चीन ने 2026 के लिए अपना जीडीपी विकास दर लक्ष्य 4.5 से 5 प्रतिशत रखा है। यह फैसला गुरुवार (5 मार्च 2026) को नेशनल पीपुल्स कॉन्ग्रेस (एनपीसी) के सत्र में प्रीमियर ली कियांग के गवर्नमेंट वर्क रिपोर्ट में घोषित किया गया। पिछले कई दशकों से चीन हर साल 7-8 प्रतिशत या कम से कम 5 प्रतिशत के आसपास का लक्ष्य रखता था। 1990-91 के बाद यह पहला मौका है जब लक्ष्य 5 प्रतिशत से नीचे चला गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला कमजोरी नहीं, बल्कि सावधानी और लचीलेपन की निशानी है। लेकिन सच्चाई यह है कि यह मजबूरी का फैसला है।
सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? चीन किन गंभीर मुश्किलों में फंस गया है? घरेलू बाजार पूरी तरह ठप क्यों हो गया है? रियल एस्टेट सेक्टर क्यों बर्बाद हो चुका है? वैश्विक तनाव, मिडिल ईस्ट का युद्ध, वेनेजुएला, यूक्रेन और अमेरिका की ट्रेड वॉर का क्या भयानक असर है? कम्युनिस्ट पार्टी की गलत नीतियाँ कितनी जिम्मेदार हैं? और क्या चीन सचमुच अमेरिका के सामने खड़ा हो सकता है या सिर्फ मौका देखकर बयानबाजी करता है और पीछे हट जाता है?
कुल मिलाकर देखें तो चीन की अर्थव्यवस्था अब संकट की चपेट में आ चुकी है और मजबूत दिखने वाला कागजी शेर असल में कमजोर पड़ रहा है।
ऐतिहासिक संदर्भ में समझें- लक्ष्य क्यों इतना कम किया गया?
चीन की अर्थव्यवस्था पिछले 40 सालों से तेजी से बढ़ती रही थी। 1980-90 के दशक में विकास दर 10 प्रतिशत से ऊपर रहती थी। लेकिन अब वह पुराना चमकदार दौर खत्म हो चुका है। 2025 में चीन ने मुश्किल से 5 प्रतिशत विकास हासिल किया, वह भी सिर्फ निर्यात के सहारे। लेकिन 2026 के लिए लक्ष्य घटाकर 4.5-5 प्रतिशत का रेंज कर दिया गया। यह रेंज इसलिए चुनी गई ताकि सरकार को असफलता छिपाने का बहाना मिले। अगर अर्थव्यवस्था और गिरे तो 4.5 प्रतिशत पर भी ‘सफलता’ का दावा कर लेगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह 1991 के बाद सबसे कम लक्ष्य है और यह चीन की हार का इशारा है। न्यूयॉर्क टाइम्स और गार्जियन जैसी रिपोर्ट्स में साफ कहा गया कि चीन अब ‘संख्या पहले’ की पुरानी चाल नहीं चला पा रहा। लोकल अधिकारी पहले झूठे आँकड़े देकर लक्ष्य पूरा करते थे, लेकिन अब संकट इतना गहरा है कि झूठ भी नहीं चल रहा। 15वीं फाइव ईयर प्लान (2026-2030) शुरू हो रही है, लेकिन रिपोर्ट में खुद स्वीकार किया गया कि घरेलू और वैश्विक दोनों तरफ ‘Grave and Complex’ यानी गंभीर और जटिल समस्याएँ हैं।
बेरोजगारी 5.5 प्रतिशत, 12 मिलियन नई नौकरियाँ, 2 प्रतिशत महंगाई, अनाज 700 मिलियन टन… ये सब लक्ष्य पुराने हैं, लेकिन असल में अर्थव्यवस्था इनसे भी नीचे फिसल रही है। घाटा 4 प्रतिशत रखा गया, लेकिन यह दिखावा है। असल में चीन मजबूरी में विकास दर कम कर रहा है क्योंकि पुरानी चालें फेल हो चुकी हैं।
घरेलू संकट में रियल एस्टेट की बर्बादी और गिरती माँग ने चीन को घुटनों पर ला दिया
चीन की सबसे बड़ी कमजोरी घरेलू बाजार है। आम लोग अब खर्च नहीं कर पा रहे हैं। चीनी लोग संशय की परिस्थितियों को देखते हुए सेविंग्स यानी डर के मारे बचत बढ़ा रहे हैं। चूँकि नौकरियाँ अनिश्चित है। युवाओं में बेरोजगारी बढ़ रही है। सोशल सेफ्टी का पैमाना टूट चुका है। सरकार से लेकर आम लोगों तक पर स्वास्थ्य, शिक्षा और पेंशन का बोझ बढ़ रहा है। ऐसे में साल 2025 में कंज्यूमर स्पेंडिंग पूरी तरह कमजोर रही है और व्यापारिक निवेश भी ठप सा हो गया है।
