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India-US ट्रेड डील में रूसी तेल पर कोई बैन नहीं, मार्को रुबियो ने साफ किया पूरा मामला: जानें विपक्ष ने ट्रंप की प्रेशर टैक्टिक्स को हथियार बनाकर कैसे फैलाया झूठ

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के बयान से भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर विपक्ष के उन दावों की हवा निकल गई, जिनमें मोदी सरकार पर अमेरिकी दबाव में झुकने का आरोप लगाया जा रहा था।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में दिए गए बयान ने भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर चल रही सभी अटकलों पर पूर्ण विराम लगा दिया है। मार्को रुबियो ने स्पष्ट किया कि भारत ने रूस से तेल खरीद पूरी तरह बंद करने का कोई वादा नहीं किया। भारत ने केवल अतिरिक्त रूसी तेल नहीं खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है। यह बयान उन सभी दावों की हवा निकाल देता है जिन्हें भारत का विपक्ष खासकर कॉन्ग्रेस पार्टी महीनों से प्रचारित कर रही थी।

विपक्ष ने दावा किया था कि मोदी सरकार ने अमेरिकी दबाव में घुटने टेक दिए हैं और रूस से तेल आयात रोकने पर सहमति दे दी है। लेकिन रुबियो का बयान इस झूठ की पोल खोलता है और साबित करता है कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए अपनी शर्तों पर ही आगे बढ़ रहा है।

यह पूरा प्रकरण ट्रंप प्रशासन की दबाव वाली टैक्टिक्स का एक क्लासिक उदाहरण है। डोनाल्ड ट्रंप ने 2025 में सत्ता संभालते ही भारत पर रूसी तेल आयात रोकने के लिए टैरिफ का हथियार इस्तेमाल किया था। अगस्त 2025 में भारत से आयात पर 50% तक ड्यूटी बढ़ा दी गई थी, जिसका उद्देश्य स्पष्ट था- भारत को रूस से दूरी बनाने पर मजबूर करना।

डोनाल्ड ट्रंप ने खुद कई बार दावा किया कि भारत ने रूसी तेल रोकने का वादा किया है। लेकिन अब रुबियो का बयान साफ करता है कि भारत ने कोई पूर्ण प्रतिबंध स्वीकार नहीं किया, बल्कि मौजूदा स्तर पर आयात जारी रखते हुए केवल अतिरिक्त वृद्धि रोकने की बात कही है। यह भारत की कूटनीतिक जीत है, जहाँ दबाव के बावजूद राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं किया गया।

विपक्ष ने कैसे बनाया झूठा नैरेटिव

जब से भारत-अमेरिका ट्रेड फ्रेमवर्क की बातें चल रही थीं, कॉन्ग्रेस पार्टी और अन्य विपक्षी दल मोदी सरकार पर हमलावर दिख रहे थे। राहुल गाँधी ने कई मंचों से दावा किया कि “अब अमेरिका तय करेगा कि भारत कहाँ से तेल खरीदेगा” और “मोदी जी ने अमेरिकी दबाव में रूसी तेल खरीद बंद करने पर सहमति दे दी है।”

एक रैली में राहुल गाँधी ने कहा था कि ट्रंप के साथ ‘रातों-रात’ डील हुई और मोदी सरकार ने देश की स्वायत्तता बेच दी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह डील किसानों के खिलाफ है, क्योंकि अमेरिकी कृषि उत्पादों पर ड्यूटी कम होने से भारतीय किसान बर्बाद हो जाएँगे।

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश तो इस मुद्दे पर सबसे मुखर रहे। उन्होंने कई बार सोशल मीडिया और प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि “ट्रंप ने खुलेआम घोषणा की है कि भारत ने रूसी तेल खरीदना बंद करने का वादा किया है, लेकिन मोदी सरकार चुप है”।

रमेश ने इसे ‘सरेंडर’ करार दिया और पूछा कि क्या मोदी जी ने संसद को इसकी जानकारी दी? उन्होंने दावा किया कि व्हाइट हाउस की फैक्टशीट में स्पष्ट लिखा है कि भारत रूसी तेल आयात रोकने पर सहमत हुआ है।

कॉन्ग्रेस ने इसे ‘राष्ट्रीय आत्मसम्मान पर चोट’ बताया और कहा कि मोदी सरकार अमेरिकी दबाव में झुक गई है। अन्य विपक्षी दलों ने भी यही नैरेटिव दोहराया कि मोदी की ‘हग डिप्लोमेसी’ फेल हो गई और ट्रंप ने भारत को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।

ये बयान सोशल मीडिया पर वायरल हुए, कई मीडिया हाउस ने इन्हें हेडलाइंस बनाया और एक झूठा नैरेटिव तैयार हो गया कि भारत ने रूस से तेल आयात पूरी तरह बंद कर दिया है। विपक्ष ने इसे मोदी सरकार की ‘कमजोरी’ का प्रतीक बनाया, जबकि असलियत कुछ और थी।

असलियत क्या है: मार्को रुबियो और एस जयशंकर के बयान ने खोली पोल

म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में मार्को रुबियो ने स्पष्ट कहा, “हमारी भारत के साथ बातचीत में हमें उनकी प्रतिबद्धता मिली है कि वे अतिरिक्त रूसी तेल नहीं खरीदेंगे।” रुबियो ने यह भी जोड़ा कि अमेरिका रूस पर नए प्रतिबंध लगा रहा है और यूक्रेन को सहायता दे रहा है, लेकिन भारत के साथ बातचीत और दबाव दोनों जारी रहेंगे।

