पश्चिमी मीडिया अब आखिरकार उस सच्चाई को मानने लगा है, जिसे ऑपइंडिया काफी सालों से बता रहा है। यह पूरा मामला दुनिया भर में फैले उन एनजीओ (NGO), एक्टिविस्ट ग्रुप और मीडिया हाउस से जुड़ा है, जो असल में चीन की सरकार के लिए प्रचार (प्रोपेगेंडा) करने वाली मशीन की तरह काम कर रहे हैं। हाल ही में फॉक्स न्यूज (FOX NEWS) ने एक बड़ी पड़ताल की है, जिसमें नेविल रॉय सिंघम के चीन-समर्थक नेटवर्क का पर्दाफाश किया गया है।
अमेरिका के रहने वाले नेविल रॉय सिंघम एक बड़े बिजनेसमैन हैं, जिन्होंने 2017 में अपनी कंपनी लगभग 6,500 करोड़ रुपए ($785 मिलियन) में बेची थी और फिर चीन के शंघाई जाकर बस गए। अब यह साफ हो रहा है कि वे कैसे पैसों के दम पर खबरों का एक जाल बुनकर दुनिया भर में चीन की छवि चमकाने का खेल चला रहे हैं।
फॉक्स न्यूज की इस पाँच पार्ट वाली सीरीज की तीन रिपोर्ट से पता चलता है कि नेविल रॉय सिंघम का संगठन बड़ी चालाकी से खबरों का एक ऐसा जाल बुन रहा है, जहाँ मामूली विरोध-प्रदर्शनों को भी ‘बड़ा मुद्दा’ बनाकर पेश किया जाता है। सिंघम के पैसों से चलने वाला यह नेटवर्क इस तरह की खबरों को पूरी दुनिया में फैलाता है। इनका असली मकसद अमेरिका और भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों में झगड़े और फूट पैदा करना है। साथ ही, ये चीन को एक ऐसे ‘नेक’ देश के रूप में दिखाते हैं जो दुनिया को अमेरिका के असर से बचा रहा है। क्यूबा में चल रहे वामपंथी आंदोलन में यह खेल साफ-साफ देखा जा सकता है।
इनके काम करने का तरीका बहुत सीधा है, ये किसी भी तरह दुनिया को यह यकीन दिलाना चाहते हैं कि चीन की ‘मार्क्सवादी-नक्सलवादी’ सोच ही सबसे बढ़िया और भली है। दूसरी तरफ, ये अमेरिका और उसकी व्यापारिक नीतियों को दुनिया की हर मुसीबत की जड़ और सबसे बड़ी बुराई के रूप में दिखाते हैं।
नेविल रॉय सिंघम का ‘चीन प्रेम’: प्रोपेगेंडा के दम पर दुश्मन देशों को बर्बाद करने वाली सैकड़ों संस्थाओं का खुलासा
मार्च 2026 की शुरुआत में, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और नेविल रॉय सिंघम के संगठन ‘हाउस ऑफ सिंघम’ के बीच संदिग्ध रिश्तों की सरकारी जाँच शुरू हो गई है। अमेरिका के अधिकारी अब इस बात की गहराई से छानबीन कर रहे हैं कि सिंघम को चीन से कितना पैसा मिल रहा है, मीडिया और राजनीति में उनकी कितनी पकड़ है और उनके इन कामों से अमेरिका के हितों को कितना नुकसान पहुँच रहा है।
चाहे अमेरिका में फिलिस्तीन के समर्थन में होने वाले प्रदर्शन हों, क्यूबा में वामपंथी कार्यकर्ताओं का जमावड़ा हो या ईरान युद्ध के खिलाफ उठने वाली आवाजें, ऊपर से देखने में ये सब आम लोगों का गुस्सा लग सकते हैं, लेकिन असलियत कुछ और ही है। ये प्रदर्शन असल में एक बहुत बड़ी और सोची-समझी साजिश का हिस्सा हैं, जिन्हें मोटी फंडिंग और खास राजनीतिक मकसद के साथ चलाया जा रहा है। इन सबकी डोर नेविल सिंघम के उस नेटवर्क से जुड़ी है, जिसमें एनजीओ (NGO), मीडिया हाउस, बड़े-बड़े बुद्धिजीवी और मशहूर हस्तियाँ शामिल हैं।
