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‘अभी वोट करने आने वाले होंगे मुस्लिम, फोर्स भेज दो’: DIG मुरादाबाद के नाम से फर्जी स्क्रीनशॉट वायरल, पुलिस के खंडन के बावजूद फैलाया जा रहा फेक न्यूज

लोकसभा चुनाव 2024 में दूसरे चरण के मतदान के दौरान मुरादाबाद रेंज के डीआईजी IPS मुनिराज के नाम से एक स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर तेजी से फैला। ये मैसेज वॉट्सऐप ग्रुप ‘बेबाक खबर बेबाक अंदाज’ से जुड़ा है, जिसमें मुस्लिम बहुल इलाकों में 3 बजे के बाद वोटिंग बढ़ने से रोकने के लिए फोर्स भेजने की अपील की जा रही है। ये स्क्रीनशॉट पूरी तरह से फर्जी है, ऐसी सफाई डीआईजी रेंज मुरादाबाद के एक्स हैंडल पर दी गई है। इसके बावजूद इस मैसेज को इस्लामी और कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम तेजी से फैला रहा है, जिसमें कई कथित ‘पत्रकार’ भी शामिल हैं।

इस स्क्रीनशॉट में DIG मुनिराज नाम से मैसेज भेजा गया दिख रहा है, जिसमें लिखा है, “अभी सब लोग नमाज पढ़ने गए है और 3 बजे के बाद ये फिर भारी वोट करेंगे। मुस्लिम बूथ्स पर 40 प्रतिशत वोटिंग हो गई है। कैसे भी 3 बजे फोर्स लगा दीजिए, आपको बहुत बहुत धन्यवाद।” इसके बाद एक और मैसेज भेजा गया है, जिसमें लिखा है ‘अमरोहा’ यानी ये मैसेज अमरोहा के लिए भेजा गया है।

इस वायरल मैसेज की जानकारी पुलिस तक पहुँची, तो पुलिस ने इस मैसेज का खंडन किया। पुलिस की तरफ से पोस्ट लिखा गया है, जिसमें लिखा है, “सर्व संबंधित को सूचित किया जाता है कि सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्मों पर IPS Muniraj के नाम से किसी अज्ञात द्वारा भ्रामक खबर फैलाने हेतु एक वॉट्सऐप ग्रुप “बेबाक खबर बेबाक अंदाज” का स्क्रीनशॉट वायरल हो रहा है, जबकि श्री मुनिराज जी, पुलिस उपमहानिरीक्षक, मुरादाबाद परिक्षेत्र मुरादाबाद “बेबाक खबर बेबाक अंदाज” वॉट्सऐप ग्रुप में नहीं हैं। तथ्यों की जानकारी कर आवश्यक विधिक कार्यवाही अमल में लायी जा रही है। ऐसी भ्रामक खबरों पर ध्यान न दें।”

इस खबर के खंडन के बावजूद ये फेक न्यूज तेजी से फैलाया गया। लोकेश राय नाम के पत्रकार ने लिखा, “इलेक्शन 2024 में क्या हो रहा है, ये देख लीजिए। एक सीनियर आईपीएस अफसर का मैसेज वायरल हुआ है। लगता है किसी संगठन के पदाधिकारी ने भेजा है।”

कॉन्ग्रेस कवर करने वाली ‘पत्रकार’ रोहिणी सिंह, जिनके एक्स पर 10 लाख से ज्यादा फॉलोवर्स हैं, उन्होंने इस फेक न्यूज को रीट्वीट करते हुए लिखा, “ये क्या हो रहा है यूपी पुलिस? शर्मनाक।”

फेक न्यूज फैलाने के आरोपों में जिस बोलता हिंदुस्तान नाम के यूट्यूब चैनल पर रोक लग चुकी है, उसने भी इसे आगे बढ़ाया और लिखा, “मुस्लिम बूथों पर 40% वोटिंग हो चुकी है। जुमे की नमाज के बाद वोटरों की भीड़ उमड़ेगी, भारी फोर्स लगाओ।” यूपी के IPS अफसर के व्हाट्सएप मैसेज पर मचा हंगामा”। हालाँकि बाद में इस एक्स हैंडल ने पुलिस की प्रतिक्रिया साझा करके अपनी जिम्मेदारियों से इतिश्री कर लिया और नफरत फैलाने वाले फेक न्यूज को नहीं हटाया।

इस पूरे खेल में फेक न्यूज फैलाने में माहिर माना जाने वाला जुबैर भी शामिल रहा। बाला नाम के एक्स यूजर ने दावा किया कि जुबैर ने फेक न्यूज फैलाने वाले दो लोगों के ट्वीट्स को री-ट्वीट किया। साथ ही दोनों ही ट्वीट्स को री-ट्वीट करने से जुड़े स्क्रीनशॉट भी शेयर किए और लिखा, “यूपी के एक डीआईजी का फेक स्क्रीनशॉट सुबह से वायरल किया जा रहा है, जिसके मकसद का केंद्र अधिकारी के खिलाफ सांप्रदायिक नफरत पैदा करना है। इस स्क्रीनशॉट का फैक्ट चेक करने की बचाय अल्ट न्यूज का को-फाउंडर और कॉन्ग्रेस आईटी सेल का सदस्य मोहम्मद जुबैर (@Zoo_Bear) इसे अपने टूलकिट के माध्यम से आगे बढ़ा रहा है। वो एक अधिकारी पर हमले के लिए भीड़ को उकसाने की कोशिश कर रहा है। वो (जुबैर) इस तरह के अपराधों को हमेशा अंजाम देता रहा है। यूपी पुलिस को इसके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।”

बता दें कि मुरादाबाद में पहले चरण के दौरान ही 19 अप्रैल को मतदान समाप्त हो चुका है। ऐसे में मुरादाबाद के अधिकारी के नाम से इस तरह का फेक न्यूज फैलाने का एक ही मकसद था कि अमरोहा में दूसरे चरण में हुए मतदान को खास सांप्रदायिक नजरिए से प्रभावित किया जा सके।

इस्लामी-वामी फिलीस्तीन समर्थकों का आतंक देख US भूला मानवाधिकारों वाला ज्ञान, भारत के समय खूब फैलाया था प्रोपगेंडा: अमेरिका का दोहरा चरित्र बेनकाब

