Homeरिपोर्टराष्ट्रीय सुरक्षाऑपरेशन कगार, नक्सलवाद पर प्रहार और 50 साल का संघर्ष: जानिए 2025 में कैसे...

ऑपरेशन कगार, नक्सलवाद पर प्रहार और 50 साल का संघर्ष: जानिए 2025 में कैसे मजबूत हुई आतंरिक सुरक्षा, शाह ने लिखी लाल आतंक के खात्मे की पटकथा

औपचारिक घोषणा भले ही 2026 में हो, लेकिन हकीकत यह है कि 2025 में ही नक्सलवाद की हार तय हो चुकी थी। यह लड़ाई अब अंतिम दौर में है। कई नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर दिया, तो कई मारे गए। ये सरकार की बड़ी उपलब्धि है।

जब अमित शाह ने सार्वजनिक रूप से 31 मार्च 2026 को नक्सलवाद के खात्मे की समयसीमा तय की, तो यह कोई नारा या राजनीतिक दावा नहीं था। यह एक स्पष्ट डेडलाइन थी। डेडलाइन तभी तय की जाती है जब जमीन पर नतीजे साफ दिखने लगते हैं और लड़ाई जीत की ओर अंतिम चरण में पहुँच जाती है।

नक्सलवाद भारत की सबसे लंबी आंतरिक सुरक्षा चुनौती रही है, जो करीब 50 साल तक चली। कई सरकारें बदलीं, बड़े वन क्षेत्र नक्सलियों के गलियारे के नाम से जाने गए और लंबे समय तक सरकार का लक्ष्य नक्सलवाद को खत्म करने से ज्यादा उसे नियंत्रित करना रहा। पहले मुठभेड़, बातचीत और हिंसा कम करने पर जोर दिया जाता था। जीत की बात बहुत संभलकर की जाती थी। लेकिन 2025 में यह सोच पूरी तरह बदल गई।

साल 2025 सिर्फ लाल आतंकियों के साथ मुठभेड़ों की संख्या बढ़ने का साल नहीं था, बल्कि यह नक्सलवाद को व्यवस्थित तरीके से तोड़ने का साल बना। नक्सल संगठन की वरिष्ठ नेतृत्व संरचना टूट गई, उनके सुरक्षित इलाके खत्म हो गए, भर्ती तंत्र कमजोर पड़ गया और लड़ाकों का मनोबल पूरी तरह गिर गया। कई जिले नक्सल प्रभाव से बाहर आ गए। सैकड़ों नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया और उनके ठिकाने एक-एक कर खत्म होते चले गए।

यह सिर्फ प्रगति नहीं थी, बल्कि एक ऐसे आंदोलन का अंतिम चरण था जो कभी खुद को शोषितों की आवाज बताता था, लेकिन अब केवल डर और हिंसा के सहारे टिका हुआ था। नक्सलवाद के खात्मे का दावा कोई राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि जमीनी आँकड़ों और घटनाओं पर आधारित निष्कर्ष है, जो सभी एक ही दिशा में इशारा करते हैं।

औपचारिक घोषणा भले ही 2026 में हो, लेकिन हकीकत यह है कि 2025 में ही नक्सलवाद की हार तय हो चुकी थी। यह लड़ाई अब पलटने वाली नहीं है। नक्सलवाद लगभग खत्म हो चुका है।

2025 ने सब कुछ क्यों बदल दिया

दशकों तक भारत की नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई एक ही चक्र में घूमती रही। किसी बड़े हमले या घात के बाद सुरक्षा बलों का अभियान चलता, फिर उसके बाद बातचीत, संघर्षविराम या राजनीतिक ठहराव आ जाता। लक्ष्य नक्सलवाद को खत्म करना नहीं, बल्कि काबू में रखना था। सड़कें सुरक्षित रहें, चुनाव शांतिपूर्ण हों, जानमाल का नुकसान कम हो और हिंसा शहरों तक न पहुँचे। नक्सलवाद को एक स्थायी बीमारी की तरह देखा गया, जिसे पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता। यह सोच 2025 में निर्णायक रूप से टूट गई।

2025 में बदलाव सिर्फ कार्रवाई की तीव्रता का नहीं था, बल्कि इरादे का था। सरकार ने नक्सलवाद को अब इलाके संभालने की समस्या नहीं माना, बल्कि एक ऐसे संगठन के रूप में देखा जिसे जड़ से खत्म करना है। प्रतीकात्मक मौजूदगी की जगह लगातार और स्थायी नियंत्रण पर जोर दिया गया। कुछ दिनों या हफ्तों के लिए नहीं, बल्कि महीनों तक। जो जंगल पहले माओवादी ठिकाने माने जाते थे, वहाँ अब सिर्फ छापे नहीं पड़े, बल्कि उन्हें घेरा गया, नक्शे बनाए गए और स्थायी रूप से कब्जे में लिया गया।

