सामाजिक मुद्दे

घिसी-पिटी और पॉलिटिकली करेक्ट लाइन से अलग और बेबाक बातें

सर्जिकल स्ट्राइक 2.0: ख़ून के प्यासे ‘अपर कास्ट हिन्दू’ मानवता के नाम पर धब्बा – वामपंथी पत्रकार गिरोह

अब वामपंथी मीडिया गिरोह के धूर्त पत्रकारों का इंतजार है कि वो कैसे हमें ज्ञान देते हैं कि 'जब पाकिस्तान शांति के लिए हाथ बढ़ा रहा है, तब हम उस पर हमला क्यों कर रहे हैं'।
स्वच्छता दूतों के पाँव धोते हुए प्रधानमंत्री मोदी

हम किस दौर में जी रहे हैं? पैर धोकर फोटो खिंचाए जा रहे हैं! ये रहा जवाब

मोदी के ऐसे प्रतीकात्मक कार्य आपको नौटंकी ही लगेंगे क्योंकि आप न तो लोयथम रिचर्ड को जानते हैं, न ही नाइदो तनियम को। आप उन हजारों उत्तर-पूर्व के लोगों को नहीं समझ पाते, और उनकी वेशभूषा पर टिप्पणियाँ करते हुए, उसके बालों के कारण उसकी जान ले लेते हैं।
गब्बर सिंह

गोली क्यों मारना, जब कह के ले सकते हैं पाकिस्तान की!

युद्ध हमेशा अंतिम विकल्प होना चाहिए। युद्ध तब तक टाला जाना चाहिए जब तक हमारे अस्तित्व पर ही संकट न आ जाए।
कंगना रानौत

वामपंथी मानसिकता में जकड़े बॉलीवुड के विरुद्ध राष्ट्रवाद की जलती हुई मशाल है कंगना रानौत

पर्दे से इतर आम ज़िंदगी में भी कंगना अतिविद्रोही स्वभाव की है, जो एकदम मुँहफट होकर वो सब कुछ कह देती है, जिसने कभी उनको क्षुब्ध किया है।
कश्मीरी छात्र

आखिर इतने कश्मीरी देहरादून पहुँचे कैसे? जानिए क्या है सच

कौन जानता है कि IMA जैसे संस्थानों पर भी ये शांतिदूत नजरें रखे हुए हों और आर्मी की गतिविधियों की सूचना कहीं भेजते हों? देहरादून में ही DRDO और आयुध निर्माण फ़ैक्ट्री भी हैं, जिन्हें बेहद संवेदनशील माना जाता है।
प्रतीकात्मक चित्र

कुप्रेक: वामपंथ के इश्क़ में ज़हर होना

उम्मीद है कि 'राष्ट्रवाद से नफरत' की मानसिकता वालों के भी कभी अच्छे दिन जरूर आएँगे, जब ये यकीन करना शुरू कर देंगे कि जुरासिक पार्क की फिल्मों के लिए असली डायनासौर और सुपरमैन फिल्म बनाने के लिए असली सुपरमैन की सहायता नहीं ली गई थी।
पुलवामा के वीरों के लिए लोगों ने की मदद

जवानों के बलिदान को जाति और वर्ग में सीमित कर देने वाले नहीं समझेंगे राष्ट्रवाद की परिभाषा

सोचने वाली बात है कि एक तरफ जहाँ पर देश के कोने-कोने से लोगों द्वारा वीरगति प्राप्त जवानों के लिए हर संभव मदद पहुँचाई जा रही हैं वहीं पत्रकारिता के समुदाय विशेष के कुछ लोग इसे अपनी विचारधारा में सराबोर कर रहे हैं।

विडियो: कारवाँ के एजाज़ अशरफ़, मूर्खता विरासत में मिली है या कारवाँ वाले डिप्लोमा कराते हैं?

पुलवामा के वीरों की जाति: ये काम दिलीप मंडल जैसे लोगों का था, अब 'नए एंगल' की तलाश में कारवाँ ने इस नाले में भी अपनी जगह बना ली है।
रवीश कुमार

रवीश जी गालियाँ आपके पत्रकारिता से तंग जनता का आक्रोश है, इसे भारत-माँ के नाम मत कीजिए

जब आपको तारीफें मिली, प्रसिद्धि मिली, आज आप जो कुछ हैं, जब वो सब मिला तो आपने कभी नहीं कहा कि ये सब 'भारत माँ' की वजह से है। और जब आपकी 'पक्षकारिता' की वजह से गालियाँ मिल रही हैं तो किस हक़ से इसे 'भारत माँ' को समर्पित कर रहे हैं?
कारवाँ का प्रोपगंडा

धिक्कार अशरफ़ और Caravan! 40 जवानों के शवों पर तुमने जाति का नंगा नाच किया है

अशरफ़ और कारवाँ ने इन जवानों की जाति का पता लगाने के लिए जिस नीचता का परिचय दिया, उसे जान कर आप कारवाँ मैगज़ीन के पन्नों का टॉयलेट पेपर की तरह प्रयोग करने से भी बचेंगे। मृतकों के परिजनों से हुतात्मा की जाति पूछना इनकी नीचता का परिचायक है।

सिर्फ और सिर्फ जिहादी हिंसा का संरक्षक है आतंकवाद

कुछ गिने-चुने मुसलमान ही ऐसे थे, जो सोशल मीडिया पर कुरीतियों और बुराइयों को स्वीकार कर उनका विरोध करते थे। लेकिन उनके एकाउंट को रिपोर्ट कर डिलीट करवा दिया गया। उनकी अभिव्यक्ति की आजादी ही छीन ली गई, क्योंकि वो सुधार की बात करते हैं।
पुलवामा अटैक

भाजपाइयों, कॉन्ग्रेसियों या दलितों-ब्राह्मणों का नहीं… यह गुस्सा राष्ट्रवादियों का है

भीड़ के इस गुस्से को यदि आप समझ नहीं पा रहे तो इंशा अल्लाह आपको प्रत्यक्ष रूप से कश्मीर में आजादी का नारा बुलंद करना चाहिए।

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