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कॉन्ग्रेस से जुड़े वकील मोहम्मद अली खान ने X यूजर्स से डिलीट करवाए पोस्ट: जानिए क्यों कोर्ट को नहीं देना चाहिए था यह आदेश

ऑपइंडिया ने 6 अप्रैल को प्रकाशित अपने लेख को दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा जारी एकतरफा अंतरिम आदेशके अनुपालन में हटा दिया है। यह मुकदमा कॉन्ग्रेस से जुड़े वकील मोहम्मद अली खान और उनकी बीवी द्वारा दायर मानहानि याचिका के तहत आया है।

ऑपइंडिया ने 6 अप्रैल को मेटा इंडिया की पब्लिक पॉलिसी टीम के बारे में प्रकाशित अपना लेख हटा दिया है। यह कदम लॉ फर्म शेरगिल, होडा एंड नासिर द्वारा उनके मुवक्किलों-कॉन्ग्रेस से जुड़े अधिवक्ता मोहम्मद अली खान और उनकी बीवी प्रियंका राव खान (मेटा की पूर्व कर्मचारी) की ओर से दायर मुकदमे के बाद उठाए गए कानूनी कदमों के तहत उठाया गया है।दिल्ली उच्च न्यायालय ने 15 अप्रैल 2026 को इस मामले CS(OS) 318/2026 में एक अंतरिम रोक का आदेश जारी किया था।

हम यह लेख इसलिए नहीं हटा रहे हैं कि हमें अपनी रिपोर्टिंग के सही होने पर कोई शक है, बल्कि इसलिए हटा रहे हैं क्योंकि हम अदालत के आदेशों और कानूनी प्रक्रिया का सम्मान करते हैं (जो आदेश तीसरे पक्षों पर भी लागू होते हैं)। हालाँकि, हम अपने पाठकों को अदालत के आदेशों और अपने लेख के उन बुनियादी तथ्यों के बारे में बताना चाहते हैं, जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारियों पर आधारित थे और आज भी वो सच हैं।

मुकदमे की पृष्ठभूमि

भारत के सर्वोच्च न्यायालय में लगभग दो दशकों के अनुभव वाले कॉन्ग्रेस से जुड़े एक अधिवक्ता मोहम्मद अली खान और उनकी बीवी, वादी संख्या 2, जो मेटा इंडिया में एक पूर्व पब्लिक पॉलिसी मैनेजर थीं और जिन्होंने 20 जनवरी 2026 को इस्तीफा दे दिया था (प्रियंका राव-खान), ने माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष यह मुकदमा दायर किया।

केस में X कॉर्प, @Jhunjhunuwalaऔर@mujifren` हैंडल का उपयोग करने वाले दो अनाम सोशल मीडिया अकाउंट, और अज्ञात व्यक्तियों या बॉट्स का प्रतिनिधित्व करने वाले ‘जॉन डो’ को प्रतिवादी बनाया गया है। वादियों का कहना है कि उनके खिलाफ एक सुनियोजित, संगठित और ‘सांप्रदायिक रूप से भड़काने वाला’ मानहानि अभियान चलाया गया है। उन्होंने इसके लिए हर्जाने की माँग की है, साथ ही X Corp. से इन पोस्टों को हटाने और इन अनाम अकाउंट्स के पीछे के लोगों की पहचान उजागर करने के लिए अनिवार्य आदेशों की माँग की है।

15 अप्रैल 2026 को, माननीय न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने प्रतिवादियों को सूचित किए बिना पूरी तरह से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से तत्काल अंतरिम राहत के आवेदन पर सुनवाई की। कानून में इस प्रक्रिया को एकतरफा सुनवाई (ex-parte hearing) कहा जाता है। विवादित ट्वीट्स की समीक्षा करने के बाद, अदालत ने पाया कि वे प्रथम दृष्टया ‘अश्लील, अपमानजनक और सांप्रदायिक रूप से भड़काऊ’ थे।

अदालत ने एक व्यापक अंतरिम रोक जारी की, जिसमें न केवल सूचीबद्ध प्रतिवादियों, बल्कि किसी भी तीसरे पक्ष को विवादित सामग्री को प्रसारित करने से प्रतिबंधित कर दिया गया। इसी क्रम में OpIndia, जिसका शिकायत में नाम नहीं था, जिसे सुना नहीं गया था, और जिसे अदालत के समक्ष अपना संपादकीय तर्क प्रस्तुत करने का अवसर नहीं दिया गया था, को आदेश पारित होने के कुछ ही दिनों के भीतर हमारे लेख को हटाने का अनुरोध करने वाला एक कानूनी नोटिस प्राप्त हुआ।