इस दौर में दुविधा की कोई जगह नहीं छोड़ी गई। न संघर्षविराम का दिखावा किया गया और न ही अभियानों के साथ-साथ समानांतर बातचीत चलाई गई। सुरक्षा तंत्र का संदेश साफ था। अब यह दौर जगह देने या बातचीत करने का नहीं, बल्कि पूरी जगह छीन लेने का है।

इस स्पष्टता का सीधा असर जमीन पर दिखा। स्थानीय लोगों को लगा कि सुरक्षा बल अस्थायी नहीं, बल्कि स्थायी रूप से आए हैं, जिससे खुफिया जानकारी की गुणवत्ता बेहतर हुई। नक्सली लड़ाकों को समझ आने लगा कि पहले की तरह भाग निकलने के रास्ते अब बंद हो चुके हैं।

शीर्ष नेतृत्व और जमीनी कैडर के बीच दूरी बढ़ती गई। नक्सल आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत समय का इंतजार करने की क्षमता अब उसके खिलाफ काम करने लगी। पहले नक्सलवाद सरकारों के बदलने का इंतजार कर के बचा रहता था। लेकिन 2025 में उसे एक ऐसी ताकत से टकराना पड़ा जो न रुक रही थी, न इंतजार कर रही थी, बस लगातार दबाव बनाकर उसे तोड़ती जा रही थी।

ऑपरेशन कगार और नया सुरक्षा सिद्धांत

अगर 2025 में नक्सलवाद के खिलाफ नीति बदली, तो ऑपरेशन कगार उस नीति को जमीन पर लागू करने का सबसे साफ उदाहरण बना। यह कोई एक दिन की कार्रवाई या सुर्खियाँ बटोरने वाला अभियान नहीं था। यह एक नई रणनीति का नाम बन गया लंबे समय तक चलने वाला, खुफिया जानकारी पर आधारित और बिना किसी समझौते के चलने वाला अभियान है।

ऑपरेशन कगार की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसका मकसद सिर्फ नक्सली इलाकों में घुसकर कार्रवाई करना नहीं था, बल्कि इलाके पर लंबे समय तक नियंत्रण बनाए रखना था। पहले सुरक्षा बल मुठभेड़ के बाद वापस लौट जाते थे, लेकिन अब वे गहरे जंगलों में टिककर बैठते है, जहाँ पहले पहुँचना भी मुश्किल था।

नक्सलियों के संचार तंत्र को बाधित किया गया, हथियारों के भंडार बरामद हुए, उनके आने-जाने के रास्ते बंद किए गए और ठिकानों को पूरी तरह नष्ट किया गया। जंगल, जो पहले नक्सलियों के लिए सुरक्षित ठिकाने थे, अब उनके लिए बंद क्षेत्र बन गए।

इस अभियान में एक बड़ा बदलाव यह भी था कि लक्ष्य किसे बनाया गया। पहले हमलों के बाद छोटे-छोटे नक्सली दस्तों के पीछे दौड़ा जाता था, लेकिन अब ध्यान इलाका कमांडरों, ज़ोनल नेताओं और वरिष्ठ नक्सली अधिकारियों को खत्म करने पर रहा, जो पूरे संगठन को जोड़े रखते थे।

छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और आसपास के इलाकों में नक्सलियों की ताकत सिर्फ संख्या में नहीं, बल्कि अनुशासन और नेतृत्व संरचना में थी। जैसे ही यह रीढ़ टूटने लगी, पूरा आंदोलन बिखरने लगा।

तालमेल इस रणनीति की एक और अहम कड़ी थी। केंद्रीय बल, राज्य पुलिस और विशेष जंगल युद्ध इकाइयाँ आपस में रीयल टाइम खुफिया जानकारी साझा करते हुए एक साथ काम कर रही थीं।

अब अभियान न तो संसाधनों की कमी से रुके और न ही राजनीतिक हिचकिचाहट से। जब तक नतीजा नहीं निकला, दबाव लगातार बनाए रखा गया। ऑपरेशन कगार इस नई हकीकत का प्रतीक बन गया कि सरकार अब नक्सली इलाकों में सिर्फ जाती नहीं है, बल्कि उन्हें वापस लेती है और वहाँ टिककर रहती है।