फॉक्स न्यूज ने इस सच को सामने लाने के लिए हजारों टैक्स कागजात, संगठनों के रिकॉर्ड, पैसों के लेन-देन और सोशल मीडिया पोस्ट की जाँच की है। इस बड़ी पड़ताल के लिए आधुनिक एआई (AI) तकनीक और खुले सोर्स से मिली जानकारियों का इस्तेमाल किया गया है, जिससे सिंघम के इस नेटवर्क की एक-एक परत खुल गई है।
फॉक्स न्यूज की एक बड़ी रिपोर्ट, जिसका नाम ‘तबाही मचाने वाला जोड़ा’ (Power Couple of Chaos) है, उसने नेविल रॉय सिंघम और उनकी पत्नी इवांस के काले कारनामों की पोल खोल दी है। जाँच में पता चला है कि 2017 से अब तक सिंघम ने चीन के समर्थन में माहौल बनाने के लिए सीधे तौर पर 2300 करोड़ रुपए फूँक दिए हैं। अगर 2025 तक के पूरे लेनदेन को देखें, तो यह आँकड़ा करीब 5000 करोड़ रुपए तक पहुँच जाता है। यह भारी-भरकम पैसा दुनिया भर की 1000 से ज्यादा संस्थाओं में बाँटा गया। इनमें से लगभग 200 संगठन तो ऐसे हैं जिनका काम ही सिर्फ चीन की तारीफ करना और अमेरिका व अन्य लोकतांत्रिक देशों की बुराई करना है।
रिपोर्ट के मुताबिक, सिंघम और उनकी पत्नी इवांस ने पूरी दुनिया में करीब 2000 कट्टर वामपंथी संगठनों का एक ऐसा जाल बिछा दिया है, जो चीन, रूस, ईरान, क्यूबा और उत्तर कोरिया जैसे तानाशाह देशों का पक्ष लेते हैं। एक्टिविस्टों के बीच ऐसे लोगों को ‘टैंकी’ (Tankies) कहा जाता है, यानी वो लोग जो अपनी ही लोकतांत्रिक सरकार के खिलाफ जाकर तानाशाही सरकारों का गुणगान करते हैं। इस समय सिंघम के नेटवर्क से जुड़े कई बड़े नेता क्यूबा में बैठकर कम्युनिस्टों के लिए अभियान चला रहे हैं।
नेविल रॉय सिंघम पर आरोप है कि उन्होंने टैक्स बचाने और पैसा घुमाने के लिए फर्जी कंपनियों (शेल कंपनियों) का एक जाल बिछाया था। उन्होंने गोल्डमैन साच्स जैसी बड़ी संस्था से जुड़े एक खास फंड का इस्तेमाल किया ताकि करोड़ों रुपए बिना किसी रोक-टोक के इधर-उधर भेजे जा सकें। हालाँकि, मामला संदिग्ध लगने पर गोल्डमैन साच्स ने फरवरी 2024 में सिंघम के इस खाते को पूरी तरह बंद कर दिया।
चीन के समर्थन में काम करने वाले इस पूरे नेटवर्क की शुरुआत साल 2017 में हुई, जब नेविल सिंघम ने जोडी इवांस (Jodie Evans) से जमैका में शादी की। जोडी खुद एक एक्टिविस्ट ग्रुप की मालकिन हैं। इस शादी में दुनिया भर के 80 से ज्यादा बड़े वामपंथी नेता शामिल हुए थे, जिनमें विजय प्रसाद नाम के एक नक्सलवादी पत्रकार भी थे।
विजय प्रसाद ने बाद में सिंघम के इस नेटवर्क को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई और कई फर्जी कंपनियों के बोर्ड मेंबर बने। फॉक्स न्यूज की जाँच में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है। सिंघम के ये ज्यादातर संगठन किसी बड़े दफ्तर के बजाय साधारण होटलों या कूरियर दुकानों (UPS Store) के पते पर रजिस्टर्ड हैं। ऐसा इसलिए किया गया ताकि पैसों के लेन-देन को छिपाया जा सके और किसी को कानों-कान खबर न हो कि ये पैसा कहाँ से आ रहा है और कहाँ जा रहा है।