भारत में हिंसक प्रदर्शनों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई देखकर लोकतंत्र का ज्ञान देने वाला अमेरिका कुछ समय से खूब चर्चा में है। इन दिनों वहाँ फिलीस्तीन के लिए ‘आजादी’ माँगने की मुहीम छिड़ी हुई है। इस्लामी और वामपंथी छात्र मिलकर अमेरिका के कॉलेजों में प्रोटेस्ट कर रहे हैं और सड़कों पर बवाल किया हुआ है। शुरू में प्रशासन ने इसे सामान्य प्रदर्शन समझकर होने दिया था, लेकिन बाद में जब चीजें क्लासरूम के साइलेंट प्रदर्शन से निकलकर कॉलेज परिसर में हड़कंप मचाने, पुलिस पर हमले, तोड़फोड़ पर आ गईं, तो बिन देरी किए कार्रवाई शुरू हुई।

अब तस्वीरें सामने आ रही हैं जिनमें उपद्रव करने वाले प्रदर्शनकारियों को पुलिस हर तरीके से रोकने का प्रयास कर रही है। इस दौरान पुलिस और उनमें झड़पें भी हो रही हैं। जो पत्रकार इन चीजों को रिकॉर्ड कर रहा है उसको भी सरेआम पीटा जा रहा है। खुद को प्रोफेसर बताने वाली महिला को पकड़कर हथकड़ी लगाई जा रही है। उसके हाथ मरोड़े जा रहे हैं… आदि आदि।

ये अमेरिका से आई नई तस्वीर नहीं है। पिछले दिनों पुलिस पर हमला होने से बाद वहाँ ऐसी कार्रवाई लगातार चल रही है। हिंसक प्रदर्शन को रोकने के लिए अलग-अलग यूनिवर्सिटियों से प्रदर्शनकारी गिरफ्तार किए जा रहे हैं… और ये गिरफ्तारी एक दो नहीं, बल्कि सैंकड़ों की तादाद में हो रही है। अकेले कोलंबिया यूनिवर्सिटी से ही बीते दिनों 130 छात्र पकड़े गए थे। वहीं येल यूनिवर्सिटी से भी 40 के आसपास छात्रों को पकड़ा गया था। इसी तरह अन्य यूनिवर्सिटों में भी बात न मानने पर, गलत आचरण करने पर, हुड़दंग मचाने पर, लोगों को उकसाने पर प्रदर्शनकारी पकड़े गए थे। गुरुवार रात तक इनकी संख्या 300 तक पहुँच गई थी।

इसके अलावा हालिया कार्रवाई की बात करें तो हालात काबू पाने के लिए अब पुलिस हिरासत से ज्यादा बड़ा एक्शन ‘वोक’ छात्रों पर हो रहा है… हाल में अमेरिकी यूनिवर्सिटी प्रिंसटन ने भारतीय मूल की एक छात्रा अचिंत्या सिवालिंगम को बात न सुनने पर अमेरिका में पढ़ने से बैन ही कर दिया है। इसी तरह पीएचडी का एक छात्र हसन सैयद भी गिरफ्तार किया गया है। यूनिवर्सिटी की प्रवक्ता ने कहा है कि ये लोग लगातार चेतावनी दिए जाने के बाद भी सुनने को तैयार नहीं थे इसलिए इनके खिलाफ ये कार्रवाई हुई।

अब अमेरिका में पढ़ाई कर रहे वोक छात्रों के खिलाफ प्रशासन का ऐसा एक्शन गलत है या सही… इस पर चर्चा व्यापक स्तर पर चल रही है लेकिन इस बीच एक पक्ष जो सामने आया है वो अमेरिका के दोहरे चेहरे का है। एक चेहरा तो वो जो दिखाता है कि अमेरिका अपने देश में शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अमेरिका कुछ भी कर सकता है। चाहे फिर उसके लिए उन्हें उग्र प्रदर्शनकारी पर लाठी-डंडे चलाने पड़ें, उन्हें बंदूक दिखाकर डराना पड़े या कोई अनुशासनहीन छात्र को कॉलेज के साथ-साथ देश से भी प्रतिबंधित करना पड़े… उन्हें इससे गुरेज नहीं है।

इस कार्रवाई ने बता दिया है कि अमेरिका की पहली प्राथमिकता अपने देश के सामान्य जनजीवन की सुरक्षा करना, सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान न पहुँचने देना है। ठीक वैसे ही प्राथमिकता जो साल 2019-20 में भारत की थी जब देश में कॉलेजों से शुरू हुई हिंसा सड़कों तक आने लगी थी, लेकिन उस समय जब भारत ने अपने देश की कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए कदम उठाए तो अमेरिका ने अपने समाचार पत्रों और चैनलों के जरिए सरकार को फासीवादी दिखाना शुरू कर दिया। उन वामपंथियों को बुद्धिजीवी बनाकर भारत की वो तस्वीर दिखाई जिससे साबित हो कि भारत का लोकतंत्र कमजोर है, यहाँ प्रदर्शन करने की आजादी नहीं है, सरकार अपनी मनमानी करती है, मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा आदि-आदि।

आज भी समय-समय पर जब घोर इस्लामी और वामपंथी तत्वों को वैश्विक स्तर पर कोई भारत विरोधी प्रोपगेंडा फैलाना होता है तो उनकी सहायता अमेरिका के नामी समाचार चैनल ही करते हैं। इसके अलावा मानवाधिकारों का हवाला देकर उपद्रवियों की रिहाई की माँग की जाती है वो भी तब जब आरोपितों के विरुद्ध सबूत इकट्ठा करके कार्रवाई की जा रही हो।

इस समय अमेरिका में जो कुछ भी चल रहा है उससे अमेरिका कुछ सीखे न सीखे पर इतना सीखने की जरूरत जरूर है कि देश का लोकतंत्र देश के लोगों से ही होता है, जब उनकी जान पर खतरा बनता है और देश की संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के प्रयास होते हैं तो कड़ी कार्रवाई करनी पड़ती है, सरकार को सख्त होना पड़ता है, कड़े फैसले लेने पड़ते है। किसी के प्रदर्शन करने के अधिकार के कारण सारी जनता के जीवन को मुश्किल में नहीं छोड़ा जाता।

