Friday, April 3, 2026
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आधुनिकता की चमक और संस्कृति की छाया: हम डिजिटल युग में भविष्य बना रहे हैं या खुद को खो रहे हैं?

शोध बताते हैं कि केवल एक सप्ताह का डिजिटल डिटॉक्स भी मानसिक संतुलन में सुधार ला सकता है। यह दर्शाता है कि हमारा मस्तिष्क लगातार डिजिटल उत्तेजना से थक चुका है। विश्व के कई देश इस खतरे को पहचान चुके हैं। फ्रांस, ब्रिटेन और अन्य देशों में बच्चों के लिए सोशल मीडिया नियंत्रण, स्क्रीन लिमिट और पैरेंटल कंट्रोल पर गंभीर विचार हो रहा है।

भारत ने बीते वर्षों में डिजिटल इंडिया के माध्यम से अभूतपूर्व प्रगति की है। सरकारी सेवाओं का डिजिटलीकरण, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन शिक्षा, टेलीमेडिसिन और ई-गवर्नेस ने आम नागरिक के जीवन को आसान बनाया है। मोदी सरकार की मंशा रही है कि तकनीक के माध्यम से पारदर्शिता बढ़े, योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे और युवा शक्ति नवाचार व शोध की ओर प्रेरित हो। इसमें कोई संदेह नहीं कि डिजिटल क्रांति ने भारत को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई है। भारतीय वैज्ञानिकों, तकनीकी संस्थानों और स्टार्टअप्स ने विश्व स्तर पर अपनी क्षमता सिद्ध की है। आज भारत डिजिटल भुगतान, स्टार्टअप इकोसिस्टम आईटी सेवाओं में अग्रणी देशों में गिना जाता है।

इसी प्रगति के बीच एक मौन, गहरी और गंभीर चिंता भी जन्म ले रही है: क्या हम तकनीक का उपयोग कर रहे हैं, या धीरे-धीरे उसके मानसिक गुलाम बनते जा रहे हैं?

आज शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहाँ मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया की पहुँच न हो। सुबह आँख खुलते ही मोबाइल हाथ में आ जाता है और रात को सोने से पहले भी वही अंतिम साथी होता है। हम बिना सोचे-समझे घंटों स्क्रीन पर समय बिताते हैं। विभिन्न सर्वेक्षण बताते हैं कि भारत में लोग औसतन प्रतिदिन 6 से 7 घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं। यह समय केवल काम या अध्ययन में नहीं जाता बल्कि अधिकतर सोशल मीडिया, रील्स, वीडियो और मनोरंजन में व्यतीत होता है। यह आँकड़ा केवल समय का नहीं, हमारी सोच, हमारी प्राथमिकताओं और हमारे जीवन के संतुलन का भी संकेत देता है।

पहले परिवारों में शाम को बैठकर बातचीत होती थी। चौपालों पर चर्चा होती थी। ट्रेन में लोग एक-दूसरे से बात करते थे। पार्कों में बुजुर्ग अनुभव साझा करते थे। आज हर व्यक्ति अपने-अपने मोबाइल में खोया हुआ है। पास बैठा व्यक्ति भी दूर लगता है।

भारतीय समाज की सबसे बड़ी ताकत उसका संवाद थाः संवाद, सहकार और सौहार्द। आज वही संवाद धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। डिजिटल निर्भरता का सबसे बड़ा प्रभाव हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर दिखाई देता है। चिकित्सकों और शोधकर्ताओं के अनुसार, अत्यधिक स्क्रीन टाइम से अवसाद, चिंता, अनिद्रा और तनाव जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। कोलंबिया यूनिवर्सिटी और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जैसे संस्थानों के अध्ययन बताते हैं कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग किशोरों और युवाओं में मानसिक असंतुलन, आत्मविश्वास की कमी और सामाजिक अलगाव को जन्म देता है।

शारीरिक स्तर पर भी इसके दुष्परिणाम स्पष्ट हैं। कम चलना-फिरना, लंबे समय तक बैठना और देर रात तक स्क्रीन देखने से मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और रक्तचाप जैसी बीमारियाँ बढ़ रही हैं। जो रोग पहले वृद्धावस्था में होते थे, वे आज युवावस्था में ही दस्तक देने लगे हैं। यह केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं, भविष्य की पीढ़ी की क्षमता का प्रश्न है। इंटरनेट और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री भी एक गंभीर विषय है। हिंसा, अश्लीलता, अपसंस्कृति, गाली-गलौज और विकृत मानसिकता से भरी सामग्री आसानी से बच्चों और युवाओं तक पहुँच रही है।

