Tuesday, July 23, 2024
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अधकटा शव, नग्न लड़कियाँ और ‘अल्लाह-हू-अकबर’ के नारे के बीच हुई हत्याएँ: दिल्ली दंगों के 3 साल, फिर पढ़ें ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट्स

दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के बाद जब चारों तरफ माहौल सहमा था और सोशल मीडिया पर वामपंथी सिर्फ अपना प्रपंच फैला रहे थे... उस समय ऑपइंडिया के पत्रकार ग्राउंड पर उतरे और आपके लिए वो हकीकत इकट्ठा करके लाए जिन्हें आज भी पढ़कर रूह कांपती है।

दिल्ली के इतिहास में साल 2020 की 24-25 फरवरी वह तारीखें है जिसे राजधानी का बच्चा-बूढ़ा शायद ही कोई भूल पाए। सीएए के विरोध में महीनों से चलता प्रदर्शन उस दिन उत्तर पूर्वी दिल्ली में दंगे का रूप ले चुका था। कहीं खुलेआम पत्थरबाजी की खबर आ रही थी तो कहीं सड़कों पर पुलिस को गोली मारी जा रही थी। हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए बड़ी-बड़ी इमारतों पर गुलेल लटकाए गए थे और न जाने कितने घरों के भीतर गोला बारूद व पेट्रोल बम छिपाए गए थे। 

इन साजिशों का ही नतीजा था कि दंगों की आग जब हल्की हुई तो मरने वालों का आँकड़ा 53 पहुँच गया था और घायलों की संख्या 200 पार कर गई थी। आज भी उस समय को याद किया जाए तो रूह कांप जाती है…उत्तराखंड के उस दिलबर नेगी का चेहरा याद आने लगता है जिनके अंग काटकर आग में झोंके जा चुके थे। वहीं आईबी के अंकित शर्मा के साथ हुई बर्बरता भी कोई नहीं भूल पाता जिनके शरीर को 400 से ज्यादा बार चाकू से गोदा गया था और शव नाले से बरामद हुआ था।

आज उसी हिंदू विरोधी दंगे के पूरे 3 साल बीत गए हैं… जनजीवन फिर सामान्य हो गया है लेकिन ये कहना बिलकुल गलत है कि हिंदू उन लोगों की भयानक चीखों को भूल गए हैं जिन्हें अल्लाह-हू-अकबर और नारा-ए-तकबीर के नारों के बीच तड़पा तड़पाकर मारा गया और वामपंथी मीडिया इसे सिर्फ एक प्रदर्शन का हिंसक रूप कहकर खबरों में दिखाती रही…। 

ऑपइंडिया इसी प्रपंच की पोल खोलने और पीड़ितों की आपबीती आप तक पहुँचाने उस दौरान ग्राउंड पर उतरा। ऑपइंडिया के अनुपम कुमार सिंह, संस्थान से जुड़े पूर्व पत्रकार रवि अग्रहरी और केशव मालान पीड़ितों के घरों पर गए, उनसे कॉल पर संपर्क किया, उनके परिजनों का हाल जाना और अंत में आपके सामने उन दो दिनों की सच्चाई रखी जिसे मीडिया बताने से भी गुरेज कर रहा था।

ग्राउंड पर पहुँचे ऑपइंडिया पत्रकार और रोते-बिलखते रोग

दिल्ली दंगों में सबसे ज्यादा शिकार हुआ इलाका करावल नगर और शिव विहार भी था। मीडिया की तस्वीरें देखने के बाद जब अनुपम कुमार सिंह खुद ग्राउंड पर उतरे तो पाठकों के लिए ऐसी हकीकत लेकर आए जिसे देख-सुन सच्चाई से अंजान लोगों के कान खड़े हो गए। 

इस इलाके में हमें एक हिंदू का स्कूल मिला, जिसे जलाया जा चुका था, दुकानें मिलीं जो खाक हो चुकी थीं। लोग रोते-बिलखते लोग दिखे जो उनसे बात करते हुए अपना कसूर पूछ रहे थे कि आखिर उनके साथ ये सब क्यों हुआ। लोगों ने उन्हें बताया कैसे उन दो दिनों तक वह अपनी बहू-बेटियों की इज्जत बचाने के लिए सड़कों पर रहे और इस्लामी भीड़ की गोली-पत्थर खाते रहे।

हिंदुओं के घरों को जलाया, पुलिस पर एसिड फेंका

अनुपम को स्थानीयों ने बताया कि कैसे उस दिन राजधानी स्कूल पर 300 दंगाई जमा कर हिंदुओं को निशाना रहे थे जबकि मुस्लिम महिलाएँ अपनी छतों पर  खड़े होकर पुलिस बलों पर एसिड डाल रही थीं। वहां उन्हें ये भी पता चला कि राजधानी स्कूल (जो किसी मुस्लिम शख्स का था) पर चढ़कर दंगाइयों ने दिनेश मुंशी के सिर में गोली मारी। वहीं अन्य हिंदुओं पर गुलेल लगाकर पत्थर और बम फेंकती रही।