जाँच में सामने आया है कि इस पूरे खेल के पीछे अमेरिका की 11 संस्थाएँ (NGOs) मुख्य केंद्र के रूप में काम कर रही हैं। इनका काम बहुत व्यवस्थित है। ये पैसा बाँटते हैं, विरोध-प्रदर्शनों की प्लानिंग करते हैं, खबरें और Video बनवाते हैं और लोगों को एक खास राजनीतिक विचारधारा की ट्रेनिंग देते हैं। इन्होंने ‘लिबरेशन सेंटर’ (मुक्ति केंद्र) भी खोले हैं, जो बिल्कुल पुराने चीनी नेता माओ जे़दोंग की ‘यूनाइटेड फ्रंट’ रणनीति जैसे हैं।
इस रणनीति का मतलब है कि अपने ‘खास लोगों’ को समाज के हर हिस्से, ‘जैसे मीडिया, मजदूर संगठनों और स्कूलों’ में इस तरह घुसा दो कि वे ऊपर से तो स्वतंत्र लगें, लेकिन अंदर ही अंदर अपने ही देश की सरकार और उसकी साख को दीमक की तरह खोखला करते रहें।
अगर पैसों की बात करें, तो नेविल रॉय सिंघम ने बड़ी ही चालाकी से पैसा घुमाया है। उन्होंने गोल्डमैन साच्स के एक फंड और दो फर्जी (शेल) कंपनियों का इस्तेमाल करके करीब 2,300 करोड़ रुपए छह अलग-अलग एनजीओ में डाले। यह भारी-भरकम रकम ही उस मशीनरी को चलाने के लिए पेट्रोल का काम कर रही है, जिसका इकलौता मकसद चीन की तारीफ करना और विरोधी देशों को कमजोर करना है।

जाँच से पता चला है कि नेविल रॉय सिंघम ने कई संस्थाओं (NGOs) को मालामाल कर दिया है। उन्होंने ‘पीपुल्स फोरम’ को करीब 185 करोड़ रुपए, ‘पीपुल्स सपोर्ट फाउंडेशन’ को लगभग 1400 करोड़ रुपए और ‘जस्टिस एंड एजुकेशन फंड’ को 570 करोड़ रुपए दिए। इस खेल में ‘ब्रेकथ्रू मीडिया’ और ‘कोडपिंक’ जैसे संगठन भी शामिल हैं (कोडपिंक की मालिक सिंघम की पत्नी जोडी इवांस ही हैं)। साथ ही, विजय प्रसाद नाम के पत्रकार की कंपनी ‘ट्राईकॉन्टिनेंटल’ को भी इस नेटवर्क से मोटी फंडिंग मिली है।
इस मामले ने तब तूल पकड़ा जब सितंबर 2025 में अमेरिकी संसद की एक बड़ी कमेटी ने ‘द पीपुल्स फोरम’ के कागजात खंगालने शुरू किए। इस संस्था पर गंभीर आरोप हैं कि इसका सीधा रिश्ता चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से है। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि यह संगठन एक तरफ तो अमेरिका में ‘NGO’ बनकर टैक्स बचाने का फायदा उठा रहा था, और दूसरी तरफ चोरी-छिपे चीन के करीबी नेविल सिंघम से करोड़ों रुपए ले रहा था।
अमेरिकी सांसद जेसन स्मिथ की रिपोर्ट ने ‘द पीपुल्स फोरम’ नाम के संगठन की धज्जियाँ उड़ा दी हैं। इस संगठन ने न केवल इजरायल में हमास के आतंकी हमले को सही ठहराया, बल्कि अमेरिका के कॉलेजों में दंगे और हिंसा भड़काने का काम भी किया। खुद इस संस्था ने माना है कि उसे नेविल रॉय सिंघम से 165 करोड़ रुपए से ज्यादा की फंडिंग मिली है। असल में यह संगठन पढ़ाई के नाम पर ऐसे कोर्स चलाता है, जिनका मकसद सिर्फ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का प्रचार करना है।
जाँच में सामने आया कि 2017 से 2022 के बीच सिंघम और उनकी पत्नी ने बड़ी चालाकी से फर्जी (शेल) कंपनियों के जरिए इस संगठन को पैसा पहुँचाया। यह अब पूरी तरह साफ हो चुका है कि ‘द पीपुल्स फोरम’ कोई स्वतंत्र संस्था नहीं, बल्कि सिंघम के उस नेटवर्क का हिस्सा है जो सिर्फ चीन के इशारे पर काम करता है।
