प्रिय मृणाल पांडे, आपकी बातें सड़क पर नाइदो तनियम जैसी हत्या करा सकती हैं! सँभालिए खुद को

देश की स्वतंत्रता के इतने सालों बाद पहली बार कोई प्रधानमंत्री आया है जो भारत के उत्तर-पूर्व हिस्सों में लगातार जाता है, उनकी परम्पराओं को सम्मान देता है, उनके क्षेत्र के विकास पर ध्यान देता है, तो भी कुछ लोगों को सिर्फ़ मजाक ही सूझता है!

पाँच साल पहले की बात है, 29 जनवरी 2014 की। अरुणाचल प्रदेश का एक लड़का था, उम्र 19 साल। दिल्ली के लाजपत नगर में किसी जगह का पता खोज रहा था। एक मिठाई की दुकान थी, वहाँ से किसी ने उसके बालों का मजाक उड़ाया। उसने बाल सुनहरे रंग से रंग रखे थे, वो औरों से अलग दिखता था। इतना काफी था उसे छेड़ने और उकसाने के लिए।

मजाक और उपहास का पात्र बनने पर उसे गुस्सा आया। कहा-सुनी हुई। उसके बाद भरी दोपहरी में रॉड और डंडों से पीटा गया। फिर पुलिस आ गई। कथित तौर पर पुलिस की उपस्थिति में भी उसे पीटा गया। किसी तरह अपनी जान बचाकर वो अपनी बहन के घर पहुँचा। वहाँ रात में सोया और सुबह जगा नहीं। उसके दिमाग और फेफड़ों में अंदरूनी चोट पहुँचने के कारण वो मर गया। नाइदो तनियम अरुणाचल प्रदेश के कॉन्ग्रेस विधायक के पुत्र थे।

कल नरेन्द्र मोदी अरुणाचल प्रदेश में थे। वहाँ रैली में भाषण देते वक्त उन्होंने अरुणाचली जनजातीय परम्परा में पहनी जानी वाली टोपी सर पर पहन रखी था। जब उनके भाषण की तस्वीरें सोशल मीडिया पर आई तो एक ट्विटर यूज़र, आशीष मिश्रा (@ktakshish), ने उपहास करते हुए लिखा, “आज दुग्गल साहब मोर बने हैं।” 

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हालाँकि, ट्विटर पर इस तरह की बातें होती रहती हैं, और पीएम का मजाक आए दिन खूब उड़ता है। लेकिन ऐसे घटिया विचार वाले लोगों को मृणाल पांडे जैसे लोग शह देते हों, तो लगता है कि किसी एक प्रदेश की वेशभूषा को लेकर इनके मन में कितना कूड़ा भरा है। आशीष मिश्रा ने माफ़ी माँगते हुए अपना ट्वीट मिटा दिया है, लेकिन माफ़ी में भी यह लिखा कि ‘नॉर्थ ईस्ट वालों को रेसिस्ट लग रहा था’। ज़ाहिर है कि इन्हें ये रियलाइजेशन नहीं हुआ कि वो ट्वीट कैसा था। ख़ैर, उनको रहने देते हैं, क्योंकि उनका महत्त्व माध्यम होने भर का ही है, उससे ज़्यादा नहीं।

जबकि मृणाल पांडे ने उस ट्वीट के जवाब में जो ट्वीट लिखा वो और भी बेकार था, लेकिन अभी भी मौजूद है। उसमें मोदी की तरफ इशारा करते हुए एक मुर्ग़े को कोट पहनाया हुआ दिखाया गया है। 

मृणाल पांडे उसी गिरोह से आती हैं जो पत्रकारिता के नाम पर विचारधारा परोसने में व्यस्त हैं। विचारधारा के लिए भी किसी को कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सबकी होती है। लेकिन घृणा और भेदभाव के साथ भारत की विविधता का उपहास करना बताता है कि मानसिक रूप से कुछ लोग कितना नीचे गिर सकते हैं। 