कंटेनरों में लाए छतों पर पत्थर

ग्राउंड पर पड़ताल के दौरान हमने जब राजधानी स्कूल के बारे में जाना तो पता चला कि स्कूल को अटैक बेस की तरह प्रयोग किया गया। हम उस स्कूल की छत पर पहुँचे और पाया कि वहाँ बड़े-बड़े कंटेनर थे। नजारा देख साफ पता चल रहा था कि हमले की तैयारी लंबे समय से थी बस 24-25 फरवरी 2020 को मौका देख उसे अंजाम दिया गया। इन्हीं बड़े और भारी कंटेनरों में भरकर पत्थर छत पर लाए गए थे जिनका प्रयोग दंगाई लगातार करते थे। इसी स्कूल के बगल में एक मैरिज हॉल भी था। हॉल में कई गाड़ियाँ खड़ी थीं, लेकिन दंगाइयों ने वहाँ भी आग लगाकर सब कुछ फूँक डाला था।

जब चश्मदीद ने कहा- नाम मत लेना वो मार डालेंगे

ऑपइंडिया के पूर्व पत्रकार केशव मालान दंगों के बाद कई दिन तक प्रभावित इलाकों में घूम-घूम कर सच्चाई जुटाने का प्रयास कर रहे थे। तभी रास्ते में ही ऑटो में उनकी मुलाकात एक महिला से हुई। इस महिला ने केशव के बिना पूछे ही उन्हें जमीनी हालात बताने शुरू कर दिए और ये भी बताया कि कैसे ये उनकी आँखों देखी बात है कि इस्लामी भीड़ लाठी-डंडे, ईंट-पत्थर, सरिया-रॉड लेकर मेन रोड पर निकली हुई थी और हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए अपने बच्चों और महिलाओं को बाहर निकाल रही थे।

महिला को जाते-जाते जब केशव के पत्रकार होने का पता चला तो उसने अनुरोध किया कि किसी कीमत पर उसका नाम खबर में न दिया जाए वरना वो भीड़ उसे भी मार देगी।

घर से टहलने निकले आलोक वापस नहीं लौटे

केशव, कई दिन चांद बाग, करावल नगर, शिव विहार समेत उत्तर पूर्वी दिल्ली के इलाकों में घूमे। इस दौरान उन्हें हर जगह पुलिस फोर्स मिली। प्रभावित क्षेत्रों में जाने के बाद उनकी मुलाकात पहले उस आलोक तिवारी की बदहवास पत्नी से हुई उस दिन भी अपने पति का इंतजार कर रहीं थी।

केशव के अनुरोध पर आलोक की पत्नी कविता ने उनसे बात की और बताया कि कैसे उनके पति तो 10 बजे खाना खाकर बाहर घूमने गए थे मगर आधे घंटे बाद एक फोन आया जिससे उन्हें पता चला कि उनके पति को मारा गया है। आलोक का अंतिम संस्कार चंदा इकट्ठा करके करवाया गया था।

जो लड़की करती थी दुआ सलाम उसकी शादी में आग लगाई

आलोक के घर के बाद केशव को चांद बाग के एक ऐसे घर के बारे में पता चला जहाँ कुछ दिन पहले लड़की की शादी की तैयारी चल रही थी लेकिन दंगों के बाद वहाँ मातम था। हैरानी इस बात की थी कि इस्लामी भीड़ ने उस बच्ची की शादी की तैयारियों में आग लगाई थी जो आते-जाते उन्हें दुआ सलाम करती थी।

दुकान तोड़कर लूटा सबकुछ

हिंसा के लगातार कई दिनों तक ग्राउंड पर जाते-जाते केशव ताहिर हुसैन के घर के नजदीक पहुँचे जो उस दौरान दंगाइयों का अड्डा बना हुआ था और जहाँ अंकित शर्मा को निर्ममता से मौत के घाट उतारा गया था। गलियों में जाते जाते उन्हें श्याम चाय वाला मिला। श्याम बेबस होकर जमीन पर बैठे थे। पूछने पर उन्होंने बताया कि कैसे उस दिन इस्लामी भीड़ आई और उनकी दुकान तोड़कर, वहाँ लूटपाट करके चली गई।

लड़कियों के कपड़े उतरवाकर नंगे भेजा घर

एक महिला मिली जिसने पहचान न बताए जाने की शर्त पर बताया कि दंगों के दो दिन कैसे लड़कियों के लिए भारी थे। महिला के मुताबिक, भीड़ ने ट्यूशन से लौटती लड़कियों से उनके कपड़े उतरवा लिए थे और उन्हें नग्न कर घरों में भेजा था।

