यूरोप में 9 नवंबर 1989 को एक दीवार गिरी इस दीवार का नाम बर्लिन वाल था। सोवियत रूस समर्थित ईस्ट जर्मनी और अमेरिका जैसी NATO पॉवर से समर्थित वेस्ट जर्मनी इसी के साथ एक हो गए। इस दीवार ने सिर्फ़ देश के दो हिस्सों को एकीकृत नहीं किया बल्कि 4 दशक से चले आ रहे कोल्ड वॉर को भी ख़त्म किया।
इसके साथ ही दुनिया बाई पोलेरिटी यानी द्विध्रुवीय व्यवस्था ख़त्म हो गई। राजनीति विज्ञानियों की द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार चाँदी हुई, उन्हें मल्टी पोलरिज्म, यूनीपोलरिज्म जैसे टर्म्स गढ़ने को मिले। कुछ ने कहा कि अब एक और कोई ताक़त खड़ी होगी और दुनिया वापस पुरानी व्यवस्था में आएगी। जबकि कुछ ने कहा कि मल्टी पोलरिज्म होगा।
2010s में जब चाइना की इकॉनमी 10 ट्रिलियन डॉलर पार हो गई तो बाई पोलर व्यवस्था वालों ने बताया कि चीन ही USSR का उत्तराधिकारी है। लेकिन पिछले एक महीने में ही ये स्मोक स्क्रीन छँट गई है।
पहले वेनेजुएला और अब ईरान, एक-एक करके उसके साथ अलायन्स रखने वाले देशों में अमेरिका मनमर्जी कर रहा है। इसके बदले में चीन के पास कोई जवाब नहीं है। चीन कुछ केसेस में सिर्फ़ बयान जारी करके पल्ला झाड़ ले रहा है और कहीं तो उसके पास ऑफर करने को बयान भी नहीं हैं।
एक-एक करके दोनों केसेज ने कैसे चीन की भद्द पिटवाई है, समझते हैं। सबसे पहले केस लेते हैं वेनेजुएला का।
वेनेजुएला मामले ने बताया, चीन सिर्फ मौकापरस्त
निकोलस मादुरो के राज में वेनेजुएला के तेल का सबसे बड़ा ख़रीददार चीन ही रहा है, रॉयटर्स की एक रिपोर्ट बताती है कि चीन 2025 में वेनेजुएला से 5 लाख बैरल प्रतिदिन ख़रीद रहा था। चाइनीज़ इन्वेस्टर्स ने वेनेजुएला के आयल सेक्टर में 2 बिलियन डॉलर से ज्यादा का इन्वेस्टमेंट भी किया है। और उसकी दोस्ती वेनेजुएला से तेल ख़रीदने तक ही नहीं बल्कि अपने हथियार बेचने की भी है। अमेरिकन थिंक टैंक CSIS की एक आर्म, चाइना पॉवर बताती है कि 2015 से 25 के बीच में चीन ने वेनेजुएला को लगभग 600 मिलियन डॉलर्स यानी 5000 करोड़ से ज्यादा के वेपन्स बेचे हैं।
इनमें आर्मर्ड व्हीकल्स से लेकर ट्रेनर एयरक्राफ्ट, मिसाइल, हेलीकॉप्टर तक शामिल हैं। यही नहीं बल्कि चीन की वेनेजुएला से संबंध भी रणनीतिक लेवल की हैं। इन सब के बाद भी जब जनवरी 2026 में एक ब्रीफ ऑपरेशन के बाद अमेरिका ने मादुरो को उठा लिया और वेनेजुएला में साइलेंट रिजीम चेंज कर दिया, तो चीन चुप हो गया। उसने सिर्फ़ एक बयान जारी करके इति श्री कर ली। UNSC में उसने अमेरिका की निंदा की और कहानी ख़त्म हो गई। यहाँ तक कि मादुरो के लिए छोड़िए, चीन ने अपने इकोनॉमिक इंटरेस्ट्स को भी ख़ासा प्रोटेक्ट नहीं किया। उसको वेनेजुएला से मिलने वाला तेल 50% तक घट गया।
और ये तेल ऐसा नहीं था कि वो ख़रीद रहा था जो कहीं और से भी ख़रीदा जा सकता था। ये तेल असल में चीन के लोन का रिपेमेंट था। लेकिन इन सबके बावजूद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने बयानों में मादुरो का नाम तक नहीं लिया और ना ही अमेरिका की खुले तौर पर निंदा की, कोई मिलिट्री या इकोनॉमिक एक्शन तो छोड़ दीजिए।
अगर ये पूरा एपिसोड इस बात को सिद्ध करने के लिए कम था कि चीन के पास ऐसी कंडीशंस में सिर्फ़ लिप सर्विस है और वो इकॉनमी चाहे 20 ट्रिलियन की हो गया हो, वो अमेरिका के बराबर खड़ी होने वाली शक्ति आज तक नहीं बन पाया है, तो ईरान पर हमला हो गया।
ईरान पर हमले के बाद भी चीन ने टाइट रखी जुबान
जहाँ मादुरो को अमेरिका ने सिर्फ़ गिरफ्तार किया था तो ईरान के ख़िलाफ़ उसने इजरायल के साथ मिलकर पूरा युद्ध छेड़ दिया और सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामनेई को मार तक गिराया। इसके साथ ही ईरान की टॉप लीडरशिप भी ख़त्म कर दी गई। उसके एक्स प्रेसिडेंट को मार दिया गया। उसके न्यूक्लियर रिएक्टर्स पर हमला हुआ।
