फैलेसी यानी तर्क में गलती या सोचने के तरीके की कमी। दुनिया में 230 से ज्यादा तरह की फैलसी होती हैं। इनमें से एक बहुत मशहूर भूल है ‘दो चीजों के एक साथ होने को किसी काम की ‘वजह’ मान लेना’। इसका मतलब होता है कि अगर दो चीजें एक साथ हो रही हैं, तो लोग मान लेते हैं कि एक चीज दूसरे की वजह से हो रही है। लेकिन यहाँ इस गलत निष्कर्ष की बात क्यों हो रही है? क्योंकि द वायर ने एक लेख छापा जिसका शीर्षक था ‘डेटा दिखाता है कि SIR ने बंगाल में बीजेपी की मदद की’।
इस लेख में यह दिखाने की कोशिश की गई कि SIR ने पश्चिम बंगाल चुनाव में बीजेपी की जीत में मदद की। लेकिन पूरा लेख सिर्फ अंदाजों, अधूरी बातों और गलत तर्क पर आधारित है। इस लेख में हम समझेंगे कि ये दावे सिर्फ कमजोर ही नहीं बल्कि लोगों को गुमराह करने वाले भी हैं।
साथ होने का मतलब वजह होना नहीं होता
पूरे लेख में द वायर का तर्क सिर्फ एक आंकड़े पर टिका है कि कई सीटों पर हटाए गए वोटरों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी। इसी के आधार पर दावा किया गया कि SIR ने बीजेपी को फायदा पहुँचाया। लेकिन यही सबसे बड़ी कमजोरी भी है।
सिर्फ इसलिए कि दो चीजें एक साथ हुईं, इसका मतलब यह नहीं कि एक दूसरी की वजह है। वोटर हटाए गए, इससे यह साबित नहीं हो जाता कि बीजेपी उसी वजह से जीती।
लेख यह भी साबित नहीं कर पाता कि अगर ये वोटर हटाए नहीं जाते तो नतीजे बदल ही जाते। ज्यादा से ज्यादा इसे एक संभावना कहा जा सकता है, पक्का सच नहीं।
लेख बार-बार वोटर हटाने और कम जीत के अंतर की तुलना करके यह माहौल बनाने की कोशिश करता है कि चुनाव का नतीजा बदल दिया गया। लेकिन कहीं भी यह नहीं बताया गया कि आखिर SIR ने बीजेपी की मदद कैसे की। यह साबित नहीं किया गया कि हटाए गए वोटर सच में वोट डालते, वे असली वोटर थे भी या नहीं या फिर मतदान का तरीका वैसा ही रहता।
सबसे बड़ी बात यह है कि द वायर ने अपने लेख में खुद ये बात मानी है कि हर सीट का नतीजा SIR की वजह से बदला। यानी लेखक खुद ही कह रहा है कि उसका तर्क पूरी तरह पक्का नहीं है।
यहीं पर पूरा लेख कमजोर पड़ जाता है। एक तरफ शीर्षक में बड़े भरोसे के साथ कहा जाता है कि ‘डेटा दिखाता है कि SIR ने बीजेपी को जिताया’, लेकिन अंदर का पूरा लेख सिर्फ मान्यताओं, कल्पनाओं और संभावनाओं पर टिका है। कोई सीधा सबूत नहीं दिया गया।
यह लेख 14 साल की सत्ता विरोधी लहर, बीजेपी की संगठनात्मक ताकत, उम्मीदवारों का चयन, सरकार के खिलाफ नाराजगी, मतदान का तरीका और बदलते वोटरों के रुझान जैसे बड़े कारणों को पूरी तरह नजरअंदाज कर देता है।
लेख पूरी तरह कल्पनाओं पर टिका है
आँकड़ों की तुलना करने के बाद ‘लेख अगर ऐसा होता तो?’ वाली कल्पनाओं की दुनिया में चला जाता है। यहाँ लेखक अलग-अलग कहानियाँ बनाकर निष्कर्ष निकालने की कोशिश करता है। लेकिन ये सिर्फ कल्पना है, सबूत नहीं।
पहले मॉडल में लेखक सबसे खराब स्थिति मान लेता है। इसमें कहा जाता है कि हर हटाया गया वोटर TMC को वोट देता और हर नया वोटर बीजेपी को। फिर कहा जाता है कि अगर SIR नहीं हुआ होता तो 87 सीटें TMC के पास रहतीं और शायद चुनाव का नतीजा बदल जाता।
लेकिन यहाँ कई सवाल खड़े होते हैं। हमें कैसे पता कि हटाए गए वोटर असली थे और अभी भी जिंदा थे? और अगर वे असली वोटर थे भी, तो यह क्यों मान लिया जाए कि सभी TMC को ही वोट देते? वे बीजेपी, कॉन्ग्रेस या वामपंथी दलों को भी वोट दे सकते थे और क्या यह तय है कि हर हटाया गया वोटर मतदान करता?
