Tuesday, October 27, 2020
Home विचार सामाजिक मुद्दे मी लॉर्ड! शाहीन बाग पर आपके फैसले की बत्ती बना कर बीरबल जैसे देखते...

मी लॉर्ड! शाहीन बाग पर आपके फैसले की बत्ती बना कर बीरबल जैसे देखते रहने के अलावा क्या विकल्प है?

राजनीति हमेशा विवश रहेगी न्यायाधीशो! आपकी शक्तिहीनता किस कारण है? इस लाचारी से जन्मी परिस्थितियों ने 53 लाशें गिरा दीं मी लॉर्ड। एक सीधे सवाल के उत्तर में आपको जनवरी से अक्टूबर क्यों लग जाता है महाशयों?

शाहीन बाग दिसम्बर 2019 के उत्तरार्ध में जामिया नगर के दंगों के साथ शुरु हुआ एक कैंसरकारी ट्यूमर था, जिसकी जानकारी विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और अपने ही कर्मियों द्वारा टाँग उठा कर मूत्र विसर्जन किए जाने वाले चौथे खम्बे, मीडिया, को भी थी। फिर भी यह चलता रहा और इसकी परिणति 2020 की फरवरी 23, 24, 25 वाले हिन्दू विरोधी दंगों के रूप में हुई, जो किस व्यापकता को प्राप्त करती देवाधिदेव जानते हैं।

आज इस देश की सबसे उन्मुक्त, किसी भी तरह के प्रश्नों से स्वतंत्र और समय-समय पर कालजयी निर्णय देने वाली संस्था ने कहा है कि ‘शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन ही उचित है, जगह घेर कर बैठ जाना गलत है क्योंकि लोगों को इससे परेशानी होती है।’

पहली बात तो यह है कि यह बात तो आठवीं कक्षा में पढ़ते छात्र-छात्राएँ भी जानते हैं कि किसी भी मौलिक अधिकार के वृत्त की परिधि वहीं सीमित हो जाती है, जहाँ से दूसरों को उससे परेशानी होने लगती है। इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय को अपना वक्त लगाना पड़ा, बहस हुई, फिर निर्णय आया कि ‘नहीं भाई, शाहीन बाग में जो हुआ वो गलत था’।

यही अदालतें दिवाली पर क्या होना है, समय से पहले बता देते हैं; दहीं हाँडी का ऊँचाई तक इनको निर्धारित करनी होती है; कौन सी फिल्म बिना कटे-छँटे रिलीज होनी है, ये एक दिन की आपातकालीन सुनवाई में तय हो जाती है। इनके पास समयाभाव कभी नहीं रहा अगर आपके पास सही वकील हैं। कई बार स्वयं ही संज्ञान ले कर महामहिम न्यायमूर्तिगण ज्ञान की बातें समाज के हित में कर देते हैं।

लेकिन, शाहीन बाग जैसी प्रायोजित नौटंकी पर इनको अक्टूबर 2020 लग जाता है। बात यह नहीं है कि न्यायालय को तो निर्णय देना होता है, बात यह है कि इस निर्णय का अब करें क्या? क्या यह निर्णय सुनिश्चित कर देगा कि आगे शाहीन बाग पैदा नहीं होगा और ये वामी-कामी-इस्लामी कट्टरपंथियों का समूह दोबारा पूरे भारत को हिन्दूविरोधी दंगों की आग में नहीं झोंकेगा?

