बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद से ही तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के कार्यकर्ता बौखलाए हुए हैं। राज्य के कई हिस्सों से भाजपा समर्थकों और कार्यकर्ताओं पर हमलों और हत्याओं की खबरें आ रही हैं। कहीं बम फेंके जा रहे हैं- कहीं गोलियाँ चल रही हैं।
इन सब खबरों के बीच एक तरफ सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि राज्य में दंगाई ये सब तब कर रहे हैं जब उन्हें पता है कि भाजपा सरकार बनने के बाद वो बख्शे नहीं जाएँगे। दूसरी तरफ ये कल्पना की जा रही है कि यदि 2026 के परिणाम 2021 जैसे होते, तो राज्य के आम नागरिकों और हिंदुओं का क्या हश्र होता।
आज जब बंगाल एक नए दौर की ओर बढ़ने को तैयार हो रहा है, तो 2021 की उन भयावह यादों को ताजा करना जरूरी है, ताकि वर्तमान परिवर्तन की अहमियत को समझा जा सके। 2021 के नतीजों के बाद बंगाल ने हिंसा का जो दौर देखा था वह पश्चिम बंगाल पर लगा कलंक है।
क्या हुआ था 2021 के चुनावी नतीजों के बाद
वो दिन 2 मई 2021 का था। टीवी पर इधर चुनावी नतीजों में इधर टीएमसी को बहुमत मिलता दिखा, उधर पूरे राज्य में चुन-चुनकर भाजपा समर्थकों को निशाना बनाए जाने की खबरें, तस्वीरें और वीडियोज आने लगीं।
उस वक्त चुन-चुनकर भाजपा समर्थकों के घरों में तोड़फोड़ की गई, कार्यकर्ताओं के परिजनों के साथ मारपीट हुई और उनपर क्रूड बमों से हमले किए गए। राजनीतिक प्रतिशोध की इंतेहा ये थी कि कई कार्यकर्ताओं की बेरहमी से हत्या कर दी गई- किसी कीलाश पेड़ से लटकी मिली, तो किसी को चाकुओं से गोद दिया गया। माता-पिता के सामने बच्ची की बलात्कार की बातें सामने आईं। बच्चे के सामने माँ का कत्ल हुआ। उस समय 40 से ज्यादा घटनाएँ थी, जिन्हें ऑपइंडिया ने भी रिपोर्ट किया था।
4. Even married Hindu women were picked up in places like Diamond Harbour and their husbands were asked to cough up INR 25000 to secure the release of their wives, failing which they would continue to be "used" by TMC cadre. I personally spoke with some of the affected families.
— Sai Deepak J (@jsaideepak) May 4, 2026
2021 में हुई सभी हिंसा की घटनाओं की खबरें सुन पूरा देश सन्न था और दूसरी तरफ तत्कालीन बंगाल सरकार के कान में जूँ नहीं रेंग नहीं थी। मीडिया से बात करते हुए केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के हवा-हवाई दावे हो रहे थे, वहीं दूसरी ओर पुलिस बल मूकदर्शक बने बैठे थे। पीड़ितों से मिलने जा रहे अन्य राज्यों के लोगों को रोका जा रहा था कि कहीं असलियत बाहर न आ जाए। स्थिति इतनी विकट हो गई थी कि हजारों हिंदुओं को अपनी जान बचाने के लिए पलायन करना पड़ा था।
हिंदुओं को करना पड़ा पलायन
भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष जेपी नड्डा ने तब बताया था कि उस दौरान हुई राजनीतिक हिंसा के कारण लगभग 80000 से 100000 हिंदू परिवार विस्थापित हुए। बंगाल में सुरक्षा न मिलने के कारण बड़ी संख्या में लोगों ने पड़ोसी राज्य असम के धुबरी जिले में शरण ली।
वहीं, 14 मई 2021 को विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने दावा किया कि इस हिंसा से 3500 से अधिक गाँव और लगभग 40,000 हिंदू प्रभावित हुए। परिषद के अनुसार, इस मारकाट में सबसे अधिक अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को निशाना बनाया गया। वीएचपी ने इस संबंध में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की माँग की थी।
