाने के लिए बाबासाहब भीमराव आंबेडकर के नाम का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। साथ ही मनोज जरांगे के नेतृत्व वाले मराठा आरक्षण आंदोलन को भी इसके लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

महाराष्ट्र में क्षेत्रवाद की आग बालासाहब ठाकरे के ज़माने से ही भड़कती रही है, जब यूपी-बिहार वालों के खिलाफ शिवसेना-मनसे घृणा फैलाती थी। राज्य में जब भाजपा की सरकार बनी, तब इसमें कमी आई। हालाँकि, अब साजिश है कि फिर से राज्य को आंदोलनों में झोंक दिया जाए और केंद्र व प्रदेश सरकारों के खिलाफ जनता को सड़क पर लाकर अशांति व अराजकता का माहौल बना दिया जाए। I.N.D.I. गठबंधन वालों ने देख लिया है – दुष्प्रचार और अराजकता उनकी सफलता की गारंटी बन रही है।

महाराष्ट्र: 2019 और 2024 के चुनावी आँकड़ों का विश्लेषण

हम बात करेंगे कि कैसे कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपना दुष्प्रचार अभियान शुरू कर दिया है, लेकिन उससे पहले डेटा देखना ज़रूरी है। ताज़ा लोकसभा चुनावों की बात करें तो महाराष्ट्र की 48 में से 30 सीटें जीत कर I.N.D.I. गठबंधन उत्साह में है। चुनाव में एक निर्दलीय की जीत हुई है, लेकिन सांगली से चुने गए विकास प्रकाशबापू पाटिल कॉन्ग्रेस के ही बागी हैं। अगर वो लौटते हैं तो महाराष्ट्र में I.N.D.I. गठबंधन की सीटें 31 तक पहुँच जाएगी और देश में कॉन्ग्रेस तिहाई आँकड़े को छुएगी।

महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस को 13, शिवसेना (UBT) को 9 और NCP (SP) को 8 सीटें आई हैं। वहीं NDA की बात करें तो भाजपा को मात्र 9 सीटें ही मिली, वहीं उसके सहयोगी दलों बालसाहेबांची शिवसेना ने 7 और NCP (अजीत पवार गुट) मात्र 1 सीट ही जीत सकी। शिवसेना और NCP टूट चुकी है और इसका एक-एक धड़ा सत्तापक्ष और विपक्ष के साथ है। कुल मिला कर राज्य में I.N.D.I. गठबंधन 30 और NDA ने 17 सीटें अपने नाम की। अब देखते हैं 2019 में क्या हुआ था।

2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने अकेले 23 सीटें अपने नाम की थी, जबकि अखंडित शिवसेना ने तब 18 सीटें जीती थीं। इस तरह NDA का आँकड़ा तब 41 का था, जो अब 17 हो गया है। वहीं कॉन्ग्रेस को सिर्फ 1 सीट ही मिल सकी थी, जबकि अखंडित NCP ने 4 सीटें अपने नाम की थीं। इस तरह I.N.D.I. गठबंधन सीधा 5 से 31 तक पहुँच गया। यानी, महाराष्ट्र में पासा पलट गया है। लेकिन, हमें इससे पहले ये भी देखना होगा कि वोट शेयर क्या कहते हैं।

अगर हम वोट शेयर पर नज़र डालें तो 10 सीटें ऐसी हैं जहाँ NDA को 5% या उससे कम अंतर से हार मिली है। अमरावत, बीड, धुले और मुंबई नॉर्थ-सेन्ट्रल में हार का आँकड़ा 2% से भी कम रहा। 26.18% वोट शेयर के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है, जबकि कॉन्ग्रेस 16.92% के साथ दूसरे स्थान पर है। कुल वोट शेयर की बात करें तो I.N.D.I. गठबंधन और NDA के वोट शेयर का अंतर मात्र 1.18% ही है। सतारा और रत्नागिरी, इन दोनों सीटों पर भाजपा पहली बार जीती। शिवसेना के गढ़ रहे कोंकण में भाजपा ने 6 में से 5 सीटें अपने नाम की।

दुष्प्रचार और अराजकता के सहारे कॉन्ग्रेस का विधानसभा अभियान

कॉन्ग्रेस पार्टी ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस किया। कॉन्ग्रेस के मीडिया एवं पब्लिसिटी विभाग के अध्यक्ष पवन खेड़ा ने दावा किया कि भाजपा ने महाराष्ट्र में हार की खीझ में संसद भवन परिसर से छत्रपति शिवाजी महाराज और बाबासाहब भीमराव आंबेडकर की प्रतिमाओं को हटा दिया है। क्या कोई भी पार्टी इतनी मूर्ख हो सकती है कि इन दोनों हस्तियों की मूर्तियाँ हटा दें, वो भी चुनाव से पहले? लेकिन नहीं, कॉन्ग्रेस ने भाजपा को लेकर नकारात्मक माहौल बनाने के लिए ऐसा दावा किया।

जबकि सच्चाई यह थी कि इन मूर्तियों को पुराने संसद भवन से नए संसद भवन परिसर में स्थानांतरित किया जा रहा था। सितंबर 2023 में ही नए संसद भवन की इमारत का उद्घाटन हुआ है, ऐसे में वर्षों से चल रही पुरानी संसद भवन परिसर से चीजों को नए संसद भवन में लेकर रखा जा रहा है। न सिर्फ छत्रपति शिवाजी महाराज, बल्कि महाराणा प्रताप और बिरसा मुंडा की मूर्तियाँ भी नए संसद भवन में लाई गईं। कॉन्ग्रेस के कम्युनिकेशन इंचार्ज जनरल सेक्रेटरी जयराम रमेश ने इसे अत्याचार करार दिया।

