इस वर्ष भी 18 अगस्त की तारीख आई लेकिन इस बात पर शायद ही किसी का ध्यान गया हो कि PM मोदी ने नेताजी की इस तथाकथित पुण्यतिथि पर किसी भी प्रकार का कोई संदेश जारी नहीं किया।
चीन के साथ युद्ध की स्थिति 1960 से पहले ही पैदा हो चुकी थी। लाल किला एक्सरसाइज में यह दर्ज है। लेकिन लेफ्टिनेंट जनरल थोराट के आकलन को नेहरू ने गंभीरता से नहीं लिया।
आजाद भारत में भी राम के खिलाफ साजिशें बंद नहीं हुईं। इसके अगुवा खुद नेहरू थे। लंबे संघर्ष के बाद 5 अगस्त का वो दिन आ रहा है जब पीएम मोदी खुद मंदिर की शिला स्थापित करेंगे।
चुनाव प्रचार के लिए केरल पहुँचे नेहरू को अपने आसपास जब बहुत सारे लाल झंडे दिखे, तो उन्होंने अपने बगल में बैठे शख्स से पूछा- क्या ये चीनी जंक्शन है? इसके बाद...
"वो राजनीतिक लोग ही थे, जो ये सब नहीं चाहते थे। उसमें खासकर कॉन्ग्रेस थी, जो उस हार के पीछे की कड़वी सच्चाई लोगों को नहीं बताना चाहती थी। जिसका खामियाजा हमारी सेना ने भुगता।"
'चाऊ-माओ' के बीच अपने लिए वैश्विक छवि तलाश रहे नेहरू ने कभी सीमा पर हो रही सैनिकों की मौत को लेकर जुबान नहीं खोली। उन्हें यह स्वीकार करते दशक बीत गए कि सीमा पर कुछ चिंताजनक हो रहा है।