संदर्भ के लिए, यद्यपि कानूनी पाबंदी के कारण विवादित ट्वीट्स को यहाँ दोबारा नहीं छापा जा सकता, लेकिन X पर मुख्य चर्चा यह थी कि मेटा (फेसबुक/इंस्टाग्राम) भाजपा समर्थकों और हिंदू अधिकारों की बात करने वालों के खिलाफ भेदभाव या पक्षपात करता है।

विवादित ट्वीट्स को कानूनी कारणों से यहाँ दोबारा नहीं छापा जा सकता, लेकिन X (ट्विटर) पर चल रही मुख्य चर्चा का सार यह था कि मेटा (META) भाजपा समर्थकों और हिंदू अधिकारों के मुद्दे पर पोस्ट करने वाले लोगों के खिलाफ भेदभाव या पक्षपात कर रहा था।

X पर कई लोगों ने यह आरोप लगाया था कि यह पक्षपात मेटा की पूर्व अधिकारी प्रियंका राव-खान और उनके पति मोहम्मद अली खान (जो कांग्रेस से जुड़े हैं) के प्रभाव के कारण हो रहा था। इस बात की पुष्टि मोहम्मद अली खान के उस ट्वीट से भी होती है जो आज भी उनके X अकाउंट पर मौजूद है। हालांकि, यह साफ नहीं है कि खान को X पर लिखी गई वे बातें (जो अब हटा दी गई हैं) मानहानिकारक क्यों लगीं।

यदि अदालत में सुनवाई का मौका दिया जाता, तो X पर हुई इस पूरी बातचीत को एक राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप माना जा सकता था, जिसका अदालत में कानूनी बचाव किया जा सकता था। दिलचस्प बात यह है कि कॉन्ग्रेस पार्टी खुद भी पहले कई बार मेटा (फेसबुक) पर भेदभाव और पक्षपात करने के आरोप लगा चुकी है। ऐसे में यह बात समझ से बिल्कुल परे है कि कॉन्ग्रेस से जुड़ा एक वकील उन्हीं आरोपों को अपने खिलाफ लगाए जाने पर न केवल ‘मानहानिकारक’ (बदनामी करने वाला) मान रहा है, बल्कि उसे ‘सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील’ भी बता रहा है।

कोर्ट ने वास्तविकता में क्या कहा

प्रथम दृष्टया, न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद का आदेश एक Ex-parte Ad-interim Injunction है। इसका मतलब है कि यह एक अस्थायी रोक है जो आपात स्थिति में दूसरे पक्ष को सुने बिना दी जाती है। भारतीय कानून में यह प्रक्रिया तय है और इसका मकसद पूरी सुनवाई होने तक किसी का नुकसान होने से रोकना होता है।

यहाँ अदालत के क्षेत्राधिकार के प्रयोग की आलोचना करने का कोई इरादा नहीं है; यह एक अच्छी तरह से स्थापित प्रक्रियात्मक व्यवस्था है। फिर भी, भारतीय न्यायशास्त्र में यह भी भली-भांति स्थापित है कि एकतरफा आदेश दोषसिद्धि का फैसला या अंतिम तथ्यात्मक निर्धारण नहीं होता है। पूरी सुनवाई का इंतजार करते समय अपूरणीय क्षति से बचने के लिए, यह एक जरूरी और शुरुआती (prima facie) मूल्यांकन होता है।

अदालत ने अपने आदेश के पैराग्राफ 16 में लिखा-“इस कोर्ट की प्रथम दृष्टया राय में”। इसका कानूनी मतलब यह है कि यह अदालत का शुरुआती और अनंतिम विचार है, अंतिम फैसला नहीं। अभी तक प्रतिवादियों को सुना नहीं गया है, सबूतों की जाँच या गवाहों की जिरह नहीं हुई है। इस मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई 2026 को तय है।

इस मामले में यह ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है कि प्रतिवादियों और ‘उनकी ओर से काम करने वाले’ किसी भी व्यक्ति को पैराग्राफ 21 के तहत निषेधाज्ञा (injunction) द्वारा कथित तौर पर मानहानिकारक सामग्री वितरित करने से प्रतिबंधित किया गया है। पैराग्राफ 24 में, इसे ‘जनता के किसी भी सदस्य’ को शामिल करने के लिए विस्तारित किया गया है।