लेकिन तब भी चीन ने क्या किया? चीन ने वही घिसी पिटी बातें की, जिसमें UN चार्टर, संप्रभुता और वायलेशन जैसे शब्द शामिल थे, जिनकी हैसियत अन्तरराष्ट्रीय राजनीति में किसी फेंके हुए पेपर से ज्यादा नहीं है। इन फैक्ट चाइना ने बाक़ी देशों की तरह सुप्रीम लीडर खामनेई की मौत पर कोई शोक वग़ैरह भी नहीं घोषित किया।
ये सब तब हुआ, जब ईरान और चीन ने 25 साल की साझेदारी का समझौता कर रखा है। ईरान का लगभग 80% क्रूड चीन ख़रीदता है, ईरान चाइना की बेल्ट एंड रोड परियोजना का भी हिस्सा है। उसने लगभग 2 बिलियन डॉलर इन्वेस्ट भी किया हुआ है, आर्म्स भी बेचे हैं।
तेहरान की मेट्रो से लेकर रेलवे लाइंस तक और पोर्ट्स से लेकर ऑयल इंडस्ट्री तक चीन का महत्वपूर्ण इन्वेस्टमेंट ईरान में है। लेकिन यहाँ भी सुप्रीम लीडर की मौत के बाद जिनपिंग का एक भी बयान तक नहीं आया। मिलिट्री इंटरवेंशन और ईरान को वेपन सपोर्ट तो बड़े दूर की बात है।
यानी दोनों केसेस में चीन सिर्फ़ बोलता रह गया और एक्शन के नाम पर उसने एक पुलिस कांस्टेबल को नहीं भेजा। जिन एनालिस्ट्स को ये लगता था कि उन्हें चीन दूसरे देशों बचाएगा क्योंकि वो अब दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी ताक़त बन चुका है, वो सारी एनालिसिस भी धरी रह गई।
यहाँ तक कि वो चाहे तो इस मामले में अमेरिका की तरह अपनी इकोनॉमिक पॉवर का भी यूज कर सकता है, सैंक्शंस लगा सकता है, एक्सपोर्ट रोक सकता है और अपनी मैन्यूफैक्चिरंग के बल पर कुछ डेंट जरूर क्रिएट कर सकता है, लेकिन उससे ये भी नहीं हुआ। क्योंकि चाइना इन सब में अपना सिर्फ़ फ़ायदा देखता है।
फिर भी हमारे लिबरल्स चाहते हैं- भारत युद्ध में कूद जाए
इस सब के बावजूद हमारे लिबरल – वामपंथी और कॉन्ग्रेसी चाहते हैं कि हम इस युद्ध में खामनेई की फोटो और ईरान का झंडा लेकर अमेरिका के ख़िलाफ़ लड़ें, इजरायल से रिश्ते तोड़ दें और उनकी सबमरीन, युद्धपोत सब कुछ ब्लॉक कर दें उनसे एकदम जंग मोड में आ जाएँ, अपनी तेल की सप्लाई ख़त्म कर दें।
और ये सब हम तब करें जब हमारे दर्जनों आयल के टैंकर्स और बाक़ी शिप ईरान के स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज़ बंद करने के चलते फँसे रहें। लेकिन कांग्रेसियों के कहने से हमारे नेशनल इंटरेस्ट को हम हैंपर नहीं करेंगे।
भारत ना मिलिट्री एक्शन लेगा और ना ऐसी फर्जी लिप सर्विस देगा जो संकट के समय काम ना आए। याद रखिए जो लोग चीन को USSR का उत्तराधिकारी बता रहे थे, उन्हें याद रखना चाहिए कि ऐसी कंडीशंस में वो अपनी मिलिट्री भेजता था, अपनी सबमरींस भेजता था, UNSC में अमेरिका को मजबूर कर देता था। लेकिन चीन अपने हथियार और अपनी अर्थव्यवस्था को लेकर इन्फ़िरियारिटी में ही जी रहा है। चाहे ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उसके एयरडिफेंस का एक्सपोज होना हो या ईरान में उनके एयरडिफेंस के देखते देखते अयातुल्लाह खामनेई का सिटिंग डक बन जाना हो।
कुछ दिनों पहले की ही बात है जब अमेरिका ने जरा सा टैरिफ लगाया था तो चीन की इकॉनमी काँपने लगी थी। सच ये है कि चीन के सो कॉल्ड डिफेंस सिस्टम और उसकी सुपरपॉवर इकॉनमी को वॉर का कोई एक्सपोज़र नहीं है। 1979 के बाद चीन ने कोई युद्ध नहीं लड़ा है।
आज चीन में ना वैसी मिलिट्री ऑपरेशन की हैसियत है और ना ही उस तरह का पॉवर प्रोजेक्शन करने की। हाँ! अगर उसे अमेरिका का सामना करना है तो उसे हमेशा भारत से बना के रखनी पड़ेगी, क्योंकि बिना भारत और रूस का साथ लिए वो सिर्फ़ बयान ही जारी कर पाएगा। निकोलस मादुरो का वेनेजुएला प्रॉपर सोशलिस्ट स्टेट था, यानी उन्हीं वैल्यूज को मानता था, जिनपर चाइना बना है।


