अमेरिका में बैठ भारतीय युवाओं को भड़काने वाले रवीश जी, मॉलिक्यूल नाक की जगह कहीं और भी धँस सकता है

रवीश कुमार यूपी-बिहार के लोगों की समझ को 'थर्ड क्लास' बताते हैं। युवाओं को हिंसा के लिए भड़काते हैं। ऐसे में जरूरी है कि एक रिसर्च पेपर इस पर भी निकलना चाहिए कि कैलिफोर्निया में बैठ कर वे जिस मॉलिक्यूल का अविष्कार करने में लगे हैं, वो उनके शरीर में कहाँ पर धँसेगा और कहाँ से अलार्म बजाएगा।

वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार का अंतिम सहारा अब सड़क पर उतर कर होने वाला विरोध-प्रदर्शन ही रह गया है। अगर आप सोच रहे हैं कि रवीश डफली बजाते हुए सड़क पर लाल झंडा लिए उतरने की योजना बना रहे हैं, तो शायद आप उनकी घाघ-बुद्धि से परिचित नहीं हैं। वो भला ख़ुद क्यों सड़क पर आएँ? इसमें उनका घाटा है। सरकार का क्या जाता है? इसलिए, उनके धूर्त दिमाग ने नई योजना तैयार की है। क्यों न युवाओं, ख़ासकर छात्रों को ही भड़का कर सड़क पर उतार दिया जाए। साँप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी। एनडीटीवी की टीआरपी पाताल में धँसते जा रही है और रवीश नाक में धँसने वाला मॉलिक्यूल बनाने की बात कर रहे हैं। उनका मीडिया संस्थान कंगाल होने की ओर अग्रसर है और वो युवाओं को बौद्धिक रूप से कंगाल बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

अफवाह ऐसे फैलाई जा रही है, जैसे लगता हो कि जेएनयू की फी काफ़ी महँगी है। जबकि देखा जाए तो विश्वविद्यालय ने सालाना 240 रुपए के ट्यूशन या 9 रुपए के लाइब्रेरी फी में कोई बदलाव नहीं किया है। बस हॉस्टल मैनुअल अपडेट हुआ है। जिन सेवाओं का छात्र इस्तेमाल करेंगे, उनका शुल्क देना होगा। शुल्क कम देना है, कम बिजली पानी यूज कीजिए। 10 रुपए से 300 रुपए हुए मासिक हॉस्टल फी को 3000% की वृद्धि बता कर प्रचारित किया जा रहा है। क्या ये भ्रामक नहीं? इससे जेएनयू महँगा तो नहीं हो जाता। उसकी तुलना उसके इर्द-गिर्द स्थित आईआईटी और आईआईएमसी से न ही करें तो बेहतर।

मुफ्त शिक्षा के लिए बजट कहाँ से आएगा? सरकार ने 12वीं तक की शिक्षा पहले ही मुफ़्त कर रखी है। जर्मनी और नॉर्वे जैसे देशों में उच्च-शिक्षा काफ़ी सस्ती है, लेकिन उसकी जनसंख्या से ज्यादा लोग तो बिहार के कई जिलों में रहते हैं। 130 करोड़ लोगों के देश में सभी के लिए मुफ्त शिक्षा की बात ही बेमानी है, जहाँ की जीडीपी अपना राजस्व घाटा कम करने के लिए संघर्ष कर रही हो। जेएनयू के आंदोलन के पीछे राजनीति हो रही है, इसमें कोई शक नहीं। सत्ता में अस्थिरता फैलाने की मंशा रखने वाले वामपंथी इस पर जवाब देंगे कि चीन की वामपंथी सरकार ने हॉन्गकॉन्ग के छात्रों के साथ कैसा व्यवहार किया है?

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दरअसल, रवीश ने एक लेख लिखा। इसमें उन्होंने युवाओं को सड़क पर उतर कर अराजकता फैलाने की अपील की। भले ही उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा किया लेकिन उनकी मोदी-विरोधी मंशा हिलोरे मारते हुए अपना प्रत्यक्ष परिचय दे रही थी। रवीश ने हिंदी पट्टी के नौजवानों को अभिशप्त करार दिया। उन्होंने हिंदी बेल्ट के युवाओं की राजनीतिक समझ पर सवाल खड़े किए। रवीश ने कहा कि यहाँ के युवाओं की राजनीतिक समझ थर्ड क्लास की है। वो कहते हैं कि थर्ड क्लास न होती तो वो भी जेएनयू वालों की तरह ही सड़क पर होते।

क्या रवीश चाहते हैं कि यूपी-बिहार के युवा भी अपने कॉलेज के किसी डीन को घेर कर दुर्व्यवहार करें, जिससे वो वहीं अचेत होकर गिर पड़े? उसकी बीवी और बच्ची गिड़गिड़ाते रहें, क्योंकि बीमार डीन को जल्दी अस्पताल पहुँचाना है और छात्र नारेबाजी करते हुए एम्बुलेंस को घेर कर खड़े हो जाएँ? जी हाँ, ऐसा जेएनयू में हुआ, जब प्रोफेसर उमेश कदम मरते-मरते बचे। क्या रवीश चाहते हैं कि हिंदी पट्टी की छात्राएँ भी अपने कॉलेज की किसी महिला प्रोफेसर के कपड़े फाड़ने का प्रयास करे? ऐसा जेएनयू में हुआ। उन्हीं छात्रों ने किया, एक हाथ में जो महिलाधिकार का झंडा और दूसरे हाथ में कैंडल लिए आए दिन सड़कों पर निकलती हैं।

