Monday, July 22, 2024
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‘भाईचारा’, ‘अच्छा मुस्लिम’ और डायरेक्टर के बेटे को छोड़ बाक़ी सब ठीक: ‘ग़दर 2’ से सनी देओल ने मनवाया लोहा, सीटियाँ-तालियाँ-नारों का माहौल बनाने वाली फिल्म

अगर बात की जाती है कि आज़ादी से पहले चारों ओर भाईचारा था, फिर काशी में नागा साधुओं और औरंगजेब के बीच हुए युद्ध को नज़रंदाज़ कर दिया जाएगा? अयोध्या को बचाने के लिए कई बार लड़ाइयाँ हुईं। सोमनाथ भी भयंकर युद्ध के बाद लूटा गया।

फिल्म ‘ग़दर 2’ सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। अभिनेता सनी देओल स्टारर इस फिल्म की समीक्षाएँ भी आ चुकी हैं। बड़ी संख्या में दर्शकों ने भी इसे पहले दिन देखा है। फिल्म में निर्देशक अनिल शर्मा के बेटे उत्कर्ष शर्मा, अमीषा पटेल, मनीष वाधवा और सिमरत कौर सहायक किरदारों में हैं। फिल्म की कहानी और एक्टिंग परफॉर्मेंस पर हम बाद में बात करेंगे, क्योंकि इस पर तो काफी कुछ लिखा-सुना जा चुका है। इसीलिए, सीधे मुद्दे पर आते हैं।

अगर आप ये सोच कर ‘ग़दर 2’ देखने जा रहे हैं कि इसमें बॉलीवुड का जो ट्रेंड रहा है उससे कुछ हट कर है, तो आप निराश होंगे। इसमें भी कथित भाईचारे का सन्देश दिया गया है। हिंदुस्तान के मुस्लिम को पाकिस्तानी पीटते हैं। पाकिस्तान में कई ऐसे मुस्लिम हैं जो हिन्दुस्तानियों की मदद करते हैं। इनमें महिलाएँ भी हैं। ये लोग सीधे-सादे दिखाए गए हैं, जो ‘मानवता’ के नाते भारतीयों की मदद करते हैं और मजहब आड़े नहीं आता।

‘अच्छा मुस्लिम’ और ‘भाईचारा’ की बातें डालने की ज़रूरत थी?

अगर आपको 2015 में आई फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ याद होगी तो आपको पाकिस्तान के ‘अच्छे मुस्लिमों’ के बारे में भी पता होगा। एक पत्रकार, जो हनुमान भक्त की मदद करता है। एक मौलवी, जो उसे पुलिस से बचाता है। उसी तरह ‘ग़दर 2’ में भी ऐसे किरदार हैं। एक दृश्य में सनी देओल कहते भी हैं कि अगर पाकिस्तानियों को भारत में रहने का मौका मिला तो आधा पाकिस्तान खाली हो जाएगा। ‘भाईचारा’ का सन्देश तो दिया गया है।

इसी तरह, सनी देओल के बेटे के किरदार में दिख रहे उत्कर्ष शर्मा पाकिस्तानी जनरल (मनीष वधावा) से कहते हैं कि उन्होंने शरीयत पढ़ी है और उनकी माँ (शकीना के किरदार में अमीषा पटेल) ने उन्हें कुरान भी पढ़ाया है। वो एक तरह से जताना चाहते हैं कि कुरान और शरीयत पाकिस्तानी कट्टरवादियों ने ठीक से नहीं पढ़ी, इसीलिए वो हिंसा करते हैं। जबकि विदेशों में कुरान जलाने वाले कहते हैं कि इसमें इस्लाम न मानने वालों की हत्या की बात कही गई है।