यानी पूरा निष्कर्ष सिर्फ एक मान्यता पर खड़ा है। अगर मान्यता बदल जाए तो नतीजा भी बदल जाएगा। अब दूसरे मॉडल की बात करते हैं। यहाँ द वायर थोड़ा नरम तरीका अपनाता है और 2021 के मतदान के आधार पर नया हिसाब लगाता है।
इसमें कहा जाता है कि अगर SIR नहीं हुआ होता और हटाए गए वोटरों ने पिछली बार की तरह वोट किया होता, तो सिर्फ 11 सीटों का नतीजा बदलता। लेकिन सवाल वही है कि आखिर किस आधार पर यह मान लिया गया कि लोग इस बार भी पिछली बार जैसा ही वोट करते? और सबसे बड़ी बात, अगर इस मॉडल को भी सही मान लें, तब भी बीजेपी बहुमत के साथ चुनाव जीत रही थी।
अगर हटाए गए वोटरों को जोड़ने के बाद भी बीजेपी जीत रही है, तो फिर SIR अकेले चुनाव का कारण कैसे हो सकता है? सिर्फ बड़े-बड़े शब्द इस्तेमाल कर देने से कोई तर्क सही नहीं हो जाता।
ऐसे शब्द सिर्फ लोगों को यह महसूस कराने के लिए इस्तेमाल किए गए कि चुनाव में गड़बड़ी साबित हो चुकी है, जबकि पूरा लेख सिर्फ कल्पनाओं पर टिका है। कल्पना सवाल उठा सकती है, लेकिन उसे पक्का सबूत नहीं कहा जा सकता।
आंकड़ों को चुनकर दिखाने से कहानी कमजोर पड़ती है
अगर एक शब्द में द वायर के इस लेख को समझाना हो, तो वह होगा आंकड़ों से खेल। लेख बार-बार उन सीटों की बात करता है जहाँ ज्यादा वोटर हटाए गए और बीजेपी जीती। लेकिन वह यह नहीं बताता कि कई सीटों पर भारी संख्या में वोटर हटाए जाने के बावजूद TMC भी जीती।
जिन 20 विधानसभा सीटों पर सबसे ज्यादा वोटर हटाए गए, उनमें से 13 सीटें TMC ने जीतीं, 6 बीजेपी ने और 1 कॉन्ग्रेस ने। अगर SIR सच में TMC को नुकसान पहुँचाने और बीजेपी को फायदा देने के लिए किया गया था, तो सबसे ज्यादा वोटर हटने वाली सीटों पर TMC की जीत इस पूरी कहानी पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।
यहीं पर द वायर की दोहरी सोच साफ दिखती है। जहाँ बीजेपी को फायदा हुआ वहाँ जोर देकर बात की गई, लेकिन जहाँ भारी वोटर हटाने के बावजूद TMC जीत गई, वहाँ चुप्पी साध ली गई। इससे साफ दिखता है कि आँकड़ों को निष्पक्ष तरीके से नहीं बल्कि एक राजनीतिक कहानी फिट करने के लिए इस्तेमाल किया गया।
सिर्फ वोटर हटाए जाने से चुनाव का नतीजा तय नहीं होता। चुनाव उम्मीदवार की ताकत, जातीय और धार्मिक समीकरण, सत्ता विरोधी माहौल, संगठन की ताकत और लोगों के मूड जैसे कई कारणों से तय होते हैं। इसलिए किसी एक चीज को चुनाव का पूरा कारण बताना गलत है।
बंगाल का राजनीतिक बदलाव SIR से पहले शुरू हो चुका था
द वायर अपने पूरे विश्लेषण में यह दिखाने की कोशिश करता है कि पश्चिम बंगाल चुनाव का नतीजा मुख्य रूप से वोटर लिस्ट संशोधन यानी SIR की वजह से आया। लेकिन यह दावा बंगाल में पिछले एक दशक से चल रहे बड़े राजनीतिक बदलाव को पूरी तरह नजरअंदाज करता है।
दशकों तक पश्चिम बंगाल की राजनीति पर पहले वामपंथी दलों और फिर TMC का दबदबा रहा, जबकि बीजेपी की मौजूदगी बहुत सीमित थी। लेकिन इसी दौरान राज्य की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती गई।
कभी पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत का 127.5 प्रतिशत थी, जो घटकर 83.7 प्रतिशत रह गई। एक समय देश के कुल औद्योगिक उत्पादन में बंगाल की हिस्सेदारी 27 प्रतिशत थी, जो अब घटकर केवल 4 प्रतिशत रह गई है। आर्थिक गिरावट के साथ-साथ राज्य ने राजनीतिक हिंसा और कई विवादित घटनाएँ भी देखीं।
