भैंस, गधे और कार बेचकर पैसे जुटाने वाले प्रधानमंत्री को यह सोचना चाहिए कि बंदूक़ों और आरडीएक्स के साथ-साथ आतंकियों को सैलरी पर रखना पाकिस्तानी हुकूमत की अजीबोग़रीब नीतियों की तरफ इशारा करता है।
सवाल यह है कि इतने सालों तक अमरीकी फ़ौज की मौजूदगी होते हुए भी अफ-पाक सीमा पर से आतंकवादियों का ख़ात्मा क्यों नहीं हो सका? उप विदेश मंत्री करज़ई इसके कारण बताते हुए लिखते हैं कि इन आतंकियों को ‘स्टेट’ (अर्थात पाकिस्तान) द्वारा संरक्षण प्राप्त है।
सिद्धू ने पाकिस्तान का बचाव किया और कपिल ने सिद्धू का। ये रिश्ता क्या कहलाता है? जनता की मदद से अपना व्यापार चलाने वालों को जनभावना की ही क़द्र नहीं। जवानों के बलिदान का इनकी नज़र में कोई मोल नहीं!
रवीश कुमार का तो यह हाल है कि वे प्रनॉय रॉय के घर में तीसरी सबसे पुरानी चीज हो चुके हैं, लेकिन तब भी उनकी नौकरी छोड़ नहीं सकते क्योंकि उन्होंने इतना 'यश' कमाया है कि यहाँ से जाने के बाद उन्हें शायद ही कोई रोजगार दे।
बात दरअसल यह है कि रविश कुमार जैसे लोग पत्रकारिता के उस युग से वास्ता रखते हैं, जब खबरें नहीं फतवे दिए जाते थे, यानि कह दिया सो कह दिया, न खाता न बही-जो छेनू ने कह दिया वही सही।
अतीत में शिवसेना की बात को गंभीरता से न लेने का दावा करने वाले कुछ तथाकथित पत्रकारों व विश्लेषकों ने सामना में छपने वाले लेखों का शब्दशः भावार्थ कर इसे भगवद् गीता की तरह बाँचना शुरू कर दिया था।
आज देश में उन लोगों के लिए सख्ती न करने की बात की जा रही है जो देश की भावनाओं को न केवल आहत कर रहे हैं बल्कि देश के ख़िलाफ़ खड़े होकर देशद्रोही होने का सबूत भी दे रहे हैं।
किसी घटिया-कुंठित शख्स ने आपको अपने लिंग की तस्वीर भेजी। यह उसकी अति-बेहयायी का प्रमाण है। लेकिन वो राष्ट्रवादी है, इसका प्रमाण-पत्र आपने कैसे जारी कर दिया ?
भले ही देश आज अपने जवानों को खो देने की पीड़ा से गुज़र रहा हो, लेकिन वो सही और ग़लत को समझने में पूरी तरह से सक्षम हैं। कविता कृष्णन की यह ओछी हरक़त उनकी भ्रष्ट बुद्धि और विचारधारा को स्पष्ट करता है।