Tuesday, March 9, 2021
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पंडित दीन दयाल उपाध्याय: नेहरू जानते थे कि ये न केवल संसद का समीकरण बदलेगा बल्कि राजनीति भी बदल देगा

"मौत से पहले जिस ट्रेन से पंडित दीन दयाल उपाध्याय सफर कर रहे थे, उस ट्रेन में उस दिन मौजूद हर यात्री का अड्रेस फर्जी था। अगर वो ट्रेन से गिरे थे तो शव सीधा क्यों पड़ा हुआ था, 5 रुपए का नोट हाथ में क्यों था"

11 फरवरी 1968। आज की तारीख से 53 साल पहले। मुगलसराय जंक्शन पर सुबह-सुबह चद्दर से ढका एक शव मिला। ये शव लोहे-कंकड़ के ट्रैक पर पीठ के बल सीधे पड़ा हुआ था। मुट्ठी में 5 रुपए का नोट था। कलाई में नाना देशमुख नाम से घड़ी थी। जेब में थे सिर्फ़ 26 रुपए और एक प्रथम श्रेणी की टिकट थी, जिस पर नंबर 04348 था।

इस शव को सबसे पहले देखने वाले का नाम लीवर मैन ईश्वर दयाल था, जिनकी सूचना के बाद पटरी के पास पड़े इस आदमी की स्थिति स्टेशन मास्टर ने अपने रजिस्टर में ‘लगभग मृत’ लिख कर दर्ज की थी। 

ये शख्स कौन था? जिसके अंतिम समय से जुड़ी एक-एक कड़ी अब तक कई लोगों की स्मृतियों में कैद है और जिसके कारण हर साल ये तारीख आने पर एक सवाल खड़ा होता है कि आखिर उस दिन ये मृत्यु कैसे हुई?

11 फरवरी 1968 को मुगलसराय जंक्शन पर मिला वह शव जनसंघ के सह संस्थापक पंडित दीन दयाल उपाध्याय (पंडित जी) का था। आज उनके नाम पर आपको कई स्कूल, कॉलेज, संस्थान खुले मिलेंगे। उनकी विचारधारा ‘एकात्म मानववाद’ पर कई नेता उनकी प्रशंसा करेंगे। कई लोगों के जीवन में वह आदर्श भी पाए जाएँगे। लेकिन, इतनी महान विभूति के साथ अंतिम दिन क्या हुआ, ये कोई ठीक-ठीक नहीं बता पाएगा। समझने-समझाने को सिर्फ़ कुछ कड़ियाँ होंगी।

पंडित दीन दयान उपाध्याय का शव (साभार: गूगल)

वो बिंदुवार कड़ियाँ, जो आज भी पंडित दीन दयाल की मौत को ‘हत्या’ कहने पर मजबूर करती हैं

कुछ किताबों व रिपोर्ट्स के हवाले से बताया जाता है कि कत्ल से एक दिन पूर्व यानी 10 जनवरी 1968 पंडित उपाध्याय लखनऊ में अपनी मुँह बोली बहन लता खन्ना के घर पर थे। उसी रात उन्हें ट्रेन पकड़ कर अगले दिन के लिए सीधे दिल्ली आना था। जहाँ बजट सत्र के मद्देनजर जनसंघ की बैठक होने वाली थी। मगर, इससे पहले कि वह दिल्ली के लिए निकलें, लता खन्ना के घर बिहार जनसंघ के संगठन मंत्री अश्विनी कुमार ने फोन किया और उनके बिहार प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में शामिल होने का अनुरोध किया।

अश्विनी के आग्रह पर गौर करते हुए पंडित दीन दयाल ने दिल्ली में सुदर सिंह भंडारी से बात की और बिना कुछ सोचे कार्यक्रम में शामिल होने के लिए लखनऊ को अलविदा कह दिया। जल्दी-जल्दी में टिकट होने के बावजूद पंडित जी को प्रथम श्रेणी की बोगी ‘ए’ कम्पार्टमेंट में सीट मिली थी। स्वयं प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री राम प्रकाश गुप्त उन्हें छोड़ने गए थे। 

