जहाँ एक तरफ देश पुलवामा में शहीद हुए 44 सीआरपीएफ के जवानों को लेकर शोक मना रहा था, वहीं दूसरी ओर दिव्या स्पंदना ने NDTV की आधी-अधूरी रिपोर्ट का इस्तेमाल करते हुए ट्रेन-18 के बारे में झूठी ख़बर फैलाते हुए ट्रेन को विफल बताया।
ऐसी हर बेहयाई के केन्द्र में ये यूजूअल सस्पैक्ट्स आते हैं, भारतीय पत्रकारिता के समुदाय विशेष, उन्हें अलग एंगल चाहिए कि बाकी लोग जवानों के परिवार से मिल रहे हैं, हम आतंकियों के घरवालों से मिल लेते हैं! उसके बाद क्या? उसके बाद यह कहना कि दोनों के माँ-बाप एक ही तरह के दुःख से गुजर रहे हैं?
फ़िल्म अभिनेत्री कंगना रनौत ने कहा, “अब जो भी शांति और अहिंसा की बात करेगा उस पर कालिख पोत कर, गधे पर बैठा कर चौराहे पर खड़ा कर देना चाहिए ताकि जो भी आए थप्पड़ मार कर जाए।”
जो मासूम ये तर्क देते पाए जाते हैं कि “हिंसा का इलाज हिंसा नहीं हो सकता”, वो क्यूट लोग अक्सर भूल जाते हैं कि हिटलर को रोकने के लिए हिंसा का ही इस्तेमाल करना पड़ा था।
भारी मात्रा में विस्फोटक सामग्री लाना, उसे वाहन पर असेम्बल करना, कई दिन पहले से इलाके की रेकी करना और पूरा प्लान बनाने में अच्छा-खासा समय लगता है। यह स्थानीय सहायता के बिना संभव ही नहीं है।
गृह मंत्री ने शाम में कहा था कि सेना को हुर्रियत नेताओं की सुरक्षा पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया है। इस बयान के कुछ समय बाद ही सरकार द्वारा हुर्रियत नेताओं की सुरक्षा वापस लेने की बात कही जा रही है।
आतंकियों के हमले का निशाना अब 'भारत देश' की जगह 'गोमूत्र पीने वाले हिन्दू' हो चुके हैं। अमरनाथ यात्रा, संकटमोचन मंदिर पर हुए हमले की यादें भी ताजा ही होंगी। इन्हें पढ़कर 'हिन्दूफोबिया' किसी को नज़र नहीं आता।
आतंकियों को पाकिस्तानी सत्ता के संरक्षण का जीता-जागता उदाहरण। 5 साल पीछे। मसूद अज़हर की वो रैली जहाँ से पठानकोट और पुलवामा हमले की पटकथा का लिखा जाना शुरू हो गया था।
भारत में रह कर पाकिस्तान की भाषा बोलने वालों को यह बताने का समय आ गया है कि आप ऐसी घटिया हरक़त कर के देश की जनता को और उस जनता की मदद से चला रहे अपने व्यापार को ग्रांटेड नहीं ले सकते। अब समय आ गया है।