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घुसपैठिए खुद कबूल रहे सच, फिर भी ‘बेचारा’ बताने में जुटा वामपंथी-इस्लामी इकोसिस्टम: Al Jazeera से लेकर स्क्रॉल-The Wire का प्रोपेगेंडा हुआ बेनकाब

पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने की जारी कार्रवाई में एक बात एकदम साफ हो गई है और वो यह है कि जो लोग खुद मानते हैं कि वे अवैध रूप से भारत में घुसे, जिन्होंने खुद दलालों को पैसे देकर बॉर्डर पार किया, जो यहाँ आकर सरकारी योजनाओं का फायदा उठाते रहे, वही लोग आज कुछ मीडिया संस्थानों के नजर में ‘बेचारे’ हैं। लेकिन जो सरकार कानून लागू कर रही है, देश की सीमाओं की रक्षा कर रही है, उन्हें वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी मीडिया संस्थानों की रिपोर्ट्स में ‘मुस्लिम-विरोधी’ बनाकर पेश किया जा रहा है।

जहाँ खुद घुसपैठियों ने बता रहे हैं कि कैसे वे BSF की गश्त पर नजर रखकर सिर्फ 10 मिनट में बॉर्डर पार कर लेते थे और TMC के शासन में उन्हें इसमें मदद मिली। यह कबूलनामा किसी और ने नहीं, खुद इन घुसपैठियों ने दिया है। लेकिन इस सच को छुपाकर इन्हीं लोगों को ‘पीड़ित’ और ‘बेचारे’ बताने की होड़ मची है।

यह नैरेटिव अचानक नहीं बना, इसे बड़े सोचे समझे तरीके से तैयार किया गया है। इस नैरेटिव को खड़ा करने में सबसे आगे है कतर सरकार का मुखपत्र अल जजीरा (AL Jazeera), जिसने भारत के खिलाफ खबरें गढ़ने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। उसके साथ कंधे से कंधा मिला रही हैं भारत की वामपंथी झुकाव वाले मीडिया पोर्टल ‘स्क्रॉल‘ (Scroll) और ‘द वायर‘ (The Wire), जो हर उस मौके को लपकती हैं जहाँ भारत सरकार को घेरा जा सके। आइए देखते हैं कि इन रिपोर्ट्स में असल में क्या लिखा है।

अल जजीरा ने खुद बांग्लादेशी नागरिकों को माना अवैध, फिर भी दिया ‘पीड़ित’ का दर्जा

अल जजीरा ने 10 जून 2026 को रिपोर्ट प्रकाशित की। इसे गुरविंदर सिंह ने लिखा है। रिपोर्ट की हेडलाइन है ‘Bengal pushes out Muslim Bangladeshis, deepening religious tensions’ यानी पहले शब्द से ही यह तय कर दिया गया कि यह मामला धर्म का है। इसमें ‘Bangladeshis’ नहीं लिखा, सीधे ‘Muslim Bangladeshis’ लिखा। रिपोर्ट के मेडाडेटा और कैटेगरी में इस रिपोर्ट को ‘Islamophobia’ यानी इस्लाम-विरोधी टैग के साथ फाइल किया गया है, जिससे तय किया गया कि इस घुसपैठिए-विरोधी कार्ऱवाई को मुस्लिम-विरोधी के रूप में पेश करना है।

अल जजीरा की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

इसमें हकीमपुर बॉर्डर पर खड़े रायसुल इस्लाम और उनके परिवार की कहानी से शुरुआत होती है, जो कि देखने में बिल्कुल एक इमोशनल स्टोरी लगती है। लेकिन जरा ध्यान से पढ़िए।
रिपोर्ट में जो सबसे दिलचस्प बात है, वो यह है कि खुद रायसुल इस्लाम ने माना कि उन्होंने एक दलाल को करीब 250 डॉलर (लगभग ₹24000) देकर परिवार सहित बॉर्डर पार किया। यानी यह अवैध घुसपैठ थी, इसमें कोई दो राय नहीं।

