सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (15 सितंबर 2025) को वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 पर अंतरिम फैसला सुनाया। चीफ जस्टिस बी.आर. गवई की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि पूरा कानून वैध है, लेकिन कुछ हिस्सों पर अस्थाई रोक लगा दी। ये रोक भी ऐसे प्वॉइंट्स पर हैं, जिसका कानून पर कोई खास असर नहीं पड़ने वाला।
सुप्रीम कोर्ट ने पाँच साल इस्लाम प्रैक्टिस प्रमाण (सेक्शन 3(r)), सरकारी संपत्ति जाँच के एकतरफा फैसले (सेक्शन 3C) और बोर्डों में गैर-मुस्लिमों की अधिक संख्या पर रोक लगाई। लेकिन वक्फ-बाय-यूजर हटाना, ट्राइबल जमीन पर रोक, रजिस्ट्रेशन अनिवार्य और संरक्षित स्मारकों पर वैध ठहराया। सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला मुस्लिम समुदाय के मजहबी अधिकारों, वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा और सरकारी संपत्तियों की रक्षा पर क्या असर डालेगा, इसे विस्तार से समझते हैं।
वक्फ क्या है? इस बात को समझना जरूरी
भारत में वक्फ संपत्तियाँ बहुत पुरानी हैं – कुछ मुगल काल की, कुछ इससे पहले की। आज देश में करीब 8 लाख वक्फ संपत्तियाँ हैं, जिनकी कीमत अरबों में है। लेकिन समस्या ये है कि कई जगहों पर इनका दुरुपयोग होता रहा है – अवैध कब्जे, किराया न लेना या फिर सरकारी जमीनों को वक्फ बताकर हड़प लेना।
इसी दुरुपयोग को रोकने के लिए देश में साल 1923 से कानून बने। 1923 का मुसलमान वक्फ एक्ट पहला था, जो रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता लाया। फिर 1934 में बंगाल वक्फ एक्ट, 1954 में वक्फ एक्ट, 1995 में यूनिफाइड वक्फ मैनेजमेंट एक्ट आया।
साल 2013 में इस कानून में फिर से बदलाव लाया गया, लेकिन वक्फ संपत्तियों का दुरुपयोग रुका नहीं। ऐसे में अब साल 2025 में वक्फ संशोधन अधिनियम आया है, जो वक्फ बोर्डों को मजबूत बनाने, रजिस्ट्रेशन सख्त करने और दुरुपयोग रोकने के लिए है। हालाँकि मुस्लिम संगठनों ने इसे चुनौती दी है, ये कहते हुए कि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-26) और समानता (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन है।
कानूनी चुनौती मुख्य रूप से तीन प्रमुख प्रावधानों पर केंद्रित थी-
- वक्फ संपत्तियों को रद्द करने की शक्ति: कोर्ट, वक्फ-बाय-यूजर या वक्फ डीड के जरिए घोषित संपत्तियों को डी-नोटिफाई करने की शक्ति पर सवाल उठे।
- वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद की संरचना: याचिकाकर्ताओं का कहना था कि केवल मुस्लिम ही इनमें होने चाहिए, सिवाय उन सदस्यों के जो पदेन (एक्स-ऑफिशियो) हैं।
- कलेक्टर की जाँच का प्रावधान: इसमें कहा गया था कि अगर कलेक्टर जाँच के बाद संपत्ति को सरकारी जमीन मानता है, तो उसे वक्फ संपत्ति नहीं माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
ये मामला कई रिट याचिकाओं का बंडल था। मुख्य याचिका व्रिट पिटिशन (सिविल) नंबर 276/2025 है, जो ‘इन रे: द वक्फ अमेंडमेंट एक्ट, 2025’ पर है। इसमें 2013 की पुरानी याचिका (नंबर 814) और 2025 की 18 नई याचिकाएँ (269, 284, 314, 331, 344, 353, 375, 381, 398, 415, 427, 431, 436, 439, 440, 445, 447, 450) शामिल हैं। एक ट्रांसफर पिटिशन (1316/2025) भी थी।
