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भारत-मोदी पर उठाए सवाल, ईरान-खामेनेई के लिए दिखाया प्यार…: प्रोपेगेंडा के ‘प्राइम मास्टर’ बने रवीश कुमार, 5 दिन में 6 Video डालकर जानिए क्या नैरेटिव बनाया

प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार ने ईरान को एक 'आदर्श राष्ट्र' और वहाँ के नेताओं को 'मसीहा' की तरह पेश करने में अपनी सारी ऊर्जा लगा दी है। रवीश कुमार ईरान के संदर्भ में 'शहादत', 'पवित्र महीना' और 'नैतिकता' जैसे भावनात्मक शब्दों का सहारा लेते हैं, लेकिन यही संवेदनशीलता इजरायल में मारे गए मासूमों के लिए कहीं नजर नहीं आती।

आजकल डिजिटल मीडिया के दौर में पत्रकारिता के मायने बदल गए हैं, लेकिन कुछ पत्रकारों के लिए यह केवल अपना ‘एजेंडा’ सेट करने का जरिया बन गया है। प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार के हालिया वीडियोज को देखकर ऐसा लगता है कि उनकी निष्पक्षता की परिभाषा अब केवल ‘एकतरफा विरोध’ तक सिमट गई है। बीते 5 दिनों में रवीश कुमार ने अपने यूट्यूब चैनल पर ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष को लेकर 6 वीडियो पोस्ट किए हैं।

गौर करने वाली बात यह है कि जैसे-जैसे दिन बीते, उनकी पत्रकारिता से ‘तथ्य’ गायब होते गए और ‘ईरान के प्रति संवेदना’ बढ़ती गई। इन वीडियोज के जरिए रवीश ने न केवल अमेरिका और इजरायल को विलेन साबित करने की कोशिश की, बल्कि ईरान के कट्टरपंथी शासन का कुछ इस तरह महिमामंडन किया जैसे वे किसी शांतिदूत के पक्ष में खड़े हों।

हमले की आड़ में अमेरिका-इजरायल को घेरने की कोशिश

रवीश कुमार की पहली वीडियो 28 फरवरी को अपलोड की गई थी, जिसका शीर्षक है- ‘अमेरिका-इजरायल का ईरान पर हमला, क्या इस बार बच पाएगा ईरान?’ वीडियो के थंबनेल में उन्होंने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई के साथ बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रंप की तस्वीर लगाई है। थंबनेल का टेक्स्ट ‘ईरान पर हमला’ पाठकों को यह संदेश देने की कोशिश करता है कि ईरान एक पीड़ित मुल्क है जिस पर दो ताकतवर देश मिलकर अत्याचार कर रहे हैं। लेकिन टाइटल में ही ‘क्या इस बार बच पाएगा ईरान’ लिखकर रवीश कुमार ने दर्शकों के मन में ईरान के प्रति एक ‘बेचारा’ वाली छवि गढ़ने की कोशिश शुरू कर दी।

वीडियो के अंदर रवीश कुमार ने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ बेहद आक्रामक शब्दावली का इस्तेमाल किया है। उन्होंने इन देशों की सैन्य कार्रवाई को ‘उत्पाद’, ‘मनमानी’ और ‘कब्जा’ जैसे शब्दों से नवाजा। रवीश ने यहाँ तक कह दिया कि जब पीएम मोदी इजरायल गए थे, तभी से विशेषज्ञों ने इस हमले की भविष्यवाणी कर दी थी- मानो भारत की कूटनीति का एकमात्र लक्ष्य ईरान पर हमला करवाना हो।

वे ईरान की पाँच लड़कियों की मौत का जिक्र तो करते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि ईरान ने भी मिसाइलें दागी हैं। वे सवाल उठाते हैं कि क्या सत्ता परिवर्तन के लिए किसी देश पर बम गिराया जा सकता है? लेकिन वे इस बात पर चुप्पी साध लेते हैं कि ईरान का शासन अपने ही लोगों और पड़ोसी देशों के लिए कितना खतरनाक रहा है। उनके लिए अमेरिका और इजरायल ‘आउट ऑफ कंट्रोल’ हैं, पर ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाएँ शायद उनके लिए ‘शांति मिशन’ हैं।

