Tuesday, July 23, 2024
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बलिदान पुलिसकर्मियों के परिजनों के ख्याल की बात CM केजरीवाल का राजनीतिक स्टंट: दंगों और कोरोना काल में कई मरे, घरवालों को आज भी है मुआवजे का इतंजार

केजरीवाल सरकार की ऐसी तमाम घोषणाएँ हैं, जिसे जनता को दिखाने के लिए कर तो दिया, लेकिन उसे पूरा करने में कई बहाने बनाते रहे। 'पुलिस स्मृति दिवस' पर बलिदान हुए पुलिसकर्मियों के परिजनों की चिंता की बात करना केजरीवाल सरकार का सिर्फ राजनीतिक स्टंट नजर आता है।

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (CM Arvind Kejriwal) की नेतृत्व वाली दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार (Delhi AAP Government) सिर्फ क्रेडिट लेना जानती है। वादे पूरे करने में शायद उसका कोई विश्वास नहीं है। केजरीवाल सरकार ने एक बार फिर ऐसी ही घोषणा की और उसका क्रेडिट भी लिया, लेकिन अपने पिछले वादे कभी पूरी नहीं कर पाई।

‘पुलिस स्मृति दिवस’ के अवसर पर मुख्यमंत्री केजरीवाल ने शुक्रवार (21 अक्टूबर 2022) को एक न्यूज पोर्टल की दो साल पुरानी खबर की स्क्रीनशॉट को ट्वीट किया। इस खबर में ड्यूटी के दौरान बलिदान हुए 8 पुलिसकर्मियों के परिजनों को एक-एक करोड़ रुपए मुआवजा राशि जारी करने की घोषणा 17 सितंबर 2019 को सीएम केजरीवाल ने की थी।

उसी खबर की स्क्रीनशॉट को शेयर करते हुए सीएम ने शुक्रवार लिखा, “पुलिस स्मृति दिवस पर मैं उन सभी जाँबाज़ पुलिसकर्मियों को नमन करता हूँ, जिन्होंने पूरी निष्ठा से अपना कर्तव्य निभाते हुए जनता की सेवा में अपने प्राणों का बलिदान दिया। हमारी सरकार ऐसे सभी जाँबाज़ पुलिसकर्मियों के परिजनों का हमेशा ख़्याल रखती है।”

सीएम केजरीवाल ने अपने ट्वीट में दावा किया है कि दिल्ली की AAP सरकार बलिदान हुए पुलिसकर्मियों के परिजनों का हमेशा ख्याल रखती है। हालाँकि, हकीकत कुछ और है। दिल्ली सरकार वाहवाही लूटने के लिए घोषणा तो करती है, लेकिन वो सिर्फ घोषणा ही रह जाती है। घोषणा के बाद केजरीवाल सरकार बलिदान पुलिसकर्मियों की कभी सुध नहीं लेती।

ऐसे कुछ मामलों की याद दिलाते हैं, जिनसे केजरीवाल सरकार की झूठ का पर्दाफाश होता है। दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के दौरान 24 फरवरी 2020 को दंगाइयों की भीड़ ने मौजपुर इलाके में पुलिस की टीम पर हमला कर दिया था। इस हमले में दिल्ली पुलिस के 42 वर्षीय हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल बलिदान हो गए थे। 

उस समय लोगों की सहानुभूति बटोरने के लिए केजरीवाल सरकार ने रतन लाल के परिवार को एक करोड़ रुपए मुआवजा देने के साथ उनकी पत्नी को एक महीने में सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया था, लेकिन वह वादा दिल्ली सरकार आज तक पूरा नहीं कर पाई।

रतन लाल की पत्नी पूनम ने ऑपइंडिया को बताया, “सरकार ने जो वादे किए थे उनमें से कई अब तक पूरे नहीं हुए हैं। दिल्ली सरकार से एक करोड़ रुपए दो हिस्सों में मिले। अन्य कई लोगों ने भी उस समय कई वादे किए थे जो पूरे नहीं हुए। बुराड़ी में इनके (रतन लाल) के नाम से सड़क पर गेट बनवाने को बोला गया था, पर वो भी नहीं हुआ।”

पूनम आगे बताती हैं, “केजरीवाल ने भी शिक्षा के हिसाब से 1 महीने में नौकरी देने को कहा था, पर वो भी नहीं हुआ। ‘शहीद’ का सर्टिफिकेट देने के लिए बोला गया था, लेकिन वो भी अभी तक नहीं मिला है। गैलेंट्री अवार्ड 15 अगस्त को तो दिया गया है, लेकिन उसके फायदे नहीं मिल रहे हैं। उसका अभी तक एप्रूवल नहीं हुआ है। फैमिली जैसे-तैसे चल रही है।”