लीडरशिप का सिर कलम करना: माओवादियों की पूरी टॉप कमांड को तोड़ना

नक्सलवाद को निर्णायक गिरावट की ओर ले जाने वाली सबसे बड़ी वजह सिर्फ इलाकों का नुकसान नहीं था, बल्कि उसके नेतृत्व ढाँचे का व्यवस्थित सफाया था। दशकों तक माओवादी आंदोलन झटके सहता रहा, क्योंकि उसकी कमांड चेन सुरक्षित रहती थी। लड़ाके बदले जा सकते थे, लेकिन कमांडर नहीं। 2025 में यही समीकरण पलट गया।

लगातार चले अभियानों में एरिया कमेटी के सदस्य, ज़ोनल कमांडर और वरिष्ठ रणनीतिकार एक-एक कर खत्म किए जाने लगे। ये कोई नाम मात्र के चेहरे नहीं थे, बल्कि वही लोग थे जो हमलों की योजना बनाते थे, भर्ती चलाते थे, पैसों का प्रबंधन करते थे और अलग-अलग नक्सली दस्तों को जोड़कर रखते थे। जब इन दिमागों को हटाया गया, तो आंदोलन सिर्फ कमजोर नहीं हुआ, बल्कि लकवाग्रस्त हो गया। इसका असर तुरंत दिखा।

नेतृत्व या तो मारा गया या लगातार भागता रहा। नतीजा यह हुआ कि स्थानीय दस्तों के पास न दिशा बची, न आदेश। आपूर्ति की कड़ियाँ टूट गईं, खुफिया जानकारियाँ लीक होने लगीं और संगठन के भीतर अविश्वास बढ़ गया। कई इलाकों में नक्सली लड़ाके लड़ने के बजाय बिखर गए।

सबसे अहम बात यह रही कि संगठन के पास कोई भरोसेमंद दूसरी पंक्ति तैयार नहीं थी। पुराना नेतृत्व उम्रदराज़ हो चुका था और नए भर्ती न तो वैचारिक रूप से मज़बूत थे, न ही उनके पास जमीनी लड़ाई का अधिकार या अनुभव था। नतीजतन, जो बचा वह हथियारों से लैस लेकिन नेतृत्वहीन संगठन था।

भीड़ के बजाय कमांड ढाँचे को निशाना बनाकर, सरकार ने वह कर दिखाया जो दशकों की मुठभेड़ें नहीं कर पाईं। उसने माओवादियों की एक संगठित आंदोलन के रूप में काम करने की क्षमता ही तोड़ दी। यही वजह है कि 2025 के बाद नक्सलवाद सिर्फ पीछे नहीं हटा, बल्कि अपने आप बिखरने लगा।

सैकड़ों की संख्या में सरेंडर, सरकार का संदेश: हथियार डालो या मरो

मुठभेड़ें दबाव दिखाती हैं, लेकिन आत्मसमर्पण टूटन का संकेत होता है। 2025 में नक्सलियों के आत्मसमर्पण की संख्या किसी भी गोलीबारी से ज्यादा बोलती दिखी। छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और आसपास के इलाकों में सैकड़ों नक्सली कैडरों ने हथियार डाल दिए, जिनमें इनामी कमांडर और वरिष्ठ नक्सली नेता भी शामिल थे, जो वर्षों से संगठन के भीतर सक्रिय थे।

ये लोग कोई बाहरी समर्थक नहीं थे, बल्कि प्रशिक्षित लड़ाके और संगठनकर्ता थे, जो आत्मसमर्पण के जोखिमों को अच्छी तरह समझते थे। उन्होंने एक मुठभेड़ के डर से नहीं, बल्कि इसलिए हथियार डाले क्योंकि नेतृत्व खत्म हो चुका था, जंगलों के सुरक्षित ठिकाने टूट चुके थे और भागने के रास्ते बंद हो गए थे। आत्मसमर्पण अब एक वास्तविक और सुरक्षित रास्ता बन चुका था।

सरकार की पुनर्वास नीतियों और सुरक्षा की गारंटी ने यह साफ कर दिया कि हथियार डालना अब कोई जाल नहीं, बल्कि नई जिंदगी की शुरुआत है। सच्चाई यह है कि कोई विद्रोह सिर्फ इसलिए खत्म नहीं होता कि वह हथियारों में कमजोर पड़ गया हो। वह तब खत्म होता है, जब उसके अपने लड़ाके लड़ाई को बेकार मानने लगते हैं। 2025 में नक्सलवाद का यही मोड़ सामने आया, जब उसके अपने कैडर ही इस लड़ाई से मुंह मोड़ने लगे।