इस निर्णय की बत्ती बना कर जहाँ सूर्य की रोशनी नहीं पहुँचती वहाँ जला कर रखने के अलावा क्या विकल्प है? करें क्या इस निर्णय का? इसी न्यायालय से यह तक संभव न हो सका कि वो पुलिस से शाहीन बाग खाली करवा दे, न यह हुआ कि सरकारों को हाजिर करे कि ये हो क्या रहा है उसके निर्देशों का? 17 फरवरी को इसी सर्वोच्च न्यायालय ने कहा विरोध कीजिए लेकिन सड़क ब्लॉक मत कीजिए।

उसका क्या हुआ? क्या सुप्रीम कोर्ट की हालत गाँव के नुक्कड़ पर बैठे उस बुजुर्ग की हो गई है जो जानता है कि क्या गलत हो रहा है, बोलता भी है कि कोई उसको सही कर दे, लेकिन उसको पता ही नहीं कि कोई सुन भी रहा है! सुप्रीम कोर्ट ने भी बोल दिया, किसी ने सुना, पालन किया कि नहीं, ये जानने का भी समय नहीं।

दिल्ली पुलिस, केन्द्र सरकार सब दोषी हैं

53 लोगों की लाश कैसे गिरी, यह एक अलग बात है, लेकिन वहाँ तक पहुँचने की सारी सीढ़ियाँ शाहीन बाग से ही हो कर गई थी। जब पहले दिन शाहीन बाग में अराजकतावादी भीड़ पहुँची, दो दिन दंगे हो चुके थे, तब दिल्ली पुलिस ने बैरिकेडिंग की थी। उन्होंने उसे हटवाया था और रात को चले गए। फिर जामिया समेत अलीगढ़ और जेएनयू के इस्लामी कट्टरपंथी लड़कों ने वापस उसे हटवा कर फिर से रास्ता बंद कर दिया।

अब सवाल यह है कि उसी दिन दिल्ली पुलिस ने वापस क्यों नहीं हटाया? क्या उन्हें इसकी भनक नहीं थी कि यहाँ दो दिन पहले दंगा हुआ, आगजनी हुई और ये मुस्लिम बहुल इलाका है जहाँ मस्जिदों की लाउडस्पीकरों से भीड़ जुटाई जाती है, तो इस नासूर को बढ़ने न दिया जाए?

केन्द्र सरकार क्या कर रही थी? क्या वो ये देखना चाह रही थी कि दिल्ली चुनावों के समय इस पर आम आदमी पार्टी क्या करती है, उसके हिसाब से चलेंगे? मैं एक सामान्य नागरिक के तौर पर इन प्रश्नों के उत्तर पाना चाहता हूँ कि जब कानून हर तरह से पारित हो गया, तो इन अराजक तत्वों और इस्लामी कट्टरपंथियों को वामपंथी धूर्तों के साथ इकट्ठा होने क्यों दिया?

क्या तर्क यह था कि ये लोग स्वतः नग्न हो जाएँगे? बात यह है कि इनकी नग्नता किन्हें नहीं दिखती? ये कब-कब एक्सपोज नहीं हुए हैं? क्या हजार-दो हजार लोग जब चाहेंगे राष्ट्र की राजधानी को इच्छानुसार बंधक बना लेंगे? जिस दिन छात्र पत्थर उठाता है, उसकी छात्र होने की पात्रता खत्म हो जाती है। जिस दिन नागरिक मशाल उठा कर गैस सिलिंडर वाली बस में आग लगा कर पूरे इलाके को उड़ाने के स्वप्न को प्रतिफलित करना चाहता है, उसी समय वह अपराधी हो जाता है, और उसके सारे मौलिक अधिकार अनुपस्थित हो जाते हैं।

अपराधी चाहे एक व्यक्ति हो या भीड़, समाज की सामाजिकता, राष्ट्र की राष्ट्रीयता और संविधान की संवैधानिकता की समुचित रक्षा हेतु पुलिस तंत्र को निरपेक्ष हो कर हर वह निर्णय लेना चाहिए जो वृहद समाज, राष्ट्र और संविधान को सहेजने के लिए आवश्यक हो। यहाँ तथाकथित छात्र देश को तोड़ने की बातें “गलियों में निकलने का वक्त आ गया है, और पूछने का वक्त आ गया है कि ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या-ला इलाहा इल्लिल्लाह'” कहते हुए खुले में घूमते हैं और हम कहते कि ये छात्र हैं, सख्ती से पेश न आएँ!