ऐसे अनाम तीसरे पक्ष (जैसे पत्रकार या मीडिया संस्थान) जिन्हें अदालत में कभी सुना ही नहीं गया, उन पर इस तरह का व्यापक प्रतिबंध लगाना प्रक्रियात्मक न्याय के खिलाफ सवाल खड़ा करता है। इस तरह के व्यापक प्रतिबंध, विशेष रूप से वे जो पत्रकारिता की रिपोर्टिंग को प्रतिबंधित करते हैं, ऐतिहासिक रूप से उच्च अदालतों की आलोचना का शिकार हुए हैं, और भारत का प्रेस पर पूर्व प्रतिबंध कानूनअभी भी एक विकासशील और विवादास्पद क्षेत्र है।

OpIndia इस मामले में कोई पक्षकार (party) नहीं है। हमें अदालत को अपनी संपादकीय प्रक्रिया पेश करने का मौका नहीं दिया गया, न ही हमें कोई नोटिस दिया गया या सुना गया। वादियों के कानूनी वकील ने इस रोक के आदेश का उपयोग 17 अप्रैल 2026 को जारी कानूनी नोटिस में लेख हटाने का अनुरोध करने के औचित्य के रूप में किया। उस अनिवार्यता को हम गंभीरता से लेते हैं। हालाँकि, हम सम्मानपूर्वक यह भी बताते हैं कि क्या किसी ऐसे मीडिया आउटलेट पर स्थगनादेश लागू किया जाना चाहिए जिसने स्वतंत्र रूप से रिपोर्ट की और जो मुकदमे में प्रतिवादी नहीं था, यह विषय अभी भी बहस का मुद्दा है।

क्या हैं तथ्य

हमारा मूल लेख काफी हद तक उन तथ्यों पर आधारित था जिन्हें आसानी से जाँचा जा सकता था, साथ ही उन सोशल मीडिया पोस्टों पर जो आम जनता के लिए उपलब्ध थीं-जिसमें कांग्रेस से जुड़े वकील मोहम्मद अली खान का अपना ट्वीट भी शामिल है। हम ध्यान दिलाते हैं कि दो मुख्य स्रोत, X अकाउंट्स @Jhunjhunuwala_ और @mujifren, इस मुकदमे में प्रतिवादी के रूप में दर्ज हैं और अदालत ने स्पष्ट रूप से उन पोस्टों को हटाने का आदेश दिया है।

चूँकि वे ट्वीट्स हटा दिए गए हैं, इसलिए ऑपइंडिया (OpIndia) भी उन ट्वीट्स पर आधारित सामग्री को हटाने के लिए कानूनी रूप से अदालत के आदेश से बंधा हुआ था। हालाँकि, हमारी रिपोर्ट की कुछ जानकारियाँ प्रकाशन के समय सार्वजनिक रिकॉर्ड पर आधारित थीं और वे केवल उन अनाम अकाउंट्स पर निर्भर नहीं थीं। हम उन्हें यहाँ रिकॉर्ड के तौर पर रखते हैं

पहला तथ्य यह है कि मोहम्मद अली खान (पहले वादी) भारत के सर्वोच्च न्यायालय में वकील हैं, जो अपने X पेज पर सार्वजनिक रूप से खुद को भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस की मीडिया टीम का सदस्य लिखते हैं। यह उनका अपना घोषित जुड़ाव है, न कि आलोचकों द्वारा उन पर लगाया गया कोई ठप्पा।

दूसरा तथ्य अदालत के अपने आदेश के पैराग्राफ 2 से आता है, जिसके अनुसार वादी संख्या 2 (प्रियंका राव-खान) ने 20 जनवरी 2026 को मेटा इंडिया की पब्लिक पॉलिसी टीम छोड़ दी थी। अदालत के शब्दों में, वे ’20 जनवरी 2026 को अपने इस्तीफे तक मेटा इंडिया की पब्लिक पॉलिसी टीम (विशेष रूप से ऑनलाइन महिला और बाल सुरक्षा नीति) से जुड़ी हुई थीं।’

तीसरा तथ्य यह है कि अदालत के आदेश के पैराग्राफ 2 में ही यह भी पुष्टि की गई है कि दोनों वादी आपस में पति-पत्नी हैं। इसलिए, किसी अनाम ट्वीट के बजाय दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष वादियों की अपनी दलीलें ही इस बात को साबित करती हैं। यह जानकारी किसी नीतिगत और प्रभाव वाले पद पर रहते हुए संभावित ‘हितों के टकराव’ (Conflict of Interest) के संदर्भ में लिखे गए हमारे लेख का मुख्य हिस्सा थी।

मूल रूप से, यह जानना पूरी तरह से जनहित का विषय है कि क्या किसी बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कार्यरत एक पब्लिक पॉलिसी मैनेजर- जिसका करोड़ों भारतीय उपयोगकर्ताओं को प्रभावित करने वाले नियमों व फैसलों पर महत्वपूर्ण प्रभाव होता है- का अपने जीवनसाथी की सक्रिय राजनीतिक भूमिका के कारण कोई संभावित ‘हितों का टकराव’ है या नहीं।