इसका प्रभाव उनके मन, सोच और व्यवहार पर पड़ रहा है। रिश्तों के प्रति संवेदनशीलता कम हो रही है। धैर्य घट रहा है। सहनशीलता कमजोर हो रही है। कभी भारतीय परिवार को ‘प्रथम पाठशाला’ कहा जाता था। दादा-दादी बच्चों को कहानियाँ सुनाते थे, संस्कार देते थे, जीवन के मूल्य समझाते थे। माता-पिता बच्चों के साथ समय बिताते थे। आज वह भूमिका मोबाइल फोन निभा रहा है।

दो-तीन साल का बच्चा भी मोबाइल चलाना जानता है। माता-पिता व्यस्त हैं। बच्चे को मोबाइल पकड़ा दिया जाता है। यही उसकी दुनिया बन जाती है। संयुक्त परिवार की परंपरा, जो भारतीय समाज की रीढ़ थी, धीरे-धीरे कमजोर हो रही है। बुजुर्गों का अनुभव, मार्गदर्शन और संस्कार नई पीढ़ी तक नहीं पहुँच पा रहे हैं। हमारी संस्कृति संयम, संतुलन और त्याग पर आधारित रही है। सीमित आवश्यकताएँ, सरल जीवन और सामूहिकता हमारी पहचान थी।

आज हमारी आवश्यकताएँ असीमित हो गई हैं। उपभोग की संस्कृति बढ़ रही है। हम अधिक कमाने, अधिक खर्च करने और अधिक दिखाने की होड़ में फँसते जा रहे हैं। तकनीक ने इस प्रवृत्ति को और तेज कर दिया है। आज हर प्रश्न का उत्तर गूगल से लिया जाता है। हर निर्णय ऐप से होता है। हर दिशा GPS बताता है। हम धीरे-धीरे अपनी सोच, विवेक और निर्णय क्षमता तकनीक को सौंपते जा रहे हैं।

हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि बु‌द्धि से ऊपर विवेक होता है। तकनीक बुद्धि का उत्पाद है लेकिन विवेक का विकल्प नहीं। जब विवेक कमजोर होता है, तब समाज दिशाहीन हो जाता है। इंटरनेट युग में अध्ययन, साहित्य, महापुरुषों के विचार और गहन चिंतन पीछे छूटते जा रहे हैं। कम लोग हैं जो तकनीक का उपयोग आत्मविकास के लिए करते हैं। अधिकतर लोग सतही मनोरंजन में उलझे रहते हैं।

शोध बताते हैं कि केवल एक सप्ताह का डिजिटल डिटॉक्स भी मानसिक संतुलन में सुधार ला सकता है। यह दर्शाता है कि हमारा मस्तिष्क लगातार डिजिटल उत्तेजना से थक चुका है। विश्व के कई देश इस खतरे को पहचान चुके हैं। फ्रांस, ब्रिटेन और अन्य देशों में बच्चों के लिए सोशल मीडिया नियंत्रण, स्क्रीन लिमिट और पैरेंटल कंट्रोल पर गंभीर विचार हो रहा है।

भारत में भी इस दिशा में संतुलित नीति की आवश्यकता है- ऐसी नीति जो स्वतंत्रता और जिम्मेदारी दोनों को संतुलित करे। नीति से अधिक जरूरी सामाजिक जागरूकता है। माता-पिता को बच्चों के साथ समय बिताना होगा। शिक्षकों को केवल पाठ्यक्रम नहीं, जीवन मूल्य भी सिखाने होंगे। समाज को संवाद की संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। डिजिटल इंडिया हमारी ताकत है। यह हमारी प्रगति का आधार है। लेकिन यदि हमने संतुलन नहीं बनाया, तो यही ताकत हमारी कमजोरी बन सकती है।

तकनीक साधन है, साध्य नहीं। हमें यह तय करना होगा कि हम तकनीक के मालिक रहेंगे या उसके दास बनेंगे। आज आवश्यकता है आत्ममंथन की। अपने जीवन की गति को थोड़ा धीमा करने की। अपने रिश्तों को फिर से समय देने की। अपने बच्चों को स्क्रीन से बाहर की दुनिया दिखाने की। डिजिटल युग में भी भारतीय मूल्य, संस्कृति और विवेक ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी हैं। यदि हम इन्हें बचा पाए, तो तकनीक हमारे लिए वरदान बनेगी। अन्यथा, हम सुविधाओं से भरे लेकिन संवेदनहीन समाज में बदलते चले जाएँगे। यह चुनाव आज हमारे हाथ में है।

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Harish Chandra Srivastava
Harish Chandra Srivastavahttp://up.bjp.org/state-media/
Spokesperson of Bharatiya Janata Party, Uttar Pradesh

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