अल जजीरा की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

एक और शख्स मिराजुल गाजी ने भी माना कि वे परिवार सहित पाँच साल पहले बेहतर मौके की तलाश में भारत आए थे। यानी न इलाज का बहाना, न कोई आपदा, सिर्फ बेहतर कमाई के लिए अवैध तरीके से घुसपैठ। लेकिन अल जजीरा ने इन्हें ‘पीड़ित’ के रूप में पेश किया, न कि उस ‘अपराधी’ के तौर पर जो खुद अपना अपराध स्वीकार कर रहे हैं।

रिपोर्ट में कहा गया कि बंगाल से घुसपैठियों को भगाने की कार्रवाई को धार्मिक पहचान से उतनी ही प्रेरित है जितनी कानूनी दर्जे से। ह्यूमन राइट्स वॉच की एशिया डायरेक्टर को कोट किया गया, तीस्ता सेतलवाड़ जैसी विवादित एक्टिविस्ट को कोट किया गया, लेकिन सरकार के पक्ष को जानबूझकर हाशिये पर रखा गया। यानी एक कानूनी घुसपैठ-विरोधी अभियान को धीरे-धीरे ‘मुस्लिमों के खिलाफ षडयंत्र’ में बदल दिया गया।

स्क्रॉल ने भारत की राजनीति में बांग्लादेश को दखल देने का दिया लाइसेंस

स्क्रॉल ने तो बांग्लादेश को भारत की राजनीति में दखल देने का लाइसेंस ही थमा दिया। स्क्रॉल ने ढाका ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट को अपने प्लैटफॉर्म में चेपकर भारत सरकार के प्रति अपनी ‘घृणा’ दिखलाई। यानी नजरिया बांग्लादेश का था, लेकिन था भारत के खिलाफ और स्क्रॉल ने उसे जगह भी दी।

इस रिपोर्ट का विश्लेषण करें तो एंगल बिल्कुल साफ है। हेडलाइन ही सीधे भारत के खिलाफ लिखी गई- ‘View from Bangladesh: India forcing people across the border is becoming a test of ties’ यानी सीधा जजमेंट दे दिया कि भारत इन घुसपैठियों को ‘जबरदस्ती’ सीमा पार भेज रहा है।

स्क्रॉल की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

जबकि खुद अल जजीरा की रिपोर्ट में इन्हीं घुसपैठियों ने माना कि वे स्वेच्छा से लौटने आए क्योंकि उन्हें डर था। सरकार ने भी ‘डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट’ नीति की घोषणा की थी और लोग खुद सरेंडर कर रहे थे। मतलब इन बांग्लादेशी नागरिकों को पता था कि घुसपैठिए हैं इसीलिए वापस लौटने लगे। लेकिन हेडलाइन में ‘जबरदस्ती’ शब्द डालकर पूरी कहानी पलट दी गई।

स्क्रॉल की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

साथ ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बांग्लादेश के लिए यह मुद्दा सिर्फ बॉर्डर मैनेजमेंट नहीं बल्कि संप्रभुता, मानवाधिकार और राजनयिक मानदंजों की परीक्षा है। अब सोचिए, जो लोग अवैध रूप से भारत की संप्रभुता का उल्लंघन करके आए, उन्हें वापस भेजना बांग्लादेश की संप्रभुता का उल्लंघन है? यह तर्क उल्टा है। असल में बांग्लादेश को चाहिए कि अपने नागरिकों को घुसपैठ से रोके, लेकिन उलटे भारत पर ही आरोप लगाए जा रहे हैं।