नेविल रॉय सिंघम का रिकॉर्ड काफी पुराना और संदिग्ध है। रिपोर्ट के मुताबिक, 1974 में ही FBI ने उनके खिलाफ जाँच शुरू कर दी थी क्योंकि वे उन गुटों से जुड़े थे जो अमेरिका के दुश्मन माने जाते थे। इतना ही नहीं, सिंघम ने सालों तक विवादित चीनी कंपनी हुवावे (Huawei) के लिए भी काम किया। बता दें कि हुवावे के रिश्ते चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से इतने गहरे हैं कि कंपनी ने खुद माना था कि उनके ऑफिस के अंदर चीन की सरकारी ‘पार्टी कमेटी’ बैठती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नेविल सिंघम का यह पूरा तामझाम असल में ‘खबरों की हेराफेरी’ (Information Laundering) करने का एक अड्डा है। इसका एक ही मकसद है ‘पूरी दुनिया में चीन की तारीफ करवाना और अमेरिका के भीतर झगड़े पैदा करना’।
हैरानी की बात यह है कि जो विरोध-प्रदर्शन देखने में आम जनता का गुस्सा लगते हैं, (जैसे ईरान युद्ध का विरोध या क्यूबा की सरकार का समर्थन) वे असल में पूरी तरह से स्क्रिप्टेड होते हैं। सिंघम के मीडिया चैनल (जैसे ‘ब्रेकथ्रू न्यूज’) इन प्रदर्शनों की प्रोफेशनल तरीके से शूटिंग करते हैं, उन्हें शानदार वीडियो और कमेंट्री के साथ तैयार करते हैं और फिर Social Media पर फैला देते हैं। यह सब इसलिए किया जाता है ताकि दुनिया को लगे कि ये कोई बहुत बड़ा ‘जन-आंदोलन’ है, जबकि हकीकत में यह एक सोची-समझी साजिश होती है।
इसी साल फरवरी में विशेषज्ञ एडम सोहन ने अमेरिकी संसद में इस जाल की पोल खोलते हुए कहा, “यह कोई आम जनता का विरोध नहीं है। यह एक ऐसा सेट सिस्टम है जिसे जब चाहे, जहाँ चाहे, अमेरिका के काम-काज को रोकने (जाम करने) के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।”
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे खेल के लिए पैसा अमेरिका के ही टैक्स कानूनों (NGO के जरिए मिलने वाली छूट) से आ रहा है, लेकिन इसका रिमोट कंट्रोल एक दुश्मन देश (चीन) के हाथ में है। सोहन ने चेतावनी दी कि यह हमारे देश की सुरक्षा में एक ऐसा छेद है जिसे हमें तुरंत बंद करना होगा।

रॉय सिंघम और PSL से जुड़ा जिहादी ढेर: 2025 में अमेरिकी इजराइली दूतावास पर किया था हमला
रॉय सिंघम का नेटवर्क सिर्फ भाषण देने या विरोध-प्रदर्शन करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अब इसके तार हत्या और आतंक से भी जुड़ चुके हैं। मई 2025 में वॉशिंगटन डीसी (अमेरिका) में ‘एलियास रोड्रिगेज’ नाम के एक कट्टरपंथी ने ‘फ्री फिलिस्तीन’ के नारे लगाते हुए इजराइली दूतावास के दो कर्मचारियों का कत्ल कर दिया था। जब जाँच हुई, तो पता चला कि यह हत्यारा ‘पार्टी फॉर सोशलिज्म एंड लिबरेशन’ (PSL) नाम के एक कम्युनिस्ट ग्रुप से जुड़ा था। चौंकाने वाली बात यह है कि इस ग्रुप को चीन का प्रोपेगेंडा फैलाने वाले नेविल रॉय सिंघम और उनकी पत्नी मोटी फंडिंग देते हैं।
