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पीरागढ़ी कार हत्याकांड में मुस्लिम आलिम करीमुद्दीन को मीडिया बता रहा ‘बाबा-तांत्रिक’, ये हिंदुओं को बदनाम करने की कोशिश: समझिए- कैसे खेला जा रहा ये खेल

अपराध की खबर तो सभी ने दी, लेकिन कई मुख्यधारा मीडिया हाउस ने आरोपित को 'बाबा', 'तांत्रिक' या 'साधु' कहकर पेश किया, जबकि वह मुस्लिम आलिम या पीर है। ये शब्द हिंदू धार्मिक परंपरा से जुड़े हैं।

दिल्ली के पीरागढ़ी फ्लाईओवर पर बुधवार (11 फरवरी 2026) एक कार में तीन शव मिलने का मामला सामने आया है। पुलिस ने इस मिस्ट्री को सुलझाने का दावा करते हुए ‘आलिम करीमुद्दीन’ को गिरफ्तार किया गया।

जाँच में सामने आया है कि यह लोगों को झाड़-फूँक के जरिए पैसे दोगुने करने का लालच देता था। मरने वाले तीनों लोग रणधीर, शिव नरेश और लक्ष्मी देवी इसी झाँसे में आकर उसके संपर्क में आए थे।

CCTV फुटेज में आलिम करीमुद्दीन को वारदात वाले दिन कार की अगली सीट पर बैठा देखा गया है। पुलिस के अनुसार, वह काफी देर तक उसी सफेद टाटा टिएगो कार में मौजूद था, जिसमें बाद में तीनों के शव मिले।

हालाँकि शवों पर चोट के कोई साफ निशान नहीं थे, जिससे यह मामला शुरू में उलझा हुआ लग रहा था। अब पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कार के अंदर ऐसा क्या हुआ जिससे तीनों की जान चली गई, क्या उन्हें कोई जहरीली चीज दी गई या दम घोंटा गया या कोई और तरीका अपनाया गया।

कमरुद्दीन पहले भी 2025 में यूपी में इसी तरह हत्या के आरोप में पकड़ा जा चुका है। उस केस में उसे दो बार जमानत नहीं मिली थी और तरीका भी वही था, धोखे से जहर देकर हत्या। जिसके बाद हम अगर मेन स्ट्रीम मीडिया ने जब इस खबर की जानकारी दी तब आलिम करीमुद्दीन को बाबा कह कर खबर को चलाया।

सवाल सिर्फ अपराध का नहीं, मीडिया की पहचान की भाषा का भी है

अगर इस खबर को ध्यान से पढ़ा जाए, तो साफ पता चलता है कि आरोपित एक मुस्लिम पीर या आलिम है। लेकिन इसके बावजूद कई मीडिया हाउस उसे ‘बाबा’, ‘तांत्रिक’ या ‘साधु’ जैसे शब्दों से संबोधित कर रहे हैं।

(फोटो साभार – द वीक)

ये शब्द आम तौर पर हिंदू धार्मिक परंपरा से जुड़े माने जाते हैं। जब कोई मीडिया हाउस किसी मुस्लिम आरोपित को ‘बाबा’ या ‘साधु’ कहता है, तो पाठकों और दर्शकों के मन में सबसे पहले एक हिंदू बाबा की छवि उभरती है।

यह न सिर्फ भ्रामक है, बल्कि एक पूरे समुदाय और धर्म की छवि को गलत तरीके से पेश करने जैसा भी है। यहाँ सवाल यह है की क्या यह सिर्फ लापरवाही है या सोच-समझकर की गई भाषा की हेराफेरी? 

पहचान छुपा कर फैलाया जाता है भ्रम

अगर कोई मुस्लिम व्यक्ति किसी cमें अपराध करता है, तो उसे सही शब्दों में पहचाना जाना चाहिए, जैसे ‘पीर’, ‘मौलवी’ या ‘आलिम’। लेकिन कई बड़े मीडिया हाउस बार-बार उसे ‘बाबा’ या ‘तांत्रिक’ जैसे शब्दों से संबोधित करते हैं, जो सीधे तौर पर हिंदू धार्मिक पहचान से जुड़े हैं।

(फोटो साभार – जागरण)

इसका नतीजा यह होता है कि आम जनता के मन में यह धारणा बनती है कि यह अपराध किसी हिंदू साधु या बाबा ने किया है। धीरे-धीरे इससे हिंदू बाबाओं और हिंदू धर्म के प्रति गलत और नकारात्मक छवि बनने लगती है। एक पत्रकार के तौर पर यह बेहद गैर-जिम्मेदाराना रवैया है। मीडिया का काम सच्चाई दिखाना है न कि पहचान को तोड़-मरोड़कर पेश करना।  