जहाँ तक शरीयत का सवाल है, इसके तहत अफगानिस्तान में महिलाओं को शिक्षा और नौकरी से वंचित कर दिया गया है। उन पर कोड़े बरसाए जाते हैं। शरीयत के हिसाब से भारत में भी मुस्लिमों के ‘पर्सनल लॉ’ हैं, जिसके तहत बेटियों को मृत पिता की संपत्ति में हिस्सा तक नहीं मिलता। ‘तीन तलाक’ जैसे महिला विरोधी नियम इसी कानून का हिस्सा थे, जिसे मोदी सरकार ने निरस्त किया। इसके तहत शौहर द्वारा 3 बार तलाक बोल या मैसेज में लिख तक देने से तलाक हो जाता था।

आज के समय में ‘अच्छा पाकिस्तानी मुस्लिम’ वाली थ्योरी शायद ही लोगों को पचे, क्योंकि राजस्थान के उदयपुर में कन्हैया लाल तेली की रेकी करने वाला उनका मुस्लिम पड़ोसी ही था, जिसके बाद उनका गला काट डाला गया था। महाराष्ट्र के अमरावती में उमेश कोल्हे की हत्या करने वाला उनका मुस्लिम दोस्त ही था, जिनकी उन्होंने मदद की थी कभी। थोड़ा पीछे जाएँ तो कश्मीर में BK गंजू नामक इंजीनियर की हत्या का कारण उनका मुस्लिम पड़ोसी ही था, जिसने उनके छिपने के ठिकाने के बारे में बता दिया और आतंकियों ने उन्हें मार डाला।

‘ग़दर 2’ में एक जगह सनी देओल डायलॉग बोलते हैं, “अगर रसूल का इस्लाम पढ़ा होता तो दुनिया ‘गजवा-ए-हिन्द’ नहीं, बल्कि ‘जज्बा-ए-हिन्द’ होती।” जबकि इस्लामी कट्टरपंथी गजवा-ए-हिन्द का स्रोत हदीथ को ही मानते हैं। हदीथ के बारे में कहा जाता है कि इसमें पैगंबर मुहम्मद और उनके परिवार की ही बातें हैं। एक बात है कि फिल्म में ‘गजवा-ए-हिन्द’ की चर्चा के बाद कम से कम लोग सर्च तो करेंगे इंटरनेट पर कि ये है क्या।

यहाँ भी संक्षेप में बता देना आवश्यक है। इस्लामी कट्टरपंथी मानते हैं कि हदीथ में वर्णन है कि मुस्लिमों और गैर-मुस्लिमों के बीच भारत में एक बड़ा युद्ध होगा। इसीलिए, ये इस्लामी कट्टरपंथी और आतंकी पूरे दक्षिण एशिया में इस्लाम के शासन, या खलीफा के शासन के लिए हिंसा करते हैं। भारत में इस्लामी आक्रांताओं को शासन करने में कई वर्ष लग गए थे। इसके बाद उन्होंने सैकड़ों वर्षों तक राज किया, लेकिन हिन्दू खत्म नहीं हुए। इसीलिए, वो मानते हैं कि जंग जारी है, बाकी है।

इसी तरह, ‘ग़दर 2’ में पाकिस्तान का एक और बुजुर्ग मुस्लिम कहता है कि आज़ादी से पहले सब भाईचारे के साथ रहते थे। सनी देओल का डायलॉग है कि आज़ादी की लड़ाई मुस्लिमों ने भी लड़ी। फिर ‘मुस्लिम लीग’ क्या था? इस्लामी कट्टरपंथियों ने तो लड़ाई बहादुरशाह ज़फर को बादशाह बनाने के लिए लड़ी, खिलाफत के लिए लड़ी (जिसके बाद मोपला मुस्लिमों ने केरल में हिन्दुओं का नरसंहार किया), पाकिस्तान बनाने के लिए लड़ी।

अगर बात की जाती है कि आज़ादी से पहले चारों ओर भाईचारा था, फिर काशी में नागा साधुओं और औरंगजेब के बीच हुए युद्ध को नज़रंदाज़ कर दिया जाएगा? अयोध्या को बचाने के लिए कई बार लड़ाइयाँ हुईं। सोमनाथ भी भयंकर युद्ध के बाद लूटा गया। बाबर ने कुरान-इस्लाम की बातें कर के ही अपनी फ़ौज में दिल्ली पर कब्जे के लिए जोश भरा। 30,000 मंदिरों को ध्वस्त कर दिया जाना कम से कम ‘भाईचारा’ की निशानी तो नहीं ही है।

