JNU वामपंथी की हालिया गतिविधियों के तार अगर एक सिरे से जोड़ते हुए देखा जाए, तो पता चलता है कि ये कोई विद्यार्थी या नेता या समाजवादी नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ एक शहरों में रहने वाला अनपढ़, कूप-मण्डूक, गतानुगतिक है, जिसे किसी भी हाल में क्रांति की तलाश थी और समय आने पर उसने अपनी क्रांति को परिभाषित भी कर डाला है, जिसका उदाहरण ऑन डिमांड आस्तिकता वाली शेहला राशिद है।
राहुल ने जब यह बोल दिया, और फिर कैलकुलेटर लेकर चिदम्बरम सरीखे जानकार लोग बैठे तो पता चला कि आलू से सोना भी बनने लगे, हर खेत में फ़ूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाकर, उसकी छतों पर भी खेती की जाए, फिर भी इतना पैसा पैदा करना नामुमकिन हो जाएगा।
ख़ुद केजरीवाल का जन्म हरियाणा स्थित भिवानी में हुआ। पढ़ाई के लिए वो पश्चिम बंगाल गए। नौकरी उन्होंने झारखण्ड के जमशेदपुर में की। समाज सेवा उन्होंने कोलकाता में की। राजनीति वो दिल्ली में कर रहे हैं। हाँ, इलाज कराने वो बंगलुरु जाते हैं। इसके लिए उन्हें किसी आरक्षण की ज़रूरत पड़ी क्या?
आज देश की बड़ी-बड़ी परीक्षाएँ कम्प्यूटर के माध्यम से होती हैं। ऐसे में इस कदम का विरोध करना केवल मूर्खता को दर्शाता है। लेकिन अगर इसके बावजूद किसी पढ़े- लिखे समुदाय की ‘भीड़’ को इससे शिक्षा व्यवस्था में खतरा नज़र आता है, तो हर विरोध प्रदर्शन का एक तरीका होता है।
"मैं रूस से आए निमंत्रण के बाद अपनी नानी के साथ ताशकंद गया, जब मैं उनके कमरे में गया (जहाँ शास्त्रीजी की मृत्यु हुई थी) तो मुझे पता चला कि उनके कमरे में एक घंटी तक नहीं थी। सरकार ने झूठ बोला था कि उनके कमरे में कई फोन थे। क्यों?"
कॉन्ग्रेस के जो लोग अपने आपको नेता, कार्यकर्ता कहते हैं, उन पर बड़ा तरस आता है। क्योंकि जहाँ कार्यकर्ता हो सकते हैं वह एकमात्र भाजपा है। कॉन्ग्रेस में कार्यकर्ता नहीं, ‘बाउंसर’ होते हैं। वे बाउंसर हैं सोनिया गांधी के, वे बाउंसर हैं राहुल के, और वे बाउंसर हैं मिसेज प्रियंका वाड्रा के।
मलाला का न्यूज़ीलैंड के मुद्दे पर दुख प्रकट करना और रवीना और रीना पर शांत हो जाना दिखाता है कि इंसान कितना ही प्रोग्रेसिव क्यों न हो जाए, लेकिन उसके भीतर मज़हब, और मज़हब का डर हमेशा जिंदा रहता है।
झूठ का पर्दाफाश होने के बाद भी ये उम्मीद मत रखिए कि दिल्ली के ठग और #बेगुसरायकाबकैत अपनी बेशर्मी के लिए कोई माफ़ी माँगेंगे। ये वो लोग हैं जो अपने गिरोह के लोगों या खुद की की हुई यौन शोषण, बलात्कार जैसी हरकतों पर भी चुप्पी साधते हैं।
भारतीय हितों के विरुद्ध पाकिस्तान और पाकिस्तान पोषित आतंकवाद के पक्ष में बैटिंग करना यह सोचने पर विवश करती है कि कॉन्ग्रेस ऐसा अनजाने में नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति के तहत नेहरू की नीति का अनुसरण करते हुए करती है।