Sunday, December 6, 2020
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सैकड़ों करोड़ रुपए सरकार (जनता) से… और चलाते हैं चीनी प्रोपेगेंडा: PTI से प्रसार भारती तोड़ सकती है रिश्ते

वैसे तो PTI का सांप्रदायिक रूप से फर्जी समाचारों और राजनीतिक मामलों पर फर्जी खबरों को फैलाने का इतिहास रहा है। लेकिन चीन को अपना प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए मंच देकर PTI ने हर सीमा लांघ दी। पीटीआई की ‘देश विरोधी’ रिपोर्टिंग प्रसार भारती को नागवार गुजरी है। ऐसे में प्रसार भारती ने...

प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) इन दिनों एक नई मुश्किल में है। ऐसा इसलिए क्योंकि पीटीआई ने चीनी राजदूत को अपना प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए मंच प्रदान किया था।

समाचार एजेंसी के साथ हुए एक साक्षात्कार में चीनी राजदूत सन वीडोंग ने गलवान घाटी में हुए टकराव के लिए पूरे दोष को भारत के ऊपर डाल दिया था। लेकिन आश्चर्य यह कि इस दौरान एक बार भी PTI ने चीनी राजदूत को सवालों से नहीं घेरा या उनके प्रोपेगेंडा फैलाने पर अंकुश लगाने की कोशिश की।

भारत सरकार ने PTI के संचालन के खिलाफ कठोर कदम उठाने का पूरा मन बना लिया है। वो भी PTI बोर्ड के कई लोगों द्वारा विचार साझा किए जाने के बाद सरकार ने यह सोचा है।

कल की रिपोर्ट में हमने बताया था कि प्रसार भारती ने चीनी राजदूत के साक्षात्कार को देखते हुए पीटीआई के साथ अपने संबंधों की समीक्षा करने का फैसला किया है। उस इंटरव्यू को कुछ लोगों ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा जारी किया गया एक प्रेस रिलीज तक बता कर समाचार एजेंसी का मखौल उड़ाया था।

ऑपइंडिया को विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि पीटीआई की ‘देश विरोधी’ रिपोर्टिंग प्रसार भारती को नागवार गुजरी है। ऐसे में प्रसार भारती पीटीआई के साथ अपने संबंधों को आगे नहीं बढ़ाना चाहती। इसे लेकर हमें बताया गया कि पीटीआई से संबंधों पर निर्णय के बारे में जल्द ही अवगत कराया जाएगा।

सूत्रों के अनुसार 1980 के बाद से पीटीआई को करीब 200 करोड़ रुपए पब्लिक फंड के तौर पर मिले हैं, जबकि जनता के प्रति इनकी जवाबदेही नगण्य रही है। आज की तारीख में यह फंड 400 से 800 करोड़ रुपए के निवेश के बराबर है अगर हम घटते-बढ़ते ब्याज दरों के अनुसार इसका आकलन करें तो।

सूत्रों ने हमें बताया कि प्रसार भारती के अधिकारियों का मानना ​​है कि पीटीआई निजी मीडिया संस्थानों के मुकाबले सार्वजनिक संस्थानों से कितना शुल्क लेता है, इसमें और अधिक पारदर्शिता की जरूरत है। चिंता की बात यह भी है कि पीटीआई के बोर्ड में अधिकांश निदेशक निजी मीडिया संस्थामों से हैं।

प्रसार भारती का मानना ​​है कि निजी समाचार पत्रों और समाचार चैनलों से उनकी सदस्यता के लिए जितना शुल्क लिया जाता है, उससे कहीं अधिक पीटीआई उनसे वसूलता है। ऐसे में पब्लिक ब्रॉडकास्टर का मानना है कि शुल्क को लेकर पारदर्शिता होनी ही चाहिए। अब यह पता चला है कि PTI और प्रसार भारती के बीच व्यावसायिक संबंधों की गहनता से समीक्षा की जा रही है।

पीटीआई जिस रास्ते पर चल रही थी, प्रसार भारती के अधिकारियों के लिए यह अब बर्दाश्त के बाहर हो गया। भविष्य में पीटीआई को सरकारी फंडिंग मिलेगी या नहीं, कुछ ही दिनों में इसका फैसला हो जाएगा। वैसे तो समाचार एजेंसी का सांप्रदायिक रूप से फर्जी समाचारों और राजनीतिक मामलों पर फर्जी खबरों को फैलाने का इतिहास रहा है। लेकिन चीन को अपना प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए पीटीआई ने अपना मंच देकर हर सीमा को पार कर दिया।

समाचार एजेंसी की कमाई कैसे?