ईरान के ‘प्रवक्ता’ बने रवीश: मौत को बताया शहादत, भारत की तटस्थता पर प्रहार

रवीश कुमार ने अपनी दूसरी वीडियो का शीर्षक ‘ख़ामेनेई की शहादत, भागे न बंकर में छुपे, मौत को लगाया गले, शिया जगत शोक की लहर’ रखा है। वीडियो के थंबनेल पर बड़े अक्षरों में ‘खामेनेई शहीद’ लिखा गया है। शीर्षक और थंबनेल से ही स्पष्ट है कि रवीश कुमार ने एक विवादास्पद वैश्विक नेता की मृत्यु को मजहबी और भावनात्मक रंग देते हुए उसे वीरता की गाथा के रूप में पेश किया है। ‘शहादत’ जैसे भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग कर वे पहले ही पल से दर्शकों की सहानुभूति ईरान की ओर मोड़ने का प्रोपेगेंडा रच रहे हैं।

वीडियो के भीतर रवीश कुमार ने एक पत्रकार के बजाय ईरान के समर्थक की तरह बात की है। उन्होंने अयातुल्ला खामेनेई की तुलना ’21वीं सदी के कर्बला’ से करते हुए इसे एक महान बलिदान बताया। रवीश ने ट्रंप और नेतन्याहू को ‘विनाश के दरवाजे’ पर खड़ा नेता और ‘बांसुरी बजाने वाला’ करार दिया, जबकि ईरान की सैन्य कार्रवाइयों और क्षेत्रीय तनाव में उसकी भूमिका पर पूरी तरह चुप्पी साध ली। उन्होंने यह नैरेटिव सेट करने की कोशिश की कि खामेनेई मौत से डरे नहीं, बल्कि बहादुरी से उसका सामना किया। वहीं, अमेरिका और इजरायल को ‘अपराधी’ बताते हुए उन्होंने दावा किया कि वे दुनिया की शांति के दुश्मन हैं।

भारत के संदर्भ में, रवीश ने प्रधानमंत्री मोदी और भारत सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए। उन्होंने कटाक्ष किया कि जब दुनिया का इतना बड़ा ‘मजहबी और राजनीतिक’ चेहरा मारा गया, तब भारत का ‘नैतिक कंपास’ कहाँ खो गया? उन्होंने आरोप लगाया कि भारत अब अपनी स्वतंत्र नीति छोड़कर ट्रंप और इजरायल की लाइन पर चल रहा है। रवीश ने यह भी कहा कि मोदी सरकार का यह स्टैंड भारत के व्यापक हितों के खिलाफ हो सकता है क्योंकि भारत में भी बड़ी शिया आबादी रहती है। पूरी वीडियो में उन्होंने ईरान की आक्रामकता को ‘जवाब’ और इजरायल-अमेरिका के हमलों को ‘कायरता’ बताकर अपनी एकतरफा और प्रोपेगेंडाई पत्रकारिता का प्रदर्शन किया है।

मोदी विरोध में अंधे रवीश: देश की कूटनीति पर ‘प्रोपेगेंडा’ प्रहार

रवीश कुमार ने अपनी तीसरी वीडियो का शीर्षक रखा है- ‘क्या मोदी खुलकर ईरान के विरोध में आ गए हैं? सऊदी, बहरीन, UAE और इजरायल को फोन, ईरान को नहीं।’ वहीं थंबनेल पर बड़े अक्षरों में सवाल दागा गया है- ‘क्या भारत ईरान के विरोध में है?’। इस टाइटल और थंबनेल के जरिए रवीश ने वीडियो शुरू होने से पहले ही दर्शकों के मन में यह जहर घोलने की कोशिश की है कि भारत सरकार जानबूझकर एक मुस्लिम मुल्क (ईरान) के खिलाफ साजिश रच रही है और अरब देशों व इजरायल के साथ मिलकर ईरान को अकेला छोड़ रही है।

