राम मंदिर में टाँग अड़ाने सुप्रीम कोर्ट पहुँचा लिबरल गिरोह, 40 में से कोई नहीं था मूल मुकदमे में पक्षकार

याचिका दाखिल करने वालों में इरफ़ान हबीब, शबनम हाशमी, अपूर्वानंद झा, नंदिनी सुंदर और इस्लाम स्वीकार करने का ऐलान कर चुके और लम्बे समय से हिन्दू-विरोधी कार्यों में लिप्त हर्ष मंदर शामिल हैं। इनमें से एक भी व्यक्ति 1949-50 से 2019 तक चले मूल मुकदमे में पक्षकार नहीं था।

राम जन्मभूमि को लेकर चल रहे करीब 500 साल पुराने विवाद का सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से भले पटाक्षेप हो गया हो, लेकिन कुछ लोग हैं जो चाहते हैं की देश इस मुद्दे से बाहर नहीं निकले। इनमें फैसला कबूल करने की बात कह मुकरे मुस्लिम संगठन ही नहीं हैं। पूरा का पूरा लिबरल गिरोह इसमें शामिल है। कल (सोमवार 10 दिसंबर, 2019) को ऐसे 40 लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका डाली। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को “एक आस्था को दूसरी आस्था पर तरजीह देना वाला” बताया गया है। साथ ही कहा गया है कि इस फैसले से “देश की सामंजस्यपूर्ण संस्कृति और संविधान में परिकल्पित उसके सेक्युलर फैब्रिक पर सीधा असर पड़ेगा।”

रामजन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का कल आखिरी दिन था। जब पूरा देश नागरिकता संशोधन विधेयक पर बहस में लगा था तो अयोध्या में राम मंदिर की राह में रोड़ा डालने के मकसद से यह याचिका दाखिल की गई।

याचिका दाखिल करने वालों में इरफ़ान हबीब, शबनम हाशमी, अपूर्वानंद झा, नंदिनी सुंदर और इस्लाम स्वीकार करने का ऐलान कर चुके और लम्बे समय से हिन्दू-विरोधी कार्यों में लिप्त हर्ष मंदर शामिल हैं। इनमें से एक भी व्यक्ति 1949-50 से 2019 तक चले मूल मुकदमे में पक्षकार नहीं था। इरफ़ान हबीब ने इस मुकदमे में हिन्दू पक्ष के साक्ष्यों को झुठलाने की कोशिश अवश्य की थी, लेकिन असफल रहे थे।

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गौरतलब है कि 9 नवंबर, 2019 के अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यों वाली संविधान बेंच ने राम जन्मभूमि स्थल का पूरा मालिकाना हक हिन्दुओं दिया था। साथ ही मस्जिद बनाने के लिए मुसलमानों को अलग से 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश केंद्र सरकार को दिए थे। इस पीठ की अध्यक्षता तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई ने की थी और इसमें मुस्लिम जज जस्टिस अब्दुल नज़ीर भी शामिल थे। पीठ ने अपना फैसला सर्वसम्मति से दिया था।

अपनी याचिका में इन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के ऊपर ही मुकदमे की प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगा दिया है। उनके अनुसार सुप्रीम कोर्ट के फैसले में जमीन के मालिकाना हक से आगे बढ़कर मुक़दमे की परिधि में हिन्दू और मुस्लिम आस्थाओं के टकराव को शामिल कर लिया था।

इस याचिका को दायर करने वाले अधिवक्ता पूर्व आम आदमी पार्टी नेता, राफेल घोटाले के याचिकाकर्ता और जनमत संग्रह की आड़ में कश्मीर पाकिस्तान को सौंप देने की माँग का समर्थन कर इसके लिए पिटने वाले प्रशांत भूषण हैं।

याचिका में यह भी कहा गया है कि हिन्दू पक्ष को जन्मभूमि की ज़मीन देने का आधार केवल आस्था को माना गया है, जबकि मस्जिद के पक्ष में पुरातात्विक साक्ष्यों को नज़रंदाज़ कर दिया गया। यह कोरा झूठ है। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ़ किया था कि वह हिन्दू पक्ष को यह ज़मीन आस्था के आधार पर नहीं, बल्कि पुरातत्व विभाग की खुदाई में मस्जिद के हज़ारों साल पहले तक मंदिर के साक्ष्य मिलने, मस्जिद बनने के बाद से 19वीं सदी के छठे दशक के बीच हिन्दू पक्ष द्वारा अपनी पूजा साबित करने और मुस्लिमों द्वारा इसी कालखंड में लगातार नमाज़ साबित न कर पाने के चलते दे रहा है।

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