एक्टिंग परफॉर्मेंस: सनी देओल ने मनवाया लोहा, ‘चाणक्य’ छाए

जहाँ तक एक्टिंग परफॉर्मेंस की बात है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि सनी देओल के पूरी फिल्म को अपने कंधे पर ढोया है। सनी देओल का चिल्लाना, चापाकल मोमेंट, बेटे पर बिगड़ना फिर प्यार, पत्नी के साथ रोमांस, नॉस्टैल्जिक संगीत, तोप-तलवार-चक्का वाले दृश्य, इमोशनल मोमेंट में रोना, डायलॉग्स को ऊर्जा के साथ परफॉर्म करना और आसानी से गोलियाँ चलाने से लेकर बमबारी तक वाले कारनामों को निभाना – वो इतनी सहजता से सब कुछ करते चले जाते हैं कि दिखता है कि उन्होंने कुछ खास प्रयास भी नहीं किया और सब कुछ परफेक्ट हो गया। ये इस अभिनेता की ताकत है।

दर्शकों को अपने साथ बाँध कर उसी जमाने में लेकर चले गए हैं जब ‘गदर’ आई थी – ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। सनी देओल को कभी उतना वर्सटाइल नहीं माना गया, क्योंकि उनका अपना एक अलग अंदाज रहा है। लेकिन, समय-समय पर उन्होंने ‘अर्जुन (1985)’, ‘अपने (2007)’ या ‘यमला पगला दीवाना (2011)’ जैसी फ़िल्मों के जरिए बताया है कि वो इसके साथ-साथ बहुत कुछ कर सकते हैं। उनके अंदाज़ को ही कई रूपों में ढाला जा सकता है।

इसी तरह ‘गदर 2’ में भी वो डायरेक्टर के सामने समर्पण करते हुए कहानी के हिसाब से अपने किरदार को जिते हुए दिखते हैं। ये दर्शकों का प्यार ही है कि वो उम्मीद करते हैं कि अगले दृश्य में ऐसा होगा और उसकी जरा सी झलक मिलते ही तालियाँ पीटते हैं, सीटियाँ बजती हैं। दक्षिण भारत के प्रमुख अभिनेताओं वाला चार्म सनी देओल में दिखता है, मतलब वो एक्शन वाले दृश्यों में कुछ भी कर सकते हैं और दर्शकों को अच्छा ही लगेगा।

22 साल बाद भी गदर का पर्यायवाची सिर्फ सनी देओल ही है। बॉलीवुड ने उनका सही इस्तेमाल न कर के बहुत कुछ मिस किया। आज जब ‘KGF’ जैसी फ़िल्में नाम कमाती हैं, सनी देओल इस दौरान में सक्रिय रह कर काफी कुछ ऐसा कर सकते थे। तालियाँ और सीटियाँ बजने वाले दृश्य भी कमर्शियल अथवा मास सिनेमा की पहचान है। सनी देओल के फैंस इस फिल्म से निराश नहीं होंगे। 67 वर्ष की उम्र में भी उन्होंने अपना लोहा मनवाया है।

अगर बात उत्कर्ष शर्मा की करें, तो वो इस फिल्म में सिर्फ इसीलिए हैं क्योंकि वो निर्देशक अनिल शर्मा के बेटे हैं। फिल्म में उन्हें अच्छी-खासी फुटेज दी गई है। थिएटर में एक्टिंग करते हुए दिखाया गया है, वो कॉमेडी करते हैं, रोमांस करते हैं, गानों में डांस करते हैं, फैमिली ड्रामा का हिस्सा हैं, एक्शन के दृश्यों में सनी देओल के साथ पाकिस्तानियों को पीटते हैं, टॉर्चर के दृश्यों में वो पीड़ित हैं – यानी, उत्कर्ष शर्मा की रीलॉन्चिंग का पूरा प्रयास किया गया है।