वीडियो के भीतर रवीश कुमार ने पूरी तरह से एक पक्षपाती ‘स्पोकस्पर्सन’ की तरह बात की है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के शांति और बुद्ध के संदेशों को ‘चुनावी जुमला’ करार देते हुए सवाल उठाया कि भारत इस युद्ध में ईरान के पक्ष में खड़ा क्यों नहीं हो रहा? रवीश ने पीएम मोदी की इजरायल यात्रा को हमले की तैयारी से जोड़ते हुए यहाँ तक कह दिया कि क्या इजरायल ने भारत का इस्तेमाल ‘कवर’ के तौर पर किया? उन्होंने कॉन्ग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत के ‘जोकर प्रधानमंत्री’ वाले बयान का सहारा लेकर पीएम मोदी पर तंज कसा और पाकिस्तान की तारीफ तक कर डाली कि उसने कम से कम सहानुभूति तो जताई।

रवीश ने खामेनेई की मौत को ‘शहादत’ बताते हुए उसकी तुलना ईसा मसीह के क्रूसीफिकेशन और गुरु गोविंद सिंह जी के बेटों के बलिदान से कर दी, जो न केवल अतार्किक है बल्कि धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाला भी है। उन्होंने भारत सरकार की ‘चिंता’ व्यक्त करने वाली कूटनीति को ‘कायरता’ बताया और आरोप लगाया कि भारत अब अपनी स्वतंत्र नीति छोड़कर ट्रंप और नेतन्याहू की लाइन पर चल रहा है। रवीश ने चाबहार पोर्ट में भारत के निवेश का डर दिखाया और एआई (AI) कोर्स का विज्ञापन करते हुए यह नैरेटिव सेट किया कि भारत का ‘नैतिक कंपास’ अब खत्म हो चुका है। पूरी वीडियो में वे इस बात पर अड़े रहे कि भारत को ईरान पर हमले की कड़ी निंदा करनी चाहिए थी, जबकि वे ईरान द्वारा फैलाए जा रहे क्षेत्रीय तनाव पर पूरी तरह मौन रहे।

खाड़ी में खलबली और प्रोपेगेंडा का ताना-बाना

प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार की चौथी वीडियो का शीर्षक ‘9 देशों पर हमला बोला ईरान ने, कहीं रिफाइनरी बंद तो कहीं एयरपोर्ट…’ और थंबनेल ‘खाड़ी के देशों में खलबली’ दर्शकों में एक प्रकार का भय और सनसनी पैदा करने की कोशिश करता है। शीर्षक में ‘अमेरिका को भारी नुकसान’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर एक ऐसा नैरेटिव सेट किया गया है जिससे ईरान की सैन्य शक्ति को महिमामंडित किया जा सके। एकतरफा पत्रकारिता का उदाहरण देते हुए पत्रकार ने शीर्षक में ही यह तय कर दिया कि दोष किसका है। थंबनेल और टाइटल के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि पूरा अरब क्षेत्र ईरान के खौफ में है और अमेरिका बेबस नजर आ रहा है, जो कि गंभीर भू-राजनीतिक मुद्दों को एक खास चश्मे से देखने की प्रोपेगेंडा शैली को दर्शाता है।

वीडियो के भीतर रवीश कुमार ने सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत सरकार की विदेश नीति को कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि पीएम मोदी, जो ‘बुद्ध और युद्ध’ की बातें करते हैं, वे ईरान पर हुए ‘अनैतिक’ हमले और खामेनेई की हत्या पर चुप क्यों हैं? रवीश ने आरोप लगाया कि भारत सरकार अपनी ‘नैतिक साख’ खो चुकी है और अब अमेरिका व इजरायल के दबाव में काम कर रही है। उन्होंने ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या की तुलना मजहबी शहादतों से करते हुए इसे भावनात्मक मोड़ दिया, लेकिन ईरान द्वारा किए गए मिसाइल हमलों पर चुप्पी साध ली। पत्रकार ने भारत की तटस्थता को ‘कायरता’ करार दिया और दावा किया कि इजरायल ने भारत का इस्तेमाल केवल एक ‘कवर’ के रूप में किया है। पूरे वीडियो में उनका स्वर स्पष्ट रूप से ईरान के समर्थन में और मोदी-इजरायल-अमेरिका गठबंधन के प्रति घृणा से भरा हुआ प्रतीत होता है।