लोकसभा सेक्रेटेरिएट ने भी बयान दिया कि इन महान हस्तियों की मूर्तियों को सम्मानपूर्वक नए संसद भवन में लाया जा रहा है। सोचिए, जब तक सच्चाई सामने आती है झूठ मीलों का सफर तय कर चुका होता है। छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म पुणे के जुन्नर में हुआ था, जबकि BR आंबेडकर का परिवार मूल रूप से रत्नागिरी के आंबडवे से था। बॉम्बे नॉर्थ और भंडारा से उन्होंने चुनाव भी लड़ा था। छत्रपति शिवाजी महाराज ने मराठा साम्राज्य की नींव रखी। ऐसे में महाराष्ट्र में ये दोनों बहुत ही सम्मानित हस्ती हैं।

अब कॉन्ग्रेस अपनी ये सच्चाई तो लोगों को बता नहीं सकती कि 1952 में बॉम्बे नॉर्थ से उसी ने बाबासाहब भीमराव आंबेडकर के निजी सचिव रहे नारायण सदोबा काजरोलकर को उतार कर उन्हें लोकसभा पहुँचने से रोक दिया था। जबकि 1957 में भंडारा से कॉन्ग्रेस के ही भाऊराव बोरकर ने उन्हें हराया था। वहीं जनसंघ (अब भाजपा) ने दोनों ही चुनावों में भीमराव आंबेडकर का समर्थन किया था। इस सच्चाई को छिपाने के लिए कॉन्ग्रेस को झूठ बोलना ही पड़ेगा कि भाजपा ने बाबासाहब की मूर्ति हटवा दी।

बार-बार उखाड़ा जाता है मराठा आरक्षण का मुद्दा

मराठा आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है, जिसे लेकर कई बार आंदोलन हो चुके हैं। अभी नई सरकार का गठन हुआ नहीं कि एक बार फिर से आंदोलन शुरू कर दिया गया है। इस बार आंदोलन का नेतृत्व मनोज जरांगे पाटिल कर रहे हैं, जो पिछली बार भी धरने पर बैठे थे। अप्रैल के बाद अब जून में उन्होंने पुलिस से अनुमति न मिलने के बावजूद आमरण अनशन शुरू कर दिया है। उन्होंने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव लड़ने का भी ऐलान कर दिया है।

ऐसा नहीं है कि इस माँग को लेकर भाजपा हाथ पर हाथ धरे बैठी रही, महाराष्ट्र सरकार ने फरवरी 2024 में ही एक विशेष सत्र बुला कर 10% मराठा आरक्षण की व्यवस्था की थी, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट में इसे चुनौती दे दी गई। फरवरी में भी मनोज जरांगे पाटिल ने 17 दिनों का अनशन किया था। अब उनका कहना है कि OBC कोटा के अंतर्गत आरक्षण दिया जाए। मराठा आरक्षण के नाम पर हुई हिंसा की जाँच के लिए महाराष्ट्र सरकार SIT का गठन भी कर चुकी है।

इसे संयोग कहें या कुछ और, ‘संघर्ष योद्धा मनोज जरांगे पाटिल’ नामक फिल्म भी 14 जून को आने वाली है। इसे महाराष्ट्र में जगह-जगह दिखाए जाने की योजना है। महाराष्ट्र के बड़े थिएटर कलाकार मकरंद देशपांडे को इसमें लिया गया है। फिल्म का एक गाना भी आ चुका है, जो छत्रपति शिवाजी महाराज पर है। फिल्म के क्रू ने सेंसर बोर्ड पर फिल्म की रिलीज रोकने का भी आरोप लगाया था, जबकि राजनीतिक कंटेंट होने के कारण आदर्श आचार संहिता लागू होने के कारण इसे रोका गया।

अक्टूबर 2018 में भी जब महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा की सरकार थी, तब औरंगाबाद में मराठा आरक्षण के लिए बड़ा मार्च निकाला गया था। उससे पहले जब कॉन्ग्रेस-NCP की सरकार थी तब 16% रिजर्वेशन की व्यवस्था की गई, लेकिन उच्च न्यायालय ने इसे रोक दिया। देवेंद्र फडणवीस की सरकार ने भी विधानसभा में बिल पारित कराया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय पीठ ने इस पर स्टे लगा दिया। महाराष्ट्र में इसके लागू होने से आरक्षण 68% हो जाएगा, जो 50% की सीमा से अधिक है और संविधान के खिलाफ बताया जाता है।

अब विधानसभा चुनाव से ऐन पहले फिर से ये मुद्दा उखाड़ा गया है। क्या मराठा आंदोलन के नाम पर एक बार फिर से हिंसा की तैयारी है? इसके लिए फंडिंग कहाँ से आ रही है? कॉन्ग्रेस पार्टी को अराजकता से कोई गुरेज नहीं, इसमें उसे अपना फायदा ही दिखता है। अगर हम दिल्ली में हुए किसान आंदोलन और शाहीन बाग़ को देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि इन्हीं अराजक आन्दोलनों के सहारे पार्टी सत्ता में अपनी वापसी की राह देख रही है। क्या जनता इतना समझ पाएगी, या इनकी साजिश सफल होगी?

