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‘दादी जैसी नाक वाली’ प्रियंका गाँधी तक बन गई MP, पर बिहार की ‘कोयल’ रह गई बंजर: PM मोदी ने ₹1800 करोड़ से परियोजना को दी धार, 42000 हेक्टेयर जमीन की बुझेगी प्यास

उत्तरी कोयल जलाशय परियोजना एक अंतर-राज्यीय सिंचाई परियोजना है जो दो राज्यों बिहार और झारखंड में फैला हुआ है। 1972 से परियोजना की शुरुआत हुई थी, लेकिन ये अब तक पूरी नहीं हो पाई है। मोदी सरकार इसके लिए ₹ 1800 करोड़ रुपए से ज्यादा उपलब्ध करा रही है।

1972 में अखंडित बिहार के सूखा प्रभावित इलाकों की सिंचाई के लिए राज्य सरकार ने एक परियोजना बनाई थी। नाम है- उत्तरी कोयल जलाशय परियोजना (North Koel Reservoir Project)। 53 साल बाद अब इस परियोजना के पूरे होने की उम्मीद जगी है, क्योंकि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसमें दिलचस्पी ले रहे हैं।

जब इस परियोजना की नींव डली तब इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थीं। केंद्र से राज्य तक कॉन्ग्रेस का एकछत्र शासन था। बाद के सालों में इंदिरा के बेटे राजीव गाँधी भी प्रधानमंत्री बने। उनकी बहू सोनिया गाँधी लगातार 10 सालों तक पर्दे के पीछे से सरकार हाँकती रहीं। लेकिन इस परियोजना की किसी ने सुध नहीं ली।

आज इंदिरा के पोते राहुल गाँधी में ‘पीएम मटेरियल’ देखने वालों की कमी नहीं है। पोती प्रियंका गाँधी, जिनके समर्थकों का दावा है कि ‘उनकी नाक दादी (इंदिरा) जैसी है’, सांसद बन चुकी हैं। लेकिन कोयल परियोजना के भाग्य नहीं बदले।

5 दशक पहले शुरू हुई थी परियोजना के पूरा होने पर झारखंड और बिहार के चार सूखाग्रस्त जिलों में 42301 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई हो सकेगी। 1972 में शुरू की गई ये परियोजना राजनीति और लालफीताशाही का शिकार हो गई।

वर्षों से लटकी परियोजनाओं की पीएम मोदी ने ली सुध

पीएम मोदी ने इस परियोजना समेत ऐसे लटके हुए दूसरे कई परियोजनाओँ को लेकर समीक्षा बैठक की। पीएम ने कहा कि परियोजनाओं की देरी से दोहरा नुकसान होता है। एक तो लागत बढ़ जाती है, वहीं दूसरी ओर लोग इतने समय तक लाभ से वंचित रह जाते हैं। इसलिए केन्द्र और राज्य के अधिकारी दोनों को मिलकर ऐसी परियोजना को खत्म करने का प्रयास करना चाहिए और लोगों को फायदा पहुँचाने पर काम करना चाहिए।

क्या है उत्तरी कोयल जलाशय परियोजना?

उत्तरी कोयल जलाशय परियोजना एक अंतरराज्यीय सिंचाई परियोजना है जिससे बिहार और झारखंड जुड़े हुए हैं। इसमें झारखंड के लातेहार के कुटकू गाँव से होकर बहने वाली उत्तरी कोयल नदी पर एक बाँध बनाने की योजना है। बाँध से 92 किलोमीटर दूर झारखंड के पलामू जिले के मोहम्मदगंज में बैराज बनेगा और फिर बैराज से दो नहरें निकलेंगी। दाहिनी मुख्य नहर (आरएमसी) और बैराज से बाईं मुख्य नहर (एलएमसी)

इस परियोजना की शुरुआत 1972 में किया गया था। उस वक्त बिहार और झारखंड अलग नहीं हुए थे। परियोजना को 1993 में वन विभाग ने रोक लगा दी थी क्योंकि बाँध में पानी जमा होने पर झारखंड के बेतला नेशनल पार्क और पलामू टाइगर रिजर्व को खतरा हो सकता था। काम रुकने के बाद यह परियोजना 71,720 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई के लिए सालाना जल दे रही थी।

2000 में जब बिहार से झारखंड अलग हुआ तो परियोजना के दोनों बैराज और बाँध झारखंड में आ गए। दो नहरों में से एक नहर झारखंड में रह गया जबकि दूसरा नहर बिहार और झारखंड दोनों में चला गया। बिहार में ये 79.08 किलोमीटर तक फैला हुआ है।

2017 में मोदी सरकार ने की थी पहल

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति ने उत्तरी कोयल जलाशय परियोजना के बाकी बचे कामों के लिए संशोधित 2,430.76 करोड़ रुपए की लागत से पूरा करने के लिए परियोजना को मंजूरी दी। इसमें केन्द्र का हिस्सा 1,836.41 करोड़ रुपए है।

अगस्त 2017 में बचे काम के लिए पहले 1,622.27 करोड़ रुपए को मंजूरी दी गई थी। इसमें केन्द्र का हिस्सा 1,378.60 करोड़ रुपये था। लेकिन अब इसे करीब 800 करोड़ रुपए बढ़ा दिया गया है।

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रुपम
रुपम
रुपम के पास 20 साल से ज्यादा का पत्रकारिता का अनुभव है। जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा। जी न्यूज से टेलीविज़न न्यूज चैनल में कामकाज की शुरुआत। सहारा न्यूज नेटवर्क के प्रादेशिक और नेशनल चैनल में टेलीविज़न की बारीकियाँ सीखीं। सहारा प्रोग्रामिंग टीम का हिस्सा बनकर सोशल मुद्दों पर कई पुरस्कार प्राप्त डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया। एडिटरजी डिजिटल हिन्दी चैनल में न्यूज एडिटर के तौर पर काम किया।

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