Sunday, July 14, 2024
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उत्तर-पूर्वी राज्यों में संघर्ष पुराना, आंतरिक सीमा विवाद सुलझाने में यहाँ अड़ी हैं पेंच: हिंसा रोकने के हों ठोस उपाय  

उत्तर-पूर्व में केंद्र और राज्य सरकारों के लिए उनकी लगातार बदलती भूमिका चुनौती भी लाती हैं और अवसर भी। यह तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब केंद्र में सत्ताधारी दल भाजपा किसी न किसी रूप में सभी राज्य सरकारों का हिस्सा है।

असम और मिजोरम के पुलिस बलों के बीच सोमवार 26 जुलाई के दिन हुई झड़प गंभीर हो गई। परिणामस्वरूप गोलीबारी में असम पुलिस के पाँच जवान और साथ ही एक नागरिक भी मारा गया। घटना असम के कछार और मिजोरम के कोलासिब जिलों की सीमा पर हुई। उत्तर-पूर्व में हाल के वर्षों में हुई यह सबसे गंभीर घटना है जो आतंरिक सीमा विवाद से आगे हिंसा तक जा पहुँची। जो बात चिंताजनक है वो यह है कि दो राज्यों के पुलिस बलों से ऐसी घटना की अपेक्षा नहीं की जाती। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि ये झड़प हाल ही में शिलांग में उत्तर-पूर्वी राज्यों और केंद्र के बीच हुई एक ऐसी बैठक के बाद हुई जिसमें राज्यों की आतंरिक सीमाओं से सम्बंधित विवाद के संभावित हल तलाशने की दिशा में चर्चा हुई थी।

उत्तर-पूर्व के राज्यों की आतंरिक सीमाओं पर नागरिकों के बीच झड़प या संघर्ष होता रहा है पर हाल के वर्षों में पुलिस बलों के बीच ऐसी गंभीर झड़प नहीं हुई थी। घटना ने दोनों राज्यों के साथ-साथ देश को भी आश्चर्यचकित कर दिया।

इस घटना के बाद असम और मिजोरम के मुख्यमंत्रियों का सार्वजनिक आचरण भी लोगों को हतप्रभ कर गया। दोनों मुख्यमंत्रियों ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से अपने ट्विटर अकाउंट के माध्यम से शिकायत की। राज्यों के मुख्यमंत्रियों से सार्वजनिक तौर पर ऐसे आचरण की अपेक्षा नहीं रहती पर दोनों मुख्यमंत्रियों ने जो किया उसके पीछे शायद यह कारण रहा कि दोनों अपने राज्य के नागरिकों के साथ खड़े दिखना चाहते थे। वैसे भी उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोग ऐसे मौकों पर भावावेश में रहते हैं। यह बात राज्य के नेताओं को विवश करती है कि वे अपने नागरिकों के साथ खड़े दिखें। एक और कारण शायद यह था कि झड़प में पाँच पुलिसवालों की आकस्मिक मृत्यु असम के लोगों के लिए असाधारण बात थी।

उत्तर-पूर्वी राज्यों में आंतरिक सीमा विवादों का इतिहास पुराना है। असम और उसके पड़ोसी राज्यों के बीच ऐसे विवाद होते रहे हैं। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि मेघालय, नागालैंड और मिजोरम पहले असम का ही हिस्सा थे जो अलग-अलग समय में असम से राज्यों के रूप में अलग किए गए। इन तीन राज्यों के अलावा असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच भी आंतरिक सीमा का विवाद रहा है जो अक्सर सीमा पर बसे नागरिकों के बीच होता रहता है। जनजातियों के बीच ऐसे विवाद अधिकतर खेती की जमीन जंगल या समय-समय पर अवैध निर्माण के कारण होते हैं। इन राज्यों में स्थानीय लोगों के बीच आंतरिक सीमाओं को लेकर विवाद इसलिए भी आम है क्योंकि कोई ऐसी सीमा होती नहीं जो दोनों राज्यों को अलग करे।