भारत में जब ऐसी स्थिति आई थी उस समय अमेरिका दूर से केवल स्थिति देख टीका-टिप्पणी करने में लगा था, मगर आज वही दृश्य उनके सामने आ गए हैं जिससे निपटने के लिए वो जो कार्रवाई कर रहे हैं, वो खुद उनपर भारी पड़ रही है। हर जगह उनकी आलोचना हो रही है, उन्हें मानवाधिकारों का ज्ञान मिल रहा है… मगर इस दौरान वो सब लोग शांत हैं जिन्होंने अपने आसपास ऐसे प्रदर्शनों के बाद होती हिंसा और उससे नुकसान होते देखे हैं। वो चुपचाप अमेरिका के दोहरे चरित्र को देख रहे हैं। उन्हें पता है कि अमेरिका में जब स्थिति सामान्य होगी वो फिर सब भूल जाएँगे, सेकुलरिज्म को बचाने के आड़ में कट्टरपंथ को बढ़ावा देने की बातें होंगे, लोकतंत्र के नाम पर अराजकता फैसलने देने की पैरवी होगी, भारत की कार्रवाई पर सवाल उठाए जाएँगे, प्रोपगेंडा चलाने वालों को विश्लेषक, बुद्धिजीवी कहकर स्पेस दिया जाएगा। अभी हाल में भी तो ऐसा हुआ ही है… अमेरिका के राज्य विभाग की हाल में आई रिपोर्ट में भी उन्होंने भारत के ऊपर सवाल उठाए हैं जिसे विदेश मंत्रालय ने बेहद पक्षपाती रिपोर्ट बताया है…।

वक्फ संपत्तियों से कब्जा नहीं हटवा सकता वक्फ बोर्ड का CEO, केवल ट्रिब्यूनल को हक: मद्रास HC का फैसला, तमिलनाडु का 2010 का कानून रद्द

मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जेदारों की बेदखली) संशोधन अधिनियम 33, 2010 को वक्फ अधिनियम 1995 के तहत अमान्य करार दे दिया है, क्योंकि यह संविधान के दायरे से बाहर है। इस संशोधन के जरिए तमिलनाडु वक्फ बोर्ड के सीईओ को एस्टेट अधिकारी के रूप में कार्य करने का अधिकार प्रदान किया था।

एस्टेट अधिकारी के रूप में वक्त बोर्ड के सीईओ उन वक्फ संपत्तियों पर अतिक्रमण करने वालों को बेदखल करने का आदेश दे सकता है, जिन्हें तमिलनाडु सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जादारों की बेदखली) अधिनियम 1976 के दायरे में लाया गया था।

मुख्य न्यायाधीश एसवी गंगापुरवाला और न्यायमूर्ति डी भरत चक्रवर्ती की खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि वक्फ संपत्तियों पर अतिक्रमण करने वालों को केंद्रीय कानून में साल 2013 में किए गए संशोधन के बाद स्थापित वक्फ न्यायाधिकरणों के माध्यम से ही बेदखल किया जा सकता है। यानी कोई व्यक्ति यदि वक्फ सम्पत्ति पर अवैध कब्जा करता है तो उसे मात्र वक्फ ट्रिब्यूनल ही हटा सकता है ना कि इस नए संशोधन द्वारा नियुक्त अधिकारी। इसके खिलाफ कई रिट याचिका दाखिल की गई थीं।

इन याचिकाओं में कहा गया था कि राज्य का 2010 का संशोधन वक्फ अधिनियम 1995 के प्रतिकूल था। कुछ अपीलें भी जुड़ी हुई थीं, जो जुलाई 2023 में पारित एकल न्यायाधीश पीठ के आदेश को रद्द करने के लिए दायर की गई थीं। इस मामले में सभी याचिकाकर्ता और अपीलकर्ता या तो किरायेदार थे जिनका पट्टा समाप्त हो गया था या उन्हें वक्फ से संबंधित संपत्तियों/परिसरों के संबंध में अतिक्रमणकारी माना गया था।

याचिकाकर्ताओं और अपीलकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया है कि संसद ने वक्फ संशोधन अधिनियम 2013 के माध्यम से वक्फ संपत्तियों के अनधिकृत कब्जे और उनकी बेदखली से निपटने के लिए वक्फ अधिनियम 1995 में संशोधन किया था। इसमें ऐसे अतिक्रमणों या अनधिकृत कब्जे से निपटने के लिए स्पष्ट रूप से धारा 54 बनाई गई थी।

संशोधित कानून की धारा 85 में सिविल कोर्ट, राजस्व अदालत और किसी भी अन्य प्राधिकारी के वक्फ के मामले में सुनवाई करने के क्षेत्र पर रोक लगा दी गई है। इसमें तमिलनाडु अधिनियम के तहत एस्टेट अधिकारी का अधिकार भी शामिल होगा। यह भी तर्क दिया गया कि केंद्रीय अधिनियम का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों से अनधिकृत कब्जेदारों को बेदखल करने के लिए एक व्यापक और देश भर में समान तंत्र तैयार करना है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इसको देखते हुए तमिलनाडु अधिनियम 2010 स्वयं शून्य हो जाता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि केंद्रीय अधिनियम के साथ टकराव वाले राज्य के किसी भी राज्य कानून को खत्म कर दिया जाएगा। इस मामले में भारत सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर-जनरल पेश हुए और अपना तर्क रखा। कोर्ट ने भी कहा कि इस मामले में राज्य के क़ानून को राष्ट्रपति की स्वीकृति की आवश्यकता थी। ऐसे में कोर्ट ने अतिक्रमण सम्बन्धी ट्रिब्यूनल के अधिकार को ही मानते हुए इस कानून संशोधन को अमान्य करार दे दिया।

स्त्री धन पर सिर्फ पत्नी का हक, पति या सुसराल वालों का नहीं: सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, शख्स से कहा- बीवी को देने पड़ेंगे 25 लाख रुपए