इतना ही नहीं, यह कातिल ‘ANSWER कोअलिशन’ जैसे कट्टरपंथी समूहों का भी हिस्सा रहा है और उनके लिए चंदा इकट्ठा करता था। रिपोर्टों से साफ हुआ है कि ये सभी संगठन ‘पीपुल्स फोरम’ नाम की संस्था से जुड़े हैं, जिसका सीधा कनेक्शन रॉय सिंघम के जरिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से है। इससे यह साफ हो जाता है कि चीन से आने वाला यह पैसा केवल राजनीति के लिए नहीं, बल्कि दुनिया भर में हिंसा और दहशत फैलाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
चीन से पैसा पाने वाला संगठन ‘पार्टी फॉर सोशलिज्म एंड लिबरेशन’ (PSL) लगातार भारत की मोदी सरकार को निशाना बना रहा है। इस ग्रुप ने भारत को बदनाम करने के लिए गुजरात दंगों से लेकर किसान कानूनों और बेरोजगारी जैसे छह बड़े मुद्दों को अपना हथियार बना रखा है। इस संगठन की पोल तब खुली जब इसने ‘न्यूज़क्लिक’ (NewsClick) का बचाव करना शुरू किया। जब भारत सरकार ने चीन का प्रोपेगेंडा फैलाने के आरोप में न्यूजक्लिक पर एक्शन लिया, तो PSL ने इसे सरकार की तानाशाही बताकर शोर मचाना शुरू कर दिया।
हैरानी की बात तो यह है कि जब मशहूर अखबार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स‘ ने न्यूजक्लिक और उसके एडिटर प्रबीर पुरकायस्थ के चीन से जुड़े रिश्तों का पर्दाफाश किया, तो PSL ने उस अखबार के दफ्तर के बाहर ही विरोध प्रदर्शन कर दिया। इस संगठन का कहना है कि मोदी सरकार जानबूझकर वामपंथी विचारकों को ‘देशद्रोही’ बताकर उनकी आवाज दबा रही है। साफ़ है कि यह पूरा ग्रुप चीन के इशारे पर भारत की छवि खराब करने और चीनी एजेंटों को बचाने की एक बड़ी मशीन की तरह काम कर रहा है।
ब्रेकथ्रू न्यूज: सिंघम के पैसे से चलने वाली चीन की ‘प्रोपेगेंडा मशीन’
2019 में शुरू हुआ ‘ब्रेकथ्रू न्यूज‘ (BreakThrough News) कहने को तो एक न्यूज चैनल है, लेकिन असल में यह चीन के इशारे पर काम करता है। रिकॉर्ड बताते हैं कि नेविल रॉय सिंघम ने इस चैनल को ‘समाज सेवा’ के नाम पर करीब 9 करोड़ रुपए का मोटा चंदा दिया। यह चैनल एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का हिस्सा है जिसका काम ही दुनिया भर में चीन की तारीफ करना और उसके विरोधियों को बदनाम करना है। इसकी हर खबर, चाहे वो इजरायल के खिलाफ हो या क्यूबा के समर्थन में, हमेशा चीन की पसंद के हिसाब से ही बनाई जाती है।

फॉक्स न्यूज की एक रिपोर्ट ‘शंघाई सेबोटेज’ ने खुलासा किया है कि यह नेटवर्क अमेरिका को नीचा दिखाने के लिए पूरी प्लानिंग और स्क्रिप्ट के साथ काम करता है। मिसाल के तौर पर, क्यूबा में हुए एक प्रदर्शन को इस चैनल ने बड़े क्रांतिकारी अंदाज में दिखाया और इसे अमेरिकी सरकार के खिलाफ एक बड़ी बगावत बता दिया। इसके बाद, दुनिया भर के कम्युनिस्ट मीडिया संगठनों ने इस वीडियो को फैलाया ताकि लोगों के मन में कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति सहानुभूति पैदा की जा सके और चीन का नैरेटिव सेट हो सके।
"Trump thinks he can do anything, but the people are stronger."