चीन में सबसे भयानक संकट रियल एस्टेट सेक्टर का है। यह सेक्टर पूरी तरह बर्बाद हो चुका है। पाँचवाँ-छठा साल चल रहा है संकट का, लेकिन इसका कोई अंत नहीं दिख रहा है। चीनी दिग्गज जैसे एवरग्रांडे पूरी तरह दिवालिया हो चुका है। पूरे चीन में 8 करोड़ से ज्यादा अनसोल्ड (बिना बिके) और खाली घर पड़े हैं। पूरे देश में घरों की कीमतें लगातार गिर रही हैं। आम लोगों की जिंदगी भर की कमाई मिट्टी में मिल चुकी है। लोगों का आत्मविश्वास टूट चुका है। चीन की जो लोकल सरकारें पहले जमीन बेचकर कर्ज चुकाती थीं, अब वह रास्ता भी बंद हो चुका है। उनके कर्ज भी आसमान छू रहे हैं।
विशेषज्ञ कहते हैं कि इस सेक्टर की बर्बादी जीडीपी पर हर साल 2 प्रतिशत पॉइंट्स का घातक असर डाल रही है। साल 2024-2025 में यही हुआ और 2026 में भी यही होता दिख रहा है। आम लोग नया घर खरीदने से डर रहे हैं। प्रॉपर्टी मार्केट अब ‘नया मॉडल’ बनाने की बात कर रहा है, लेकिन असल में यह हार का स्वीकारोक्ति है।
जनसंख्या संकट भी एक बड़ा फैक्टर
चीन की अर्थव्यवस्था पर जनसंख्या का संकट भी भारी पड़ रहा है। कई दशकों तक चीन की ‘एक-बच्चा नीति’ ने जनसंख्या वृद्धि को सीमित कर दिया। इसका असर अब साफ दिख रहा है। चीन में जन्म दर तेजी से गिर रही है। तो बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। वहीं, कामकाजी उम्र की आबादी घट रही है। इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। जब काम करने वाले लोगों की संख्या कम होगी तो उत्पादन क्षमता भी घटेगी। साथ ही बुजुर्गों की बढ़ती आबादी का बोझ सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा।
यही कारण है कि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन की आर्थिक वृद्धि आने वाले दशकों में और धीमी हो सकती है।
कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों की असफलता
चीन की आर्थिक संरचना पर ‘Chinese Communist Party’ का गहरा नियंत्रण है। पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रपति Xi Jinping ने निजी कंपनियों पर नियंत्रण बढ़ाया है। टेक कंपनियों और निजी शिक्षा क्षेत्र पर सरकार की कड़ी कार्रवाई ने निवेशकों का भरोसा कमजोर किया। चीन की आर्थिक रणनीति का मुख्य उद्देश्य अब तीन चीजों पर केंद्रित है- 1. तकनीकी आत्मनिर्भरता, 2. घरेलू स्थिरता, 3. पार्टी का नियंत्रण
इसके लिए चीन ने ‘डुअल सर्कुलेशन’ जैसी नीतियाँ लागू की हैं, जिनका लक्ष्य घरेलू बाजार को मजबूत करना और विदेशी निर्भरता कम करना है। लेकिन इन नीतियों की भी सीमाएँ हैं। जब सरकार अर्थव्यवस्था पर अत्यधिक नियंत्रण रखती है, तो निजी क्षेत्र की पहल कमजोर पड़ सकती है।
व्यावहारिक तौर पर देखें तो चीन की सत्ताधारी पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीसीपी) दो बड़े सपने देख रही थी। पहला- टेक्नोलॉजी में वैश्विक नेता बनना और दूसरा – घरेलू स्थिरता। इसके लिए शी जिनपिंग साल 2013 से ‘नई वैज्ञानिक क्रांति’ की बात कर रहे हैं। इसी नजरिए को आगे बढ़ाते हुए साल 2023 में न्यू क्वालिटी प्रोडक्टिव फोर्सेस लाया गया, जिसमें एआई और हाई-टेक पर फोकस रखा गया। लेकिन ये सपने अब टूटते दिख रहे हैं।
