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केवल कारों को EV बनाने से नहीं खत्म होगा तेल संकट क्योंकि 59% पेट्रोल बाइक वाले फूँक डालते हैं: जानिए क्यों ग्रीन एनर्जी मिशन के लिए जरूरी है टू-व्हीलर्स और ट्रक्स में बदलाव

आखिर सिर्फ कारों को ही इलेक्ट्रिक करने से बात क्यों नहीं बनेगी? इसके लिए पहले यह समझना होगा कि असल में देश में सबसे ज्यादा तेल की खपत करता कौन है।

जब आप देश के हाईवे, एक्सप्रेसवे या फिर शहरों की सड़कों पर चलते होंगे, तो कारों की लंबी-लंबी कतारें देखते होंगे। आपको यकीनन लगता होगा कि देश में सबसे ज्यादा पेट्रोल की खपत (Consumption) यही गाड़ियाँ करती हैं।

और अगर आप आज-कल के वैश्विक कच्चे तेल (Crude Oil) के संकट से वाकिफ हैं, तो सोचते होंगे कि अगर ये गाड़ियाँ इलेक्ट्रिक हो जाएँ, तो हम बाहर से तेल मंगवाने की मजबूरी से मुक्त हो जाएँगे। शायद ऐसा ही विचार आपके मन में तब भी आता होगा, जब आप शहरों में डीजल से धुआँ उड़ाती बसें देखते होंगे।

लेकिन शायद आप सही समस्या का गलत इलाज ढूँढ रहे हैं! आपके इस नजरिए ने आपको यह मानने पर मजबूर कर दिया है कि सिर्फ कारों को इलेक्ट्रिक बना देने से पूरी समस्या का समाधान हो जाएगा। लेकिन ऐसा कतई नहीं होने वाला। और इसकी वजह यह नहीं है कि हमारे पास बिजली कम है, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है या इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ महँगी हैं, बल्कि इसका कारण कुछ और ही है।

सिर्फ कारों को इलेक्ट्रिक बनाने से हमारे कच्चे तेल के आयात (Import) की समस्या क्यों हल नहीं होगी, यह मैं आपको बस कुछ ही देर में समझाता हूँ। उससे पहले एक हालिया खबर सुनिए। ‘इकोनॉमिक टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार लगभग 9,000 करोड़ रुपए की एक नई स्कीम की तैयारी कर रही है, जिसका इस्तेमाल देश में ट्रक्स और बसों को इलेक्ट्रिफाई (Electrify) करने के लिए किया जाएगा।

अब हम अपने पहले सवाल पर वापस आते हैं कि आखिर सिर्फ कारों को ही इलेक्ट्रिक करने से बात क्यों नहीं बनेगी? इसके लिए पहले यह समझना होगा कि असल में देश में सबसे ज्यादा तेल की खपत करता कौन है।

दोपहिया वाहन पीते हैं सबसे ज्यादा पेट्रोल

चिंता मत करिए, इसके लिए हमें किसी पेट्रोल पंप पर जाकर एक-एक गाड़ी गिनने की जरूरत नहीं है, बल्कि यह काम पहले ही हो चुका है। मिनिस्ट्री ऑफ पेट्रोलियम की ‘पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल’ (PPAC) और रेटिंग एजेंसी CRISIL ने देश के करीब 3,000 पेट्रोल पंपों पर इसी बात का पता लगाने के लिए एक सर्वे किया था।

इस सर्वे के नतीजे काफी चौंकाने वाले थे। पहले बात करते हैं पेट्रोल की। सर्वे से पता चला कि सड़कों पर सबसे ज्यादा दिखने वाली कारें नहीं, बल्कि हमारी बाइक्स और स्कूटर्स, यानी टू-व्हीलर्स (2-Wheelers) इस देश में पेट्रोल के सबसे बड़े कंज्यूमर हैं। देश के कुल पेट्रोल कंजम्पशन का 59% हिस्सा अकेले ये टू-व्हीलर्स डकार जाते हैं!

वहीं, जो कारें आपको ट्रैफिक, हाईवे और एक्सप्रेसवे पर सबसे ज्यादा नजर आती हैं, उनका कुल पेट्रोल खपत में शेयर सिर्फ 39.91% है। इसमें से भी अगर कमर्शियल टैक्सियों को हटा दें, तो पर्सनल कारों का हिस्सा सिर्फ 36.62% ही रह जाता है।

यानी, जिस कार सेगमेंट को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा होती है, अगर उसे हम पूरी तरह इलेक्ट्रिक में शिफ्ट कर भी दें, तो भी पेट्रोल की समस्या सिर्फ एक-तिहाई ही हल होगी; करोड़ों लीटर पेट्रोल की खपत फिर भी बनी रहेगी। अब आपके मन में आएगा कि फिर तो हमें टू-व्हीलर्स को भी तेजी से इलेक्ट्रिक में शिफ्ट करना चाहिए।

लेकिन यहाँ भी एक पेंच है। ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) का डेटा कहता है कि साल 2025-26 में देश में जितने भी टू-व्हीलर्स बिके, उनमें से सिर्फ 6.5% ही इलेक्ट्रिक थे। वहीं फोर-व्हीलर्स (कारों) के मामले में यह आँकड़ा महज 4.4% था। साफ है कि ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन की यह राह अभी बहुत लंबी और चुनौतीपूर्ण है।