करीब 7 बजे पठानकोट-सियालदह एक्सप्रेस लखनऊ पहुँची। बैठने पर पता चला कि ट्रेन के बी कंपार्टमेंट में यूपी विधान परिषद के कॉन्ग्रेस सदस्य गौरी शंकर भी थे। ट्रेन चलते ही पंडित जी ने अपनी सीट की अदला-बदली गौरी शंकर के साथ की। ट्रेन चली और हर पड़ाव पार करके जौनपुर पहुँची।

समय रात के 12 बज रहे थे। उनकी मुलाकात जौनपुर के महाराज के कर्मचारी कन्हैया से हुई। उसके हाथ में महाराज का खत देख उन्हें याद आया कि वह अपना चश्मा कंपार्टमेंट में भूल गए हैं। इसी खत को पढ़ने के लिए वह दोबारा कंपार्टमेंट में आए और कन्हैया को कहा कि वह इसका जवाब बाद में देंगे।

यूट्यूब वीडियो से लिया गया स्क्रीनशॉट

ट्रेन फिर चली। अगली बार इसका स्टॉपेज मुगलसराय जंक्शन का प्लेटफॉर्म नंबर 1 था। गाड़ी चूँकि पटना नहीं जाती थी, इसलिए उसके डिब्बों को दिल्ली हावड़ा एक्सप्रेस से जोड़ा जाना था। पूरी प्रक्रिया में उस समय करीब आधे घंटे लगते थे। सो यात्रियों को चाहते न चाहते इंतजार करना ही था।

समय सारणी बता रही थी कि गाड़ी 2:50 पर चलेगी और पटना 6 बजे पहुँचाएगी। यानी सब चीजें तय थीं। उधर पटना में पंडित जी के स्वागत की तैयारी हो रही थी। लेकिन अगली सुबह हुआ क्या? पंडित जी पटना पहुँचे ही नहीं। गाड़ी का कोना-कोना छाना गया। उनका कोई नामोनिशान नहीं था। तब तक इधर, मुगलसराय जंक्शन पर मालूम चल चुका था कि कोई शव है, जो पत्थरों के ढेर पर पड़ा है।

स्टेशन पर पड़ा पंडित दीन दयाल का शव

मुगलसराय स्टेशन पर भीड़ इकट्ठा होने में देर नहीं लगी। दो सिपाही 3:45 पर वारदात वाली जगह पहुँचे। इनके बाद दारोगा फतेहबहादुर सिंह ने भी घटनास्थल का मुआयना किया। डॉक्टर आए और सारी नब्ज आदि देख उन्हें मृत करार दे दिया गया। बड़ी अजीब बात थी, जब पटना में पंडित जी को ट्रेन में न पाकर कैलाशपति मिश्र उदास हो रहे थे, तभी वहाँ मुगलसराय में पंडित जी को आधिकारिक तौर पर मृत घोषित किया जा रहा था।

किसी को नहीं पता था कि ये शव जनसंघ के सह-संस्थापक दीन दयाल उपाध्याय का है। पुलिस को भी नहीं। मगर वहाँ स्टेशन पर काम करने वाले एक बनमाली भट्टाचार्य थे, जिन्होंने उन्हें पहचाना और बाद में इसकी सारी जानकारी जनसंघ कार्यकर्ताओं को दी।

चूँकि पुलिस को उनके शव के पास टिकट भी बरामद हुआ था, तो बड़ी आसानी से नंबर मिलान करके उन्हें पहचान लिया गया। वहीं पुलिस को जितनी चीजें मौका-ए-वारदात से मिली, वह भी पुलिस ने संभाल कर रख ली।