हालाँकि, 2014 के बाद बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव दिखना शुरू हुआ। बीजेपी ने धीरे-धीरे अपना वोट शेयर बढ़ाया और राज्य में एक मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में उभरने लगी।
2019 के लोकसभा चुनाव में यह बदलाव और साफ दिखाई दिया, जब बीजेपी ने बंगाल में 18 लोकसभा सीटें जीतकर खुद को TMC की सबसे बड़ी चुनौती के रूप में स्थापित कर लिया। यह राजनीतिक बदलाव 2026 के SIR से कई साल पहले शुरू हो चुका था।
पश्चिम बंगाल में बीजेपी का बढ़ना अचानक नहीं हुआ, बल्कि लंबे समय से जमीनी स्तर पर संगठन मजबूत करने का नतीजा था। पार्टी ने बूथ स्तर पर नेटवर्क तैयार किया, कार्यकर्ताओं को मजबूत किया और उन इलाकों तक पहुँच बनाई जहाँ पहले उसका प्रभाव बहुत कम था।
समय के साथ बीजेपी ने सीमावर्ती जिलों, ग्रामीण हिंदू बहुल इलाकों और सांप्रदायिक तनाव वाले क्षेत्रों में अपना जनाधार बढ़ाया। दूसरी तरफ TMC सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल भी लगातार बढ़ रहा था।
भ्रष्टाचार, भर्ती घोटाले, राजनीतिक हिंसा और संदेशखाली जैसे विवादों ने लोगों में नाराजगी पैदा की। ऐसे राजनीतिक माहौल में चुनावी बदलाव को सिर्फ वोटर लिस्ट संशोधन से जोड़ देना सही नहीं माना जा सकता।
द वायर ने बंगाल के चुनावी नतीजों को मुख्य रूप से SIR के नजरिए से दिखाकर TMC और उसके कार्यकर्ताओं पर लगे आरोपों और विवादों को नजरअंदाज करने की कोशिश की। चुनाव सिर्फ वोटर लिस्ट से तय नहीं होते, बल्कि बदलती जनता की पसंद, संगठन की ताकत, विचारधारा और लोगों की सोच भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती है।
बीजेपी की हर बड़ी जीत को सिर्फ वोटर हटाने का नतीजा बताना एक ऐसा राजनीतिक नैरेटिव तैयार करना है जिसमें लोग सिर्फ सनसनीखेज हेडलाइन पर ध्यान दें और पूरी सच्चाई को नजरअंदाज कर दें।
‘डेटा से पता चलता है कि SIR ने BJP को बंगाल जीतने में मदद की’ जैसी हेडलाइन बिना ठोस सबूत और सिर्फ मान्यताओं के आधार पर यह दिखाती है कि वामपंथी सोच से जुड़े लोग बीजेपी की हर चुनावी जीत को किसी न किसी तरह फर्जी या धांधली साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। यही बेचैनी पूरे लेख में साफ दिखाई देती है।
निष्कर्ष
द वायर का लेख SIR को लेकर कुछ सवाल जरूर उठाता है, लेकिन यह कहीं भी साबित नहीं कर पाता कि वोटर हटाने की वजह से बीजेपी चुनाव जीती। पूरा तर्क सिर्फ आँकड़ों की तुलना और कल्पनाओं पर टिका है, किसी ठोस सबूत पर नहीं।
लेकिन इस लेख में यह मानकर चला जा रहा है कि जहाँ जीत का अंतर कम था और वोटर ज्यादा हटाए गए, वहाँ चुनाव का नतीजा बदल गया होगा। लेकिन यह बंगाल की राजनीति के बड़े कारणों को नजरअंदाज करता है, जैसे सत्ता विरोधी माहौल, बीजेपी का लगातार बढ़ता संगठन, धार्मिक ध्रुवीकरण और बदलते वोटरों का रुझान।
यहाँ तक कि इस लेख में खुद ये बात माना गया है कि यह तय नहीं किया जा सकता कि हटाए गए वोटर किसे वोट देते हैं और उसके अपने हिसाब से भी बीजेपी आगे रहती है।
लोकतंत्र में वोटर लिस्ट की जाँच जरूरी है, लेकिन सिर्फ शक को सबूत नहीं माना जा सकता। संभावना सवाल खड़े कर सकती है, लेकिन उसे चुनाव में गड़बड़ी का पक्का प्रमाण नहीं कहा जा सकता। आखिरकार बंगाल का चुनावी नतीजा कल्पनाओं से नहीं बल्कि वहाँ की असली राजनीतिक परिस्थितियों से तय हुआ था।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