— BreakThrough News (@BTnewsroom) March 24, 2026
The first Nuestra América flotilla vessel arrived in Cuba Tuesday with 14 tons of food and medicine and 73 solar panels. @ldejesusreyes reports from Havana. pic.twitter.com/7WvuEaYCJE
आसान शब्दों में कहें तो, ये विरोध प्रदर्शन असल में एक सोची-समझी स्क्रिप्ट (नाटक) की तरह होते हैं। होता यह है कि रॉय सिंघम के नेटवर्क से जुड़े लोग पहले एक प्रदर्शन आयोजित करते हैं, फिर उनके ही नेटवर्क के मीडिया चैनल उसे ‘सच्चा आंदोलन’ बताकर कवर करते हैं। बाद में इसे दुनिया भर में फैलाया जाता है ताकि लोगों की सहानुभूति जीती जा सके और सरकारों पर दबाव बनाया जा सके। इसका असली मकसद सिर्फ एक है, कम्युनिस्ट विचारधारा को फैलाना और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के लिए समर्थन जुटाना।
फॉक्स न्यूज की एक रिपोर्ट ने इस बड़े जाल का खुलासा किया है। सिंघम का यह नेटवर्क अमेरिका में इजरायल विरोधी प्रदर्शन कराने से लेकर भारत में प्रोपेगेंडा फैलाने और दक्षिण अफ्रीका की लेबर यूनियनों को अपने कब्जे में लेने तक फैला हुआ है। यह एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय खेल है, जो कई मुखौटा कंपनियों और एक ही पते के पीछे छिपा है। इनका एकमात्र मिशन दुनिया भर में मार्क्सवाद फैलाना और चीन को अमेरिका के मुकाबले दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनाना है।
हैरानी की बात यह है कि नेविल रॉय सिंघम का परिवार विदेशी राजनीति को अपने हिसाब से चलाने के लिए पानी की तरह पैसा बहा रहा है। रॉय सिंघम की बहन शांति सिंघम और उनके पति डेनियल गुडविन ने न्यूयॉर्क के मेयर चुनाव में एक खास राजनीतिक गुट को मोटा चंदा दिया। दिलचस्प बात यह है कि डेनियल पहले रॉय सिंघम की ही कंपनी ‘थॉटवर्क्स’ में बड़े पद पर काम कर चुके हैं। इससे साफ होता है कि यह परिवार सिर्फ बिजनेस ही नहीं, बल्कि विदेशों में राजनीतिक जोड़-तोड़ में भी लगा हुआ है।
चीन के कट्टर समर्थक रॉय सिंघम खुलेआम चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तारीफ करते हैं। वे दुनिया में चल रहे मौजूदा नियमों को ‘झूठ’ बताते हैं और कहते हैं कि पूरी दुनिया को माओ ज़ेदोंग के दिखाए रास्ते पर चलना चाहिए। वे अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों के सख्त खिलाफ हैं और चाहते हैं कि दुनिया चीन के हिसाब से चले।
सिंघम ने अपने एक भाषण में पश्चिमी देशों पर हमला करते हुए कहा कि ये देश लोकतंत्र की रक्षा का सिर्फ दिखावा करते हैं। उन्होंने दावा किया कि असल में सोवियत संघ और चीन के लोगों ने ही अपने बलिदान से मानवता को बचाया है। सिंघम का मानना है कि केवल समाजवादी सोच ही दुनिया की बड़ी ताकतों को हरा सकती है। कुल मिलाकर, वे चीन की ताकत और उसकी सोच को पूरी दुनिया पर थोपना चाहते हैं।

नेविल रॉय सिंघम का असली मकसद अब सबके सामने है। उन्होंने साफ कहा है कि अगर दुनिया को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी के हिसाब से चलाना है, तो हमें इतिहास की उन पुरानी बातों को बदलना होगा जिन्हें दुनिया अब तक सच मानती आई है। सिंघम चाहते हैं कि दुनिया वैसी ही दिखे और सोचे, जैसा चीन चाहता है।
हैरानी की बात यह है कि इस काम के लिए सिंघम ने अमेरिका के ही पैसे का इस्तेमाल किया है। ‘फॉक्स न्यूज’ की रिपोर्ट ने एक ऐसी ‘सीक्रेट पाइपलाइन’ का पर्दाफाश किया है, जिसके जरिए अमेरिका की तीन बड़ी संस्थाओं (NGOs) ने 2021 से अब तक करीब 75 करोड़ रुपए ($91 लाख) चीन भेजे हैं। यह पैसा सात बार में ‘शंघाई माकु कल्चरल कम्युनिकेशंस’ नाम की एक कंपनी को दिया गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह कंपनी खुद सिंघम की ही एक आलीशान बिल्डिंग के पते पर चल रही है और इसका इकलौता काम इंटरनेट पर चीन के पक्ष में झूठा प्रचार (प्रोपेगेंडा) फैलाना है।

