कॉन्ग्रेस की चिड़चिड़ाहट का कारण केवल और केवल पीएम मोदी हैं। यह चिड़चिड़ाहट और बौखलाहट किसी न किसी रूप में सामने आती रहती है। इस बार यह झुंझलाहट पी चिदंबरम के रूप में सामने है।
एक रोती हुई माँ, बाहर विनती करता पूरा परिवार, मौलवियों-उलेमाओं द्वारा मस्जिद के लाउडस्पीकर से आग्रह, सुरक्षा बलों द्वारा नागरिकों को बचाने की कोशिश, इन सबके बीच आतंकियों ने कुछ ऐसा किया जो उनसे सहानुभूति रखने वालों की पोल खोल देगा।
भाजपा में एक साधारण कार्यकर्ता नेता बन सकता है, नेता से क्षत्रप, क्षत्रप से राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रधानमंत्री तक बन सकता है, लेकिन वह चाहकर भी पार्टी को हायजैक नहीं कर सकता है, चाहे वह कितना भी कद्दावर बना रहे।
ये बहुत ही धूर्त एडिटर का कमाल होता है जब वो लड़की के वक्षस्थल को घूरने को 'ग़लत बात' कहते हुए हेडलाइन बनाता है, और इमेज में वैसी ही तस्वीर लगाता है। इस आलोचना से वो अपने आप को इम्यून करना चाहता है कि 'मैं तो इस तरह के इमेज को शेयर न करने की सलाह दे रहा था'।
अरविन्द केजरीवाल के कारनामों का ताजा उदाहरण है उनका एक ट्वीट जिसमें एक प्रतीकात्मक चित्र में झाड़ू लिया हुआ व्यक्ति ‘स्वस्तिक’ चिह्न को खदेड़ कर भगा रहा है। इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस प्रकार का हिन्दू विरोधी चित्र केजरीवाल की टीम ने खुद बनाया हो।
बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं को चुनावी मैदान से दूर रखने की मंशा नए उम्मीदवारों को जगह देने और उनकी नई सकारात्मक राजनीतिक सोच को सामने लाने के मक़सद से की गई जान पड़ती है। ये बात और है कि विपक्ष द्वारा ऐसा दुष्प्रचार किया जाता है कि बीजेपी वरिष्ठ नेताओं को नज़रअंदाज़ कर रही है।
क्या तुमको सोनिया गाँधी से लगाव है, क्या तुमको राहुल गाँधी से प्रेम है, या फिर प्रियंका वाड्रा से मोहब्बत है? अगर ऐसा है भी तो उसका एक सपाट कारण बता दो कि इन लोगों का देश, समाज और अर्थव्यवस्था में क्या योगदान है जो तुम इन पर अपनी जान न्यौछावर करते हो?
लोजपा भी नवादा पर अपना दावा छोड़ने को तैयार नही है और गिरिराज सिंह भी पीछे नहीं हट रहे। हालाँकि, गिरिराज सिंह ने कहा है, "चुनाव लड़ूँ या नही, पार्टी की सेवा की है और आगे भी करता रहूँगा।"