आपको ‘जीनियस’ फ़िल्म याद है 2018 की? उसका निर्देशन भी अनिल शर्मा ने ही किया था। फिल्म को समीक्षकों और दर्शकों, दोनों ने एकदम ही नकार दिया था। नवाजुद्दीन सिद्दीकी को विलेन बनाया गया था। मिथुन चक्रवर्ती एक महत्वपूर्ण किरदार में थे। बतौर संगीत निर्देशक हिमेश रेशमिया ने ‘तेरा फितूर’ (अरिजीत सिंह की आवाज में) और ‘दिल मेरी ना सुने’ (आतिफ असलम की आवाज में) जैसे अच्छे गाने बनाए जो चले भी।

फिर भी फ़िल्म पिट गई। उत्कर्ष शर्मा को 5 साल से कोई काम नहीं मिला। पिताजी ने ‘गदर 2’ के जरिए उन्हें रिलॉन्च करने की कोशिश की है। फ़िल्म भले चल जाए, उत्कर्ष शर्मा को फिर से तब तक कोई फ़िल्म नहीं मिलेगी जब तक अनिल शर्मा फिर से उन्हें लेकर कोई फ़िल्म नहीं बनाते हैं। वो ‘गदर 2’ की सबसे कामजोर कड़ी है। उनके दृश्य आपको बोरिंग लगेंगे। एंट्री वाले दृश्य में ही उनकी ओवरएक्टिंग नजर आ जाती है।

सिमरत कौर क्यूट लगी हैं और उन्हें 70 के दशक की एक लड़की के रूप में ढाला गया है और वो उस हिसाब से चुलबुली वाला किरदार निभाती भी हैं। हालाँकि, पाकिस्तान में उतना खुलापन अखरता है, जहाँ लड़कियाँ निर्णय लेती हैं कारोबार के मामले में और पिता के सामने बॉयफ्रेंड-शादी वगैरह की बातें कर सकती हैं। सनी देओल के साथ-साथ यहाँ एक और किरदार की बात करनी आवश्यक है। मुख्य विलेन, पाकिस्तानी जनरल के रोल में दिखे मनीष वाधवा।

आपको ‘चंद्रगुप्त मौर्य’ याद हैं? ये सीरियल 2011 में आता था, ‘इमेजिन टीवी’ पर। अगले साल ही ये चैनल ही बंद हो गया था। इस सीरियल में ‘चाणक्य’ का जो किरदार था, वो कइयों के जेहन में ऐसा बैठा कि आज तक बैठा ही हुआ है। सीरियल को पूरा भी नहीं किया जा सका था। मनीष वाधवा ने एक इंटरव्यू के दौरान बोला भी था कि उन्हें शिखा खोलने का मौका नहीं मिला, इसका उन्हें दुःख है।

शायद ही कोई ऐसा अभिनेता आज तक हुआ हो, जिसकी दूर-दूर तक भी अमरीश पुरी के साथ तुलना की जा सके। बच्चन-शाहरुख-रणवीर ‘डॉन’ हो सकते हैं, लेकिन ‘मोगैम्बो’ कोई नहीं हो सकता। गिन-चुन कर यही कोई 7 फिल्में की होंगी मनीष वाधवा ने, लेकिन सीरियलों में काम करने का अच्छा अनुभव है इनका। सीरियलों में अच्छे अभिनय के बावजूद उन्हें वैसा मौका नहीं मिला अपनी प्रतिभा को दिखाने का।

‘गदर 2’ में पाकिस्तानी जनरल के रूप में वो जमे हैं। खासकर उन्होंने अपने हाव-भाव और डायलॉग बोलने का जो स्टाइल आत्मसात किया है इस फ़िल्म के लिए, वो अंत तक उसका अनुसरण करते रहे हैं। वो चाणक्य के अलावा कंस, अजातशत्रु, बाजीराव पेशवा, महर्षि विश्वामित्र और रावण का किरदार भी निभाया है सीरियलों में। चन्द्रगुप्त मौर्य का किरदार निभा चुके आशीष शर्मा ने ऑपइंडिया के साथ एक इंटरव्यू के दौरान जो बताया था, शायद यही इसका कारण हो कि उन्हें मनीष वाधवा ज्यादा फिल्मों में नहीं दिखे।