महिलाओं के जेवर-गहनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला देते हुए कहा है कि महिला का स्त्रीधन उसकी पूर्ण संपत्ति है, उसमें किसी को हिस्सेदारी देने की मजबूरी नहीं है। महिला अपनी मर्जी से उस स्त्रीधन को खर्च कर सकती है, वो ही उसकी पूरी तरह से मालकिन है। ससुराल के लोग उस स्त्रीधन में से कुछ भी नहीं पा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही ये भी कहा कि संकट के समय अगर पत्नी चाहे, तो पति इस स्त्री धन का इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन उस स्त्री धन को लौटाने की जिम्मेदारी भी पति की होगी। वो उसे लेकर भूल नहीं सकता। ये पति का नैतिक दायित्व होगा कि वो पत्नी के स्त्रीधन को लौटाए या उसके बराबर मूल्य चुकाए। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने एक व्यक्ति को उसकी पत्नी के 25 लाख के स्त्रीधन को लौटाने का आदेश भी दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए पति को अपनी पत्नी के सभी आभूषण छीनने के लिए 25 लाख रुपये की आर्थिक क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया। महिला अब 50 वर्ष की है। सुप्रीम कोर्ट ने जीवन-यापन की लागत में वृद्धि और समता एवं न्याय के हित को ध्यान में रखते हुए महिला को क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के 5 अप्रैल, 2022 के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें तलाक मंजूर करते हुए पति और सास से सोने के मूल्य के रूप में 8.9 लाख रुपये वसूलने के फैमिली कोर्ट के 2011 के आदेश को रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के तर्क को नकार दिया कि एक नवविवाहित महिला को पहली रात ही सारे सोने के आभूषणों से वंचित कर दिया जाना विश्वसनीय नहीं है।

ये था पूरा मामला

महिला ने आरोप लगाया कि उसके गहने शादी के पहले ही दिन उसके पति ने ले लिए थे और रिश्ते में खटास आने के बाद और उनके अलग होने के फैसले के बाद उसने अपनी संपत्ति वापस पाने के लिए पारिवारिक अदालत का दरवाजा खटखटाया। 2009 में पारिवारिक अदालत ने उसके पक्ष में फैसला सुनाया और उसके पति को उसे 8.9 लाख रुपये देने का आदेश दिया, लेकिन केरल हाईकोर्ट ने आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि पत्नी यह साबित करने में असफल रही है कि उसका ‘स्त्रीधन’ उसके पति ने लिया था।

PM मोदी को कभी ‘नर्वस’ तो कभी ‘डरा हुआ’ कहकर उछल रहे राहुल गाँधी… 7 दिन में नहीं कर पाए उनसे आधी भी रैली, प्रधानमंत्री 1 हफ्ते में 25 जगह गरजे

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने एक चुनावी रैली में कहा है कि पीएम मोदी आजकल नर्वस हो गए हैं और वह अगले कुछ दिनों में मंच पर आँसू बहा सकते हैं। कॉन्ग्रेस नेता ने यह बयान कर्नाटक के बीजापुर में दिया, इससे पहले राहुल गाँधी ने कहा था कि पीएम मोदी डर से काँप रहे हैं।

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी बीते कुछ दिनों से लगातार सम्पत्ति के दोबारा बँटवारे, जातिगत जनगणना और लोगों की सम्पत्ति के सर्वे के मुद्दे को उठा रहे हैं। सम्पत्ति के दोबारा बँटवारे के लिए वह देश के लोगों की सम्पत्ति के एक्सरे की बात भी कह चुके हैं। अब उन्होंने पीएम मोदी पर हमले चालू किए हैं।

राहुल गाँधी ने बीजापुर में वादा किया कि जब कोई परिवार सोकर उठेगा तो उसे अपने खाते में ₹10,500 मिलेंगे। जब तक वह गरीबी से नहीं निकलेगा तब तक खटाखट खटाखट ₹8500 दिए जाएँगे। उन्होंने कहा कि युवाओं को महीने के ₹8500 टकाटक मिलेंगे।

राहुल गाँधी ने कर्नाटक में अपनी चुनाव रणनीति में परिवर्तन किया। यहाँ उन्होंने सम्पत्ति के सर्वे की कोई बात नहीं की ना ही उसे दोबारा बाँटने को लेकर जोर डाला। बीजापुर में राहुल कॉन्ग्रेस की चुनावी गारंटियों पर बात करते रहे।

इससे पहले 7 अप्रैल को राहुल गाँधी ने एक रैली में देश के लोगों की सम्पति के सर्वे की बात कही थी। उन्होंने सम्पत्ति के दोबारा बंटवारे को लेकर बात की थी। यह बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया है। पीएम मोदी इसको लेकर कॉन्ग्रेस पर हमलावर हैं।

पीएम मोदी ने सम्पत्ति के सर्वे और उसको दोबारा बाँटने पर कहा था कि कॉन्ग्रेस महिलाओं का मंगलसूत्र छीन कर उनको बाँटना चाहती है जिनके अधिक बच्चे है और जो घुसपैठिये हैं। पीएम मोदी ने इशारा किया था कि कॉन्ग्रेस संसाधनों पर मुस्लिमों का पहला हक़ बताती है, इसीलिए उन्हें सम्पत्ति बांटेंगी।

इसके बाद कॉन्ग्रेस नेता सैम पित्रोदा के एक और बयान ने इस मामले में कॉन्ग्रेस को कठघरे में खड़ा कर दिया था। सैम पित्रोदा ने आईडिया दिया था कि अमेरिका की तरह भारत में मृत्यु के बाद किसी की पूरी सम्पत्ति उसके बच्चों को ना मिले बल्कि उसका 55% सरकार ले ले। इसको लेकर भी पीएम मोदी ने हमला बोला था।

पीएम मोदी ने कहा था कि कॉन्ग्रेस जीते जी लोगों को टैक्स से और मरने के बाद विरासत टैक्स से मारेगी। पीएम मोदी ने इसे कॉन्ग्रेस की लूट करार दिया था जो कि जिन्दगी के साथ भी और जिन्दगी के बाद भी चलती रहेगी। इन सबके बाद राहुल गाँधी का सम्पत्ति के दोबारा बँटवारे से पीछे हटने का रुख भी सामने आया था।

जहाँ एक ओर राहुल गाँधी पीएम मोदी नर्वस बता रहे हैं तो वही दूसरी तरफ वह पीएम मोदी का चुनावी मुकाबला नहीं कर पा रहे। जहाँ उन्होंने बीते 7 दिनों में मात्र 9 चुनावी जनसभाएँ की हैं। इनमें भी एक दिल्ली में ही थी जो कि सामाजिक न्याय सम्मेलन के नाम से आयोजित की गई थी। इसके उलट प्रधानमंत्री मोदी लगातार रैलियां और रोड शो कर रहे हैं। पीएम मोदी ने पिछले 7 दिनों में 25 से अधिक जनसभाएँ और रोड शो किए हैं। वह एक दिन में औसतन 3-4 रैली-रोडशो कर रहे हैं।