विजय प्रसाद, न्यूज़क्लिक और सिंघम: भारत में चीनी प्रोपेगेंडा का ‘तिगड़ा’
फॉक्स न्यूज की जाँच ने खुलासा किया है कि नेविल रॉय सिंघम ने भारत के खिलाफ एक बड़ा जाल बिछा रखा है। रिपोर्ट के मुताबिक, सिंघम की संस्था ने दिल्ली के न्यूज़ पोर्टल ‘न्यूजक्लिक’ (NewsClick) को लगभग 87 करोड़ रुपए (10.5 मिलियन डॉलर) का भारी-भरकम चंदा दिया। इसी वजह से भारत सरकार ने सिंघम के खिलाफ समन जारी किया है। उन पर भारत के चुनावों में दखल देने, पैसों की हेराफेरी (मनी लॉन्ड्रिंग) और अशांति फैलाने की साजिश रचने जैसे गंभीर आरोप हैं।

इस पूरे खेल में विजय प्रसाद एक मुख्य खिलाड़ी के रूप में सामने आए हैं। वे ‘ट्राइकॉटिनेंटल’ (TriContinental) नाम की संस्था से जुड़े हैं, जो सिंघम के नेटवर्क का एक खास हिस्सा है। न्यूजक्लिक और विजय प्रसाद की भारत विरोधी हरकतों का खुलासा पहले भी होता रहा है।
सिंघम खुद ‘ट्राइकॉटिनेंटल’ के सलाहकार बोर्ड में शामिल हैं और इसे चलाने के लिए मोटी फंडिंग देते हैं। आरोप है कि सिंघम अमेरिका की संस्थाओं का इस्तेमाल करके चीन का प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए पैसा पहुँचा रहे हैं। इतना ही नहीं, सिंघम ‘लेफ्ट वर्ड बुक्स’ और ‘ग्लोबट्रॉटर’ जैसी संस्थाओं के जरिए भी इस पूरे नैरेटिव को कंट्रोल करते हैं ताकि दुनिया भर में चीन की बात रखी जा सके।
विजय प्रसाद का मामला सिर्फ विचारधारा का नहीं है, बल्कि इनके तार सीधे भारत की राजनीति से जुड़े हैं। विजय प्रसाद माकपा (CPI-M) की बड़ी नेता वृंदा करात के भतीजे हैं। वृंदा करात के पति और दिग्गज नेता प्रकाश करात के कुछ ईमेल भी सामने आए थे, जिनसे पता चला कि उनके नेविल रॉय सिंघम के साथ बहुत करीबी रिश्ते हैं और वे न्यूजक्लिक के चीनी फंडिंग मामले में शामिल थे।
न्यूजक्लिक का नाम पहली बार 2021 में तब उछला जब ED (प्रवर्तन निदेशालय) ने इसकी जाँच शुरू की। इस पोर्टल पर आरोप है कि इसने गलत तरीके से विदेश से करीब 38 करोड़ रुपए मँगाए। जब 2023 में ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने रॉय सिंघम और चीन के इस पूरे खेल का पर्दाफाश किया, तो विजय प्रसाद ने इसे सरकार की साजिश बताकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की।
विजय प्रसाद ‘प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल’ नाम के एक अंतरराष्ट्रीय ग्रुप के बड़े सदस्य भी हैं। यह ग्रुप दुनिया भर के वामपंथी कार्यकर्ताओं को एक साथ लाता है। यह संगठन लगातार मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए ऐसे लेख छापता है जिनसे भारत की छवि खराब हो। इस मंच पर हर्ष मंदर जैसे लोगों के भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी लेख भरे पड़े हैं। इस ग्रुप में जयती घोष और ब्रिटेन के नेता जेरेमी कॉर्बिन जैसे लोग भी शामिल हैं, जो अक्सर भारत के खिलाफ बयानबाजी के लिए जाने जाते हैं।
‘प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल’ का जाल सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार विवादित ‘टाइडस फाउंडेशन’ (Tides Foundation) से भी जुड़े हैं। यह फाउंडेशन हमास का समर्थन करने वाले संगठनों को पैसा देता है। चौंकाने वाली बात यह है कि इसी टाइडस फाउंडेशन का सीधा कनेक्शन नेविल रॉय सिंघम और न्यूजक्लिक (NewsClick) से भी पाया गया है।
टाइडस फाउंडेशन भारत और हिंदू-विरोधी गुटों को पैसा पहुँचाने के लिए बदनाम है। इसने ‘हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स’ (HfHR) जैसे संगठनों को बड़ी मदद दी है, जिनके तार कट्टरपंथियों और खालिस्तानियों से जुड़े हैं। इस संस्था को बनाने के पीछे भी उन्हीं लोगों का हाथ था जो अमेरिका में बैठकर भारत के खिलाफ माहौल बनाते हैं।