बलिदान हुए पुलिसकर्मी के परिजनों को मुआवजा और मदद देने में भी केजरीवाल सरकार की राजनीति भी दिखती है। वह वोटबैंक का ख्याल रखते हुए अपने वादे पूरी करती रही है। कोरोना काल में अपनी जान हथेली पर रखकर ड्यूटी करने वाले और फिर संक्रमित होकर बलिदान देने वाले दिल्ली पुलिस के अमित कुमार राणा के परिजनों को फूटी कौड़ी भी नहीं दी गई।

उस दौरान दिल्ली की AAP सरकार ने 1 करोड़ रुपए मुआवजा देने की घोषणा की थी, लेकिन उसे पाने के लिए अमित कुमार की विधवा आज भी दर-दर की ठोकरें खा रही हैं। उस समय भी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट करके अमित राणा की मौत पर दुःख जताया था और परिवार को 1 करोड़ रुपए बतौर मुआवजा देने की घोषणा की थी। 

जब घोषणा के बाद एक साल से अधिक समय गुजर गया और दिल्ली सरकार ने एक रुपए भी नहीं दिए तो दिवंगत अमित राणा की पत्नी पूजा को दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। कोर्ट में दिल्ली सरकार के वकील ने तर्क दिया कि ‘प्रशासनिक कारणों’ की वजह से मुआवजा राशि देने में देर हुई। कोर्ट में दिल्ली सरकार ने कहा कि कई लोगों को मुआवजा देने के लिए सरकार कदम उठा रही है।

अमित राणा की मौत के बाद भी अरविंद केजरीवाल ने कुछ ऐसी ही सहानुभूति व्यक्त की थी। उन्होंने ट्वीट कर कहा था, “अमित जी अपनी जान की परवाह ना करते हुए करोना की इस महामारी के समय हम दिल्ली वालों की सेवा करते रहे। वे खुद करोना से संक्रमित हो गए और हमें छोड़ कर चले गए। उनकी शहादत को मैं सभी दिल्लीवासियो की ओर से नमन करता हूँ। उनके परिवार को 1 करोड़ रुपए की सम्मान राशि दी जाएगी।”

हालाँकि, दिल्ली सरकार ने कोर्ट में एक साल से भी अधिक समय से मुआवजा नहीं देने के पीछे ‘प्रशासनिक कारण’ बता दिया, जबकि GTB अस्पताल में तैनात युवा डॉक्टर अनस मुजाहिद की मौत के मामले में ऐसा कोई कारण नहीं रहा। अनस मुजाहिद की मौत के बाद मुख्यमंत्री केजरीवाल खुद मुस्तफाबाद के भागीरथी विहार स्थित उनके घर गए और अनस के परिजनों को 1 करोड़ रुपए की सहायता राशि का चेक सौंपा।

वहीं, अमित राणा की मौत के बाद दिल्ली सरकार का एक भी अधिकारी उनके घर नहीं पहुँचा, जबकि कोरोना संक्रमण से अपनी जान गँवाने वाले अमित की विधवा पत्नी और उनका मासूम बेटा भी कोरोना से संक्रमित होकर जीवन और मौत की जंग लड़ रहे थे। परिजनों ने तो यहाँ तक आरोप लगाया कि अमित के इलाज के लिए दिल्ली सरकार ने समुचित व्यवस्था नहीं की थी। जाहिर सी बात है कि यहाँ सीएम केजरीवाल ने वोटबैंक की राजनीति को अधिक महत्व दिया।

दिवंगत अमित की पत्नी पूजा का कहना है कि परिवार को हाल ही में सूचित किया गया था कि उनके बेटे की फ़ाइल को दिल्ली सरकार ने अस्वीकार .कर दिया है, क्योंकि यह उनकी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है। उन्होंने बताया कि परिवार ने सरकारी विभाग द्वारा कहे गए सभी आवश्यक दस्तावेज जमा किए थे, लेकिन बाद में उन्हें सूचित किया गया कि उनकी फाइल इस आधार पर खारिज कर दी गई है कि अमित कोविड-19 ड्यूटी पर नहीं थे।

उपरोक्त मामले दिल्ली की केजरीवाल सरकार की घोषणाओं की कुछ बानगी हैं। इस तरह के तमाम ऐसी घोषणाएँ हैं, जिसे जनता को दिखाने के लिए केजरीवाल ने कर तो दिया, लेकिन उसे पूरा करने में कई बहाने बनाते रहे। ‘पुलिस स्मृति दिवस’ पर बलिदान हुए पुलिसकर्मियों के परिजनों की चिंता की बात करना केजरीवाल सरकार का सिर्फ राजनीतिक स्टंट है। उन्हें पीड़ित परिजनों के सुख-दुख से कोई खास चिंता नहीं है।

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सुधीर गहलोत
सुधीर गहलोत
इतिहास प्रेमी

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