घर से निकले राहुल को मारी गोली

बृजपुरी में राहुल ठाकुर की हत्या को लेकर चश्मदीदों ने बताया कि कैसे उस दिन राहुल सिर्फ बाहर हुए हल्ले के बाद माहौल देखने निकला था कि इतने में सामने से हथियारबंद भीड़ ने उसको गोली मारी और वह वहीं पेट पकड़े जमीन पर गिर गया। घरवाले उसे अस्पताल ले गए लेकिन बचा कोई नहीं पाया। राहुल के घर पहुँचने पर हमारे पत्रकार को राहुल की माँ की दहाड़ सुनने को मिली और ये भी पता चला कि उनके पिचा आरपीएफ में तैनात थे जो बार-बार सोच रहे थे कि उनके बेटे को उस दिन घर से निकलने की क्या जरूरत थी।

घूमने निकला धर्मेंद्र घर नहीं लौटा

प्रभावित इलाकों में जाने के वक्त एक हिंदू परिवार ऐसा भी था जिनका बेटा धर्मेंद्र दंगों के वक्त गायब हो गया था और वो लोग बस उसके इंतजार में थे। परिवार का कहना था कि धर्मेंद्र बाहर घूमने की बात कहकर निकला था लेकिन शाम को पता चला कि वहाँ दंगे शुरू हो गए और सात दिन बाद भी धर्मेंद्र उन्हें वापस नहीं मिला।

दिलबर नेगी: जिनके इस्लामी भीड़ ने काट दिए हाथ-पाँव, शव आग में झोंका

पीड़ितों तक पहुँचने के क्रम में ऑपइंडिया ने मृतक दिलबर नेगी के साथ हुई बर्बरता के बारे में भी आपको बताया। दिलबर नेगी पौड़ी जिले के थलीसैण ब्लॉक के निवासी थे जो दिल्ली में काम करने आए थे लेकिन 23 फरवरी को इस्लामी भीड़ ने उन्हें दुकान में पकड़कर उनके हाथ पाँव काटे और फिर उनके अधकटे शव को दुकान के साथ आग में झोंक दिया। जब ऑपइंडिया के पूर्व पत्रकार आशीष नौटियाल को इस हत्या की सूचना मिली तो उन्होंने उस श्याम को खोजा, जो किसी तरह उस दिन उस भीड़ से अपनी जान बचाकर भागा था। वहीं उनके परिवार से बात भी की जिसके बाद पता चला कि कैसे वो लोग ये नहीं मान पा रहे हैं कि उनका बेटा अब वापस नहीं लौटेगा।

बता दें कि इन दंगों के 7 माह बाद दिल्ली पुलिस ने 2700 पेज की चार्जशीट दाखिल की थी जिसमें उमर खालिद जैसे कई लोगों के नाम लिए गए थे। हालाँकि उनके कृत्यों पर क्या सुनवाई हुई ये अब भी बहस की बात है। स्थानीय हिंदू आज भी इलाकों में डर में रहते हैं। जबकि ताहिर हुसैन की वो बिल्डिंग जहाँ से हिंदू निशाना बनाए गए वहाँ से धंधा होने की बात पिछली बार सामने आ चुकी थी।

तीन साल बाद पीड़ितों के हाल

ऑपइंडिया हर साल आपको प्रभावित इलाकों के हालातों से अवगत कराता रहा है। हर बार कभी पता चला कि किसी को न्याय नहीं मिला है तो कोई मुआवजे के इंतजार में है, किसी ने सीएम को पत्र लिखा है तो कोई घर चलाने के लिए नौकरी माँग रहा है…।

इस साल भी हमने कुछ पीडितों के परिजनों से बात की और पता चला कि कैसे अदालत से आए दिन आरोपित रिहा हो रहे और पीड़ित घरवालों को न्याय फिर नहीं मिल पाता। दिल्ली दंगों में पहली सजा जिसे दी गई वो दिनेश यादव हैं। उनके गम में माता-पिता दोनों संसार छोड़ गए हैं। लेकिन दिनेश को इतनी भी रियायत नहीं मिली कि वो मुखाग्नि दे पाते।

इसी तरह हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की पत्नी जिन्हें शुरुआत में हर किसी ने वायदे किए वो भी अब दिल्ली छोड़ चुकी है। उनका कहना है कि वो नौकरी की गुहार सीएम केजरीवाल से लगाती रहीं लेकिन उन्हें कहीं कोई मदद नहीं मिली। अब जो पैसे मिले हैं वो दिल्ली के खर्चों खत्म न हो जाएँ इसलिए वो अपने मायके चली गई हैं।

इसी प्रकार एक कहानी विनोद की भी है। कट्टर भीड़ ने विनोद को हथियारों से सड़क पर मारा था। 3 साल पूरे होने पर जब ऑपइंडिया ने उनके परिवार से संपर्क किया तो उन्होंने बस यही कहा कि उन्हें बहुत दुख होता है जब पता चला है कि मुख्य आरोपित धीरे-धीरे रिहा हो रहे हैं जबकि उनकी सुनवाई तक नहीं हो रही।

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