सुनवाई अप्रैल 2025 से चल रही थी। 16-17 अप्रैल को चीफ जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच ने तीन मुख्य मुद्दे तय किए थे – 1) वक्फ बाय यूजर का डी-रिकग्निशन, 2) सरकारी संपत्तियों पर स्पेशल प्रोविजन, 3) सेंट्रल काउंसिल और स्टेट बोर्ड की कंपोजिशन में बदलाव।
अब इस मामले में सोमवार (15 सितंबर 2025) को चीफ जस्टिस गवई, जस्टिस अगस्टाइन जॉर्ज मसीह की बेंच ने फाइनल अंतरिम फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ कानून पर रोक लगाने से किया साफ इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी नए कानून (जैसे ये वक्फ अमेंडमेंट) को तुरंत रोकना (स्टे लगाना) आसान नहीं है। ये रेयर केस में ही होता है। क्यों? क्योंकि कोर्ट को लगता है कि हर कानून को ‘संवैधानिक’ मानकर चलना चाहिए (प्रेजम्प्शन ऑफ कन्स्टिट्यूशनलिटी), जब तक साफ-साफ गलती न साबित हो।

सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि सिर्फ 2 हालात में तुरंत किसी भी कानून पर रोक लगा सकते हैं, जब–
1-अगर कानून बनाने का हक ही न हो (लेगिस्लेटिव कम्पिटेंस न हो)।
2-अगर ये फंडामेंटल राइट्स (जैसे रिलिजन की आजादी, इक्वालिटी) का बिल्कुल साफ उल्लंघन करे।

याचिकाकर्ताओं की दलीलों को पढ़ें
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ये कानून वक्फ को ‘प्रोटेक्ट’ करने का नाम लेकर संपत्ति छीनने का प्लान है। कपिल सिब्बल ने कहा, “ये कानून वक्फ को बचाने का बहाना है, लेकिन असल में सरकारी संपत्तियाँ हड़प लेने का। 2025 से पहले वक्फ रजिस्ट्रेशन जरूरी नहीं था। 1923 के मुसलमान वक्फ एक्ट और 1954 के एक्ट में प्रोविजन था, लेकिन न करने पर सिर्फ म्यूतावल्ली (मैनेजर) को हटाने की सजा थी, वक्फ पर असर नहीं पड़ता था।”
याचिकाकर्ताओं ने चेतावनी दी कि वक्फ-बाय-यूजर प्रावधान को खत्म करने से सदियों पुरानी मस्जिदें, कब्रिस्तान और अन्य धार्मिक स्थल खो सकते हैं। उनका कहना था कि यह मुस्लिम धार्मिक मामलों में दखलंदाजी है और यह संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन करता है, जो धार्मिक समुदायों को अपने अजहबी मामलों को संभालने का अधिकार देता है।
सरकार की तरफ से क्या कहा गया?
सरकार का साफ कहना है कि ये कानून वक्फ संपत्तियों का मिसयूज रोकता है, वक्फ को मजबूत बनाता है। सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, “वक्फ का आधार भले ही इस्लामी परंपरा में हो, लेकिन यह कोई जरूरी मजहबी प्रथा नहीं है। उन्होंने कहा कि वक्फ बोर्ड मुख्य रूप से सांसारिक (सेक्युलर) काम करते हैं, जैसे संपत्ति प्रबंधन, लेखा-जोखा रखना और ऑडिट करना।”
वक्फ-बाय-यूजर को खत्म करने के मुद्दे पर मेहता ने कहा कि यह 2013 में बनाया गया एक वैधानिक प्रावधान था, कोई मौलिक अधिकार नहीं। 2025 के संशोधन के जरिए संसद को इसे हटाने का पूरा अधिकार था।
वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 के प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 के विभिन्न प्रावधानों पर गहन विश्लेषण किया है, जो पेज 72 से 123 तक फैला हुआ है। यह हिस्सा कानून की हर मुख्य धारा को छूता है, जिसमें याचिकाकर्ताओं की आपत्तियाँ, सरकार की सफाई और कोर्ट का तर्क शामिल है। कोर्ट ने कहा कि ये संशोधन वक्फ संपत्तियों को मजबूत बनाने और दुरुपयोग रोकने के लिए हैं, लेकिन कुछ जगहों पर संतुलन की जरूरत है।