असली खेल तो डीजल का है

मान लेते हैं कि हम किसी तरह जादू की छड़ी घुमाकर अपने सारे टू-व्हीलर्स और फोर-व्हीलर्स को इलेक्ट्रिक में बदल भी दें, तब भी कच्चे तेल के इम्पोर्ट का संकट खत्म नहीं होगा। आप सोचेंगे कि जब सड़कों से पेट्रोल गाड़ियाँ गायब हो जाएँगी, तब भी समस्या क्यों रहेगी? इसके लिए आपको डेटा की एक दूसरी लेन में चलना होगा।

दरअसल, भारत में पेट्रोल से कहीं ज्यादा डीजल की खपत होती है। इसकी मुख्य वजह यह है कि भारत का अधिकांश मालभाड़ा (Freight) सड़कों के जरिए तय होता है। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, देश का लगभग 65% माल रोड ट्रांसपोर्ट के जरिए एक जगह से दूसरी जगह भेजा जाता है।

इस भारी-भरकम मूवमेंट को संभालते हैं ट्रक्स। ये ट्रक्स छोटी-मोटी दूरी नहीं, बल्कि महीने भर में 15,000 किलोमीटर तक का सफर तय करते हैं। स्वाभाविक है कि इनका फ्यूल कंजम्पशन भी बहुत ज्यादा होता है और ये सभी ट्रक्स डीजल पर चलते हैं।

हमारे देश में डीजल की मांग पेट्रोल के मुकाबले ढाई गुना से भी ज्यादा है। उदाहरण के लिए, साल 2024-25 में जहाँ देश में 40 मिलियन मीट्रिक टन पेट्रोल की खपत हुई, वहीं डीजल की खपत 90 मिलियन मीट्रिक टन को पार कर गई थी।

यही वजह है कि सिर्फ कार या बाइक को EV में बदलने से देश का इम्पोर्ट बिल कम नहीं होने वाला। PPAC की रिपोर्ट बताती है कि देश के कुल डीजल कंजम्पशन में से 64% हिस्सा अकेले ट्रक्स और पिक-अप गाड़ियाँ पी जाती हैं। एक आम ट्रक एक बार में करीब 111 लीटर डीजल भरवाता है। जब तक हैवी कमर्शियल व्हीकल्स (Heavy Commercial Vehicles) को इलेक्ट्रिफाई नहीं किया जाएगा, तब तक कच्चे तेल पर हमारी निर्भरता बनी रहेगी।

चीन का मॉडल और भारत की तैयारी

हमारे पड़ोसी देश चीन ने इस दिशा में तेजी से काम शुरू कर दिया है। ‘रॉयटर्स’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन में बिकने वाले नए भारी ट्रकों (Heavy Trucks) में से अब एक-चौथाई (25%) इलेक्ट्रिक हो चुके हैं, और हालिया ईरान-इजराइल संकट के बाद इस रफ्तार में और तेजी आई है। अगर भारत को भी अपना फ्यूल बिल और कार्बन एमिशन कम करना है, तो उसे पर्सनल व्हीकल्स के साथ-साथ इस हैवी सेगमेंट पर फोकस करना ही होगा।

राहत की बात यह है कि अब भारत सरकार भी इस दिशा में कदम बढ़ा रही है। जैसा कि मैंने शुरुआत में बताया, मोदी सरकार जल्द ही इलेक्ट्रिक ट्रक्स और बसों के लिए ठीक वैसे ही इंसेंटिव्स (FAME स्कीम की तरह) लाने की तैयारी में है, जैसे टू-व्हीलर्स और कारों के लिए दिए गए थे। इससे न सिर्फ तेल का आयात घटेगा, बल्कि सड़कों पर होने वाले प्रदूषण का सबसे बड़ा सोर्स भी खत्म हो जाएगा।

बसों से ज्यादा डीजल पीते हैं खेतों के पंप

इसी सर्वे से जुड़ा एक और दिलचस्प आँकड़ा बसों और खेतों में चलने वाले पंपों का है। अमूमन हमें लगता है कि देश भर में चलने वाली लाखों बसें बहुत ज्यादा डीजल खाती होंगी। लेकिन डेटा के मुताबिक, कुल डीजल खपत में बसों का शेयर सिर्फ 4.1% है, जबकि कृषि कार्यों (जैसे सिंचाई के पंप और ट्रैक्टर) में 4.7% डीजल का इस्तेमाल होता है। यानी हमारी बसें, खेतों से कम डीजल कंज्यूम करती हैं।

सिर्फ कारों को इलेक्ट्रिक कर देना मर्ज की दवा नहीं

आज जब भी वैश्विक तनाव या युद्ध (जैसे ईरान क्राइसिस) की वजह से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि सिर्फ कारों को इलेक्ट्रिक कर देना इस मर्ज की दवा नहीं है। असली समाधान छुपा है टू-व्हीलर्स और देश की लाइफलाइन कहे जाने वाले ट्रक्स को ग्रीन एनर्जी पर शिफ्ट करने में।

वैसे इस चौंकाने वाले डेटा को जानने के बाद आपकी क्या राय है? क्या आपको पहले से पता था कि कारें नहीं, बल्कि आपकी बाइक देश का सबसे ज्यादा पेट्रोल पीती है?

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