यह एक ऐसा सवाल है जिसे एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में नियामक, निगरानी संस्थाएं और आम नागरिक उन संस्थानों से नियमित और सही रूप से पूछते हैं जिनका सार्वजनिक चर्चाओं पर प्रभाव होता है। यह सवाल उठाना मानहानि नहीं है, इसी को जवाबदेह पत्रकारिता (Accountability Journalism) कहा जाता है।

मोहम्मद अली खान द्वारा अस्पष्ट विक्टिम-कार्ड खेलना

अदालत ने अपनी समझ और बुद्धिमत्ता से इस मामले की सुनवाई चलने के दौरान पोस्ट्स को हटाने का एकतरफा अंतरिम आदेश (ex-parte injunction) देना उचित समझा। हालाँकि, यहाँ सबसे अधिक चिंताजनक बात मोहम्मद अली खान द्वारा किए गए दावे हैं, जिन्हें आखिरकार अदालत ने भी स्वीकार कर लिया।

X (ट्विटर) पर चल रही पूरी चर्चा इस बात के इर्द-गिर्द थी कि कैसे कॉन्ग्रेस से जुड़े एक वकील और उनकी पत्नी संभवतः META को अपने वैचारिक विरोधियों के खिलाफ पक्षपाती बनाने में भूमिका निभा रहे थे। ये आरोप उन आरोपों से अलग नहीं हैं जो कॉन्ग्रेस पार्टी खुद अतीत में मेटा पर लगा चुकी है। इसलिए, यह बात समझ से परे है कि जब वही आरोप मोहम्मद अली खान के खिलाफ लगाए जाते हैं, तो उन्हें ‘सांप्रदायिक’ मान लिया जाता है, जबकि जब खान की अपनी पार्टी (कॉन्ग्रेस) यही आरोप लगाती है, तो उसे महज एक ‘संदेह’ माना जाता है।

इसलिए, यह स्पष्ट रूप से खान द्वारा अपनी मजहबी पहचान का दुरुपयोग करने जैसा है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनकी बीवी (मेटा की पूर्व कर्मचारी) और वे खुद (उनके कॉन्ग्रेस से संबंध रखने वाले) के बारे में आम जनता कोई सवाल न उठा सके।

मूल रूप से, पीड़ित कार्ड (victim-playing) खेलकर कानूनी व न्यायिक प्रक्रिया को भटकाने के लिए धार्मिक पहचान का इस्तेमाल करना कोई नई बात नहीं है। लेकिन जहाँ तक सार्वजनिक आलोचना का सवाल है, अदालत ने इस आदेश के ज़रिए एक खतरनाक मिसाल पर अपनी मुहर लगा दी है, जिसका इस्तेमाल भविष्य में अन्य गलत इरादे वाले लोग भी कर सकते हैं।

हमें इसमें कोई हैरानी नहीं होगी अगर X पर संबंधित हैंडल द्वारा की गई अन्य असंबंधित पोस्टों का इस्तेमाल खान द्वारा अपने खिलाफ धार्मिक पूर्वाग्रह का आरोप लगाने के लिए किया गया हो, और अदालत को अपने पक्ष में यह विवादित आदेश पारित करने के लिए आश्वस्त करने हेतु खुद को पीड़ित के रूप में पेश किया गया हो।

अंतिम बात

अगर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी छापने पर भी किसी समाचार संगठन पर ऐसा प्रतिबंध लगा दिया जाता है, जिसे वह चुनौती भी न दे सका हो, तो स्वतंत्र प्रेस काम नहीं कर सकती। स्वतंत्र सार्वजनिक चर्चा ही लोकतंत्र की असली नींव है, और हर सार्वजनिक व्यक्ति की जाँच-परख हो सकती है-जिसमें खान और उनकी पत्नी भी शामिल हैं।

आज, हम कानून का पालन करते हुए इस आदेश को मान रहे हैं। लेकिन कानून के दायरे में रहते हुए, हम जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग जारी रखने और कानूनी रास्ते अपनाने का अपना अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

संस्थागत ‘हितों के टकराव’, राजनीतिक संबंधों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म चलाने से जुड़ी यह कहानी खत्म होने वाली नहीं है। यह एक ऐसी कहानी है जिसे सावधानी से, निष्पक्षता से और सभी लोगों के अधिकारों का पूरा ध्यान रखते हुए बार-बार बताया जाना चाहिए और बताया जाएगा।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

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Divyansh Tiwari
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