स्क्रॉल की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

रिपोर्ट में विश्लेषकों के हवाले से कहा गया कि भारत में बांग्लादेशी प्रवासन एक संवेदनशील घरेलू राजनीतिक मुद्दा बन गया है, खासकर BJP सरकार में। लेकिन पूरी रिपोर्ट में एक बार भी यह नहीं पूछा गया कि बांग्लादेश के लोग अवैध रूप से क्यों आ रहे हैं? बांग्लादेश सरकार की जिम्मेदारी क्या है? सारा ठीकरा भारत पर फोड़ दिया गया।

द वायर ने घुसपैठियों को भगाने को बताया ‘सजा’

वामपंथी मीडिया द वायर ने भी इसी नैरेटिव से 9 जून 2026 को रिपोर्ट प्रकाशित की और इसकी हेडलाइन ही बता देती है कि एजेंडा क्या है। आसिफ फारुख ने लिखी इस रिपोर्ट की हेडलाइन है- ‘At Bengal’s Borders, Pushbacks Are Punishment’

द वायर की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

यहाँ हेडलाइन में ही फैसला सुना दिया गया। कहा गया कि घुसपैठियों को वापस भेजना ‘सजा’ है, यह द वायर की मानसिकता है। जो लोग अवैध रूप से भारत में घुसे उनके लिए यहाँ रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। लेकिन उन्हें वापस भेजने को ‘सजा’ बताना इसी एजेंडे का हिस्सा है।

द वायर की रिपोर्ट से स्क्रीनशॉट

रिपोर्ट में कहा गया कि घुसपैठियों की संख्या के बारे में वर्षों से बढ़ा-चढ़ाकर दावे किए जाते रहे हैं, जबकि सरकारी जवाब भी कभी सटीक संख्या नहीं द सके। लिखा कि जब अनिश्चित आँकड़े राजनीतिक यकीन बन जाते हैं, तो आम मजदूर इसकी कीमत चुकाते हैं। यहाँ द वायर का तर्क यह है कि चूँकि घुसपैठियों की सही संख्या पता नहीं है, इसलिए किसी को वापस नहीं भेजना चाहिए। द वायर से इस तर्क की उम्मीद करना हैरान कर देने वाला नहीं है।

‘हाँ, हम बांग्लादेश से हैं’: जब घुसपैठियों ने खुद कबूला कि कैसे तोड़ा भारत का कानून

यह वो बात है जिसे अल जजीरा, स्क्रॉल और द वायर जैसे मीडिया संस्थान जानबूझकर पर्दे के पीछे रखते हैं। जो लोग आज कैमरों के सामने ‘पीड़ित’ बनकर पेश किए जा रहे हैं, उन्हीं लोगों ने खुले मुँह स्वीकार किया है कि उन्होंने किस तरह भारत का कानून तोड़ा, किस तरह यहाँ की सरकारी व्यवस्था का गलत फायदा उठाया और किस तरह सालों तक यह सब चलता रहा।

कई घुसपैठियों ने खुद बताया कि वे दलालों को पैसे देकर भारत में घुसे। एक ने कहा कि बॉर्डर पार कराने वाले को 2,000 रुपए दिए और आधार कार्ड बनवाने के लिए 2,000 से 3,000 रुपए अलग से चुकाए। TMC के नेताओं ने भी उनकी इस प्रक्रिया में मदद की। यानी यह पूरा एक नेटवर्क था, कोई मजबूरी नहीं।

इनके बस्ती बसाने का तरीका भी सुनिए। दलालों ने पहले राशन कार्ड बनवाया, राशन कार्ड से आधार हुआ, आधार से PAN कार्ड, वोटर ID और सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने लगा। कुछ घुसपैठिए तो दशकों से यहाँ रह रहे थे, वोट डाल रहे थे और हर सरकारी योजना का लाभ उठा रहे थे। बेंगलुरु में हुए एक स्टिंग ऑपरेशन में भी यही सामने आया कि घुसपैठिए बिना किसी वैध दस्तावेज के भारत में खुलकर रह रहे थे, उनके पास आधार, PAN कार्ड और बैंक की सुविधाएँ तक थीं।