युवाओं को भड़काते हुए रवीश कुमार का फेसबुक पोस्ट

कहीं रवीश की इच्छा ये तो नहीं कि बिहार के छात्र संगठनों में वामपंथ काबिज हो जाए और नेता झूठी अफवाह फैलाएँ कि कैम्पस में सीआरपीएफ तैनात कर छात्रों को पिटवाया जा रहा है। जेएनयू के छात्र नेता साकेत मून ने कुछ ऐसा ही किया। आवाज़ उठाने और सड़क पर उतरने के लिए युवाओं को जेएनयू से सीखने की सलाह देने वाले रवीश कहीं ऐसा तो नहीं चाहते कि यूपी-बिहार के कॉलेजों में भी महिला पत्रकारों के साथ बदतमीजी की जाए और उनके ‘मजे लेने’ की बात कही जाए। महिला मीडियाकर्मियों को घेर कर गुंडागर्दी करने का काम जेएनयू के उपद्रवी कर चुके हैं।

आखिर पढ़ने के लिए राजनीति करना अनिवार्य क्यों है? राजनीति की समझ होना, राजनीतिक चर्चा करना और सड़क पर उतर कर राजनीति करना अलग-अलग चीजें हैं। जब रवीश कहते हैं कि हिन्दू पट्टी के युवा चुप हैं, तब क्या वो उन्हें अराजकता फैलाते हुए जेएनयू के उपद्रवियों की तरह पुलिस बैरिकेडिंग तोड़ कर क़ानून-व्यवस्था की ऐसी-तैसे करने को नहीं भड़का रहे? क्या रवीश कुमार जवाब देंगे कि सोमवार (नवंबर 18, 2019) को दिल्ली में उद्योग भवन, लोक कल्याण मार्ग, सेंट्रल सेक्रेटेरिएट और पटेल चौक मेट्रो स्टेशनों पर सेवाओं को ठप्प क्यों किया गया था? इससे कितने लोगों को परेशानी हुई, इसका कोई हिसाब नहीं। उस दिल्ली में ऐसा हुआ, जहाँ मेट्रो को सिटी की लाइफलाइन कहा जाता है।

बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी भी तो इसी देश का हिस्सा है। वहाँ के छात्र भी तो युवा ही हैं। वो अपने ही विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना मदन मोहन मालवीय के मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनके बारे में रवीश ने कभी लिखा क्या? बीएचयू में महमना का नियम चलेगा या फिर किसी वामपंथी वीसी की मनमानी? अगर ऐसा है तो वहाँ शिलापट्टों पर लिखे महामना के विचारों को उसी स्प्रे पेंट्स से मिटा देना चाहिए, जिसका प्रयोग कर के विवेकानंद को अपमानित किया गया था। और हाँ, उस स्प्रे पेंट की कीमत जेएनयू के कई छात्रों के हॉस्टल फी से ज्यादा होती है।

लेकिन, रवीश कुमार बीएचयू पर नहीं लिखेंगे। वे कैलिफोर्निया से अराजकता भड़काने की मीठी गोली फेंकेंगे। उन्होंने मंगलवार को ख़ुद बताया कि वो फ़िलहाल कैलिफोर्निया के कॉलेज ऑफ केमिस्ट्री में घूम रहे हैं। मज़ाकिया अंदाज़ में उन्होंने लिखा कि वो एक ऐसा मॉलिक्यूल बना रहे हैं, जो कम्युनल/ फेक टेक्स्ट के साथ अपने आप चिपक जाएगा। हालाँकि, उन्होंने ये नहीं बताया कि ये मॉलिक्यूल झूठ बोल कर और भ्रामक बातें कर के युवाओं को अराजकता फैलाने के लिए भड़काने वालों के कहाँ जाकर चिपकेगा? रवीश ने लिखा कि जैसे ही कोई कम्युनल टेक्स्ट पढ़ेगा, उसकी नाक से होते हुए मॉलिक्यूल दिमाग़ में अलार्म बजाने लगेगा।

अगर सच में ऐसा है तो रवीश को इस मॉलिक्यूल का प्रयोग ख़ुद पर तो कभी नहीं करना चाहिए। वरना वो डूबते चैनल एनडीटीवी के लो-टीआरपी शो ‘प्राइम टाइम’ में बैठेंगे तो उनके रुदन की जगह जनता को एक घंटे तक अलार्म की आवाज़ ही सुनने मिलेगी। दावा तो उन्होंने ये किया है कि ये अलार्म दिमाग में बजेगा लेकिन रवीश के मामले में कहाँ से आवाज़ निकलेगी, इस पर वो फ़िलहाल चुप हैं। राज्यसभा का 250वाँ सत्र चल रहा है। ऐसे में रवीश चाहते हैं कि इस ऐतिहासिक मौके पर कुछ ऐसा हो, जिससे जनता का ध्यान वहाँ से हट कर कहीं और चला जाए। सड़कों पर ख़ून बहे और अराजकता फैले।

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बरखा दत्त
मीडिया गिरोह ऐसे आंदोलनों की तलाश में रहता है, जहाँ अपना कुछ दाँव पर न लगे और मलाई काटने को खूब मिले। बरखा दत्त का ट्वीट इसकी प्रतिध्वनि है। यूॅं ही नहीं कहते- तू चल मैं आता हूँ, चुपड़ी रोटी खाता हूँ, ठण्डा पानी पीता हूँ, हरी डाल पर बैठा हूँ।

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