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पाकिस्तान की एक्सपायर्ड मानवता, सड़े हुए राहत पैकेज के साथ खुद को बार‑बार बेनकाब करता आतंकी मुल्क

पाकिस्तान की हालिया शर्मनाक घटना श्रीलंका में सामने आई। पहले ही विनाशकारी बाढ़ और एक घातक चक्रवात के घावों से जूझ रहा वह द्वीपीय देश पाकिस्तान की 'मदद' का शिकार बना गया। जो राहत सामग्री भेजी गई, वह एक साल से भी अधिक पुरानी यानी पूरी तरह एक्सपायर्ड निकली। मानवीय सहायता का उद्देश्य संकट में फँसे लोगों को सहारा देना होता है, लेकिन पाकिस्तान ने श्रीलंका को जो भेजा, वह सहानुभूति के नाम पर पैक किया गया कचरा था।

जब भी किसी पड़ोसी देश पर कोई त्रासदी आती है तब पाकिस्तान के व्यवहार में एक अजीब सा पैटर्न दिखाई देता है। प्राकृतिक आपदा हो, मानवीय संकट हो या लोगों की समस्या- पाकिस्तान उसे मदद की तात्कालिक पुकार की तरह नहीं, बल्कि आत्म-प्रशंसा वाले प्रचार का मौका समझता है।

यह उसकी पेशेवर आदत बन चुकी है- कम से कम काम करके, अधिक अधिक जोर-शोर से उसका प्रचार करना और उम्मीद करना कि दुनिया तालियाँ बजाएगी। लेकिन हर बार सच बाहर आ ही जाता है- ठीक उसी तरह जैसे पाकिस्तान की ‘मदद’ के नाम पर भेजी गई एक्सपायर्ड दालों की बदबू।

पाकिस्तान की ताजा किरकिरी सामने आई। पहले ही विनाशकारी बाढ़ और एक घातक चक्रवात के घावों से जूझ रहा ये द्वीपीय देश पाकिस्तान की ‘मदद’ का शिकार बना। कोलंबो स्थित पाकिस्तान उच्चायोग ने गर्व से ऑनलाइन तस्वीरें पोस्ट कीं, मानो वे राहत सामग्री श्रीलंका के पीड़ितों के लिए किसी बड़ी नेकी के तौर पर भेज रहे हों।

शायद उन्हें उम्मीद थी कि हैशटैग चलेंगे, तारीफें मिलेंगी और कूटनीतिक लाभ होगा। लेकिन इसके बदले में उसे अपमान मिला। उन चमकदार ‘राहत’ पैकेटों पर साफ-साफ तारीख छपी थी- EXP: 10/2024। किसी भी PR फिल्टर से छिप नहीं सकी। राहत सामग्री एक साल से भी अधिक पुरानी, यानी पूरी तरह एक्सपायर्ड थी।

मानवीय सहायता का उद्देश्य संकटग्रस्त लोगों को सहारा देना होता है, लेकिन पाकिस्तान ने श्रीलंका को जो भेजा, वह सहानुभूति के नाम पर पैक किया गया कचरा था। जिन चीजों को फेंक देना चाहिए था, उन्हें उन लोगों को थमा दिया गया जिन्होंने पहले ही बहुत कुछ खो दिया था। यह सिर्फ लापरवाही नहीं- यह क्रूरता है।

और तो और, उच्चायोग ने खुद ही इन एक्सपायर्ड पैकेटों की तस्वीरें पोस्ट कर दीं। मतलब पाकिस्तान की पूरी कूटनीतिक श्रृंखला में किसी ने यह देखने की जहमत तक नहीं उठाई कि वे क्या भेज रहे हैं। सहानुभूति दिखाने के लिए अमीर होना जरूरी नहीं होता, लेकिन पाकिस्तान हर बार यह साबित कर देता है कि उसे परवाह ही नहीं।

यह कोई पहली गलती नहीं- पाकिस्तान की खोखली मानवता वाला पैटर्न

श्रीलंका तो बस उस किताब का नया चैप्टर है जिसे पाकिस्तान वर्षों से लिख रहा है, दिखावटी मानवता का मैनुअल। इसका आइडिया है- कुछ भी भेज दो, नैतिकता का दावा करो और उम्मीद करो कि घरेलू मीडिया और सोशल मीडिया पर लोग इसे वैश्विक सद्भावना कहेंगे। फोटो-ऑप पर आधारित यह दाँव-पेंच पाकिस्तान की पहचान बन चुकी है।

2022 में अपने दूसरे पड़ोसी देश और उस समय अपने साथ भाईचारे रखने का दावा करने वाले अफगानिस्तान को पाकिस्तान ने सड़ा हुआ गेहूं भेजा था। यह थोड़ा बहुत खराब या ‘एक्सपायरी के करीब’ नहीं था बल्कि पूरी तरह से सड़ा हुआ था।

