Sunday, August 1, 2021
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केरल के ‘कोरोना मॉडल’ पर इतनी बातें, ड्रग्स, पॉलिटिकल मर्डर और लव जिहाद पर कब बात करेंगे कॉमरेड राहुल

केरल हाई कोर्ट ने एक रिपोर्ट का विशेष तौर पर उल्लेख किया है। इस रिपोर्ट के अनुसार राज्य में लगभग 400 शिक्षण संस्थान ड्रग्स की चपेट में हैं। ऐसे संस्थानों में से 74 फीसदी से ज्यादा स्कूल हैं।

बात जब गंभीर विमर्शों की हो तो कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी जैसे अपरिपक्व नेता, जिनकी सबसे बड़ी पूँजी ही परिवार का नाम है, की चर्चा का तुक नहीं बनता। गुरुवार (11 फरवरी 2021) को कॉन्ग्रेस के युवराज ने लोकसभा में ‘हम दो हमारे दो’, ‘अडानी-अंबानी’ टाइप ढेर सारी बातें की, जबकि चर्चा बजट पर थी। बावजूद उनका जिक्र भर क्योंकि वे केरल के वायनाड से ही लोकसभा पहुँचे हैं। वायनाड ने उन्हें तब सदन में भेज दिया, जब अमेठी की परंपरागत सीट पर 2019 के आम चुनावों में हार की आहट पाकर वे वहाँ गए थे।

इच्छा हो तो राहुल का ‘कालजयी’ भाषण यहॉं सुन सकते हैं

केरल एक ऐसा प्रदेश है जहाँ बारी-बारी से वाम दलों और कॉन्ग्रेस का गठबंधन सत्ता में रहता है। अभी लेफ्ट फ्रंट की सरकार है। दक्षिणपंथ के लिए यह अभी अभेद्य किला ही है। इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में इस खेमे का प्रभाव बढ़ने की उम्मीदें भी जताई जा रही है।

पर आपने कभी राजनीतिक विमर्शों में उन मुद्दों पर चर्चा सुनी है, जिनसे केरल जूझ रहा है। ऐसा नहीं है कि केरल के मुद्दे देश के राजनीतिक विमर्श में नहीं आते। कोरोना संकट के बाद लिबरलों ने केरल मॉडल का खूब झुनझुना बजाया था, जबकि तथ्य इस मॉडल के फ्लॉप होने की तस्दीक करते हैं। दिसंबर 2020 में कोरोना के जितने मामले देश में थे, उसमें 40 फीसदी महाराष्ट्र और केरल से ही थे। जनवरी 2021 में जब पूरे देश में संक्रमण में सुधार दिख रहा तब भी केरल मॉडल उछाल मार रहा था।

बावजूद इस मॉडल पर खूब शोर हुआ। लेकिन कभी आपने केरल के ड्रग्स के दलदल में धॅंसते जाने पर चर्चा सुनी है। केरल हाई कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि केरल में नशीली दवाओं के इस्तेमाल की दर काफी ज्यादा है। न्यायालय ने इसे देखते हुए युवाओं और छात्रों को नशीली दवाओं का इस्तेमाल करने से रोकने के लिए कई दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार न्यायालय ने एक रिपोर्ट का विशेष तौर पर उल्लेख किया। इस रिपोर्ट के अनुसार राज्य में लगभग 400 शिक्षण संस्थान ड्रग्स की चपेट में हैं। ऐसे संस्थानों में से 74 फीसदी से ज्यादा स्कूल हैं। इसे देखते हुए अदालत ने शिक्षण संस्थानों में पुलिस कैंपस यूनिट के गठन का निर्देश राज्य सरकार को दिए हैं।

‘उड़ता पंजाब’ वाले लिबरल जमात के लिए भी यह कोई महत्वपूर्ण मसला नहीं है। शायद इसलिए क्योंकि उनके ‘वैचारिक पुरोधा’ सत्ता में हैं!

ड्रग्स की तरह ही केरल लव जिहाद से भी त्रस्त है। इसे देखते हुए पिछले दिनों बीजेपी ने कहा था कि यदि वह राज्य की सत्ता में आती है तो इसे रोकने के लिए कानून बनाएगी। केरल में ईसाई भी बढ़ते लव जिहाद से हलकान है। कुछ महीनों पहले राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के जॉर्ज कुरियन ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र लिख कर केरल में ईसाई लड़कियों को निशाना बनाए जाने की बात की थी। उन्होंने आँकड़ा दिया था कि 7 साल में केरल में 4000 महिलाएँ लव जिहाद की शिकार बनीं। कुरियन ने कहा था कि उन सभी का ब्रैनवॉश हुआ और जबरन इस्लाम में धर्मान्तरित किया गया। ढेरों पीड़ितों की आपबीती हैं जो बताती हैं कि कैसे उनको जान-बूझकर निशाना बनाया गया। फिर भी रवीश कुमार को यह हिन्दू-मुस्लिम सिलेबस का हिस्सा लगता है।

इसी तरह केरल में राजनीतिक हिंसा, खासकर संघ परिवार से जुड़े लोगों को जिस तरह निशाना बनाया जाता है, वह भयावह है। एक रिपोर्ट के मुताबिक मोटे तौर पर 2000 के बाद से केरल में 200 से ज्यादा पॉलिटिकल किलिंग हो चुकी हैं। इनमें से आधे तो केवल कन्नूर जिले में ही अंजाम दिए जाते हैं। सत्ता में नहीं होने पर कई मौकों पर वामपंथियों की हिंसा के शिकार कॉन्ग्रेस के भी कार्यकर्ता होते हैं। लेकिन कॉन्ग्रेस उसी तरह की रहस्यमयी चुप्पी साध लेती है, जैसा उसने मरीचझापी नरसंहार के वक्त किया था।

1979 में मरीचझापी द्वीप पर बांग्लादेशी नामशूद्रों का ऐसा नरंसहार किया गया था कि कई लोगों का दावा है कि इसकी वजह से सुंदरबन के बाघ आदमखोर हो गए। उस समय बंगाल की सत्ता में वामपंथी थे और विपक्ष में कॉन्ग्रेस। आज दोनों बंगाल के मैदान में साथ उतरने की तैयारी कर रहे हैं।

उस समय मरीचझापी को न तो वामदलों ने मुद्दा बनने दिया था और न कॉन्ग्रेस ने नामशूद्रों की फिक्र की थी। केरल में भी वही युगलबंदी है। वामपंथी न तो अपनी हिंसा पर चर्चा चाहते हैं, न लव जिहाद की साजिशों पर। ड्रग्स जैसे मुद्दे तो खैर कभी हमारी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा ही नहीं बन पाए।

कॉन्ग्रेस को बचना है तो ‘हम दो (मॉं-बेटे), हमारे दो (लिबरल-लेफ्ट)’ से छुटकारा पाना ही होगा। फिलहाल इसकी उम्मीद दिखती नहीं!

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अजीत झा
देसिल बयना सब जन मिट्ठा

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