उसी दिन सुबह के साढ़े 9 बजे वो ट्रेन, जिसमें पंडितजी थे, मोकामा स्टेशन पहुँची। यहाँ किसी पैसेंजर ने एक लावारिस सूटकेस देखा तो उसने कर्तव्य समझ उसे रेलवे कर्मचारियों को दे दिया। छानबीन में मालूम हुआ कि वह सूटकेस भी पंडित जी का था।

साभार:बीजेपी यूट्यूब चैनल

अगली कड़ी में पुलिस को सुराग एमपी सिंह ने दिया। ये जिओग्राफिकल सर्वे ऑफ इंडिया से थे। उस दिन वह भी उसकी बोगी में थे, जिसमें पंडित दीन दयाल उपाध्याय की टिकट कन्फर्म हुई थी।

सिंह ने बताया कि मुगलसराय पर टॉयलेट की ओर जाते समय उन्हें एक आदमी पंडित जी का बिस्तर ट्रेन से उतारता दिखा था। जब उन्होंने पूछा तो बताया कि उसके पिता को यहाँ उतरना था, वह उतर गए तो अब बिस्तर भी जा रहा है।

पुलिस ने इस सुराग पर लालता नाम के युवक को खोज निकाला। पूछताछ में उसने बताया कि कोई राम अवध था, जिसने उसे लावारिस बिस्तर उठा कर ले जाने को कहा। उसने तो बस उसे उठाया और बाद में उसे 40 रुपए में बेचा। पड़ताल हुई तो किसी सफाईकर्मी के पास से पंडित जी का जैकेट और कुर्ता बरामद किया गया। 

कई निरीक्षण हुए मगर आगे कोई सुराग न मिला। बाद में जाँच गई सीबीआई के हाथ। चंद दिनों में ही पता चल गया कि उस दिन पटना स्टेशन पर गाड़ी पहुँचने के बाद किसी ने एक सफाईकर्मी को ट्रेन में भेज कर बोगी साफ करवाई थी, मगर वह खुद उस गाड़ी में नहीं चढ़ा था। इस काम के लिए उस समय सफाईकर्मी को 400 रुपए दिए गए थे।

पंडित जी की शव यात्रा

कड़ियाँ तलाशते-तलाशते दो हफ्ते में कई चीजें सीबीआई इकट्ठा कर चुकी थी। आरोपितों के तौर पर राम अवध और कोई भरत लाल पेश किए गए। सीबीआई के पास उनका बयान था, जिसमें वह स्वीकार रहे थे कि उन्होंने दीन दयाल उपाध्याय को गाड़ी से नीचे फेंका क्योंकि वह चोरी का विरोध कर रहे थे। 

1 वर्ष 4 माह तक की जिरह के बाद 9 जून 1969 को इस मामले पर वाराणसी की सत्र अदालत में दोबारा सुनवाई हुई। न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा कि सीबीआई जाँच के अतिरिक्त बहुत सारी चीजें अस्पष्ट हैं। मसलन आखिर क्यों पंडितजी के हाथ में उस रात 5 रुपए मिले? गाड़ी स्टेशन पर रुकी तो लाश अलग क्यों मिली? जब दो अभियुक्त चोरी की बात कह रहे हैं तो सहयात्रियों ने ऐसी बात क्यों नहीं बताई? आदि-इत्यादि।

यूट्यूब वीडियो से लिए गए स्क्रीनशॉट

कोर्ट ने सोच-विचार तो बहुत किया लेकिन दोनों पक्षों की ओर से सही साक्ष्य न मिल पाने के कारण राम अवध और अन्य आरोपित हत्या के इल्जाम से मुक्त हो गए। चोरी के इल्जाम में भरत लाल नाम के युवक को 4 साल की सजा सुनाई गई। वह पहले भी कई बार इन इल्जामों में जेल भेजा गया था।

बाद में उनकी मौत को राजनीतिक हत्या करार दिया गया। कई तरह के दावे हुए। लेकिन प्रमाण कहीं से कहीं न मिल सका। कुछ लोगों ने जनसंघ के अगले अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी तक को इसके लिए जिम्मेदार बता दिया, मगर हर थ्योरी फेल हो गई।

क्या कहते हैं पंडित दीन दयान उपाध्याय की ‘हत्या’ पर विश्लेषक और भाजपा नेता?