तालिबान तक को सार्वजनिक रूप से कहना पड़ा कि यह गेहूं खाने लायक नहीं है। जब तालिबान आपको क्वालिटी कंट्रोल पर लेक्चर दे, तो समझ जाना चाहिए कि स्थिति कितनी गिर चुकी है।

हालाँकि पाकिस्तान आत्मनिरीक्षण और जवाबदेही से हमेशा ही बचता आया है। यह जाँच करने के बजाय कि ऐसी खराब सामग्री क्यों भेजी गई, पाकिस्तान ने उस अफगान प्रवक्ता को ही हटवा दिया जिसने सच बोलने की हिम्मत की थी।

पाकिस्तान की दुनिया में नैरेटिव हमेशा वास्तविकता से अधिक जरूरी होती है। अगर फैक्ट्स शर्मिंदा कर रहे हों तो तथ्यों को नहीं बल्कि आवाज को दबा दो।

भारत फोटो-ऑप नहीं, असल मदद की उठाता है जिम्मेदारी

एक ओर पाकिस्तान अपने पड़ोसियों को एक्सपायर्ड सामान भेजता है, वहीं भारत जिम्मेदारी, विश्वसनीयता और सम्मान के साथ अपनी मदद की भूमिका निभाता है।

‘पड़ोसी पहले’ नीति के तहत भारत ने दिखाया है कि असल राहत अभियान तेजी के साथ, रणनीतिक और सहानुभूलि के साथ किए जाते हैं।

श्रीलंका में भारत का चल रहा मिशन ऑपरेशन सागर बंधु अब तक 53 टन से अधिक राहत सामग्री भूमि, वायु और समुद्र मार्ग से पहुँचा चुका है- टेंट, हाइजीन किट, सर्जिकल उपकरण, दवाइयाँ, कंबल और अन्य आवश्यक राहत सामग्री, जिन्हें स्क्रैपयार्ड से नहीं, तत्काल जरूरत और संवेदना के साथ जुटाया गया।

भारत की खासियत यह है कि वह सिर्फ सामान ही नहीं भेजता पर साथ ही लोगों की जान भी बचाता है। INS विक्रांत, INS उदयगिरि, INS सुकन्या जैसे नौसैनिक जहाज और MI‑17 और चेतक जैसे हेलीकॉप्टर कठिन से कठिन इलाकों से लोगों को एयरलिफ्ट कर रहे हैं। गर्भवती महिलाएँ, बच्चे, बुजुर्ग, घायल लोग, भारत ने उन्हें आंकड़ों की तरह नहीं, इंसानी जिंदगियों की तरह देखा।

बचाए गए लोगों में कई श्रीलंकाई नागरिक थे। यात्रा के लिए गए और आपदा में फँसे कई भारतीय यात्री थे। कई जर्मनी, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया के पर्यटक भी थे और यहाँ तक कि पाकिस्तानी नागरिक भी शामिल थे। भारत ने मदद करने से पहले किसी का पासपोर्ट नहीं देखा। यही फर्क है- एक जिम्मेदार क्षेत्रीय शक्ति और एक दिखावटी शक्ति के बीच में।

इस्लामाबाद की स्ट्रेटेजी: पीड़ित को नहीं, दर्शकों को इंप्रेस करो

पाकिस्तान के लिए, मानवीय सहायता किसी उत्पाद के मार्केटिंग करने की तरह है, कुछ फोटो खिंचवा लो, दो ट्वीट कर दो, और फिर भूल जाओ। पीड़ित मायने नहीं रखते। मायने यह रखता है कि क्या यह नाटक घरेलू दर्शकों को यह विश्वास दिला सकता है कि उनका देश इस क्षेत्र में एक उदार शक्ति है।

पाकिस्तान का यह व्यवहार एक गहरी सांस्कृतिक और राजनीतिक खामी को उजागर करता है। एक ऐसी राष्ट्रीय मानसिकता जो इनकार पर टिकी है, जहाँ दिखावा हमेशा सच पर भारी पड़ता है।

पाकिस्तान लोगों से अधिक PR को तरजीह देता है; दिखावे को काम से ऊपर रखता है और हर नया संकट इस खोखलेपन को फिर से उजागर कर देता है। समस्या यह नहीं कि पाकिस्तान असली मदद नहीं कर सकता। समस्या यह है कि वह करना चाहता ही नहीं, क्योंकि उसका लक्ष्य पीड़ित को उठाना नहीं होता, उसका लक्ष्य पाकिस्तान के नाजुक अहंकार को ऊपर रखना होता है।