रवि किशन की नहीं होगी DNA जाँच, मुंबई कोर्ट ने खारिज की याचिका: खुद को बेटी बताने वाली एक्ट्रेस को झटका, FIR भी दर्ज

मशहूर अभिनेता और गोरखपुर से सांसद रवि किशन को कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। खुद को रवि किशन की बेटी बताने वाली शिनोवा ने डीएनए टेस्ट की माँग की थी, लेकिन अदालत ने शिनोवा की याचिका खारिज कर दी है। शिनोवा ने मुंबई की डिंडोशी कोर्ट में अर्जी दाखिल की थी, लेकिन कोर्ट ने पाया कि दोनों के बीच कोई पारिवारिक रिश्ता नहीं है, ऐसे में डीएनए जाँच की माँग का कोई आधार नहीं बनता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ दिनों पहले एक महिला ने खुद को रवि किशन की प्रेमिका बताया था तो वहीं महिला की बेटी शिनोवा का कहना था कि रवि किशन उसके पिता हैं। इसी सिलसिले में शिनोवा ने रवि किशन के डीएनए टेस्ट की माँग की थी। मगर अब अदालत से रवि किशन को बड़ी राहत मिली है। मुंबई की डिंडोशी सत्र अदालत ने डीएनए जाँच की माँग को सिरे से ठुकराते हुए शिनोवा की याचिका भी खारिज कर दी।

इस केस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि यहाँ ऐसा कोई मामला नजर नहीं आ रहा है। शिनोवा और उसकी माँ का रवि किशन से कोई पारिवारिक संबंध नजर नहीं आ रहा है। इसलिए डीएनए जाँच का सवाल ही नहीं उठता है। हालाँकि कोर्ट का पूरा फैसला अभी तक सामने नहीं आया है।

बता दें कि लखनऊ की रहने वाली महिला अपर्णा सोनी उर्फ अपर्णा ठाकुर ने रवि किशन को लेकर बड़ा खुलासा किया था। अपर्णा का दावा था कि रवि किशन उनकी बेटी शिनोवा के पिता हैं। वहीं शिनोवा ने भी वीडियो जारी करके प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इंसाफ की गुहार लगाई थी।

शिनोवा का वीडियो वायरल होने के बाद रवि किशन की पत्नी प्रीति शुक्ला एक्शन मोड में आ गई थीं। उन्होंने लखनऊ के हजरतगंज थाने में अपर्णा और उनकी बेटी शिनोवा के खिलाफ झूठा आरोप लगाने की शिकायत दर्ज करवाई। प्रीति शुक्ला का कहना था कि दोनों माँ-बेटी पैसे ऐंठने के लिए रवि किशन को बदनाम कर रही हैं। वहीं अब अदालत ने भी शिनोवा की डीएनए टेस्ट की माँग ठुकरा दी है।

संदेशखाली में CBI का छापा, TMC नेता हफीजुल खान के ठिकाने पर मिला गोला बारूद और विदेशी पिस्टल: शाहजहाँ शेख का है करीबी

केन्द्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने पश्चिम बंगाल के संदेशखाली में शुक्रवार (26 अप्रैल, 2024) को छापेमारी की है। CBI को संदेशखाली में बड़ी मात्रा में हथियार और गोला बारूद बरामद हुए हैं। CBI संदेशखाली में ED टीम पर हुए जनवरी, 2025 में हुए हमले की जाँच कर रही है।

CBI ने संदेशखाली में शाहजहाँ शेख के एक करीबी के घर पर छापेमारी की है जहाँ से उसे बड़ी मात्रा में हथियार बरामद हुए हैं। बताया जा रहा है कि यहाँ से उसे विदेश में बने हथियार तक बरामद हुए हैं। CBI की टीम केन्द्रीय सुरक्षा बलों के साथ यहाँ पहुँची है।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, CBI की टीम संदेशखाली के सर्बेरिया इलाके में छापेमारी करने पहुँची है जहाँ उसने शाहजहाँ के एक करीबी हफीजुल खान के घर से यह हथियार बरामद किए हैं। हफीजुल भी तृणमूल कॉन्ग्रेस का नेता बताया जा रहा है।

CBI 5 जनवरी, 2024 को प्रवर्तन निदेशालय (ED) पर संदेशखाली में हुए हमले के सिलसिले में यह छापेमारी करने पहुँची है। CBI की यह छापेमारी सुबह से ही जारी है। इस मामले में अभी बंगाल सरकार की कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

गौरतलब है कि 5 जनवरी, 2024 को प्रवर्तन निदेशालय (ED) की एक टीम संदेशखाली में पूछताछ करने गई थी। यह टीम राशन घोटाला मामले में शेख शाहजहाँ से पूछताछ करने पहुँची थी। इस दौरान ED और केन्द्रीय सुरक्षा बलों की टीम पर शाहजहाँ के गुंडों ने हमला बोल दिया था।

उनकी गाड़ियाँ तोड़ दी थीं और अधिकारियों को घायल कर दिया था। इस हमले में तीन अधिकारी घायल हो गए थे। ED की टीम काफी मुश्किल से यहाँ से निकल पाई थी। इसके बाद इस हमले के मामले में FIR दर्ज हुई थी।

इस हमले के लगभग एक महीने के बाद संदेशखाली का भयावह सच देश के सामने आना चालू हुआ था। पूर्व TMC नेता और स्थानीय दबंग शेख शाहजहाँ और कुछ अन्य नेताओं पर महिलाओं ने यौन शोषण के आरोप लगे थे। इसके अलावा इन पर लोगों की जमीन कब्जाने, मारने पीटने और धमकाने के आरोप भी लगे थे। शेख शाहजहाँ पहले फरार हो गया था लेकिन बाद में वह पकड़ा गया था। वर्तमान में वह केन्द्रीय एजेंसियों की हिरासत में है।