महाराष्ट्र: जनता को भ्रम में रखने की साजिश में कॉन्ग्रेस

अब देखिए, कॉन्ग्रेस की योजना क्या है। केंद्र में 300 से भी अधिक सीटों के साथ NDA की सरकार है। नीतीश कुमार की JDU और चंद्रबाबू नायडू की TDP ने साफ़ कर दिया है कि उनका नरेंद्र मोदी को पूर्ण समर्थन है। 7 सीटों वाली शिवसेना (शिंदे गुट) और 5 सीटों वाली RLJP है ही। लेकिन, महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस के प्रभारी रमेश चेन्निथला ने नेताओं को जनता में ये भ्रम फैलाने का आदेश दिया है कि केंद्र में एक अस्थिर सरकार है और वो कभी भी गिर सकती है।

ये उस पार्टी का नेता कह रहा है, जिसने 2004 में 145 और 2009 में 206 सीटों के साथ सरकार चलाई थी। कॉन्ग्रेस के नव-निर्वाचित सांसदों को महाराष्ट्र में ये अनिश्चितता फैलाने के लिए लगा दिया गया है कि केंद्र सरकार कितने दिन चल पाएगी इस पर संशय है। भ्रम, संशय, अशांति, अराजकता, झूठ – अब यही महाराष्ट्र में ही नहीं बल्कि पूरे देश में कॉन्ग्रेस के हथियार बन गए हैं। भाजपा को इससे निपटना होगा। महाराष्ट्र में वैसे भी राजनीति खिचड़ी हो गई है – 2 दल टूटे हैं जिनके एक का परिवार भी टूटा है, सत्ताधारियों को मात मिली है, विपक्ष जीता है।

जाट कॉलोनी में हिन्दू लड़कियों के नितंब पर हाथ मारता था सलमान, UP पुलिस ने दबोचा: अब अपने पाँव पर नहीं हो पा रहा खड़ा

उत्तर प्रदेश की मुजफ्फरनगर पुलिस ने शुक्रवार (7 जून 2024) को एक नाबालिग हिंदू लड़की से छेड़खानी करने के आरोपित सलमान को गिरफ्तार कर लिया। आरोपित जिले में हिन्दू लड़कियों को छेड़ने और उनके साथ अश्लील हरकत करने के लिए कुख्यात है। सलमान की गिरफ्तारी और उसके द्वारा की गई छेड़खानी की घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

वीडियो में दिख रहा है कि बाइक से जा रहा सलमान सुनसान जगह पर अकेली जा रही एक लड़की के नितम्ब पर हाथ मारता है। यह घटना मुज़फ्फरनगर के थाना क्षेत्र सिविल लाइंस की है। गिरफ्तारी के बाद पुलिस हिरासत का एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें सलमान अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पा रहा है और पुलिस वालों के कंधे पर झूलता नजर आ रहा है।

घटना का वीडियो गुरुवार (6 जून) को सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। इसमें हीरो होंडा की स्प्लेंडर बाइक पर सवार एक व्यक्ति को जाट कॉलोनी में अकेली जा रही एक हिन्दू लड़की के नितम्ब पर हाथ मार कर भागते देखा गया। 16 वर्षीया पीड़िता मुज़फ्फरनगर में ही जूडो-कराटे का प्रशिक्षण ले रही है। पीड़िता के पिता ने बताया कि घटना के बाद उनकी बेटी काफी डरी हुई है।

पुलिस ने वीडियो की पड़ताल की तो आरोपित सलमान निकला। सलमान की तलाश में पुलिस कई टीमों का गठन किया गया। वह 7 जून (शुक्रवार) को कहीं भागने की फिराक में रुड़की चुंगी पर खड़ा दिखा। मुखबिरों से मिली सूचना के आधार पर पुलिस ने तुरंत दबिश दी। पुलिस को देखकर सलमान भागने लगा, लेकिन जवानों ने दौड़कर उसे दबोच लिया। यहाँ से उसे थाने लाकर पूछताछ की गई।

पुलिस प्रेसनोट

सलमान मुज़फ्फरनगर शहर के मुस्लिम बहुल इलाके खालापार का रहने वाला है। कहा जाता है कि वह लम्बे समय से शहर में लड़कियों को परेशान करता था। सलमान न सिर्फ लड़कियों के नितम्बों पर हाथ मारकर भाग जाता था, बल्कि कई बार तो वो अपना प्राइवेट पार्ट खोलकर सार्वजनिक रूप से दिखाने भी लगता था। इस दौरान वह अपनी बाइक के आगे-पीछे वाली नंबर प्लेट पर टेप चिपका लेता था।

सोशल मीडिया पर यह भी दावा किया जा रहा है कि लड़कियों को डराने के लिए सलमान अपने पास तेजाब की बोतल भी रखता था। गिरफ्तारी के बाद पुलिस की हिरासत में सलमान का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। बाइक पर फर्राटे मारने वाला सलमान वायरल वीडियो में 2 पुलिस वालों के कंधे पर लटक कर चलता नजर जा रहा है।

सलमान पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354 (क) के अलावा पॉक्सो एक्ट की धारा 7/8 के तहत भी कार्रवाई की गई है। मुज़फ्फरनगर के एडिशनल एसपी ने सलमान की गिरफ्तारी की पुष्टि की है। मामले में जाँच व अन्य जरूरी कार्रवाई की जा रही है। आरोपित सलमान का अब्बू का नाम गुलजार है।