इतना ही नहीं, टाइडस फाउंडेशन ने ‘अमन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट’ (AMAN) को भी पैसा दिया है। यह वही ट्रस्ट है जिसका नाम न्यूजक्लिक-चीन फंडिंग घोटाले में सामने आया था। आरोप है कि चीन ने न्यूजक्लिक के जरिए भारत की एकता और अखंडता को नुकसान पहुँचाने के लिए करोड़ों रुपए भेजे थे।
चीन के एजेंट रॉय सिंघम ने ‘पीपुल्स डिस्पैच’ जैसे कई विदेशी न्यूज पोर्टल्स में करोड़ों रुपए लगाए हैं। इन्हीं मंचों का इस्तेमाल करके विजय प्रसाद जैसे लोग लगातार भारत के खिलाफ लेख लिखते हैं और चीन के एजेंडे को बढ़ावा देते हैं।
‘पीपुल्स डिस्पैच’ नाम का पोर्टल खुद को जनता की आवाज कहता है, लेकिन असल में इसका इस्तेमाल खास एजेंडा चलाने के लिए होता है। उदाहरण के लिए, जनवरी 2020 में विजय प्रसाद ने इस पोर्टल पर जेएनयू (JNU) के प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया था और मोदी सरकार के खिलाफ जमकर निशाना साधा था। इससे साफ पता चलता है कि यह पोर्टल किस तरह की सोच को बढ़ावा देता है।
नेविल रॉय सिंघम ने अपनी बड़ी टीम में कुछ भारतीयों को भी जोड़ा था, जो ‘ट्राइकॉटिनेंटल’ जैसे एनजीओ के लिए काम करते थे। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ये संस्थाएँ चीन के एजेंडे को फैलाने का काम कर रही थीं। सिंघम की इस टीम में प्रबीर पुरकायस्थ, सृजना, प्रशांत और विजय प्रसाद जैसे मुख्य नाम शामिल थे, जो भारत में बैठकर चीन के पक्ष में माहौल तैयार कर रहे थे।
इतना ही नहीं, विजय प्रसाद के रिश्ते पी साईनाथ से भी काफी करीबी रहे हैं। पी साईनाथ के पोर्टल ‘पारी’ (PARI) का नाम भी तब उछला जब सिंघम और चीन के प्रोपेगेंडा नेटवर्क का सच सबके सामने आया। जैसे ही यह विवाद बढ़ा, ‘पारी’ ने तुरंत अपने पोर्टल से सिंघम से जुड़ी सारी जानकारियाँ हटा दीं ताकि उनकी पोल न खुल जाए।
न्यूजक्लिक (NewsClick) का हिंदू-विरोधी रवैया तो पुराना है, लेकिन अब इसके चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से रिश्तों की परतें खुल रही हैं। 2023 में ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया कि नेविल रॉय सिंघम के नेतृत्व में संस्थाओं और फर्जी कंपनियों का एक ऐसा जाल बिछाया गया है, जिसका सीधा कंट्रोल चीन के पास है। 2024 में दिल्ली पुलिस ने कोर्ट में बताया कि इस पूरे खेल का ‘असली मालिक और पैसा देने वाला’ चीन ही है। आरोप है कि चीनी फंड का इस्तेमाल कश्मीर और किसान आंदोलन जैसे मुद्दों पर भारत के खिलाफ झूठ फैलाने के लिए किया गया। यह मामला अभी अदालत में चल रहा है।
2021 में ही ‘ऑपइंडिया‘ ने न्यूजक्लिक के कनेक्शनों की जाँच की थी, जिसमें उन चेहरों का पर्दाफाश हुआ था जो लगातार भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं। इसमें ‘अर्बन नक्सल’ से लेकर तीस्ता सीतलवाड़ और अभिसार शर्मा जैसे लोगों के नाम शामिल हैं। इससे साफ है कि न्यूजक्लिक एक न्यूज पोर्टल नहीं, बल्कि भारत विरोधी एजेंडा चलाने का एक अड्डा बन चुका है।
सीधी बात यह है कि नेविल रॉय सिंघम का यह काम कोई ‘समाज सेवा’ नहीं, बल्कि चीन की एक सोची-समझी साजिश है। यह नेटवर्क एनजीओ और डिजिटल मीडिया का सहारा लेकर ‘स्वतंत्र न्यूज’ के नाम पर चीन की बातों को दुनिया में फैलाता है। जैसे अमेरिका अपनी ताकत का इस्तेमाल करता है, वैसे ही चीन ने भारत और अमेरिका जैसे देशों के भीतर अपने ‘बौद्धिक मोहरे’ (Intellectual Assets) तैयार कर लिए हैं, जो अंदर ही अंदर लोकतंत्र को कमजोर करने में लगे हैं।
(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