TMC बांग्लादेशी घुसपैठियों से करवाती है जमीन पर कब्जा, कॉन्ग्रेस उन्हें पैसे बाँटती है: मालदा में PM मोदी का हमला, बोले- अगले जन्म में बंगाल में पैदा लूँगा

लोकसभा चुनाव 2024 में दूसरे चरण का मतदान आज शुक्रवार (26 अप्रैल 2024) को जारी है। इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पश्चिम बंगाल के मालदा में एक रैली को संबोधित किया। यहाँ उन्होंने पश्चिम बंगाल से अपने प्रेम और निकटता के बारे में बताया और कहा कि उन्हें लगता है कि पिछले जन्म में उनका जन्म पश्चिम बंगाल में हुआ था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनसभा में आए हुए लोगों की भावनाओं की कद्र करते हुए कहा, “आप सब इतना प्यार दे रहे हैं, ऐसा लगता है मैं पिछले जन्म में या तो बंगाल में पैदा हुआ था या अगले जन्म में बंगाल की किसी माँ की गोद से पैदा होने वाला हूँ। मुझे इतना प्यार कभी नसीब नहीं हुआ।”

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) पर निशाना साधते हुए पीएम मोदी ने कहा कि TMC के राज में बंगाल में एक ही चीज चलती है और वह है- हजारों करोड़ के स्कैम। उन्होंने कहा कि घोटाले TMC करती है और भुगतान बंगाल की जनता को करना पड़ता है।

बंगाल की समृद्धि वाले इतिहास की याद दिलाते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, “एक समय था, जब बंगाल पूरे देश के विकास का नेतृत्व करता था। लेकिन, पहले लेफ्ट वालों ने और फिर TMC वालों ने बंगाल की इस महानता को चोट पहुँचाई, बंगाल के सम्मान को चूर-चूर कर दिया और विकास पर रोक लगा दी।”

बंगाल की जनता को दिए जा रहे केंद्रीय योजनाओं के लाभ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “बंगाल के 50 लाख से ज्यादा किसानों के खाते में पीएम किसान सम्मान निधि के 8,000 करोड़ रुपए सीधे भेजे गए हैं। लेकिन, TMC सरकार आपको लूटने का कोई मौका नहीं छोड़ती। मैं बंगाल के विकास के लिए यहाँ की सरकार को जो पैसा भेजता हूँ, वो TMC के नेता, मंत्री और तोलाबाज मिलकर खा जाते हैं।”

प्रधानमंत्री ने कहा, “माँ-माटी-मानुष की बात कहकर सत्ता में आई TMC ने सबसे बड़ा विश्वासघात यहाँ की महिलाओं से ही किया है। जब BJP सरकार ने मुस्लिम बहनों को अत्याचार से बचाने के लिए तीन तलाक खत्म किया तो TMC ने इसका विरोध किया। संदेशखाली में महिलाओं पर इतने अत्याचार हुए और TMC सरकार आखिर तक मुख्य आरोपी को बचती रही।”

प्रधानमंत्री ने TMC पर तुष्टिकरण का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “TMC और कॉन्ग्रेस को जोड़े रखने का सबसे बड़ा चुंबक है- तुष्टिकरण। तुष्टिकरण के लिए ये दोनों पार्टियाँ कुछ भी कर सकती हैं। तुष्टिकरण की खातिर ये लोग देशहित में लिए गए हर निर्णय को वापस पलटना चाहते हैं।”

उन्होंने कहा, “TMC और कॉन्ग्रेस में तुष्टिकरण का कॉम्पिटिशन चल रहा है। TMC सरकार बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों को लाकर बसाने का काम करती है। इन घुसपैठियों को आपकी जमीन और खेत पर कब्जा करवाती है और कॉन्ग्रेस आपकी संपत्ति ऐसे वोटबैंक में बाँटने की बात कर रही है।”

दारू घोटाला केस में मनीष सिसोदिया को फिर नहीं मिली राहत, शराब कारोबारी विजय नायर के साथ 8 मई तक बढ़ी न्यायिक हिरासत

दिल्ली शराब घोटाला केस में तिहाड़ जेल में बंद आप नेता मनीष सिसोदिया को फिर राहत नहीं मिली है। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने शराब घोटाला मामले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में आप नेता मनीष सिसोदिया, विजय नायर और अन्य आरोपितों की न्यायिक हिरासत 8 मई, 2024 तक बढ़ा दी है। मनीष सिसोदिया को ईडी के साथ ही सीबीआई ने भी गिरफ्तार किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राउज एवेन्यू कोर्ट में सुनवाई के दौरान प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने जवाब दाखिल करने के लिए समय माँगा था। इस पर कोर्ट ने ईडी को 8 मई तक का समय दिया। कोर्ट ने कहा कि दस्तावेजों के निरीक्षण को लेकर ईडी 8 मई दोपहर 12 बजे तक अपना जवाब दाखिल कर सकती है। मनीष सिसोदिया को पिछले साल 26 फरवरी को गिरफ्तार किया गया था। सीबीआई की गिरफ्तारी के बाद से ही सिसोदिया दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं।

सीबीआई की हिरासत 7 मई तक

बता दें कि इस मामले में मनीष सिसोदिया को सीबीआई ने भी गिरफ्तार किया है। अभी सीबीआई के पास 7 मई तक की हिरासत है। बुधवार (24 अप्रैल 2024) को सीबीआई ने उन्हें कोर्ट में पेश कर हिरासत बढ़ाने की माँग की थी, जिसे कोर्ट ने 7 मई तक बढ़ा दी थी। बता दें कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी अभी तिहाड़ जेल में बंद हैं। कोर्ट ने उनकी भी कस्टडी बढ़ा दी है। इस मामले में बीआरएस की एमएलसी के कविता भी जेल में बंद हैं, उन्हें ईडी ने हैदराबाद से गिरफ्तार किया था।

गौरतलब है कि दिल्ली शराब घोटाला केस में ईडी का आरोप है कि दिल्ली आबकारी नीति को संशोधित करते समय अनियमितताएं बरती गईं, लाइसेंस धारकों को अनुचित लाभ दिया गया, लाइसेंस शुल्क माफ कर दिया गया या कम कर दिया गया और सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के बिना लाइसेंस दिए गए। इस मामले में मनी ट्रेल भी सामने आ चुकी है।

कॉलेजियम सिस्टम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी नहीं हुई दर्ज… सुनवाई तो दूर की बात: हजारों वकीलों को समान अवसर मिलने की बात अब कौन सुनेगा?

हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति करने वाली कॉलेजियम सिस्टम में किसी तरह की दखल सुप्रीम कोर्ट नहीं चाहता है। कॉलेजियम प्रणाली पर सवाल उठाने वाली एक रिट याचिका को सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने दर्ज करने से इनकार कर दिया है। रजिस्ट्री का कहना है कि साल 2016 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम 2014 को संविधान पीठ पहले ही फैसला दे चुकी है।

याचिकाकर्ता एडवोकेट मैथ्यूज जे नेदुमपारा को जवाब देते हुए सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार ने कहा कि इस मामले से संबंधित सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन एवं अन्य बनाम भारत संघ केस में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा पहले ही फैसला किया जा चुका है। इस निर्णय में संविधान पीठ ने 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक आयोग (NJAC) को असंवैधानिक और शून्य घोषित कर दिया था।

रजिस्ट्रार ने कहा कि NJAC संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करता था, इसलिए असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है। वर्तमान याचिका उन्हीं मुद्दों से संबंधित है, जिन्हें पूर्व के फैसले द्वारा खत्म किया जा चुका है। रजिस्ट्रार ने यह भी कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान याचिका स्थापित सिद्धांतों को ‘अतिक्रमण’ करने के लिए या ‘किसी गुप्त उद्देश्य से’ दायर की गई है।

रजिस्ट्रार ने कहा कि एनजेएसी पर फैसले के खिलाफ 2018 में दायर एक समीक्षा याचिका को भी संविधान पीठ ने खारिज कर दिया था। बेंच ने याचिका को ध्यान से देखा और उसमें कोई योग्यता नहीं पाई।याचिकाकर्ता संविधान के अनुच्छेद 32 की आड़ में 2015 के फैसले की समीक्षा की माँग कर रहे हैं। इन मुद्दों को ‘कानूनी रूप से दोबारा उठाने की अनुमति’ नहीं दी जा सकती।

इसके आधार पर रजिस्ट्रार ने सुप्रीम कोर्ट नियम 2013 के आदेश XV नियम 5 के आलोक में याचिका लेने से इनकार कर दिया। आदेश XV नियम 5 इस प्रकार है: “रजिस्ट्रार इस आधार पर याचिका प्राप्त करने से इनकार कर सकता है कि यह किसी उचित कारण का खुलासा नहीं करता है या तुच्छ है या इसमें घोटाला है।”

याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में कहा कि कॉलेजियम प्रणाली के कारण ‘याचिकाकर्ताओं और हजारों वकीलों को समान अवसर से वंचित’ कर दिया गया है। इसके अलावा, याचिका में यह घोषित करने की माँग की गई कि एनजेएसी ‘लोगों की इच्छा’ है और सुप्रीम कोर्ट एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण ‘विधायी और कार्यकारी नीति के विशेष क्षेत्र’ में आता है।

बताते चलें कि कॉलेजियम सिस्टम भाई-भतीजावाद और जातिवाद का ऐसा मिश्रण है कि न्यायिक क्षेत्र में इसे ‘अंकल कल्चर’ कहा जाने लगा है। अन्य क्षेत्रों की तरह केंद्र की मोदी सरकार ने इसमें आवश्यक सुधार करने की कोशिश की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने खुद को सर्वोच्च ऑथरिटी बताते हुए संसद में बने इस कानून को ही खारिज कर दिया। इसके कारण जनता में पहले से ही बैठी आशंका और मजबूत हो गई कि सुप्रीम कोर्ट आखिर कॉलेजियम में पारदर्शिता तक क्यों नहीं लाना चाहता है।

क्या है कॉलेजियम सिस्टम

कॉलेजियम सिस्टम सुप्रीम कोर्ट द्वारा खुद से विकसित किया हुआ एक सिस्टम है, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति की जाती है। यह नियुक्ति फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के पाँच वरिष्ठ जजों की अनुशंसा पर ही की जाती है। हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति भी कॉलेजियम की सलाह पर होती है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, संबंधित हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस और उस राज्य के राज्यपाल शामिल होते हैं।

कॉलेजियम सिस्टम कोई संवैधानिक अवधारणा नहीं है, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने तीन फैसलों के आधार पर विकसित किया गया है। इसे ‘जजेस केस’ के नाम से जाना जाता है। पहला केस 1981, दूसरा 1993 और तीसरा 1998 के केस से जुड़ा है। 1981 के पहले केस को एसपी गुप्ता केस के नाम से भी जाना जाता है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जजों की नियुक्ति के लिए चीफ़ जस्टिस के पास एकाधिकार नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें सरकार की भी भूमिका होनी चाहिए। 1993 में दूसरे केस में 9 जजों की एक बेंच ने कहा कि जजों की नियुक्तियों में मुख्य न्यायाधीश की ‘राय’ को बाकी लोगों की राय के ऊपर तरजीह दी जाए। इस तरह 1998 के तीसरे केस में सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम का आकार बड़ा करते हुए इसे पाँच जजों का एक समूह बना दिया।

इन तीन केसों के आधार पर कॉलेजियम सिस्टम को विकसित किया गया और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के साथ-साथ चार अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों की राय को अनिवार्य बना दिया गया। इनकी राय के बिना सुप्रीम कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में किसी भी न्यायाधीश की नियुक्ति नहीं की जा सकती।

जजों की नियुक्ति को लेकर क्या कहता है संविधान

सारा काम इसी ‘राय’ को ‘सहमति’ बनाने को लेकर है। संविधान में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के वरिष्ठ जजों से विचार-विमर्श करके ही राष्ट्रपति करेंगे। संविधान के अनुच्छेद 124 में सुप्रीम कोर्ट और उसमें जजों की नियुक्ति और अनुच्छेद 217 में हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति से संबंधित प्रावधान है।

संविधान के अनुच्छेद 217 में कहा गया है कि राष्ट्रपति हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश, राज्य के राज्यपाल और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से विचार-विमर्श करने के बाद निर्णय लेंगे।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने ‘जजेज केसेस’ में संविधान में उल्लेखित शब्द ‘कंसल्टेशन’ की व्याख्या करके ‘सहमति’ कर दी। यानी विचार-विमर्श को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की ‘सहमति’ के रूप में संदर्भित कर दिया।