सीजफायर का शोर और सरकार ने इसे नजरअंदाज क्यों किया

जैसे-जैसे दबाव बढ़ा और माओवादी ढाँचा टूटने लगा, वैसे-वैसे संघर्षविराम की माँगें तेज होने लगीं। इन अपीलों को वामपंथी सोच वाले कुछ कार्यकर्ताओं और सिविल सोसायटी के हिस्सों ने आगे बढ़ाया, जो लंबे समय से बातचीत की वकालत करते रहे हैं। लेकिन यह कोई वास्तविक शांति पहल नहीं थी, बल्कि कमजोर पड़ चुके नक्सल आंदोलन की दबाव बनाने की रणनीति थी।

इतिहास गवाह है कि संघर्षविराम का फायदा माओवादी संगठन अक्सर फिर से संगठित होने, हथियार जुटाने और अपनी पकड़ लौटाने के लिए करते रहे हैं। इस बार सरकार ने किसी भी तरह के रोक लगाने से इनकार कर दिया, जो उसके आत्मविश्वास को दिखाता है।

बातचीत समस्या के समाधान का साधन हो सकती है, लेकिन टूटते हुए आंदोलनों को बचाने का जरिया नहीं। संघर्षविराम की माँग ठुकराकर सरकार ने साफ संदेश दिया कि यह दौर नक्सलवाद के पतन को संभालने का नहीं, बल्कि उसे पूरी तरह खत्म करने का है।

2026 में औपचारिक घोषणा होगी, युद्ध खत्म हो जाएगा

मार्च 2026 में जब सरकार आधिकारिक रूप से नक्सलवाद के अंत की घोषणा करेगी, तो वह असल जीत का नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक औपचारिकता होगी। निर्णायक बदलाव पहले ही हो चुका है। 2025 तक नक्सल आंदोलन अपना नेतृत्व, इलाकाई पकड़, भर्ती क्षमता और वैचारिक ताकत, ये चारों स्तंभ खो चुका था, जिनके सहारे ऐसे आंदोलन टिके रहते हैं।

अब जो बचा है, वह कोई संगठित ताकत नहीं, बल्कि बिखरे हुए अवशेष हैं। कभी एक सतत नक्सली क्षेत्र माने जाने वाला रेड कॉरिडोर अब अस्तित्व में नहीं है। जो जंगल पहले नक्सलियों के सुरक्षित ठिकाने थे, वहाँ अब लगातार सुरक्षा बलों की मौजूदगी है। क्रांति की अनिवार्यता का माओवादी दावा अपनी ही अप्रासंगिकता के बोझ तले ढह चुका है।

इसका मतलब यह नहीं कि बंदूकों के शांत होते ही काम खत्म हो जाता है। हिंसा से बाहर आए इलाकों में सुशासन, विकास और लंबे समय तक राजनीतिक जुड़ाव जरूरी होता है। हिंसा से पैदा हुआ खालीपन अगर स्थायी रूप से और साफ तौर पर राज्य द्वारा नहीं भरा गया, तो हालात दोबारा बिगड़ सकते हैं।

लेकिन एक निष्कर्ष अब साफ है और उस पर सवाल उठाना मुश्किल है, भारत नक्सलवाद के सिर्फ पतन को नहीं, बल्कि उसके पूर्ण समापन को देख चुका है। घोषणा भले 2026 में हो, लेकिन हर मायने में नक्सलवाद का अंत 2025 में ही हो गया था।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी टीम के ध्रुव मिश्रा की है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

Dhruv Mishra
Dhruv Mishra
Dhruv Mishra is a researcher and writer specializing in Indian politics and policy analysis. With a background in data-driven storytelling, he explores elections, governance, and India’s role in global affairs.

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

‘बकरीद पर हिंदुओं की कुर्बानी देने लगे कट्टरपंथी…’ सूर्या को चाकू घोंपने का Video वायरल, गाजियाबाद पुलिस ने 3 को किया गिरफ्तार: पढ़ें- असद...

असद, नवाब, फरहान, आतिफ और सारिक समेत 5 से 6 हमलावरों ने हिंदू युवक को फोन कर बकरा हलाल दिखाने के लिए बुलाया, फिर चाकू से ताबड़तोड़ वार किए।

नरेंद्र मोदी स्टेडियम से SVP स्पोर्ट्स एन्क्लेव तक: समझें भारत का स्पोर्ट्स कैपिटल बनने की दिशा में कैसे आगे बढ़ रहा है अहमदाबाद

आज जब अहमदाबाद स्पोर्ट्स कैपिटल की बात होती है, तो यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि धीरे-धीरे आकार लेती एक वास्तविकता जैसा लगता है।
- विज्ञापन -