इन प्रदेशों में जनजातियों की भारी मात्रा में उपस्थिति के कारण उत्तर-पूर्वी राज्यों में प्रशासनिक व्यवस्था अधिकतर स्वायत्त स्थानीय काउंसिल के अधीन रहती है। ऐसे में राज्यों के प्रशासन के हर पहलू को दुरुस्त रखने की अपेक्षा करना हमेशा तार्किक नहीं लगता। वैसे भी जनजातियों के बीच संबंधों और संघर्षों का एक लम्बा इतिहास रहा है। पिछले चार-पाँच दशकों में इस स्थानीय व्यवस्था में जनसंख्या में हो रहे बदलाव के कारण ऐसे गुट भी बने हैं जो जनजातियों का हिस्सा नहीं रहे और हाल के वर्षों में इन जगहों पर पहुँचे हैं। यह एक ऐसी समस्या है जो पिछले लगभग सत्तर वर्षों से केवल असम ही नहीं बल्कि मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम में भी देखी गई है। इन बातों का प्रभाव स्थानीय प्रशासन और कानून व्यवस्था पर पड़ता ही है। असम में तेज़ी से हुए जनसंख्या में बदलाव का राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव दिखाई देने लगा है।

इसके अलावा इन राज्यों में विकास और मूलभूत सुविधाओं को लेकर पहले की केंद्र और राज्य सरकारों के प्रदर्शन पर हमेशा प्रश्नचिन्ह लगता रहा। इन कारणों से ये राज्य न केवल बाकी के भारत से कटे रहे बल्कि इनमें नीति निर्धारण, विकास की रूपरेखा और उनका क्रियान्वयन न हो सका। ये ऐसी समस्याएं हैं जिनका हल निकालने में समय लगेगा। वर्तमान केंद्र सरकार के प्रयास पिछले कुछ वर्षों से दिख रहे हैं पर दशकों की समस्याओं का हल वर्षों में संभव नहीं हो सकता। जनजातियों का आर्थिक विकास जब तक कृषि पर निर्भर रहेगा तब तक ऐसी समस्याएं दिखाई देती रहेगी।

वर्तमान परिस्थितियों में केंद्र और राज्य सरकारों के लिए एक चुनौती यह तय करने की भी है कि जनजातियों में संवैधानिक या कानूनी दृष्टिकोण स्थापित करना कितना कठिन या सरल है? यह प्रश्न इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि असम और उसके पड़ोसी राज्य अपनी सीमाएं चार अलग-अलग देशों से साझा करते हैं। चुनौती यह तय करने की भी है कि जनजातियों के प्रति सरकारों का जो रवैया आज से पचास वर्ष पूर्व था, क्या आज भी प्रासंगिक है? क्या पिछले पांच दशकों में नई परिस्थितियाँ पैदा नहीं हुई जो स्थानीय प्रशासन के लिए ही नहीं बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों के लिए नई चुनौती लेकर आई हैं। समय के अनुसार क्या समस्याएं, चुनौतियाँ और अवसर बदले नहीं हैं?

उत्तर-पूर्व में केंद्र और राज्य सरकारों के लिए उनकी लगातार बदलती भूमिका चुनौती भी लाती हैं और अवसर भी। यह तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब केंद्र में सत्ताधारी दल भाजपा किसी न किसी रूप में सभी राज्य सरकारों का हिस्सा है। असम के मुख्यमंत्री नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस के सबसे महत्वपूर्ण नेता हैं। उनकी भूमिका इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाती है। उनके और साथ ही अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों के लिए यह अवसर है कि दशकों से चल रहे आंतरिक सीमा विवाद का हल निकालने की दिशा में तेज़ी से कदम उठाएं। केंद्रीय गृह मंत्रालय को भी जल्दी दिखाते हुए इन सीमा विवादों का हल निकालने के प्रयासों में अपना योगदान देना चाहिए। हाल की बैठकों से स्पष्ट है कि एक प्रयास जारी है पर इसमें तेज़ी लाई जानी चाहिए ताकि ऐसी किसी घटना को दोबारा होने से रोका जा सके।

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