अब कम्युनिष्ट पार्टी कोई नतीजे नहीं दे पा रही है। ऐसे में चीन का कर्ज और बढ़ेगा। हालाँकि साल 2026 में फिस्कल डेफिसिट सिर्फ 4 प्रतिशत रखा गया है, लेकिन ये आँकड़ा बहुत बड़ा है।
बता दें कि चीन में दिसंबर 2025 में ‘Investment in people’ का नाटक रचा गया, जिसमें बुजुर्गों की देखभाल, स्वास्थ्य बीमा, चाइल्डकेयर की बातें की गई। लेकिन ये सब उपाय अपर्याप्त साबित हुए हैं। दरअसल, इसका असल मकसद टेक सेक्टर को बचाना है, आम चीनी नागरिकों को नहीं। जाहिर है, कम्युनिष्ट पार्टी की नीतियाँ अब फेल हो चुकी हैं। भले ही दावा स्थिरता का हो, लेकिन ये नीतियाँ असलियत में संकट को बढ़ा ही रही हैं।
चीन की एक बड़ी समस्या यह भी है कि वहाँ के लोग खर्च कम कर रहे हैं। आम तौर पर विकसित अर्थव्यवस्थाओं में विकास का मुख्य आधार घरेलू उपभोग होता है। लेकिन चीन में लंबे समय से अर्थव्यवस्था निवेश और निर्यात पर निर्भर रही है। चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने पिछले वर्षों में घरेलू माँग बढ़ाने की कोशिश जरूर की, लेकिन इसमें बहुत बड़ी सफलता नहीं मिली।
इसके पीछे कई कारण हैं-
- लोगों की आय में धीमी वृद्धि
- नौकरी को लेकर असुरक्षा
- सामाजिक सुरक्षा की कमी
- स्वास्थ्य और शिक्षा का बढ़ता खर्च
इन कारणों से लोग ज्यादा बचत करते हैं और कम खर्च करते हैं। यह स्थिति चीन की सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गई है क्योंकि अगर घरेलू बाजार मजबूत नहीं होगा तो आर्थिक वृद्धि भी सीमित हो जाएगी।
वैश्विक तनाव जैसे ट्रेड वॉर, मिडिल ईस्ट, वेनेजुएला और यूक्रेन ने चीन को बैकफुट पर धकेल दिया
चीन अब वैश्विक मंच पर भी कमजोर दिख रहा है। अमेरिका का ट्रेड वॉर सबसे घातक हथियार साबित हुआ है। डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ से साल 2025 में अमेरिका को चीनी निर्यात 20 प्रतिशत तक गिर गया। भले ही चीन का ट्रेड सरप्लस 1.2 ट्रिलियन डॉलर का रिकॉर्ड बनाता दिखा, लेकिन वो चीन सरकार की निर्यात पर निर्भरता का सबूत ही था, जिसका हल्ला डोनाल्ड ट्रंप कर ही रहे थे। अमेरिका की देखा-देखी अब मैक्सिको और यूरोप भी चीन पर टैरिफ लगा रहे हैं, ऐसे में चीन का निर्यात इंजन फेल होने वाला है।
दरअसल, चीन की अर्थव्यवस्था पर सबसे बड़ा बाहरी दबाव यही अमेरिका के साथ उसकी प्रतिस्पर्धा है। जब अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार आई, तब चीन के खिलाफ बड़े पैमाने पर टैरिफ लगाए गए। इससे चीन के निर्यात को बड़ा झटका लगा। इसके बाद चीनी कंपनियों पर तकनीकी प्रतिबंध लगाए गए। सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी पर रोक लगा दी गई और चीनी कंपनियों पर निगरानी बढ़ा दी गई। इस व्यापार युद्ध ने चीन की आर्थिक रणनीति को बदल दिया। अब चीन तेजी से तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ने की कोशिश कर रहा है। लेकिन यह प्रक्रिया लंबी और महँगी है।
