मैं इस बजट को सांप्रदायिक मानता हूँ। यकीन मानिए आज इस बजट के दौरान गाँधी जी होते तो इसे पास नहीं होने देते। बजट तो हर साल आता है, जाता है, लेकिन अल्पसंख्यक के मुद्दे पर सभी चुप्पी साध लेते हैं। अंत में सवाल यही कि क्या इस बजट के पैसे से गरीब का पेट भर जाता है?
आम तौर पर आप देखेंगे कि पुलवामा में 40 सीआरपीएफ जवानों को उड़ाने वाले आदिल अहमद डार जैसे आदमी के साथ भी रवीश जैसा मीडिया एक अलग तरीके से ट्रीटमेंट करता है।
सत्यान्वेषी पत्रकार रवीश कालजयी मुस्कान लेकर जरा देर से अपने प्राइम टाइम में आए लेकिन इससे पहले ही उनकी घातक टुकड़ियों के सिपहसालार ध्रुव राठी से लेकर शेहला रशीद और स्वरा भास्कर ट्विटर पर गोडसे और गो** में तालमेल बैठाते नजर आए।
दीपक चौरसिया और रवीश कुमार दोनों ही वरिष्ठ पत्रकार हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि दोनों की सैलरी अलग-अलग जगह से आती है। लेकिन हैं दोनों ही पत्रकार। शायद शाहीन बाग वाले इस बात को समझ नहीं पाए। तभी एक तरफ वो रवीश के साथ याराना रखते हैं जबकि दीपक चौरसिया के साथ मारपीट की जाती है।
रवीश ने कही, इमरान ने सुनी। रवीश की सलाह इमरान ने मानी। अब इमरान ख़ान न अख़बार पढ़ेंगे और न ही टीवी देखेंगे। उन्होंने न्यूज़ शो देखना बंद कर दिया है। रवीश लगातार अपने 'प्राइम टाइम' में कहते हैं कि टीवी न देखें और अख़बार न पढ़ें। उन्हीं अख़बारों की ख़बर वो शेयर भी करते हैं।
"अगर कॉन्ग्रेस में शीर्ष नेताओं को कोई अन्य राजनेता उनकी कुर्सी के लिए खतरा लगता है, तो वे उसे दबा देते हैं। कॉन्ग्रेस में बहुत से अच्छे नेता हैं, जिन्हें मैं बहुत अच्छे से जानता हूँ। लेकिन अगर मैंने उनका नाम सार्वजनिक तौर पर लिया तो पार्टी में उन्हें दबा दिया जाएगा।"
शुरू में रवीश जी कह रहे थे कि पुलिस केस क्यों नहीं दर्ज कर रही, पुलिस दोषियों को पकड़ क्यों नहीं कर रही है? और जब पुलिस ने उन्हें पकड़ा है तो रवीश जी ने लंबे-लंबे प्रपंची पोस्ट लिखे हैं।