ये वो बिंदुवार कड़ियाँ हैं, जिन्हें जानना जरूरी है लेकिन उससे भी ज्यादा ये जानना जरूरी है कि इसे लेकर वर्तमान के राजनीतिक विशेषज्ञ क्या कहते हैं। यूट्यूब पर कुछ वीडियोज हैं। जिनमें कई लोगों ने पंडित दीन दयाल उपाध्याय की बात करते हुए सीधे-सीधे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर निशाना साधा है।

द क्विंट की एक वीडियो में राजनीतिक विश्लेषक राकेश सिन्हा पंडित दीन दयाल पर बात करते हुए कहते हैं कि जब वह (पंडित जी) राजनीति में आए तो जवाहरलाल नेहरू ने जनसंघ पर प्रहार करने शुरू कर दिए थे। वह जानते थे कि ये आदमी न केवल संसद में समीकरण को बदलेगा बल्कि ये आदमी राजनीति की गुणवत्ता को भी बदल देगा।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय
पंडित दीनदयाल उपाध्याय (चित्र साभार: deendayalupadhyay.org)

भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी इसे हत्या करार देते हुए पूछते हैं कि जो थ्योरी चली कि वह ट्रेन से गिराए गए… अगर ऐसा होता तो उनका शव सीधा क्यों पड़ा होता। 5 रुपए का नोट हाथ में क्यों होता? वह सवाल खड़ा करते हैं कि उस ट्रेन में उस दिन मौजूद हर यात्री का फर्जी अड्रेस था। जिससे पता चलता है कि वह सब सुनियोजित था, जिनकी कभी जाँच नहीं हुई। एमजे अकबर कहते हैं कि ये हकीकत है कि उस रहस्य को नहीं सुलझाया गया। अब भी कई ऐसी चीजें हैं, जो संतोषजनक नहीं हैं।

मुगलसराय जंक्शन का नाम हुआ पंडित दीन दयाल उपाध्याय

मालूम हो कि हाल में उत्तर प्रदेश में योगी सरकार आने के बाद यह मुद्दा दोबारा उठा और पंडित दीन दयाल की मृत्यु पर दोबारा जाँच करने की बात कही गई। वहीं उससे पहले योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने के बाद मुग़लसराय रेलवे स्टेशन के नाम को बदलने के लिए केंद्र सरकार को एक सुझाव भेजा गया। केंद्र सरकार को भेजे अपने सुझाव में उत्तर प्रदेश सरकार ने मुग़लसराय का नाम बदलकर दीन दयाल उपाध्याय स्टेशन रखने की बात कही, जिसे जून 2018 में स्वीकार कर लिया गया।

इसके बाद मुग़लसराय रेलवे स्टेशन का नाम पंडित दीन दयाल उपाध्याय रेलवे स्टेशन हो गया। रेलवे स्टेशन के नाम को बदले जाने के करीब 6 महीने बाद उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने फिर मुग़लसराय तहसील का नाम बदल कर पंडित दीन दयाल उपाध्याय तहसील करने का फैसला लिया।

मुग़लसराय तहसील का भी नाम बदल दिया गया
मुग़लसराय तहसील का भी नाम बदल दिया गया

इसके साथ ही पंडित दीन दयाल की विचारधारा की मुरीद मोदी सरकार ने अपने नेतृत्व में पंडित दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर देश में कई सारी बड़ी सरकारी योजनाएँ भी चलाईं। इन योजनाओं में मुख्य रूप से दीन दयाल उपाध्याय अंत्योदय योजना, दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना और दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना है।

पंडित दीन दयाल उपाध्याय के जीवन पर भाजपा के यूट्यूब चैनल पर मौजूद जानकारी

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