5 साल इस्लाम की प्रैक्टिस की जरूरत वैध, लेकिन SC ने लगाई अस्थाई रोक
1- सबसे पहले बात करते हैं सेक्शन 4(ix)(a) की, जो मूल वक्फ अधिनियम 1995 की धारा 3(r) में संशोधन लाता है। यह धारा वक्फ की परिभाषा तय करती है। संशोधन में एक नया नियम जोड़ा गया है कि कोई व्यक्ति अगर अपनी संपत्ति को वक्फ घोषित करना चाहता है, तो उसे साबित करना होगा कि वह कम से कम पाँच साल से इस्लाम का पालन कर रहा है।
कोर्ट ने इसे वैध माना, क्योंकि यह दुरुपयोग रोकने का तरीका है। कल्पना कीजिए, कोई व्यक्ति अचानक संपत्ति दान कर दे और बाद में कहे कि वह वक्फ था – इससे विवाद बढ़ते हैं। यह प्रावधान ऐसी धोखाधड़ी को रोकता है, खासकर जब संपत्ति सरकारी या विवादित हो। लेकिन कोर्ट ने एक समस्या देखी- अभी तक कोई तंत्र नहीं है कि कैसे यह पाँच साल का प्रमाण चेक होगा। राज्य सरकार को नियम बनाने होंगे, जैसे दस्तावेज, गवाह या रिकॉर्ड। जब तक ऐसा तंत्र न बने, कोर्ट ने इस हिस्से पर अस्थाई रोक लगा दी।

मतलब फिलहाल कोई नया वक्फ बनाने के लिए यह प्रमाण न दिखाना पड़ेगा। यह स्टे प्राइमा फेसी है, यानी पहली नजर में जरूरी लग रहा है, लेकिन फाइनल सुनवाई में बदल सकता है। याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि यह भेदभावपूर्ण है, क्योंकि दूसरे धर्मों में ऐसा नहीं, लेकिन कोर्ट ने कहा कि वक्फ इस्लामिक कॉन्सेप्ट है, तो इसकी खास सुरक्षा जरूरी। फिर भी बिना मैकेनिज्म के लागू न हो।
सरकारी संपत्तियों को हड़पने पर भी लगाई रोक, अब सरकार की एंट्री
सेक्शन 5 में नई धारा 3C जोड़ी गई है, जो सरकारी संपत्तियों पर विशेष प्रावधान को लेकर है। यह कहता है कि कोई सरकारी संपत्ति, चाहे पहले या बाद में वक्फ घोषित की गई हो, वक्फ नहीं मानी जाएगी। कोर्ट ने मूल विचार को सही माना, क्योंकि सरकारी संपत्ति पब्लिक ट्रस्ट है, इसे वक्फ बताकर हड़पना गलत। लेकिन कुछ हिस्सों पर रोक लगा दी।
खासकर सब-सेक्शन (2) का प्रोविजो, जो कहता है कि डेजिग्नेटेड ऑफिसर (कलेक्टर से ऊपर का अधिकारी) की रिपोर्ट आने से पहले ही संपत्ति को वक्फ न मानो। साथ ही सब-सेक्शन (3) और (4) पर स्टे – ये कहते हैं कि अगर ऑफिसर जाँच कर कहे कि सरकारी है, तो रेवेन्यू रिकॉर्ड बदल दो और बोर्ड को निर्देश दो। कोर्ट ने कहा यह एकतरफा है, बिना पूर्ण सुनवाई के स्टेटस बदलना अनुच्छेद 14 (समानता) का उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब विवादित मामलों में वक्फ ट्रिब्यूनल ही फैसला करेगा। जाँच शुरू होने पर तीसरे पक्ष को बेचना या हस्तांतरित न हो सकेगा, लेकिन हाई कोर्ट में अपील का रास्ता खुला रहेगा।
ASI संरक्षित धरोहरों पर नहीं होगा वक्फ का अधिकार, पर नमाज की दी अनुमति
इसी सेक्शन 5 का एक और हिस्सा धारा 3D संरक्षित स्मारकों से जुड़ा है। यह कहता है कि अगर कोई स्मारक 1904 या 1958 के कानूनों के तहत ‘प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट’ घोषित हो, तो वक्फ घोषणा शून्य हो जाएगी। कोर्ट ने इसे वैध माना, क्योंकि पुरातत्व सर्वेक्षण ऑफ इंडिया (ASI) को स्मारकों की रक्षा का अधिकार है। लेकिन महत्वपूर्ण बात- मजहबी प्रथाएँ जारी रहेंगी। मतलब अगर मस्जिद या कब्रिस्तान स्मारक में है, तो नमाज या पूजा रुकेगी नहीं – 1958 एक्ट की धारा 5(6) यही कहती है।