‘यश चोपड़ा और करण जौहर ने बहुत ठेस पहुँचाया, चीख-चीख कर कहूँगी’: वरिष्ठ अभिनेत्री फरीदा जलाल ने बताई बॉलीवुड की सच्चाई, कहा – बदल जाते हैं लोग

वरिष्ठ अभिनेत्री फरीदा जलाल ने YRF के संस्थापक यश चोपड़ा और ‘धर्म प्रोडक्शंस’ के करण जौहर के ‘धोखे’ को याद किया है। नब्बे के दशक में कई फिल्मों में हीरो-हीरोइन की माँ का किरदार निभा चुकीं फरीदा जलाल को हाल ही में ‘हीरामंडी’ नामक वेब सीरीज में देखा गया था। एक ज़माने में उन्हें वादा कर के भी ‘दिल तो पागल है’ (1997) के बाद काम नहीं दिया गया, जिसके बाद यश चोपड़ा से उनके रिश्ते बिगड़ गए। आदित्य चोपड़ा की पहली फिल्म DDJL (1995) में अहम किरदार निभाया था।

उन्होंने बताया कि ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे’ के बाद उन्हें YRF ने काम नहीं दिया, लेकिन ‘दिल तो पागल है’ के लिए उन्हें यश चोपड़ा ने खुद फोन कर के कहा था कि इसमें उनके लिए एक किरदार है लेकिन आदित्य को लगता है कि वो इसे नहीं करेंगी। तब यश चोपड़ा ने आदित्य चोपड़ा से कहा कि वो फरीदा जलाल से बात करेंगे। इसके बाद यश चोपड़ा ने अनुपम खेर का उदाहरण फरीदा जलाल को दिया, जो किसी भी फिल्म में रोल के लिए हाँ कर देते थे, अपने किरदार की लंबाई नहीं देखते थे।

बकौल फरीदा जलाल, तब यश चोपड़ा ने उनसे कहा कि वो उन्हें या आदित्य को ‘ना’ नहीं कहें, ये सिलसिला चलता रहता है। फरीदा जलाल ने कहा कि उसके बाद उन्हें यश चोपड़ा की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। उन्होंने बताया कि करण जौहर को ये पता था कि उनके साथ गलत हुआ है, इसीलिए उन्होंने ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ में दादी का रोल देने के लिए व्यक्तिगत रूप से उन्हें कॉल किया था। इसके बाद फिर वो खाली हाथ रहीं। फरीदा जलाल ने कहा कि उन्हें काफी ठेस पहुँची है, वो इसे स्पष्ट रूप में और तेज़ आवाज़ में कह सकती हैं।

वरिष्ठ अभिनेत्री ने बताया कि फिल्म इंडस्ट्री में वफादारी इधर से उधर शिफ्ट होती है और लोग भूल जाते हैं। उन्होंने कहा कि रिश्तों को लेकर जुमले दिए गए और उनकी जगह कई रोल में किसी और को कास्ट कर लिया गया। फरीदा जलाल ने कहा कि उन्हें गहरा जख्म लगा है और वो हमेशा इस कारण दुःखी रहेंगी। उन्होंने बताया कि कैसे न सिर्फ यश चोपड़ा, बल्कि करण जौहर की तरफ से भी उन्हें बीच में कोई किरदार नहीं मिला। दोनों ने उन्हें बहुत दुःख पहुँचाया।

मंथन के लिए बुलाई गई बैठक में चलने लगे लात-घूँसे, कॉन्ग्रेस कार्यालय बन गया मैदान-ए-ज़ंग: केरल में BJP के खाता खोलते ही विरोधी खेमे में हाहाकार

केरल के त्रिशूर लोकसभा सीट पर पहली बार भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वार दर्ज की गई जीत कॉन्ग्रेस पार्टी को रास नहीं आ रही है। इसको लेकर शुक्रवार (7 जून 2024) को जिला कार्यालय में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता आपस में भिड़ गए। ऑफिस में एक-दूसरे पर लात-घूँसों की बौछार कर दी गई। भिड़ंत की वजह कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा हार का ठीकरा एक-दूसरे पर फोड़ने की कोशिश बताया जा रहा है।

इस मामले में पुलिस ने कुल 20 कॉन्ग्रेसी नेताओं-कार्यकर्ताओं पर FIR दर्ज करके जाँच शुरू कर दी है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शुक्रवार (7 जून 2024) को जिला कॉन्ग्रेस कार्यालय में कॉन्ग्रेस नेताओं एवं कार्यकर्ताओं की मीटिंग बुलाई गई थी। इस मीटिंग में जिला अध्यक्ष जोशे वल्लूर और महासचिव संजीवन कुरिचिरा भी मौजूद थे।

कुछ ही देर की बातचीत के बाद कुरिचिरा ने जिला अध्यक्ष जोशे वल्लूर और पूर्व कॉन्ग्रेस सांसद टीएन प्रतापन को भाजपा प्रत्याशी से मिली हार के लिए जिम्मेदार बता डाला। खुद पर लगे आरोपों से जिला अध्यक्ष जोशे वल्लूर और उनके समर्थक भड़क गए। इन सभी ने एकजुट होकर जिला महासचिव संजीवन को पीटना शुरू कर दिया।