यहाँ ‘अतिरिक्त’ शब्द सबसे महत्वपूर्ण है। इसका मतलब है कि भारत मौजूदा स्तर (लगभग 1.5-2 मिलियन बैरल प्रति दिन) पर रूसी तेल आयात जारी रखेगा, लेकिन उसमें वृद्धि नहीं करेगा। यह कोई पूर्ण बैन नहीं है, बल्कि एक संतुलित समझौता है।

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी कॉन्फ्रेंस में दो टूक कहा कि भारत की ऊर्जा नीति राजनीतिक दबाव पर नहीं, बल्कि लागत, उपलब्धता और रणनीतिक हितों पर आधारित है। जयशंकर ने ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ पर जोर देते हुए कहा कि भारत किसी के दबाव में अपनी ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा। यह बयान विपक्ष के सभी दावों पर पानी फेरता है। भारत ने कभी रूसी तेल पूरी तरह बंद करने का वादा नहीं किया बल्कि यह विपक्ष का फैलाया हुआ झूठ था।

भारत की ऊर्जा जरूरतें: क्यों रूस से सस्ता तेल अपरिहार्य है

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। हमारी दैनिक खपत करीब 5 मिलियन बैरल है, जिसमें से 80-85% आयात पर निर्भर है। रूस से मिलने वाला तेल डिस्काउंटेड रेट पर आता है- कभी-कभी ब्रेंट क्रूड से 20-30 डॉलर प्रति बैरल सस्ता।

यह भारत के लिए महँगाई नियंत्रित करने, ईंधन कीमतें स्थिर रखने और विदेशी मुद्रा बचाने का बड़ा साधन है। अगर भारत रूसी तेल पूरी तरह बंद करता, तो तेल कीमतें आसमान छू लेतीं, जिसका असर आम आदमी की जेब पर पड़ता।

साल 2025 में रूसी तेल आयात पीक पर पहुँचा था (जून में 2.09 मिलियन बैरल/दिन), लेकिन बाद में यह घटकर दिसंबर में सबसे निचले स्तर पर आ गया।

आँकड़ों के अनुसार, 2025-26 में रूस भारत का सबसे बड़ा सप्लायर रहा, लेकिन आयात में कमी बाजार की स्थितियों (कीमतें बढ़ना, अन्य स्रोतों से आपूर्ति) और विविधीकरण की वजह से आई, न कि अमेरिकी दबाव से। भारत ने मिडिल ईस्ट, अमेरिका और वेनेजुएला से भी आयात बढ़ाया है। यह भारत की स्मार्ट नीति है-किसी एक स्रोत पर निर्भर न रहना।

ट्रंप की दबाव टैक्टिक्स और भारत का मजबूत स्टैंड

ट्रंप प्रशासन ने टैरिफ को हथियार बनाया हुआ है। 2025 में भारत पर 50% ड्यूटी लगाकर दबाव डाला गया कि रूसी तेल रोकें, वरना ट्रेड डील नहीं। ट्रंप ने खुद कई बार दावा किया कि भारत सहमत हो गया है। लेकिन भारत ने अपनी शर्तों पर डील की, जिसमें टैरिफ 18% तक कम हो गया।

यही नहीं, अमेरिका ने 25% की अतिरिक्त पेनल्टी भी हटा ली। इसके बावजूद भारत ने रूसी तेल पर पूरा बैन नहीं लगाया। सहमति सिर्फ इतने पर दी कि वो रूस से और ज्यादा तेल नहीं खरीदेगा, बल्कि जितना तेल आ रहा है, उतनी मात्रा में तेल अपनी जरूरत के हिसाब से जरूर लेता रहेगा। यह मोदी सरकार की कूटनीति की जीत है। भारत ने दिखाया कि वह दबाव में नहीं झुकता, बल्कि राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है।

हालाँकि विपक्ष ने ट्रंप के बयानों को आधार बनाकर मोदी सरकार को कमजोर दिखाने की कोशिश की, लेकिन रुबियो का ताजा बयान साबित करता है कि भारत अपनी स्वायत्तता पर कायम है। रूस के विदेश मंत्री लावरोव ने भी कहा कि ट्रंप के अलावा किसी ने भारत के पूर्ण रोकने का दावा नहीं किया।

भारत अपनी शर्तों पर चलता है, विपक्ष का प्रोपगैंडा फेल

मार्को रुबियो का बयान इस पूरे प्रकरण की सच्चाई उजागर करता है। विपक्ष ने राजनीतिक लाभ के लिए झूठ फैलाया, मोदी सरकार को अमेरिका के सामने झुकने वाला दिखाया, लेकिन असलियत में भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता को बरकरार रखा। यह मोदी सरकार की मजबूत विदेश नीति का प्रमाण है, जहाँ दबाव के बावजूद राष्ट्रीय हित सर्वोपरि रहे।

विपक्ष को अब आईना देखना चाहिए कि वो देशहित के मुद्दों पर झूठ फैलाना बंद करें। भारत आज वैश्विक मंच पर अपनी शर्तों पर चलता है और यही उसकी ताकत है।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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