ये छात्र हैं? ये छात्र हैं? ये वो परजीवी कीटडिंभ हैं जो किन्हीं कारणों से भारतभूमि के अपशिष्ट बन कर पश्चिमगमन नहीं कर पाए और अब ये फीताकृमि बन कर, बिना लक्षण दिखाए, बरसों तक भीतर से घालते रहे हैं। इन्हें सही माहौल मिले तो ये जान ले सकते हैं, और वही लक्ष्य भी है।

निर्णय से होगा क्या?

जब दिल्ली पुलिस तब इन दंगाइयों को रोक नहीं सकी, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा था कि ये जो कर रहे हैं, वो गलत है। फिर, इनके हाथ किसने बाँधे? क्या केन्द्र सरकार, जिसके अंतर्गत दिल्ली पुलिस आती है, उसका कुछ निर्देश था? क्या केन्द्र सरकार इस धोखे में रही कि ‘ये विद्यार्थी हैं, और वो महिलाएँ हैं, दिसम्बर की ठंढ में टिक नहीं पाएँगे’?

यहाँ रातोंरात ‘जस्टिस फॉर हाथरस’ के नाम से वेबसाइट बन जाती है, दंगों को लिए सौ करोड़ का इंतजाम हो जाता है, और हजारों की भीड़ मशाल, मास्क, तेल-फुलेल ले कर शहरों को फूँकने को तैयार रहती है, और आपको लगता है कि बच्चे हैं, औरतें हैं, ठंढ है, गर्मी है…

मी लॉर्ड लोग निर्णय भी देते हैं, और कालांतर में ज्ञान भी देते हैं कि ‘जस्टिस डिलेड इज़ जस्टिस डिनाय्ड’। ये दोनों ही बातें कैसे करते हैं आप लोग, भारतभूमि के महानतम न्यायिक मस्तिष्कधारक और न्यायवेत्तावृंद? करें क्या इस कालजयी निर्णय का! जब आप यह भी सुनिश्चित नहीं कर सकते कि आपकी कही बातें पुलिस माने, तो फिर अपने ही उपहास के लिए ऐसे निर्णय क्यों देते हैं?

यहाँ कट्टरपंथी और वामी-कामी गिरोह सत्तू-नमक बाँध कर बैठा है कि जब तक दो भी जिंदा रहेगा आपसे में ही लड़ मरेंगे, एक ही बचा तो हाथ में तलवार और पैर के अँगूठे और दूसरी उँगली के बीच में कटार फँसा कर लड़ता रहेगा। उसका जन्म ही अराजकता फैलाने के लिए हुआ है, हिंसा उसकी नियति है, हिन्दूघृणा उसका न बदल सकने वाला पाठ्यक्रम है, आग लगाना उसकी मनोवृत्ति है, दंगा उसके लिए मजहबी आयोजन है…

इसे दूसरी सड़क पर बैठने से कौन रोक लेगा मी लॉर्ड? ये पारदर्शी कपड़े पहन कर भी आएँ तो राजनीति उनकी नग्नता को देख नहीं पाएगी। उन कपड़ों के नीचे की कटारें, जाँघ पर बाँधे हुए पेट्रोल बम की बोतलें इन ज्ञानपुंजों को नहीं दिखती क्योंकि कटार से तो सब्जी भी काटी जाती है और पेट्रोल तो बाइक में भी डाला जाता है। यहाँ लोग कूल्हों पर एसिड की बोतलें ले कर घूम रहे हैं और हमें लगता है कि वो बैटरी चार्ज करने जा रहे होंगे।

राजनीति हमेशा विवश रहेगी न्यायाधीशो! आपकी शक्तिहीनता किस कारण है? इस लाचारी से जन्मी परिस्थितियों ने 53 लाशें गिरा दीं मी लॉर्ड। एक सीधे सवाल के उत्तर में आपको जनवरी से अक्टूबर क्यों लग जाता है महाशयों? आप इन अराजकतावादियों के समक्ष समझौता करने वालों को किस तार्किकता के आधार पर भेजते हैं? क्या इस भीड़ को छिन्न-भिन्न करने के लिए भारतीय वायुसेना की आवश्यकता थी?

