उत्तर प्रदेश में मुस्लिमों की जनसंख्या 20% के आसपास है। यानी लिबरलों व मीडिया के गिरोह विशेष के पास वहाँ के मुस्लिमों को भड़काने के ज्यादा मौके थे और इसके लिए पूरा प्रयास किया गया। लेकिन एक व्यक्ति, सिर्फ़ एक आदमी ने सभी साजिशों को ध्वस्त कर दिया।
जिनके बच्चे मरे, जिनकी बेटियों को नग्न करके दुराचार किया गया, जिनकी शादी में सिलिंडरों को उड़ाने की योजना थी, जिनके बच्चों को छः कट्टरपंथियों ने दो-दो घंटे चाकू मारे... उन्हें अब आर्थिक मदद से भी महरूम किया जाएगा? क्या मार डाले गए हिन्दुओं के परिवारों को सहायता करना पाप है? शेखर गुप्ता को दिक्कत किससे है?
बीबीसी कहता है कि रंजन गोगोई ने 'अलिखित सिद्धांतों' का पालन नहीं किया। वही बीबीसी, जो मीडिया के लिखित व अलिखित, सभी सिद्धांतों की रोज अनगिनत बार धज्जियाँ उड़ाता है। बीबीसी के इस लेख से पता चलता है कि असली घाव तो राम मंदिर से हुआ है।
उदित ने खुद को मुस्लिम हितैशी साबित करते हुए कुछ आँसू अपनी हथेली पर गिराए और लिखा, "बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान से प्रताड़ित मुस्लिम भारत में नागरिकता नहीं ले सकते। बाकी शेष अन्य धर्म के लोगों के लिए भारतीय नागरिकता का दरवाजा खुला है। इससे दलित समाज भावुक रूप से आहत हुआ।"
यह दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि भारत जैसे विकासशील देशों में आज भी किसी बड़े पुनर्जागरण के लिए कई जिंदगियाँ दाँव पर लगानी होती हैं। स्वच्छता और बेहतर हाइजिन जैसे मुद्दों को हर गली-गाँव और अखबारों की हेडलाइन बनने तक चाइनीज वायरस कोरोना एक बड़े वर्ग को प्रभावित कर चुका था। लेकिन देर से ही सही, लोग इस ओर जागरूक हुए और शायद इसके बाद इन सब बातों का महत्व समझना शुरू कर देंगे।
आश्चर्य की बात यह कि ममता के बंगाल से छपने वाले इस अखबार में बंगाल के मजहबी दंगे दिखाई नहीं देते, बीजेपी और आरएसएस के कार्यकर्ताओं की आए दिन होती हत्याएँ नहीं दिखतीं, लेकिन दलितों को एक वायरस से तुलना करते हुए, राष्ट्रपति पर निशाना साधा जाता है, क्योंकि वो भाजपा-संघ से जुड़े हुए रहे हैं।
उत्तर-पूर्व के रहवासियों की समृद्धि भारत के विकास की धुरी है। यह भारत की एकता, अखण्डता, शांति और सुरक्षा की आधारशिला है। विगत कुछ वर्षों से पूर्वोत्तर में बुनियादी अवसंरचना, समावेशी विकास और शान्ति-वार्ता के स्तर पर तीव्र परिवर्तन दिखाई दे रहा है।
बंगाल से छपने वाला अखबार होने के बावजूद ममता के शासन में यह पेपर भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या, हर जिले में हो रहे मजहबी दंगों और तमाम अपराधों से जलते बंगाल पर चुप्पी साध लेता है। ऐसे तमाम मौकों पर इनकी बुद्धि घास चरने चली जाती है और बेहूदे हेडलाइन सुझाने वाले एडिटरों की रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है। इनका सारा ज्ञान हेडलाइन में अपनी जातिवादी घृणा, हिन्दुओं से धार्मिक घृणा आदि में ही बहता रहता है।
इस लेख में सुप्रीम कोर्ट तक को नहीं बख़्शा गया है। संविधान की रट लगाने वाले राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और संसद द्वारा बनाए गए क़ानूनों की अवहेलना करने से भी बाज नहीं आते। सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद विध्वंस की और राम मंदिर के निर्माण का मार्ग क्यों प्रशस्त किया, इस पर आपत्ति जताई गई है। यानी कोर्ट भी अब वामपंथियों से पूछ कर फ़ैसले ले।
'रावण' के झंडे का रंग भी नीला ही है जैसा कि बसपा का। चंद्रशेखर उसी दलित जाति 'जाटव' से संबंधित हैं जिससे मायावती, और उन्हीं की तरह वेस्ट यूपी ही जिसकी जन्मभूमि और कर्मभूमि रही है। चंद्रशेखर की जातीय पृष्ठभूमि और कार्य क्षेत्र को देखते हुए ही मायावती और उनकी बसपा ने भीम आर्मी चीफ को शुरू से एक प्रतिद्वंदी के तौर पर देखा।