इंडिया टुडे से बात करते हुए एक घुसपैठिए सलाम डाली ने माना कि वह गरीब था इसलिए भारत आया। जो लोग वापस जाने की कतार में थे, उनमें से अधिकतर के पास आधार, PAN, राशन कार्ड और वोटर ID थे। यानी भारत के उन नागरिकों का हक मारा जा रहा था जिनके लिए ये योजनाएँ बनी थीं। लेकिन इन मीडिया संस्थानों ने इस पहलू पर एक शब्द नहीं लिखा।

जो दशकों तक नहीं हुआ, वो शुभेंदु सरकार ने हफ्तों में कर दिखाया

केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने साफ कहा था कि जब बंगाल में कमल खिलेगा, तब घुसपैठ रुकेगी। उन्होंने तत्कालीन ममता सरकार पर आरोप लगाया था कि वह घुसपैठियों को आधार और वोटर कार्ड दिलवाकर उन्हें वोट बैंक बना रही थीं और 450 किलोमीटर सीमा पर बाड़ लगाने के लिए BSF को जमीन तक नहीं दे रही थी। तब BJP ने वादा किया था और बंगाल की जनता ने भरोसा किया था।

इसके बाद 09 मई 2026 को शुभेंदु अधिकारी की बंगाल के नए मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेते ही काम शुरू हो गया। सीएम अधिकारी ने खुद घोषणा कि कि उनकी सरकार ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नीति के तहत देश से निकाला जाएगा। इस नीति के तहत जिलों-जिलों में ‘होल्डिंग सेंटर’ भी बनाए जा रहे हैं।

इतना ही नहीं सीएम शुभेंदु ने सात दिनों के भीतर BSF को बांग्लादेश सीमा की बाड़बंदी के लिए 600 हेक्टेयर जमीन भी दे दी। वही जमीन जिसके लिए BSF ने ममता सरकार को 10 पत्र लिखने के बाद भी एक इंच नहीं मिली थी।

बांग्लादेश की तरह ही बौखलाया वामपंथी-इस्लामी मीडिया

अब जरा सोचिए। एक तरफ घुसपैठिए खुद मान रहे हैं कि उन्होंने पैसे देकर दलाल कि जरिए भारत में घुसपैठ की, फर्जी दस्तावेज बनवाए और सरकारी योजनाओं का लाभ लिया। दूसरी तरफ अल जजीरा, स्क्रॉल और द वायर इन्हीं लोगों को ‘पीड़ित’ बताकर भारत सरकार पर ‘मुस्लिम-विरोधी’ का टैग लगा रहे हैं। क्योंकि घुसपैठ के पूरे तंत्र पर लगाम लगाई जा रही है, इसीलिए इनको अब मानवाधिकार की भी बातें याद आ रही हैं।

लेकिन जिन घुसपैठियों ने खुद माना कि उन्होंने अवैध रूप से भारत में प्रवेश किया, उन्हें वापस भेजना कौन सा अमानवीय काम है? यह तो हर देश का बुनियादी अधिकार है। और जो बांग्लादेश आज भारत पर ‘अंतरराष्ट्रीय नियमों’ का ज्ञान दे रहा है, उसके विदेश मामलों के सलाहकार ने खुद माना कि उन्होंने नई दिल्ली को 12 से 13 पत्र लिखे हैं, यानी दबाव बनाने की पूरी कोशिश है।

यह दबाव इसलिए नहीं है कि बांग्लादेश को अपने नागरिकों की परवाह है, बल्कि इसलिए है कि बंगाल में BJP आने के बाद वह रास्ता बंद हो गया जो ममता के राज में खुला था। जो बांग्लादेश ममता सरकार के दौरान चुपचाप अवैध घुसपैठ और तस्करी चलाता रहा, वही अब BJP सरकार आने से बौखला गया है। यह बौखलाहट ही असली जवाब है उन सभी वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी मीडिया की रिपोर्ट्स का जो भारत को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रही हैं।

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