या फिर राजनेताओं की तरह, न्यायपालिकाएँ भी इस ललबबुआ बने आततायी कट्टरपंथियों को हाथ में आइसक्रीम पकड़ा कर पूछेंगी कि मेरा राजा बेटा कौन है? किस तरह का संदेश देना चाह रहे हैं समाज में? यही कि कल को कोई भी भीड़ बना कर सड़क पर बैठ जाए, पुलिस जाए तो मत हटो, कोर्ट कहे, तब भी मत हटो क्योंकि दंगा करने के बाद न्यायालय बताएगी कि दस महीने पहले जो रोड ब्लॉक किया था, जिसके कारण करोड़ों रुपयों का नुकसान हुआ, और बाद में 53 लाशें गिरीं, वो गलत था, ऐसा नहीं करना चाहिए!

न्यायाधीशों को सोचना चाहिए कि क्या उनका कार्य सिर्फ श्वेत पन्नों पर काले अक्षरों से छपे हुए निर्णय देना है या उसका सन्निहितार्थ यह भी है कि कोर्ट का कहा माना जाएगा। अगर वह माना नहीं जा रहा है तो असीमित शक्तियों को अपने गर्भ में रखे इस न्यायपालिका को रोका किसने है?

सामान्य नागरिक ऐसे निर्णयों से क्या अर्थ निकाले? जो टैक्स देता है, नागरिकता के गिनाए कर्तव्यों का भी वहन करता है, बत्ती देख कर रुकता है, सामान खरीद कर बिल लेता है, किसी गलत घटना की त्वरित सूचना पुलिस को देता है… उसके लिए कौन सा न्याय किया है मी लॉर्ड? वो आपके इस निर्णय से क्या घर ले जाए? मी लॉर्ड, आप स्वयं इस निर्णय में उन अक्षरों के झुंड के अलावा क्या देख पा रहे हैं? आप इस निर्णय से क्या घर ले जाएँगे?

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

दाढ़ी कटाना इस्लाम विरोधी.. नौकरी छोड़ देते, शरीयत में ये गुनाह है: SI इंतसार अली को देवबंदी उलेमा ने दिया ज्ञान

दारुल उलूम देवबंद के उलेमा का कहना है कि दरोगा को दाढ़ी नहीं कटवानी चाहिए थी चाहे तो वह नौकरी छोड़ देते। शरीयत के हिसाब से उन्होंने बहुत बड़ा जुर्म किया है।

मुस्लिमों को BJP का डर भी दिखाया, ‘जात’ देख कर आरोपित को भी बचाया: लालू यादव का MY समीकरण

उन्हें जम कर भाजपा का डर दिखाया। इससे वो मुस्लिमों के मसीहा भी बने रहे और यादवों का वोट भी उन्हें मिलता रहा। इस तरह उन्होंने MY समीकरण बना कर राज किया।

15000 स्क्वायर किलोमीटर जंगल भी बढ़े और आदिवासी तरक्की के रास्ते में विकास के पार्टनर भी: प्रकाश जावड़ेकर

"बदलाव हम हर साल एफलिएशन में करते हैं। वो 1100 शिक्षक के सुझाव पर आधारित हैं। वो इतने सार्थक हैं कि 900 पेज का बदलाव हुआ, लेकिन..."

‘बिहार में LJP वोटकटुआ का काम करेगी, इससे परिणाम पर कोई असर नहीं पड़ेगा’- प्रकाश जावड़ेकर

"बिहार में भाजपा समर्थक सवाल उठा रहे कि वहाँ पर भाजपा अकेले चुनाव क्यों नहीं लड़ती? क्या इस मुद्दे पर केंद्रीय नेतृत्व में बातचीत होती है?"