संजीवन पर लात-घूंसों की बौछार कर दी गई। उनको गंदी-गंदी गालियाँ और धमकियाँ दी गईं। कॉन्ग्रेस मुख्यालय में मौजूद कुछ अन्य लोगों ने जैसे-तैसे संजीवन को उनके ही जिला अध्यक्ष से बचा कर निकाला। इस दौरान किसी शख्स ने इस घटना का वीडियो बना लिया और सोशल मीडिया पर डाल दिया। अब यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

जिला कार्यालय से निकलने के बाद संजीवन ने पुलिस थाने में जाकर जोशे वल्लूर और उनके 19 साथियों पर FIR दर्ज करवा दिया है। उन्होंने हमलावरों पर कड़ी कार्रवाई की माँग की है। पुलिस ने सभी आरोपितों पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न जमानतीय धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। इसके बाद पूरे मामले की जाँच की जा रही है।

बता दें कि त्रिशूर लोकसभा सीट को जीत कर भाजपा ने केरल में पहली बार खाता खोला है। यहाँ भाजपा के सुरेश गोपी ने अपने निकटतम प्रत्याशी सीपीएम के वीएस सुनील कुमार को 74,000 वोटों से हराया है। कॉन्ग्रेस प्रत्याशी मुरलीधरन यहाँ तीसरे नंबर पर रहे। उन्हें कुल 3,28,124 वोट मिले। इस हार के बाद कॉन्ग्रेस प्रत्याशी ने अपने राजनैतिक जीवन से संन्यास की घोषणा कर दी है।

दिनदहाड़े बीच सड़क पर युवती को तलवार से काट डाला: पंजाब में गुरुद्वारे के सामने हुई वारदात का CCTV वीडियो आया सामने, सहेलियों संग ऑफिस जा रही थी मृतका

पंजाब के मोहाली में तलवार से मार कर एक महिला की हत्या कर दी गई है। इस घटना का CCTV वीडियो फुटेज भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। घटना शहर के फेज-5 में स्थित गुरुद्वारा के सामने की है। उक्त युवती अपने 2 सहेलियों के साथ ड्यूटी करने दफ्तर जा रही थी, लेकिन रास्ते में ही उसकी हत्या कर दी गई। हत्यारा नकाब पहन कर आया था। युवती को आनन-फानन में अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसकी मौत हो गई। इस हत्याकांड के बाद क्षेत्र में तनाव का माहौल है।

मृतका फेज-5 में ही एक कॉल सेंटर में नौकरी करती थी, शनिवार (8 जून, 2024) की सुबह भी वो वहीं जा रही थी। उसकी पहचान बलजिंदर कौर के रूप में हुई है। हत्या के समय सुबह के साढ़े 9 बज रहे थे। पुलिस ने हत्यारे को गिरफ्तार कर लिया है। उसे मेडिकल के लिए अस्पताल ले जाया गया। हत्यारा सुखचैन सिंह समराला का रहने वाला है। वो वहीं पर एक पेट्रोल पंप पर काम करता था। वहीं बलजिंदर कौर फतेहगढ़ साहिब के फतेहपुर जट्टां गाँव की रहने वाली है।

वो 9 वर्षों से मोहाली में काम कर रही थी और यहीं रह रही थी। वो प्रतिदिन अप-डाउन करती थी। उसके पिता ने ही उसे बस में बिठाया था। मृतका के भाई ने बताया कि कंपनी के मैनेजर ने फोन कर के घटना की जानकारी दी है। वहीं पंजाब पुलिस का कहना है कि दोनों एक-दूसरे को पहले से जानते थे और किसी बात को लेकर उनमें बहस हुई थी। लेकिन, मृतका के परिवार का कहना है कि सुखचैन के बारे में बलजिंदर ने उन्हें कभी नहीं बताया था।

बताया जा रहा था कि बलजिंदर कौर जैसे ही बस से उतर रही थी, उसी दौरान सुखचैन सिंह तलवार लेकर आ धमका। उसकी दोनों सहेलियाँ उसे बचाने की कोशिश करती रही, लेकिन उसने ताबड़तोड़ कई वार किए। सिविल अस्पताल मोहाली में उसे मृत घोषित किया गया। पंजाब की 'राज्य महिला आयोग' की अध्यक्ष भी अस्पताल पहुँची और घटना की जानकारी ली। पुलिस का कहना है कि इस मामले में अभी आगे की जाँच जारी है, हत्यारे से पूछताछ हो रही है।

‘घृणा फैलाने के लिए गलत इरादे से किया ऐसा’: हाईकोर्ट ने नेहा सिंह राठौड़ के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने से किया इनकार, RSS को ‘पेशाब प्रकरण’ से जोड़ किया था बदनाम

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भोजपुरी गायिका नेहा सिंह राठौड़ के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया है। मध्य प्रदेश के सीधी जिले में एक शख्स द्वारा एक जनजातीय समाज के मजदूर के ऊपर पेशाब करने का वीडियो आया था, जिस पर नेहा सिंह राठौड़ ने आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। उन्होंने इसे RSS से जोड़ा था। जस्टिस गोपाल सिंह अहलूवालिया ने पूछा कि भोजपुरी गायिका ने एक खास विचारधारा की यूनिफॉर्म को इस घटना के साथ क्यों जोड़ा?