पीटीआई एक समाचार एजेंसी है और वह खबरें देकर ऐसे लोगों से धन अर्जित करती है, जिन्होंने एजेन्सी की सदस्यता ले रखी है। इस प्रकार समाचार एजेंसी रिपोर्ट इकट्ठा करके उसमें रुचि रखने वाली पार्टियों को बेचकर उससे अपनी इनकम लेती है। उदाहरण के लिए PTI की रिपोर्ट्स मुख्यधारा की मीडिया में दिखती है। ठीक उसी सरह से अन्य समाचार एजेंसियाँ जैसे एएनआई, आईएएनएस और यूएनआई के साथ-साथ वैश्विक एजेंसियाँ जैसे रॉयटर्स और एपी आदि भी हैं।

फर्जी खबरों का लंबा इतिहास

मौजूदा विवाद के अलावा पीटीआई का फर्जी खबरों को फैलाने का एक लंबा इतिहास रहा है। समाचार एजेंसी की ओर से मिली रिपोर्ट को अधिकांश मीडिया बिना किसी संपादन के प्रकाशित करते हैं। इसके कारण व्यक्तिगत मीडिया हाउसों की तुलना में समाचार एजेंसियों की ओर से आई फर्जी खबरें अधिक लोगों तक पहुँचती हैं।

पिछले वर्ष जुलाई में एक रिपोर्ट पेश करते हुए PTI ने दावा किया था कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में कहा है कि विमुद्रीकरण का अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। कई मीडिया हाउसों द्वारा इस भ्रामक रिपोर्ट को चलाए जाने के बाद वित्त मंत्री को खुद स्पष्ट करना पड़ा कि उन्होंने ऐसा कोई बयान नहीं दिया है।

राजनीतिक मसलों पर भी न्यूज एजेंसी फेक न्यूज को हवा देती रही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले पीटीआई ने दावा किया था कि AAP के केवल 25 फीसदी उम्मीदवारों पर ही गंभीर आपराधिक मामले हैं। जबकि असल में यह संख्या 51 फीसदी थी। PTI ने इसी रिपोर्ट में BJP और कॉन्ग्रेस के डेटा के साथ भी छेड़छाड़ किया था।

2017 में प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने दावा किया था कि यूपी सरकार ने राज्य में माध्यमिक और उच्च शिक्षा के लिए बजटीय आवंटन में भारी कटौती की थी। उसी वर्ष पीटीआई ने एक और ऐसी खबर चलाई थी, जिसमें दावा किया गया था कि पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने एक टीवी समाचार एंकर के द्वारा अपमानजनक सवाल पूछे जाने के बाद पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में 2016 के सर्जिकल स्ट्राइक का प्लान किया था, जबकि यह पूरी तरह से गलत था।

पिछले साल हुए सीएए विरोधी दंगों के बाद यूपी सरकार ने सार्वजनिक और निजी संपत्तियों के नुकसान के लिए पैसे वसूलने के लिए दंगाइयों की संपत्ति को जब्त करने का निर्णय लिया था, लेकिन इस कदम को भी पीटीआई ने गलत तरीके से पेश किया और दावा किया था कि योगी आदित्यनाथ ने हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ ‘बदला’ लेने की कसम खाई थी।

ये समाचार एजेंसी PTI द्वारा फर्जी समाचारों के कुछ उदाहरण थे। हकीकत में PTI हमेशा से फर्जी और भ्रामक खबरें चलाता है, जिसे मीडिया संस्थान आँख मूँद कर पब्लिश करते हैं और यह बहुत बड़े पाठक वर्ग तक पहुँचता है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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