अब मौजूदा समय में देखें तो मिडिल ईस्ट का युद्ध चीन की कमर तोड़ रहा है। ईरान पर हमले से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज प्रभावित है। चीन रोज 10 मिलियन बैरल तेल आयात करता है, ज्यादातर इसी रूट से… लेकिन उसके बंद होने से समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। समुद्र में रोके रखा गया तेल कब तक चीन की जरूरतें पूरी करेगा? उसे घूम फिर कर रूस की तरफ ही जाना होगा। वहीं, अफ्रीका की तरफ देखें तो चीन का सारा निवेश फँसता दिख रहा है, मिडिल ईस्ट की हालत खराब हो रही है।
एक तरफ वेनेजुएला में अमेरिका ने सीधा वार किया, जहाँ चीन के अरबों डॉलर के निवेश और लोन डूब गए। इसके साथ ही उसका सस्ता तेल मिलना भी बंद हो गया। वहीं, यूक्रेन युद्ध में भी चीन सिर्फ सस्ता तेल-गैस खरीदता रहा, लेकिन किसी की तरफ खुलकर सामने नहीं आ पाया।
ये सब दिखाते हैं कि चीन सुपरपावर का ढोंग भर रहा है। अमेरिका के सामने वो घुटने टेक देता है। इन सबमें चीन की मौकापरस्ती सामने आ चुकी है और उसकी फूट डालो- राज करो की नीति भी खुल चुकी है। क्योंकि जहाँ भी वो खतरा देखता है, वहाँ से वो तुरंत पीछे हट जाता है। साफ देखें तो वेनेजुएला, ईरान, रूस-यूक्रेन मामलों में चीन की सिर्फ बयानबाजी ही सामने आई, क्योंकि उसने कोई कदम उठाने की हिम्मत ही नहीं की।
क्या चीन सचमुच कागजी शेर साबित हो रहा है?
इसका जवाब के शब्द में ढूँढें तो हाँ, चीन अब कमजोर पड़ रहा है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था दिखावटी है। उसके पास निर्यात और हाई-टेक का सहारा तो है, लेकिन घरेलू संकट, रियल एस्टेट की बर्बादी, जनसंख्या आपदा और वैश्विक दबाव उसे तोड़ रहे हैं। सत्ताधारी पार्टी की नीतियाँ स्थिरता का नाटक कर रही हैं लेकिन असल में आम चीनी नागरिकों को लूट रही हैं।
बहरहाल, चीन कमजोर पड़ चुका है। रियल एस्टेट संकट, गिरती माँग, ट्रेड वॉर और मिडिल ईस्ट तनाव ने उसे घेर लिया है। कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियाँ असफल साबित हो रही हैं। ऐसे में चीन की अर्थव्यवस्था अब दुनिया के लिए खतरे के सबूत के तौर पर दिख रही है।
अस्थिर दुनिया की भी मार झेलनी चीन की मजबूरी
दरअसल, आज की दुनिया पहले की तुलना में कहीं ज्यादा अस्थिर हो चुकी है। कई बड़े संघर्षों ने वैश्विक व्यापार और सप्लाई चेन को प्रभावित किया है। मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने से तेल की कीमतों और व्यापार मार्गों पर असर पड़ता है। चीन की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। अगर फारस की खाड़ी में तनाव बढ़ता है, तो चीन की ऊर्जा आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है।
चीन की विकास दर को 4.5–5 प्रतिशत तक सीमित करना एक बड़ा संकेत है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अब कई संरचनात्मक चुनौतियों से जूझ रही है। रियल एस्टेट संकट, घटती घरेलू माँग, जनसंख्या समस्या, कम्युनिस्ट नीतियों की सीमाएँ और अमेरिका के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा… ये सभी कारक चीन की आर्थिक गति को प्रभावित कर रहे हैं।
हालाँकि चीन अभी भी एक बड़ी आर्थिक शक्ति है और उसकी तकनीकी महत्वाकांक्षाएँ बहुत बड़ी हैं। लेकिन यह भी साफ है कि उसकी अर्थव्यवस्था अब उस ‘चमत्कारी तेजी’ से नहीं बढ़ रही, जिसने उसे पिछले चार दशकों में वैश्विक शक्ति बनाया था।