दुबई का ‘ब्रैंड’ और भारत की विदेश नीति पर रवीश का प्रहार

रवीश कुमार ने अपनी पाँचवी वीडियो का शीर्षक ‘दुबई में दहशत या सब कुछ नॉर्मल? ईरान के हमलों की चपेट में अरब देश’ रखा है और थंबनेल का टेक्सट ‘दुबई में दहशत’ है। इस वीडियो में रवीश कुमार ने नैरेटिव सेट करते हुए यह दावा किया कि भले ही वहाँ की सरकार सब कुछ सामान्य होने का दावा कर रही हो, लेकिन हकीकत में स्थिति भयावह है। उन्होंने ईरान द्वारा किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों को विस्तार से बताते हुए कहा कि ‘ईरान ने कोई गारंटी नहीं दी है’ कि दुबई सुरक्षित रहेगा। रवीश ने अमेरिकी और इजरायली चेतावनियों को आधार बनाकर यह तर्क दिया कि पूरा मध्य पूर्व युद्ध की आग में है। उन्होंने ईरान के हमलों को एक तरह से ‘स्वाभाविक प्रतिक्रिया’ के रूप में पेश किया और इजरायल-अमेरिका को तनाव बढ़ाने वाला पक्ष बताया। उनके अनुसार, खाड़ी देशों का ‘स्थिरता और शांति’ वाला ब्रैंड अब पूरी तरह चकनाचूर हो चुका है।

वीडियो के भीतर प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार ने पत्रकारिता की आड़ में पूरी तरह से ईरान का पक्ष लिया है और भारत सरकार की विदेश नीति पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा खाड़ी देशों के नेताओं से बात करने और भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयासों का मजाक उड़ाते हुए कहा कि ‘मोदी के बोलने से क्या होगा?’ रवीश कुमार ने बार-बार यह साबित करने की कोशिश की कि दुबई और सऊदी अरब में सब कुछ खत्म हो चुका है और वहाँ की सरकारें ‘झूठ’ बोल रही हैं कि स्थिति सामान्य है। रवीश ने ईरान के हमलों को जायज ठहराने जैसा लहजा अपनाते हुए कहा कि ‘ईरान ने कोई गारंटी नहीं दी है।’

रवीश ने एक कदम आगे बढ़ते हुए भारतीय शहरों की तुलना दुबई से की और भारतीय शहरों को ‘नरक’ व ‘बर्बाद’ करार दिया। उन्होंने व्यंग्य किया कि भारत में लोग केवल ‘जलेबी-समोसा’ खाकर खुश हैं जबकि विदेश नीति में भारत का कोई वजन नहीं है। उन्होंने बीजेपी के ‘IT सेल’ पर निशाना साधते हुए दर्शकों को भड़काया कि ‘भारत ने इजरायल का साथ देकर क्या पाया?’ रवीश ने खाड़ी देशों में रह रहे 1 करोड़ भारतीयों की सुरक्षा का डर दिखाकर यह नैरेटिव सेट करने की कोशिश की कि भारत का इजरायल के साथ खड़ा होना गलत है। पूरी वीडियो में वे एक ‘प्रोपेगेंडा पत्रकार’ की तरह यह संदेश देते दिखे कि ईरान अजेय है और भारत की विदेश नीति पूरी तरह विफल और ‘दिखावे’ वाली है।

युद्ध की आग में झुलसता मध्य पूर्व और ‘लाचार’ महाशक्ति अमेरिका

रवीश कुमार ने अपनी इस वीडियो का शीर्षक ‘अमेरिका के सैन्य ठिकानों पर हमला, दूतावास बंद, फैल रहा है युद्ध’ रखकर दर्शकों में घबराहट और उत्सुकता पैदा करने की कोशिश की है। थंबनेल पर बड़े अक्षरों में लिखा ‘फँस गया अमेरिका’ यह संकेत देता है कि दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति अब ईरान के चक्रव्यूह में उलझ चुकी है।

वीडियो के भीतर रवीश कुमार ने अमेरिका और इज़रायल पर तीखे हमले करते हुए आरोप लगाया है कि इन दोनों देशों ने मिलकर ईरान के 150 शहरों पर हमला किया और 160 से अधिक मासूम स्कूल जाने वाली बच्चियों की जान ले ली। रवीश ने इसे ‘ईरान की एकता का आधार’ बताते हुए कहा कि अमेरिका ने बच्चियों के स्कूल पर बम गिराकर अपनी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल की है। उन्होंने अमेरिका पर तंज कसते हुए कहा कि वह कुवैत, कतर और बहरीन में बड़े सैन्य अड्डे बनाने के बावजूद अपनी रक्षा नहीं कर पा रहा है और अब हाथ खड़े कर चुका है।