उन्होंने कहा था कि बॉलीवुड के निर्माता-निर्देशक सीरियल के कलाकारों को ‘Stale’ कह कर संबोधित करते हैं, यानी बासी। उन्हें फिल्मों में लेने से हिचकते हैं। शाहरुख खान या सुशांत सिंह राजपूत जैसे अभिनेता जबकि सीरियलों से ही आए। कहानी की बात करें तो ‘ग़दर 2’ में कुछेक ट्विस्ट और मोड़ रखने की कोशिश की गई है। कुछ नया या खास नहीं है कहानी में, लेकिन जो भी है वो देखने में अच्छा लगता है। हाँ, ‘रिकॉल वैल्यू’ में फिट बैठती है ये।

‘ग़दर 2’ प्योर थिएटर दिलम: सीटियाँ, तालियाँ, नारे

कई दृश्य पुरानी ‘ग़दर (2001)’ के डाले गए हैं इसमें, या यूँ कहें कि याद दिलाए गए हैं। संगीत में ज़्यादा छेड़छाड़ नहीं किया गया है, ये अच्छी बात है। उदित नारायण की आवाज फिट बैठती है अब भी। ‘एक मोड़ आया’ गाने में बेटे आदित्य उनका अच्छा साथ देते हैं। कहीं-कहीं म्यूजिक लाउड है, कहीं-कहीं संस्कृत श्लोक हैं वीर रास वाले अंदाज़ में, लेकिन वो अखरते नहीं। कुल मिला कर फिल्म थिएटर में देखने लायक है। देखनी चाहिए।

अमीषा पटेल का बहुत ज्यादा रोल नहीं है। गानों के अलावा अधिकतर दृश्यों में वो कभी बेटे तो कभी पति के लिए रोती हुई ही दिखती हैं। उनका अभिनय सामान्य ही है, लेकिन गानों में मेकअप काफी ज़्यादा किया गया है। फिल्म निर्देशक उन्हें एक उम्रदराज माँ दिखाना चाहते थे या फिर मेकअप के साथ युवा नायिका, यहाँ थोड़ा कन्फ्यूजन का मामला है। अब नजरें ‘ग़दर 2’ के बॉक्स ऑफिस कलेक्शंस पर हैं, क्योंकि ‘ग़दर’ के फुटफॉल्स का रिकॉर्ड अब तक नहीं टूटा है।

‘ग़दर 2’ में पाकिस्तानियों की अच्छी धुलाई हुई है, उनकी फ़ौज का मजाक बनाए जाने से लेकर बांग्लादेश के गठन तक, डायलॉग्स में सब कुछ है। खासकर मास बेल्ट के लोगों को ये खासा पसंद आएगा। सीटियाँ बज रही हैं, तालियाँ पीटी जा रही हैं, ‘भारत माता की जय’ के नारे लग रहे हैं। कुल मिला कर माहौल बनाने वाली फिल्म है, अपने प्रीक्वल की तरह। पाकिस्तानियों को तो ये बिलकुल भी पसंद नहीं आएगी, लेकिन चोरी-छिपे वो देखेंगे मनोरंजन के लिए।

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अनुपम कुमार सिंह
अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
भारत की सनातन परंपरा के पुनर्जागरण के अभियान में 'गिलहरी योगदान' दे रहा एक छोटा सा सिपाही, जिसे भारतीय इतिहास, संस्कृति, राजनीति और सिनेमा की समझ है। पढ़ाई कम्प्यूटर साइंस से हुई, लेकिन यात्रा मीडिया की चल रही है। अपने लेखों के जरिए समसामयिक विषयों के विश्लेषण के साथ-साथ वो चीजें आपके समक्ष लाने का प्रयास करता हूँ, जिन पर मुख्यधारा की मीडिया का एक बड़ा वर्ग पर्दा डालने की कोशिश में लगा रहता है।

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