‘OTT प्लेटफॉर्म सेल्फ-रेग्युलेशन की अच्छी व्यवस्था करे, फेक न्यूज पर PIB अच्छा कर रही है’ – प्रकाश जावड़ेकर

“इसके अच्छे और बुरे दोनों तरह के नतीजे आ रहे हैं। इसलिए हमने OTT प्लेटफॉर्म को कहा है कि वो सेल्फ-रेग्युलेशन की अच्छी व्यवस्था करें।"

370 हटने के बाद लद्दाख का पहला चुनाव, BJP ने मारी बाजी: 26 में 15 सीटों पर जीत, AAP को जीरो

लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिलने के बाद यह पहला चुनाव था। लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद (LAHDC) के चुनाव में...

प्रचलित ख़बरें

IAS अधिकारी ने जबरन हवन करवाकर पंडितों को पढ़ाया ‘समानता का पाठ’, लोगों ने पूछा- मस्जिद में मौलवियों को भी ज्ञान देंगी?

क्या पंडितों को 'समानता का पाठ' पढ़ाने वाले IAS अधिकारी मौलवियों को ये पाठ पढ़ाएँगे? चर्चों में जाकर पादिरयों द्वारा यौन शोषण की आई कई खबरों का जिक्र करते हुए ज्ञान देंगे?

मदद की अपील अक्टूबर में, नाम लिख लिया था सितम्बर में: लोगों ने पूछा- सोनू सूद अंतर्यामी हैं क्या?

"मदद की गुहार लगाए जाने से 1 महीने पहले ही सोनू सूद ने मरीज के नाम की एक्सेल शीट तैयार कर ली थी, क्या वो अंतर्यामी हैं?" - जानिए क्या है माजरा।

जब रावण ने पत्थर पर लिटा कर अपनी बहू का ही बलात्कार किया… वो श्राप जो हमेशा उसके साथ रहा

जानिए वाल्मीकि रामायण की उस कहानी के बारे में, जो 'रावण ने सीता को छुआ तक नहीं' वाले नैरेटिव को ध्वस्त करती है। रावण विद्वान था, संगीत का ज्ञानी था और शिवभक्त था। लेकिन, उसने स्त्रियों को कभी सम्मान नहीं दिया और उन्हें उपभोग की वस्तु समझा।

हमसे सवाल करने वालों के मुँह गोमूत्र-गोबर से भरे हैं: हिन्दू घृणा से भरे तंज के सहारे उद्धव ठाकरे ने साधा भाजपा पर निशाना

"जो लोग हमारी सरकार पर सवाल उठाते हैं, उनके मुँह गोमूत्र-गोबर से भरे हुए हैं। ये वो लोग हैं जिनके खुद के कपड़े गोमूत्र व गोबर से लिपटे हैं।"

नवरात्र में ‘हिंदू देवी’ की गोद में शराब और हाथ में गाँजा, फोटोग्राफर डिया जॉन ने कहा – ‘महिला आजादी दिखाना था मकसद’

“महिलाओं को देवी माना जाता है लेकिन उनके साथ किस तरह का व्यवहार किया जाता है? उनके व्यक्तित्व को निर्वस्त्र किया जाता है।"

एक ही रात में 3 अलग-अलग जगह लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करने वाला लालू का 2 बेटा: अब मिलेगी बिहार की गद्दी?