उन्होंने जिक्र किया कि इस घटना में शामिल शख्स ने ऐसी ड्रेस नहीं पहन रखी थी, फिर भी नेहा सिंह राठौड़ ने सोशल मीडिया पर कार्टून पोस्ट करते हुए उसके ‘खाकी शॉर्ट्स’ में होने का दावा किया था। जज ने कहा कि ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) और इंस्टाग्राम पर नेहा सिंह राठौड़ द्वारा पलोड किया गया कार्टून इस घटना के तथ्यों के हिसाब से सही नहीं था, उसमें अपने मन से अतिरिक्त चीजें जोड़ दी गई थीं। जज ने कहा कि कोर्ट इस बात को नहीं मानता है कि ये अभिव्यक्ति और बोलने की आज़ादी के तहत आता है।

जस्टिस गुरपाल सिंह अहलूवालिया ने कहा कि एक कलाकार को व्यंग्य के माध्यम से आलोचना करने का अधिकार है, लेकिन एक खास संस्था के ड्रेस का कार्टून में इस्तेमाल कर लेना व्यंग्य नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि बिना किसी सबूत के एक विशेष विचारधारा समूह को इस प्रकरण से जोड़ने की कोशिश की गई। उन्होंने कहा कि ये संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत नहीं आता है और 19(2) के तहत ऐसा करना प्रतिबंधित भी है। नेहा सिंह राठौड़ अक्सर भोजपुरी गायक व उत्तर-पूर्वी दिल्ली से सांसद मनोज तिवारी पर निशाना साधने के लिए जानी जाती हैं।

नेहा सिंह राठौड़ ने CM योगी आदित्यनाथ के खिलाफ ‘यूपी में का बा’ गाकर सुर्खियाँ बटोरी थीं। नेहा सिंह राठौड़ के खिलाफ IPC की धारा-153A (धर्म/जाति/नस्ल के आधार पर विभिन्न समुदायों में वैमनस्य फैलाना) के तहत FIR दर्ज की गई थी। मध्य प्रदेश सरकार ने बताया कि इस पर नेहा सिंह राठौड़ ने आपत्तिजनक कार्टून पोस्ट किया, जिससे तनाव फैला और उन पर NSA (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) भी लगाया गया है। कोर्ट ने माना कि गलत इरादे से घृणा फैलाने के लिए ऐसा किया गया।

जहाँ कर रहे मजदूरी-काम, वहीं से मतदान: 90-95% वोटिंग का हो लक्ष्य, NOTA को लेकर बने कड़ा कानून

लोकसभा चुनाव 2024 के पहले दो चरणों में हुए कम मतदान ने ‘अनिवार्य मतदान’ संबंधी प्रस्ताव को एकबार फिर बहस का विषय बना दिया। हालाँकि, चुनाव आयोग द्वारा थोड़े विलंब से जारी किए गए इन दोनों चरणों के अंतिम आँकड़ों और बाद के चरणों के मतदान प्रतिशत ने इस चिंता को कम कर दिया। वर्तमान चुनाव और लोकसभा चुनाव 2019 और 2014 के मतदान सम्बन्धी आँकड़ों में अब कोई उल्लेखनीय अंतराल नहीं है।

दो चरणों के बाद मतदान प्रतिशत बढ़ाने में भारत के चुनाव आयोग द्वारा चलाए गए जागरूकता अभियान, प्रधानमंत्री मोदी द्वारा बार-बार की गई अपील और राष्ट्रीय सेवा योजना, राष्ट्रीय कैडेट कोर आदि सरकारी-गैरसरकारी संस्थाओं, विविध छात्र संगठनों तथा समाज के प्रबुद्ध और जागरूक वर्ग द्वारा किए गए जनजागरण की उल्लेखनीय भूमिका है।

65 प्रतिशत के आसपास मतदान हालाँकि कोई उत्साहजनक उपलब्धि भी नहीं है। 90-95 प्रतिशत मतदान लोकतंत्र की स्वीकार्यता, सशक्तता और गतिशीलता की आधारभूत शर्त है। भारतीय लोकतंत्र को इस लक्ष्य को पाने के लिए अभी काफी मेहनत-मशक्कत करने की आवश्यकता है। अधिकतम लोगों की सक्रिय और सुनिश्चित भागीदारी ही लोकतंत्र के लक्षित उद्देश्यों की प्राप्ति का आधार है। यह भागीदारी ही लोकतंत्र की जड़ों को व्यापकता और गहराई देकर उसे मजबूती और स्थायित्व देती है।

हमारे पड़ोसी देशों- चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और नेपाल आदि में लोकतंत्र की दुर्दशा से हम अनभिज्ञ नहीं हैं। वहाँ जारी लोकतंत्र का क्षरण उसकी अपर्याप्तता, सीमितता और उसमें जनता की अनास्था का ही परिणाम है। भारत इस मामले में सौभाग्यशाली है कि यहाँ लोकतंत्र इन बुराइयों से बचा हुआ है। परंतु उसे और मजबूत बनाने के लिए मतदान प्रतिशत को 65 प्रतिशत से 90-95 प्रतिशत तक बढ़ाने की जरूरत है।

मतदान सबंधी इस लक्ष्य-प्राप्ति के लिए कुछ ‘थिंक टैंक’ पश्चिमी देशों का उदाहरण देते हए मतदान को अनिवार्य बनाने का सुझाव देते हैं। परन्तु उनके द्वारा प्रस्तावित मतदान की अनिवार्यता लोकतंत्र की मूलभावना के विरुद्ध है। यह भारत के संविधान में प्रदत्त स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का अतिक्रमण होगी। इसे नागरिक कर्तव्यों में हालाँकि अवश्य शामिल किया जा सकता है।