ऑपइंडिया का स्टैंड और बाकी मीडिया से फर्क

इस मामले में ऑपइंडिया ने अपना स्टैंड साफ रखा है। ऑपइंडिया ने मजहबी पहचान को सही संदर्भ में रखा और यह स्पष्ट किया कि आरोपित एक मुस्लिम पीर या आलिम है, न कि कोई हिंदू साधु या बाबा।

ऑपइंडिया का यह रुख इसलिए अहम है क्योंकि यह दिखाता है कि अगर मीडिया चाहे, तो तथ्यों के साथ ईमानदारी रख सकता है। इसके अलग, कई अन्य मीडिया हाउस सुविधा के हिसाब से शब्दों का चुनाव करते हैं, जहाँ मुस्लिम आरोपित को भी ‘बाबा’ या ‘तांत्रिक’ कहकर पेश किया जाता है, जिससे असल पहचान धुंधली हो जाती है।

यह न सिर्फ पत्रकारिता की नैतिकता के खिलाफ है, बल्कि यह समाज में गलत धारणाएँ फैलाने का भी एक तरीका बन जाता है।

अपराध से ज्यादा खतरनाक है भाषा का गलत इस्तेमाल

इस केस में असली मुद्दा सिर्फ यह नहीं है कि तीन लोगों की मौत कैसे हुई, बल्कि यह भी है कि मीडिया इस खबर को किस नजरिए से पेश कर रहा है। अगर हर बार मुस्लिम आरोपित को हिंदू धार्मिक शब्दों से संबोधित किया जाएगा, तो इसका सीधा असर समाज की सोच पर पड़ेगा।

(फोटो साभार – एनडीटीवी)

लोगों के मन में यह बैठने लगेगा कि धोखाधड़ी, तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास सिर्फ हिंदू बाबाओं से जुड़े हैं, जबकि हकीकत यह है कि ऐसे अपराध हर मजहब और हर समुदाय में हो सकते हैं। सही पत्रकारिता का मतलब है, तथ्य, पहचान और संदर्भ को ईमानदारी से पेश करना।

(फोटो साभार – पत्रिका )

पीरागढ़ी फ्लाईओवर का यह मामला कोई अकेला उदाहरण नहीं है। इससे पहले भी कई ऐसे केस सामने आए हैं, जहाँ मुस्लिम अपराधियों को ‘बाबा’, ‘साधु’ या ‘तांत्रिक’ जैसे शब्दों से पेश किया गया।

यह एक खतरनाक पैटर्न की ओर इशारा करता है, जहाँ मीडिया अनजाने में या जानबूझकर हिंदू धर्म और हिंदू धार्मिक प्रतीकों को अपराध से जोड़ने की कोशिश करता है। अगर यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहा, तो आने वाले समय में समाज में धार्मिक आधार पर और ज्यादा भ्रम और तनाव पैदा हो सकता है। मीडिया को यह समझना होगा कि शब्द सिर्फ शब्द नहीं होते, वे सोच बनाते हैं, छवि गढ़ते हैं और समाज की दिशा तय करते हैं।

अगर कोई आरोपित मुस्लिम है, तो उसे मुस्लिम पहचान के साथ ही पेश किया जाना चाहिए। मजहब को छुपाना या गलत धर्म से जोड़ना, दोनों ही पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। क्या मीडिया का काम लोगों को भ्रमित करना है, नहीं बल्कि लोगों को सच बताना है।

यह गलती नहीं, एक गंभीर समस्या है

मेन स्ट्रीम मीडिया हाउस जो कर रहा हैं, वह सिर्फ एक छोटी गलती नहीं है, बल्कि एक गंभीर और खतरनाक समस्या है। जब आप किसी मुस्लिम आरोपित को हिंदू बाबा या साधु की छवि में पेश करते हैं, तो आप अनजाने में ही हिंदू धर्म को बदनाम करने का काम करते हैं।

एक पत्रकार के तौर पर यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम किसी भी धर्म, समुदाय या समूह के साथ अन्याय न करें। अगर मीडिया अपनी भाषा और सोच को नहीं सुधारेगा, तो वह समाज को सही जानकारी देने के बजाय गलत दिशा में ले जाएगा।

पीरागढ़ी फ्लाईओवर केस सिर्फ एक क्राइम स्टोरी नहीं है, यह मीडिया की सोच, ईमानदारी और जिम्मेदारी की भी एक परीक्षा है। अब यह मीडिया पर निर्भर करता है कि वह इस परीक्षा में खरा उतरता है या फिर भ्रम और गलत छवि फैलाने का सिलसिला जारी रखता है।

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विवेकानंद मिश्र
विवेकानंद मिश्र
एक पत्रकार और कंटेंट क्रिएटर। राजनीति, संस्कृति, समाज से जुड़ी अनसुनी कहानियाँ सामने लाने के लिए प्रतिबद्ध।

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