ट्राइबल की जमीनें नहीं की जा सकेंगी वक्फ, सभी दलीलें खारिज
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अगला हिस्सा धारा 3E है, जो ट्राइबल भूमि से जुड़ा है। यह कहता है कि संविधान के पाँचवीं और छठी अनुसूची के तहत अनुसूचित जनजातियों की जमीन वक्फ नहीं घोषित की जा सकती। कोर्ट ने इसे पूरी तरह सही ठहराया। कारण-ट्राइबल समुदाय कमजोर हैं, उनकी जमीनें संरक्षित हैं ताकि बाहरी लोग हड़प न लें। यह संवैधानिक प्रोटेक्शन है।
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ट्राइबल मुसलमान अपनी जमीन वक्फ नहीं कर सकेंगे, जो धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला है। लेकिन कोर्ट ने कहा अनुच्छेद 25-26 यहाँ लागू नहीं, क्योंकि ट्राइबल हित प्राथमिक हैं। उदाहरण- नॉर्थ-ईस्ट या झारखंड जैसे इलाकों में ट्राइबल मुसलमानों की जमीनें वक्फ क्लेम से सुरक्षित रहेंगी। याचिकाकर्ता इस पर स्टे ऑर्डर माँग रहे थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सभी दलीलों को खारिज कर दिया।
वक्फ बोर्ड में गैर मुस्लिम सदस्यों की संख्या सीमित
अब सेक्शन 10, 12 और 16 पर, जो सेंट्रल वक्फ काउंसिल और स्टेट वक्फ बोर्ड की संरचना बदलते हैं (मूल धारा 9 और 14)। संशोधन में गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई – काउंसिल में 22 में 12 तक, बोर्ड में 11 में 7 तक। कोर्ट ने संरचना को वैध माना, क्योंकि ये सलाहकारी और प्रशासनिक निकाय हैं, धार्मिक मामलों में दखल नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कैपिंग कर दी। अब काउंसिल में 4 से ज्यादा गैर-मुस्लिम नहीं, बोर्ड में 3 से ज्यादा नहीं। यह बैलेंस है। याचिकाकर्ताओं ने इसे अनुच्छेद 26 (धार्मिक प्रबंधन का अधिकार) का उल्लंघन करार दिया, तो सरकार ने इसे स्वभाव से सेकुलर बताया। हालाँकि इन बोर्ड्स में दबदबा मुस्लिमों का ही रहेगा।
वक्फ का रजिस्ट्रेशन रहेगा अनिवार्य, नहीं मानी गई कोई दलील
सेक्शन 21 रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य बनाता है (मूल धारा 36)। कोर्ट ने कहा 1923 के कानून से ही रजिस्ट्रेशन जरूरी था, यह दुरुपयोग रोकता है। लिखित दस्तावेज (डीड) अनिवार्य, वक्फ दान अब वैध नहीं रहेगा। याचिकाकर्ताओं ने कहा इस्लामिक प्रथा में मौखिक दान मान्य, लेकिन कोर्ट ने कहा कानून में रिकॉर्ड जरूरी, विवाद सुलझाने के लिए। इस मामले में कोर्ट ने कोई स्टे नहीं दिया।
वक्फ कानूनों में कब-कब हुआ बदवाल
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में वक्फ कानूनों में कब-कब बदलाव हुए, इसे भी बताया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को समझा कि नए कानून की जरूरत क्यों पड़ी। फैसले के मुताबिक, वक्फ मतलब मुस्लिम रिलिजन में चैरिटी प्रॉपर्टी, जो कभी बेची या ट्रांसफर नहीं हो सकती – ये हमेशा गरीबों, मस्जिद या पढ़ाई के लिए रहती है। लेकिन इतिहास बताता है कि वक्फ का मिसयूज (गलत इस्तेमाल) बहुत हुआ, इसलिए रजिस्ट्रेशन जरूरी बना। चलिए, आपको वक्फ कानून में हुए बदलाव के बारे में विस्तार से बताते हैं…