मतदान प्रतिशत बढ़ाने संबंधी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मतदान को अनिवार्य बनाने की जगह कम मतदान के कारणों को चिह्नित करने और उनका व्यावहारिक समाधान करना समीचीन है।

रोटी-रोजगार की खोज में अपने गॉंव-शहर से दूर किसी अन्य गाँँव-शहर में अस्थायी रूप से रहने वालों की संख्या भारत में बहुत अधिक है। कोरोना काल में पहली बार इस संख्या की अधिकता का अंदाजा लग पाया था। इसी प्रकार पढ़ाई के लिए लाखों छात्र-छात्राएँ यूरोप-अमेरिका और लाखों कामकाजी लोग खाड़ी देशों और यूरोप-अमेरिका आदि में प्रवासी हैं। मतदान के लिए उनका अपने गाँव-घर आगमन संभव नहीं हो पाता। उनकी अनुपस्थिति मतदान प्रतिशत को प्रभावित करती है।

मतदान को प्रभावित करने वाले कई प्रमुख कारणों में से एक मतदाताओं का देश-विदेश में प्रवासन है। यह प्रवासन देश के विभिन्न भागों में बहुत बड़ी संख्या में होता है। प्रवासन सरकारी-गैरसरकारी नौकरी, शिक्षा और रोजगार आदि के कारण होता है। उदारीकरण के बाद यह प्रक्रिया बहुत अधिक बढ़ी है।

इन प्रवासी मतदाताओं के लिए सेना की तरह अपने कार्यस्थल से मतदान का विकल्प दिया जाना चाहिए। सैन्य बल और अर्धसैनिक बल के रूप में कार्यरत लाखों भारतीयों को अपने कार्यस्थल (पोस्टिंग की जगह) से ही मतदान करने की सुविधा है। यह सुविधा सभी प्रवासी मतदाताओं को दिए जाने के विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए; क्योंकि वे कई दिन का समय और किराया-भाड़ा लगाकर मतदान के लिए अपने गाँव-घर वापस नहीं जा पाते।

काफी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की भी है, जो मतदान के महत्व से अनभिज्ञ हैं। वे मानते हैं कि उनके मतदान करने या न करने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। इसी प्रकार ऐसे लोगों की संख्या भी काफी अधिक है, जो क्रमशः सिनिकल या यथास्थितिवादी हो गए हैं। उन्हें सभी राजनीतिक दल और नेता ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ या ‘एक ही थैली के चट्टे-बट्टे’ नज़र आते हैं। उन्हें सत्ता परिवर्तन से व्यवस्था परिवर्तन की कोई संभावना नज़र नहीं आती। उनके इस मनोभाव ने उनमें मतदान के प्रति अरुचि पैदा की है। यह दृष्टिकोण नकारात्मक है क्योंकि सभी दलों और नेताओं को एकसमान नहीं माना जा सकता है। लेकिन सभी नेताओं और राजनीतिक दलों को इस दृष्टिकोण के मद्देनजर आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए।

आज लोकतंत्र अपराधियों, भ्रष्टाचारियों और धन-पशुओं की गिरफ्त में हाँफ/काँप रहा है। प्रत्याशियों के चयन हेतु राजनीतिक दल सिर्फ और सिर्फ ‘जिताऊपन’ को पैमाना बनाते हैं। प्रत्याशी की योग्यता, आचार-व्यवहार, सामाजिक-राजनीतिक प्रतिबद्धता का कोई मूल्य-महत्व नहीं है। इसीलिए प्रत्येक राजनीतिक दल में दल-बदलुओं का वर्चस्व है। चुनाव दल-बदल की बाढ़ का मौसम है। ये दल-बदलू चुनाव जीतने के तंत्र और तकनीक को साधने में सिद्धहस्त हैं। इससे संवेदनशील और चिंतनशील मतदाताओं की काफी बड़ी संख्या मतदान को समय की बर्बादी या महत्वहीन मानने लगी है। इस मनःस्थिति से भी मतदान प्रतिशत कम होता है।

राजनीतिक विमर्श और चुनाव प्रचार में प्रयुक्त भाषा-भंगिमा में भी क्रमशः गिरावट आ रही है। निजी आरोप-प्रत्यारोप और हवाई घोषणाएँ भी मतदाताओं को मतदान विमुख करके चुनाव-प्रक्रिया के प्रति उदासीन बना देती हैं। ये बातें मनोरंजन के लिए तो ठीक हो सकती हैं, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवहार/वातावरण के प्रतिकूल हैं। सभी राजनीतिक दलों को एक साथ बैठकर पारस्परिक संवाद करना चाहिए और चुनावी विमर्श के साथ-साथ अपनी भाषा-भंगिमा की भी ‘लक्ष्मण-रेखा’ तय करनी चाहिए। यह मर्यादा लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण होगी।