समानांतर में ऑपरेशन सिंदूर: भ्रम में जीने वाला एक देश

अगर पाकिस्तान मानवीय संकट के दौरान इतनी आसानी से झूठ बोल सकता है, तो सोचिए सैन्य गर्व के मामले में उसका भ्रम किस स्तर का होगा। इस साल की शुरुआत में, ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारत ने पाकिस्तान में पल रहे 9 आतंकी ठिकानों और कम से कम 11 पाकिस्तानी वायुसेना ठिकानों को निशाना बनाया।

भारत के ये हमले पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था के लिए बड़ा झटका थे, इसने उस कमजोरियों को उजागर कर दिया जिन्हें इस्लामाबाद मानने से भी कतराता है।

हालाँकि जब भारतीय रणनीतिक और रक्षा हलकों में इस ऑपरेशन की सफलता का विश्लेषण हो रहा था तब पाकिस्तान की बड़ी आबादी इस दावे का ऑनलाइन जश्न मना रही थी कि उनकी वायुसेना ने जवाबी कार्रवाई में भारत के दो लड़ाकू विमान गिरा दिए।

इस बात का कोई असल प्रमाण नहीं, कोई मलबा नहीं, कोई सैटेलाइट तस्वीर नहीं, सिर्फ डींगें और डिजिटली बनाई गईं कोर कल्पनाएँ। पाकिस्तान का सच वही होता है जो उसकी प्रोपेगेंडा मशीनें कहती हैं, चाहे सबूत हों या नहीं।

यही मानसिकता एक्सपायर्ड राहत सामग्री वाले घोटाले में भी दिखती है। हकीकत- पीड़ित देश को भेजा गया एक्सपायर्ड भोजन। पाकिस्तानी नैरेटिव- हमने दिन बचा लिया।

हकीकत- गेहूं जिसे तालिबान तक ने ठुकरा दिया। पाकिस्तानी नैरेटिव- इस्लामी मानवता के नेता। हकीकत- भारतीय लड़ाकू विमानों ने सीमा पार सटीक हमले किए। पाकिस्तानी नैरेटिव- काल्पनिक भारतीय नुकसान, काल्पनिक विश्लेषकों द्वारा प्रचार-प्रसार।

पड़ोसी याद रखते हैं

संकट के समय दुनिया भाषणों को नहीं, बल्कि यह याद रखती है कि कौन आया और कैसे आया। श्रीलंका याद रखेगा कि किस पड़ोसी ने सैन्य सहयोग के साथ उपयोगी राहत सामग्री भेजी और किसने एक्सपायर्ड बचा-खुचा सामान भेजा।

अफगानिस्तान याद रखेगा कि किसने जटिल ट्रांजिट बातचीत के बाद 50,000 टन उच्च गुणवत्ता वाला गेहूं भेजा और किसने फफूंदी लगा अनाज ‘दान’ के नाम पर थमा दिया। पाकिस्तान सिर्फ शोर मचाने के लिए सराहना चाहता है। भारत चुपचाप जिंदगियाँ बचाकर सम्मान कमाता है।

दिखावटी उदारता बनाम असल जिम्मेदारी

श्रीलंकाई लोगों को एक्सपायर्ड दवाइयों की जरूरत नहीं है। अफगानों को सड़ा हुआ गेहूं नहीं चाहिए। आपदा पीड़ित पाकिस्तान के PR थिएटर के प्रॉप्स नहीं हैं। मानवीय सहायता कोई चेकलिस्ट नहीं, न ही सोशल मीडिया कंटेंट- यह सहानुभूति का दिखावा है, जिसे पाकिस्तान नकल करने की कोशिश करता है लेकिन हर बार असफल रहता है।

भारत एक जिम्मेदार लीडर देश की तरह काम करता है- राहत, बचाव और भरोसा पहुँचाकर। पाकिस्तान एक दिखावे पर चलने वाले देश की तरह रहता है- बहाने, एक्सपायर्ड खाना और खोखली डींगें पहुँचाकर।

पड़ोसी के सबसे कठिन समय में चरित्र की परीक्षा होता है। भारत का चरित्र चमकता है। पाकिस्तान का चरित्र भी उसकी निर्यातित वस्तुओं की तरह एक्सपायरी डेट वाला है। और उस तारीख की मियाद बहुत पहले ही खत्म हो चुकी है।

ये खबर मूल रूप से जिनित जैन ने लिखी है। अंग्रेजी में इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ।

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Jinit Jain
Jinit Jain
Jinit Jain is a journalist and commentator covering politics, national security, law, and socio-cultural issues, with a focus on in-depth reporting and fact-based analysis. His work examines public policy, governance, and current affairs, bringing complex developments into clear and accessible context for readers.

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