1923 का मुसलमान वक्फ एक्ट: ये पहला बड़ा कानून था। मकसद? वक्फ का मिसमैनेजमेंट (गलत मैनेजमेंट) रोकना। पहले वक्फ प्रॉपर्टी को क्रेडिटर्स (कर्ज देने वाले) से बचाने का तरीका था, लेकिन लोग इसे लूट लेते थे। इसलिए रजिस्ट्रेशन की शुरुआत हुई – मतलब वक्फ को रजिस्टर कराओ, वरना मैनेजर (मुतावल्ली) को हटा दो। लेकिन सख्त पेनल्टी नहीं थी, बस नाममात्र का। कोर्ट कहता है, ये कानून वक्फ को ‘सुरक्षित’ रखने के लिए बनाया गया था, लेकिन बेहद कमजोर था।
1934 का बंगाल वक्फ एक्ट: ये बंगाल के लिए स्पेशल था। यहाँ पहली बार ‘वक्फ बाय यूजर’ का कॉन्सेप्ट आया। मतलब? अगर कोई प्रॉपर्टी लंबे समय से वक्फ की तरह इस्तेमाल हो रही है (जैसे मस्जिद बनी हुई है), तो वो वक्फ मानी जाएगी, भले पेपर पर न हो। ये अच्छा स्टेप था, क्योंकि पुरानी वक्फ प्रॉपर्टी को बचाया। लेकिन ये सिर्फ बंगाल तक सीमित रहा।
1954 का वक्फ एक्ट: आजादी के बाद का पहला नेशनल कानून। इसमें सर्वे (सभी वक्फ चेक करना), रजिस्ट्रेशन और पेनल्टी जोड़ी गई। मतलब सरकारी अफसर वक्फ प्रॉपर्टी का लिस्ट बनाएँगे, रजिस्टर कराएँगे और गलती पर जुर्माना लगेगा। कोर्ट ने कहा कि ये कानून वक्फ को ऑर्गनाइज करने के लिए था, क्योंकि पहले बहुत कन्फ्यूजन था।
1976 की वक्फ इंक्वायरी कमिटी: एक कमिटी बनी, जिसने वक्फ के मिसयूज की जाँच की। उन्होंने कहा कि नॉन-रजिस्ट्रेशन (रजिस्टर न कराना) रोकने के लिए सेक्शन 55A जोड़ो – मतलब, अगर रजिस्टर न किया तो कोर्ट में केस न लड़ सको। ये सिफारिश अच्छी थी, लेकिन ये बदलाव तुरंत लागू नहीं हो पाया।
1984 का अमेंडमेंट: 1976 की कमिटी के बाद ये चेंज आया। सेक्शन 55E जोड़ा गया, जो रजिस्ट्रेशन को और सख्त बनाता। लेकिन कोर्ट कहता है, ये ठीक से इम्प्लीमेंट (लागू) नहीं हुआ – यानी, कागजों पर रह गया।
1995 का ओरिजिनल वक्फ एक्ट: ये सबसे बड़ा था। इसमें ‘वक्फ बाय यूजर’ को नेशनल लेवल पर मान्यता दी, रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया, और वक्फ ट्रिब्यूनल (खास कोर्ट) बनाया। सेक्शन 87 में कहा कि अगर रजिस्टर न किया तो कोर्ट में सूट (केस) नहीं चलेगा (लेकिन 2013 में ये डिलीट हो गया)। कोर्ट कहता है, ये एक्ट वक्फ को मजबूत बनाने के लिए था, लेकिन फिर भी मिसयूज जारी रहा।
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पाँच साल इस्लाम प्रैक्टिस प्रमाण (सेक्शन 3(r)), सरकारी संपत्ति जाँच के एकतरफा फैसले (सेक्शन 3C) और बोर्डों में गैर-मुस्लिमों की अधिक संख्या पर रोक लगाई है। लेकिन इसमें भी सुप्रीम कोर्ट ने 5 साल इस्लाम की प्रैक्टिस को भी जरूरी माना। चूँकि अभी ऐसा कोई सिस्टम नहीं बना है, जिसमें 5 साल इस्लाम की प्रैक्टिस की जाँच की जा सके, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने सिस्टम बनने तक इस पर अस्थाई रोक लगाई है।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कानून में वक्फ-बाय-यूजर को हटाने, ट्राइबल जमीन को वक्फ में बदलने पर रोक, रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता और संरक्षित स्मारकों पर सरकार द्वारा बनाए गए कानून की स्थिति को सही माना है। ऐसे में मूल मुद्दे पर इस फैसला का कोई खास असर नहीं दिख रहा है।