फैक्ट फाइंडिंग टीम की जाँच
इसके बाद 29 जून 2021 को सिक्किम हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश प्रमोद कोहली की अगुवाई वाली फैक्ट फाइंडिंग टीम ने अपनी रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य रखे। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में बताया कि बंगाल में परिणाम घोषित होने के बाद राज्य में हिंसा की करीब 15000 घटनाएँ घटी थीं। इन वारदातों में 25 लोगों की जान गई और लगभग 7000 महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार हुआ था।
मानवाधिकार आयोग ने HC को दी रिपोर्ट
इसके बाद 14 जुलाई को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने हाईकोर्ट में अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी। उनकी 7 सदस्यीय टीम ने 20 दिनों के भीतर 311 स्थानों का मुआयना किया था। आयोग ने अपनी कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि राज्य में ‘कानून का शासन’ नहीं, बल्कि ‘शासक का कानून’ चल रहा है।
मानवाधिकार आयोग ने बताया था कि उन्हें 23 जिलों से कुल 1979 शिकायतें मिलीं, जिनमें से अधिकांश कूच बिहार, बीरभूम, बर्धमान, उत्तर 24 परगना और कोलकाता से थीं। इन शिकायतों में हत्या, दुष्कर्म, छेड़खानी और आगजनी जैसे जघन्य अपराध शामिल थे। आयोग ने महिलाओं पर हुए अत्याचार की उन 57 शिकायतों का भी जिक्र किया जो उन्हें राष्ट्रीय महिला आयोग से प्राप्त हुई थीं। रिपोर्ट की गंभीरता को देखते हुए आयोग ने स्पष्ट सिफारिश की थी कि इस पूरे मामले की जाँच सीबीआई (CBI) को सौंपी जाए।
अदालत का रुख
बता दें कि बंगाल में 2021 में हुई हिंसा पर कोलकाता हाई कोर्ट ने भी संज्ञान लिया था। मई में ही अदालत ने ममता सरकार को तीन सदस्यीय समिति का गठन करने का आदेश दिया था, जिसमें एनएचआरसी, राज्य मानवाधिकार आयोग और राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण के एक-एक सदस्य होने थे। कोर्ट ने समिति को स्थानीय पुलिस के साथ कॉर्डिनेट करके उन सभी लोगों की सकुशल वापसी सुनिश्चित करने का काम सौंपा था जो डर से पलायन कर गए थे।
इसके बाद अदालत ने अगस्त 2021 में भी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई तरते हुए इस संबंध में आदेश दिया था। कोर्ट ने चुनावी नतीजों के बाद हुई हत्या, बलात्कार, हिंसा, महिलाओं के खिलाफ हुए अपराधों जैसी गंभीर घटनाओं की जाँच सीबीआई को सौंप दी थी। वहीं अन्य अपराध जैसे मारपीट, आगजनी और घर जलाना आदि के लिए लिए राज्य पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों की एक विशेष जाँच टीम (SIT) बनाई गई थी।
बाद में हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ ममता सरकार सुप्रीम कोर्ट भी गई। दलील दी कि आखिर सीबीआई क्यों उनकी मर्जी के बगैर इन केसों की जाँच कर रही है। हालाँकि अदालत ने केस की गंभीरता देखते हुए पड़ताल को जारी रखने का निर्देश दिया। बाद में CBI ने इस मामले में दर्जनों चार्जशीट दाखिल की और गिरफ्तारियाँ भी हुईं। शुरू में इस केस के कई मामलों की सुनवाई निचली अदालतों में चली। लेकिन 2024 में सीबीआई की एक याचिका पर गौर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल की सरकार को नोटिस जारी किया, साथ ही राज्य की निचली अदालतों में चल रही कार्यवाही पर रोक लगा दी।