मृणाल पांडे एक साहित्यकार भी रह चुकी हैं (‘चुकी हैं’ क्योंकि अभी तो वैसे लक्षण नहीं दिख रहे, साहित्य तो चुक ही गया है)। उनकी माताजी हिन्दी का एक चमकता सितारा थीं। साहित्यकार संवेदनशील होता है। साहित्यकार अपने समाज को, दूसरे समाजों को, बाकी लोगों से बेहतर तरीके से देखने और समझने में सक्षम होता है। लिखने वाले लोगों से अपेक्षा की जाती है कि अपने शब्दों से हमें घर बैठे दुनिया की सैर करा दें।

लेकिन मृणाल पांडे, जो वैचारिक असहमति की राह से उतरकर घृणा और द्वेष की कुंठा का विष उगलती आगे बढ़ रही हैं, उनमें साहित्यकार या पत्रकार होने की संवेदना का घोर अभाव है। विचारधारा से घृणा उचित है, व्यक्ति से भी घृणा करना संदर्भों में उचित जान पड़ता है (लेकिन बता दें कि आलोचना नहीं, घृणा ही है), लेकिन एक समाज की विविधता का उपहास! ये तो नीचे गिरते जाने की सीढ़ी है जहाँ आपने सर पर इतनी घृणा लाद रखी है कि ऊपर आना मुश्किल दिखता है।

मोदी के सर पर जो टोपी थी, वो अरुणाचल प्रदेश की निशि जनजाति द्वारा पहनी जाने वाली पारम्परिक टोपी है। उसमें हॉर्नबिल नामक चिड़िया को जनजातीय कलाकृति के अद्भुत नमूने के रूप में दर्शाया गया था। देश की स्वतंत्रता के इतने सालों बाद पहली बार कोई प्रधानमंत्री आया है जो लगातार भारत के उत्तर-पूर्व हिस्सों में लगातार जाता है, उनकी परम्पराओं को सम्मान देता है, उनके क्षेत्र के विकास पर ध्यान देता है, तो भी कुछ लोगों को सिर्फ़ मजाक ही सूझता है!

उत्तर-पूर्व के लोगों को मुख्यधारा में लाने की कोशिश के लिए जहाँ दिल्ली पुलिस में वहाँ के लोगों की भर्ती की जा रही है, जागरुकता अभियान चलाए जा रहे हैं, वहाँ कॉन्ग्रेस मुखपत्र नेशनल हेराल्ड की एडिटर के इस तरह के विचार दुःखद और निंदनीय हैं। यही कारण है कि ऊपर से फैलाई जा रही इस तरह की घृणा नीचे सड़कों तक उतरती है और कभी नाइदो तनियम मारा जाता है, कभी लोयथम रिचर्ड

वो अलग दिखते हैं, क्योंकि उनकी परम्पराएँ अलग है। उनके लिए हम अलग हैं, अलग दिखते हैं। भारत विविधताओं से भरा देश है, और हमें एक-दूसरे की विविधता का सम्मान करना सिखाया जाता है। यही हमारी धरोहर है, और हमारी पहचान भी। यहाँ पर कभी थरूर द्वारा नागा जनजातीय वेशभूषा का उपहास करना, तो कभी उसी कॉन्ग्रेसी विचारधारा के मुखपत्र की एडिटर का अरुणाचल की वेशभूषा का मजाक बनाना बताता है कि अभिजात्य मानसिकता के कैंसर का कोई इलाज नहीं।

कितनी अजीब बात है कि कोई व्यक्ति अपने पद का इस्तेमाल लोगों को जोड़ने में कर रहा है, और आपके पास उसकी नीतियों को लेकर, उसके कार्य को लेकर कुछ कहने को नहीं है, तो आप उसकी उस कोशिश का उपहास करते हैं जहाँ वो किसी जनजाति की परम्परा का सम्मान कर रहा होता है! ये बताता है कि आपकी चर्चा का स्तर कितना गिर चुका है। 

सड़क पर हो रहे भेदभाव को आग मत दीजिए मृणाल जी, इसकी लपटें जब उठेंगी तो आपकी जैसी विकृत मानसिकता वाले लोग मिठाई के दुकान के बाहर किसी अरुणाचली को रॉड और लातों से इतना मारेंगे कि उसकी छाती की हड्डियाँ टूट जाएँगी, दिमाग को चोट पहुँचेगी और फेफड़ों में ख़ून उतरने के कारण उसकी मृत्यु हो जाएगी।

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