रवीश ने यहाँ तक दावा किया कि अमेरिका के महंगे हथियारों के मुकाबले ईरान के ‘सस्ते और स्वदेशी’ मिसाइलें ज्यादा प्रभावी हैं और अमेरिका के पास हथियारों की वैसी सप्लाई चेन नहीं है जैसी ईरान ने खुद विकसित कर ली है। प्रोपेगेंडाई पत्रकार अमेरिकी विदेश मंत्री के तर्कों को ‘हास्यास्पद’ बताया और कहा कि अमेरिका के पास इस युद्ध को शुरू करने का कोई ठोस कारण नहीं है, सिवाय इसके कि वह इज़रायल के इशारों पर नाच रहा है। रवीश के अनुसार, ईरान अब झुकने के बजाय लंबी लड़ाई के लिए तैयार है, जो ट्रंप के लिए ‘बुरी खबर’ है।

प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश की ‘एकतरफा’ दुनिया

रवीश कुमार की हालिया वीडियोज को अगर गहराई से देखें, तो यह साफ हो जाता है कि उनकी पत्रकारिता अब निष्पक्ष रहने के बजाय एकतरफा नैरेटिव की ओर झुक गई है। एक पत्रकार की ज़िम्मेदारी होती है कि वह दोनों पक्षों के स्याह और सफेद पहलू दिखाए, लेकिन रवीश ने ईरान को एक ‘आदर्श राष्ट्र’ और वहाँ के नेताओं को ‘मसीहा’ की तरह पेश करने में अपनी सारी ऊर्जा लगा दी है। उन्होंने ईरान द्वारा मिडिल ईस्ट में लड़े जा रहे ‘प्रॉक्सी वॉर’ और लेबनान से लेकर यमन तक उसके हस्तक्षेप पर पूरी तरह चुप्पी साध ली। ताज्जुब की बात यह है कि वे लोकतांत्रिक देशों के नेताओं पर तो तीखे सवाल उठाते हैं, मगर ईरान के उस तानाशाही ढाँचे पर एक शब्द नहीं बोलते जहाँ ‘सुप्रीम लीडर’ का फैसला ही अंतिम कानून होता है।

रवीश की रिपोर्टिंग में शब्दों का चुनाव भी किसी खास एजेंडे की ओर इशारा करता है। वे ईरान के संदर्भ में ‘शहादत’, ‘पवित्र महीना’ और ‘नैतिकता’ जैसे भावनात्मक शब्दों का सहारा लेते हैं, लेकिन यही संवेदनशीलता इजरायल में मारे गए मासूमों के लिए कहीं नजर नहीं आती। इतना ही नहीं, एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दे की आड़ में अपनी ही सरकार और देश के मीडिया को नीचा दिखाना उनके कंटेंट का मुख्य हिस्सा बन गया है। कुल मिलाकर, ये वीडियो सूचना देने के बजाय एक खास तरह की नफरत और विचारधारा को बढ़ावा देते हैं। यह साफ है कि उनकी पत्रकारिता अब जमीनी हकीकत दिखाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी निजी कुंठा निकालने और एकतरफा ‘प्रोपेगेंडा’ फैलाने का जरिया बन गई है।

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मीडिया जगत में 5 साल से ज्यादा का अनुभव हो चला है। इटीवी भारत और इंडिया न्यूज के साथ ट्रेनिंग की शुरुआत की, तो सुदर्शन न्यूज चैनल में एंकरिंग, सोशल मीडिया और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अवसर मिला। न्यूज के अलावा मौका मिला एमएच1 नेशनल चैनल में, जहाँ सोशल मीडिया एक्जिक्यूटिव के पद पर तीन चैनल (श्रद्धा एमएच1, एमएच1 म्यूजिक और एमएच1 न्यूज) संभाला। इसके बाद सीनियर कंटेंट राइटर के पद पर एफिलिएट विभाग में जागरण न्यू मीडिया में काम करने का मौका मिला। अब सफर ले चला ऑपइंडिया की ओर...

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