आज से लगभग 13 साल पहले ऐसा समय भी आया था, जब राजद सुप्रीमो लालू यादव के दोनों बेटों तेज प्रताप और तेजस्वी यादव पर छेड़खानी के आरोप लगे थे।
- विज्ञापन -

दाढ़ी कटाना इस्लाम विरोधी.. नौकरी छोड़ देते, शरीयत में ये गुनाह है: SI इंतसार अली को देवबंदी उलेमा ने दिया ज्ञान

दारुल उलूम देवबंद के उलेमा का कहना है कि दरोगा को दाढ़ी नहीं कटवानी चाहिए थी चाहे तो वह नौकरी छोड़ देते। शरीयत के हिसाब से उन्होंने बहुत बड़ा जुर्म किया है।

मुस्लिमों को BJP का डर भी दिखाया, ‘जात’ देख कर आरोपित को भी बचाया: लालू यादव का MY समीकरण

उन्हें जम कर भाजपा का डर दिखाया। इससे वो मुस्लिमों के मसीहा भी बने रहे और यादवों का वोट भी उन्हें मिलता रहा। इस तरह उन्होंने MY समीकरण बना कर राज किया।

15000 स्क्वायर किलोमीटर जंगल भी बढ़े और आदिवासी तरक्की के रास्ते में विकास के पार्टनर भी: प्रकाश जावड़ेकर

"बदलाव हम हर साल एफलिएशन में करते हैं। वो 1100 शिक्षक के सुझाव पर आधारित हैं। वो इतने सार्थक हैं कि 900 पेज का बदलाव हुआ, लेकिन..."

पैगंबर मुहम्मद के कार्टूनों का सार्वजानिक प्रदर्शन, फ्रांस के एम्बेसेडर को पाकिस्तान ने भेजा समन

पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने इस मुद्दे पर कहा कि फ्रांस के राष्ट्रपति का बयान बेहद गैर ज़िम्मेदाराना था और ऐसे बयान से सिर्फ आग को हवा मिलेगी।

राहुल बन नाबालिग लड़की से की दोस्ती, रेप के बाद बताया – ‘मैं साजिद हूँ, शादी करनी है तो धर्म बदलो’

आरोपित ने खुद ही पीड़िता को बताया कि उसका नाम राहुल नहीं बल्कि साजिद है। साजिद ने पीड़िता से यह भी कहा कि अगर शादी करनी है तो...

‘बिहार में LJP वोटकटुआ का काम करेगी, इससे परिणाम पर कोई असर नहीं पड़ेगा’- प्रकाश जावड़ेकर

"बिहार में भाजपा समर्थक सवाल उठा रहे कि वहाँ पर भाजपा अकेले चुनाव क्यों नहीं लड़ती? क्या इस मुद्दे पर केंद्रीय नेतृत्व में बातचीत होती है?"

ताजमहल में फहराया भगवा झंडा, गंगा जल छिड़क कर किया शिव चालीसा का पाठ

ताजमहल परिसर में दाखिल होते ही उन्होंने वहाँ पर गंगा जल का छिड़काव किया और भगवा झंडा फहराया। शिव चालीसा का पाठ भी किया गया।

24 घंटे में रिपब्लिक TV के दिल्ली-नोएडा के पत्रकारों को मुंबई के पुलिस थाने में हाजिर होने का आदेश

अर्नब गोस्वामी ने मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह और महाराष्ट्र की उद्धव सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि नाइंसाफी की इस लड़ाई में...

‘OTT प्लेटफॉर्म सेल्फ-रेग्युलेशन की अच्छी व्यवस्था करे, फेक न्यूज पर PIB अच्छा कर रही है’ – प्रकाश जावड़ेकर

“इसके अच्छे और बुरे दोनों तरह के नतीजे आ रहे हैं। इसलिए हमने OTT प्लेटफॉर्म को कहा है कि वो सेल्फ-रेग्युलेशन की अच्छी व्यवस्था करें।"

370 हटने के बाद लद्दाख का पहला चुनाव, BJP ने मारी बाजी: 26 में 15 सीटों पर जीत, AAP को जीरो

लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिलने के बाद यह पहला चुनाव था। लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद (LAHDC) के चुनाव में...

हमसे जुड़ें

272,571FansLike
79,308FollowersFollow
338,000SubscribersSubscribe