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प्रिय मीडिया कब तक बेचते रहोगे किसानों की ये दुखांत कहानियाँ, उन्हें क्यों नही बताते उनको ही ‘मंडी-दलालों’ से मुक्त कराने के लिए मोदी लेकर आए थे कृषि कानून

जो मीडिया संस्थान आज किसान की बेबसी पर हेडलाइंस बना रहे हैं, वे यह स्वीकार करने का साहस नहीं जुटा पा रहे कि कृषि कानूनों पर फैलाया गया भ्रम ही आज की इस स्थिति का एक बड़ा कारण है।

एक किसान जब खेती करता है तो उसकी फसल से सिर्फ आमदनी नहीं, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। वह सोचता है कि फसल उचित दाम पर बिकेगी तो पुराने कर्ज चुकेंगे, घर का खर्च चलेगा और बच्चों के भविष्य के लिए कुछ बचत हो पाएगी। लेकिन सोचिए, अगर वही किसान अपनी मेहनत की फसल लेकर मंडी पहुँचे और वहाँ उसे दाम की जगह घाटे का सौदा झेलना पड़े, तो उस पर क्या बीतती होगी।

यह कोई काल्पनिक बातें नहीं हैं, बल्कि मीडिया में बताई जा रही महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजी नगर जिले के किसान की आपबीती है जिसे भावुक शब्दों के साथ पाठकों को परोसा जा रहा है।

मीडिया में बताई जा रही किसान की आपबीती

पैठण तालुका के वरुडी गाँव के एक किसान प्रकाश गलधर तीन महीने की मेहनत के बाद 1262 किलो प्याज 25 बोरे में भरकर मंडी तक लेकर आए, लेकिन यहाँ उन्हें बताया गया कि 100 रुपए प्रति क्विंटल का भाव मिलेगा इससे एक रुपया ज्यादा नहीं… यानी लगभग 1 रुपए प्रति किलो।

कुल बिक्री से उनकी जेब में सिर्फ 1262 रुपए आए। ये रकम किसान का प्रॉफिट नहीं थी बल्कि उनकी तीन महीने की कीमत थी। असली धक्का तो तब लगा जब घर से मंडी तक माल पहुँचाने की कुल कीमत को जोड़ा गया।

रिपोर्ट बताती हैं कि किसान को प्याज की तुलाई, भराई, मजदूरी, परिवहन में कुल खर्च 1263 रुपए आए। यानी जो दाम मंडी से मिला उससे एक रुपए ज्यादा लगाकर तो किसान अपनी फसल को मंडी तक पहुँचाकर ही आया था। तीन महीने की मेहनत, खेती में आई लागत और बचत का तो छोड़ दीजिए उलटा इस सौदे से किसान का नुकसान ही हुआ।

मीडिया का खेल

यह समस्या सिर्फ एक किसान की नहीं है। देश के लाखों किसान आज भी अपनी उपज बेचने के लिए मंडियों और बिचौलियों पर निर्भर हैं। मीडिया अक्सर ऐसी खबरों को भावनात्मक अंदाज में पेश करता है, जिससे आम आदमी या खबर पढ़ने वाले पाठक का गुस्सा सीधे सरकार और प्रशासन पर जाता है।

ये गुस्सा भी उचित होता है क्योंकि ये मीडिया हमें ऐसी खबरें परोसते वक्त खबर का दूसरा पहलू नहीं बताता। इस खबर में भी यही हुआ। यहाँ ये तो बताया गया कि किसान कितना दुखी है लेकिन ये नहीं बताया कि किसानों को ऐसी स्थिति से निकालने के लिए मोदी सरकार आज से 6 साल पहले ही कदम उठा चुकी थी, लेकिन कुछ आंदोलनजीवियों के चलते वह फैसला वापस हो गया।

मोदी सरकार का कृषि कानून और उसका विरोध

आज से करीब 6 साल पहले केंद्र सरकार तीन कृषि कानून लेकर आई थी। उन कानूनों का मूल उद्देश्य यही था कि किसान मंडियों और बिचौलियों के चंगुल से निकलकर अपनी फसल सीधे बाजार में कहीं भी बेच सके। लेकिन उस समय कुछ लोगों ने अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए ऐसे विरोध प्रदर्शन किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा आ पड़ा और आखिर में देश हित देखते हुए सरकार ने कानून वापस ले लिया।

वे कानून किसान विरोधी नहीं थे, लेकिन कुछ ‘आंदोलनजीवियों’ और स्वघोषित किसान नेताओं ने आम किसानों को ऐसे भड़काया था कि जिन्हें फायदा दिख भी रहा था वो भी उस पर संदेह करने लगे थे। उस दौरान सड़कों को ब्लॉक कर ऐसा माहौल बनाया गया जैसे इन कानूनों से ज्यादा किसान के लिए कुछ खतरनाक नहीं हो सकता।

उस समय जब कुछ मीडिया संस्थानों ने इन कानूनों के फायदे समझाने की कोशिश की, तो उन्हें ‘गोदी मीडिया’ कहकर खारिज कर दिया गया। तथ्यों की जगह भ्रम को स्थापित किया गया।

मीडिया में चल रही खबरें

प्रधानमंत्री मोदी ने खुद बताए थे फायदे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं इन रिफॉर्म्स के दूरगामी परिणाम समझाए थे। उन्होंने मन की बात से लेकर अलग-अलग प्लैटफॉर्म पर आकर ये समझाया था कि कैसे इन सुधारों के बाद किसानों को नए बाजार और विकल्प मिलेंगे, आधुनिक टेक्नोलॉजी और बेहतर कोल्ड स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर का लाभ मिलेगा। इससे कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा और किसान मंडियों के साथ-साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी अपने उत्पाद बेच सकेंगे।

शुरुआत में कई किसान संगठन इसके समर्थन में थे, लेकिन राकेश टिकैत जैसे चेहरों और अवसरवादी राजनीति ने दुष्प्रचार का सहारा लिया। धीरे-धीरे खबरें आई कि अगर ये सब चलता रहा तो इससे राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ भी समझौता हो सकता है। सरकार ने हर पहलू को देखा और अंत में यह कहते हुए कानून वापस लिया कि वे जनता को इसके लाभ समझाने में असफल रहे।

क्या होता अगर लागू होते कानून

आज जब स्थिति बदहाल है किसान परेशान हैं, अपने माल के उचित दाम के लिए जिरह कर रहे हैं, तो 2020-21 में हुई राजनीति, हिंसा को याद रखना जरूरी है। साथ ही ये याद रखना भी जरूरी है आज जो मीडिया इन किसानों के दर्द को अ्पनी हेडलाइंस बनाकर दिखा रहा है, अगर उस समय वह मीडिया किसान हित पर कायम रहता तो ये स्थिति नहीं आती। दुर्भाग्य यह है कि ये आज भी स्वीकार करने का साहस नहीं जुटा पा रहे कि कृषि कानूनों पर फैलाया गया भ्रम ही आज की इस स्थिति का एक बड़ा कारण है।

यदि वे कानून लागू होते, तो शायद प्रकाश गलधर को अपना प्याज 1 रुपए किलो बेचने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। शायद किसानों को मीडिया के सामने आकर मदद की गुहार नहीं लगानी पड़ती या परिवार की बदहाली देख आत्महत्या का विचार नहीं लाना पड़ता।

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