ऐसे लोगों की चिंता को ध्यान में रखते हुए ही ‘नोटा’ का प्रावधान किया गया है। अभी ‘नोटा’ अप्रभावी और अनुपयोगी है। उसे प्रभावी बनाए जाने की आवश्यकता है। यदि ‘नोटा’ को सबसे ज्यादा मत मिलते हैं तो संबंधित निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे सभी प्रत्याशियों को अगले पाँच साल तक कोई चुनाव न लड़ने की अनिवार्य ‘कूल-इन’ अवधि होनी चाहिए। साथ ही, संबंधित राजनीतिक दलों को पाँच साल तक उस निर्वाचन क्षेत्र से प्रत्याशी खड़ा करने पर रोक लगनी चाहिए।

मौसम की मार से भी मतदान प्रभावित होता है। मई-जून की चिलचिलाती धूप ने इस बार मतदान प्रतिशत को कम किया है। विविधताओं वाले विशाल देश भारत में एकसाथ कई मौसम रहते हैं। इसलिए सबके लिए उपयुक्त एक मौसम चिह्नित करना बड़ा मुश्किल है। फिर भी दीपावली के एकदम आसपास का समय अधिकांश भारतीयों के लिए अनुकूल होगा। बड़ा त्योहार होने के कारण इस अवसर पर प्रवासी प्रायः अपने गाँव-घर आते ही हैं। कम चरणों में मतदान कराते हुए एक बड़ा चरण दीवावली के ठीक पहले और दूसरा बड़ा चरण दीपावली के ठीक बाद कराने से मतदान प्रतिशत में उछाल आने की पूरी संभावना है।

इसके अलावा सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों/संस्थानों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों-औद्योगिक इकाइयों, कॉरपोरेट्स आदि को मतदान करने वाले जागरूक नागरिकों के लिए विविध लाभ, छूटें और सहूलियतें प्रदान करनी चाहिए। निश्चय ही, ये योजनाएँ नागरिकों को मतदान के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित करेंगी। सरकारी कर्मचारियों को मतदान के लिए दिए जाने वाला अवकाश ऐसी ही एक प्रशंसनीय पहल है। इसे अन्य गैर-सरकारी प्रतिष्ठानों, संस्थाओं और संगठनों में भी अनिवार्यतः लागू किया जाना चाहिए। इसी प्रकार मॉलों, शॉपिंग सेंटरों, होटलों-रेस्त्राओं, सिनेमाघरों आदि में मतदान करने वाले नागरिकों को मतदान वाले दिन कुछ प्रतिशत छूट का प्रावधान करके भी लोगों को मतदान के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।

व्यापक सामाजिक प्रभाव वाले सेलेब्रिटीज़, सोशल मीडिया इंफ्लूएन्सरों, स्वयंसेवी संगठनों, शिक्षण संस्थानों को भी नागरिकों को मतदान के महत्व के प्रति जागरूक करते हुए उन्हें मतदान के लिए प्रेरित करना चाहिए। इन सबकी सक्रिय भूमिका और भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग को व्यापक योजना बनानी चाहिए।

पिछले दिनों केंद्र सरकार ने चुनाव सुधार की दिशा में निर्णायक पहल की है। सरकार ने मतदाता पहचान-पत्र को आधार कार्ड से जोड़ने, पंचायत/निकाय चुनावों और विधानसभा/लोकसभा चुनावों की मतदाता सूचियों को एक करने जैसे महत्वपूर्ण कार्य किए हैं।

मतदाता सूचियों को आधार कार्ड से जोड़ने से फ़र्जी मतदाताओं को चिह्नित करने और उनका नाम काटने का काम आसान हो गया है। भारत में अनेक व्यक्तियों का नाम जाने-अनजाने में एकाधिक जगहों पर मतदाता सूची में शामिल होता है। एक मतदाता का नाम कई जगह होने से न सिर्फ ‘एक व्यक्ति एक मत’ के संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन होता है; बल्कि वास्तविक जनादेश का भी हरण हो जाता है। एक व्यक्ति का नाम एकाधिक मतदाता सूचियों में होने से मतदान का प्रतिशत भी कम हो जाता है। मतदाता पहचान-पत्र को आधार कार्ड से जोड़कर फर्जी मतदाताओं का उन्मूलन किया जा सकता है।

मतदाताओं के नाम के दुहराव और मतदाता सूचियों के दुहराव को रोकने के लिए किए गए प्रावधानों की तरह चुनाव-प्रक्रिया के दुहराव को रोकने की दिशा में भी काम किया जाना चाहिए। “एक देश, एक चुनाव” इस दुहराव का सही समाधान है। लोकसभा और विधान सभाओं के चुनाव एकसाथ कराकर श्रम, समय और संसाधनों की बड़ी भारी बचत की जा सकती है। बार-बार होने वाले मतदान की जगह पाँच साल में एकबार होने वाले मतदान के लिए लोग अतिरिक्त श्रम, समय और संसाधन लगाकर भी मतदान के लिए आगे आएँगे और उससे मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी होगी।

मतदान प्रतिशत बढ़ाने की दिशा में प्राथमिकता के आधार पर पहल करने की आवश्यकता है। मतदान लोकतांत्रिक प्रक्रिया का आधार है। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया में नागरिकों के दृढ़ विश्वास और गहरी आस्था का परिचायक है। इस भाव के अभाव में लोकतंत्र न तो सुरक्षित रह सकता है और न ही परिपक्व और विकसित हो सकता है। लोकतंत्र की मूल भावना अधिकतम लोगों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। चुनाव विजेता यही करता है। कम मतदान से लोकतंत्र की यह मूल भावना प्रश्नांकित होती है।