मोदी सरकार का न्यायिक सुधार और सुप्रीम कोर्ट का अड़ंगा

साल 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद अन्य क्षेत्रों की तरह न्यायिक क्षेत्रों में भी सुधार करने की कोशिश की। मोदी सरकार ने साल 2014 में संविधान में 99वाँ संशोधन करके नेशनल ज्यूडिशियल अप्वाइंटमेंट कमीशन (NJAC) अधिनियम लेकर आई। इसमें सरकार ने कॉलेजियम की जगह जजों की नियुक्ति के लिए NJAC के प्रावधानों को शामिल किया था।

NJAC में 6 सदस्यों का प्रावधान किया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ जज, केंद्रीय कानून मंत्री और दो अन्य विशेषज्ञ शामिल हैं। इन दो विशेषज्ञों का चयन प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मिलकर करेंगे। इसमें यह भी प्रावधान है कि ये दो विशेषज्ञ हर तीन साल पर बदलते रहेंगे।

इसके साथ ही साल 2014 में संविधान संशोधन करके केंद्र सरकार ने जजों की नियुक्ति के मामले में बड़ा बदलाव किया। इस संशोधन में संसद को यह अधिकार दिया गया कि भविष्य में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति से जुड़े नियमों को बना सकता है और जरूरत पड़ी तो उसमें बदलाव भी कर सकता है।

केंद्र सरकार द्वारा इस कानून को बनाने के बाद साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्युडिशियल अप्वाइंटमेंट्स कमीशन अधिनियम को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘संविधान के आधारभूत ढाँचे से छेड़छाड़’ बताते हुए रद्द कर दिया। बता दें कि संविधान में सुप्रीम कोर्ट को मौलिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में बताया गया है, जबकि देश में कानून बनाने का अधिकार सरकार और संसद के पास ही है।

कॉलेजियम पर भाई-भतीजावाद और गुटबाजी का आरोप

कॉलेजियम सिस्टम पर जजों की नियुक्ति के मामले में अक्सर भाई-भतीजावाद का आरोप लगता है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में भयानक भाई-भतीजावाद और जातिवाद का आरोप लगता है। इतना ही नहीं इस प्रक्रिया में गुटबाजी के कारण केसों के प्रभावित होने के आरोप लगते हैं।

न्यायपालिका में ‘अंकल कल्चर’ कहते है। इसके तहत अधिकांश ऐसे जजों को ही चुना जाता है, जिनके परिवार से कोई जज रह चुका होता है या जिनकी न्यायपालिका में ऊँचे पदों पर जान-पहचान है। कहा जाता है कि देश की न्यायिक व्यवस्था सिर्फ 300 परिवारों के इर्द-गिर्द घुमती है।

यह भी कहा जाता है कि कॉलेजियम सिस्टम के कारण जजों के बीच आपसी पॉलिटिक्स और गुटबाजी होती रहती है। इसके कारण जज फैसला लिखने से ज्यादा ध्यान इस बात पर लगाते हैं कि कौन जज बने। इससे न्यायिक व्यवस्था प्रभावित होती है। बताते चलें कि इस समय देश में लगभग 5 करोड़ केस विभिन्न न्यायालयों में पेंडिंग हैं।

पूर्व कानून मंत्री का कॉलेजिम सिस्टम पर वार

इस कानून को नकारने के बाद सुप्रीम कोर्ट और केंद्र के बीच पिछले दिनोें तानातानी बढ़ गई थी। पूर्व केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री किरेन रिजिजू ने अक्टूबर 2022 को कहा कि देश के लोग कॉलेजियम सिस्टम से खुश नहीं हैं और संविधान की भावना के मुताबिक जजों की नियुक्ति करना सरकार का काम है। केंद्र ने तो यहाँ तक कह दिया कि जज इस सिस्टम के जरिए अधिकतर समय राजनीति और गुटबाजी में व्यस्त रहते हैं।

उन्होंने कहा था कि आधे समय न्यायाधीश नियुक्तियों को तय करने में व्यस्त होते हैं, जिसके कारण उनका जो प्राथमिक काम न्याय प्रदान करना होता है, वह प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि संविधान में पूरी तरह स्पष्टता है कि भारत के राष्ट्रपति न्यायाधीशों की नियुक्ति करेंगे। इसका मतलब है कि कानून मंत्रालय भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से न्यायाधीशों की नियुक्ति करेगा। 

25 नवंबर 2022 को केंद्रीय क़ानून मंत्री किरेन रिजिजू ने कॉलेजियम द्वारा जजों की नियुक्ति को ‘संविधान से परे’ और एलियन बता दिया। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम प्रणाली में कई खामियाँ हैं और लोग आवाज उठा रहे हैं कि यह पारदर्शी नहीं है और ना ही इसमें जवाबदेही है। 

किरेन रिजीजू ने कहा, “भारत का संविधान जनता और सरकार के लिए ‘धार्मिक दस्तावेज’ है। कोई चीज जो संविधान से अलग है, उसे सिर्फ अदालत के कुछ जजों ने तय किए जाने के कारण आप कैसे माना सकता है कि उसका पूरा देश समर्थन करता है। आप बताएँ कि कॉलेजियम प्रणाली किस प्रावधान के तहत निर्धारित की गई है।”

केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने आगे कहा कि जिस प्रकार मीडिया पर निगरानी के लिए भारतीय प्रेस परिषद है, उसी प्रकार न्यायपालिका पर निगरानी की भी व्यवस्था होनी चाहिए। लोकतंत्र में कार्यपालिका और विधायिका पर निगरानी की व्यवस्था मौजूद है, लेकिन न्यायपालिका के भीतर ऐसा कोई तंत्र नहीं है।

उन्होंने कहा, “हमारे कार्यपालिका और विधायिका अपने दायरे में बिल्कुल बँधे हुए हैं। अगर वे इधर-उधर भटकते हैं तो न्यायपालिका उन्हें सुधारती है। समस्या यह है कि जब न्यायपालिका भटकती है तो उसको सुधारने का व्यवस्था नहीं है।” उन्होंने कहा था कि अगर न्यायपालिका यह काम खुद करे तो अच्छा है।