भारत की आजादी की लड़ाई जिस एक नारे के इर्द-गिर्द लड़ी गई, वह था ‘वंदे मातरम’। यह महज एक गीत नहीं, बल्कि उस समय के क्रांतिकारियों के लिए मौत को गले लगाने का साहस और माँ भारती के प्रति समर्पण का प्रतीक था। लेकिन दुर्भाग्य देखिए, जिस गीत ने देश को एकजुट किया, उसी पर आज ‘मजहबी आजादी’ और ‘इस्लाम’ के नाम पर बवाल काटा जा रहा है।
हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा वंदे मातरम के सभी छह छंदों को अनिवार्य करने और इसे राष्ट्रगान के समान सम्मान देने के आदेश ने एक बार फिर उस पुरानी दरार को गहरा कर दिया है, जिसे कभी मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम लीग के जरिए पैदा किया था।
वंदे मातरम का नया प्रोटोकॉल और राष्ट्रभक्ति का पुनरुद्धार
केंद्र सरकार ने ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे होने के ऐतिहासिक अवसर पर राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर कड़े दिशानिर्देश जारी किए हैं। गृह मंत्रालय की नई गाइडलाइन के अनुसार, अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और सभी आधिकारिक आयोजनों में इस गीत को बजाना अनिवार्य होगा। अब तक केवल शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाते थे, लेकिन अब सभी छह छंदों का गायन अनिवार्य कर दिया गया है, जिसकी कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकंड निर्धारित की गई है।
नए नियमों के मुताबिक, यदि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत एक साथ प्रस्तुत किए जाते हैं, तो पहले ‘वंदे मातरम’ गाया जाएगा और इस दौरान उपस्थित सभी लोगों को सावधान की मुद्रा में खड़ा होना होगा। यह बदलाव केवल एक सरकारी आदेश नहीं है, बल्कि देश के प्रशासनिक ढाँचे में राष्ट्रभक्ति के उस गौरव को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है जिसे दशकों से राजनीतिक झिझक के कारण पीछे रखा गया था।
हालाँकि, व्यावहारिक दिक्कतों और अव्यवस्था से बचने के लिए सिनेमाघरों और डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान इसे बजाना अनिवार्य नहीं रखा गया है, ताकि इसकी गरिमा भी बनी रहे और जनता को असुविधा भी न हो।
मजहबी कार्ड और एकेश्वरवाद का तर्क
जैसे ही सरकार ने इस प्रोटोकॉल को सार्वजनिक किया, मुस्लिम संगठनों ने मजहबी स्वतंत्रता की दलीलें देना शुरू कर दिया। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी का कहना है कि यह आदेश उनकी मजहबी स्वतंत्रता पर हमला है। अरशद मदनी का तर्क है कि मुसलमान सिर्फ अल्लाह की इबादत करता है और इस गीत के कुछ छंद मातृभूमि को ‘देवता’ के रूप में दिखाते हैं, जो इस्लाम के एकेश्वरवाद (एक खुदा) के खिलाफ है।
वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने तो इस अधिसूचना को ‘गैर-कानूनी’ बताते हुए कोर्ट में चुनौती देने की धमकी दे डाली। विरोधी नेता जैसे शोएब जमई और इमरान मसूद अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का हवाला देते हैं। उनका कहना है कि किसी को भी अपनी आस्था के विरुद्ध कुछ गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या अपनी मातृभूमि को ‘माँ’ कहना या उसे नमन करना किसी मजहब के खिलाफ हो सकता है?
जिन्ना का वही पुराना एजेंडा: 1937 से आज तक
इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि ‘वंदे मातरम’ का यह विरोध आज की उपज नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें उसी मुस्लिम लीग के एजेंडे में हैं जिसने भारत के टुकड़े किए थे। 1908 में पहली बार मुस्लिम लीग ने इस गीत का विरोध शुरू किया था और 1937 में मुहम्मद अली जिन्ना ने इसे ‘मुस्लिम विरोधी’ घोषित कर दिया था।
उस दौर में तत्कालीन कॉन्ग्रेस नेतृत्व, विशेषकर जवाहरलाल नेहरू ने जिन्ना के कट्टरपंथ के सामने घुटने टेक दिए थे। नेहरू ने खुद नेताजी सुभाष चंद्र बोस को पत्र लिखकर स्वीकार किया था कि वंदे मातरम की भाषा और पृष्ठभूमि मुसलमानों को असहज कर सकती है।
इसी तुष्टीकरण का परिणाम था कि 26 अक्टूबर 1937 को कॉन्ग्रेस ने इस गीत के टुकड़े कर दिए और इसके केवल पहले दो छंदों को ही स्वीकार किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में संसद में इसी विश्वासघात का जिक्र करते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस ने सत्ता के लिए राष्ट्रगीत के साथ समझौता किया, जिसका अंततः परिणाम देश के विभाजन के रूप में सामने आया।
कट्टरपंथ की गहरी जड़ें और बदलती चुनौतियाँ
आज के दौर में मदनी, ओवैसी और शफीकुर्रहमान बर्क जैसे नेताओं की भाषा में जिन्ना की 1937 वाली सोच की साफ झलक मिलती है। यह विरोध अब केवल व्यक्तिगत बयानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह संस्थागत रूप ले चुका है।
देवबंद के मदरसों से फतवे जारी होना, बिहार विधानसभा में विधायकों का राष्ट्रगीत के दौरान बहिष्कार करना और संसद के भीतर वंदे मातरम को इस्लाम के खिलाफ बताना यह साबित करता है कि भारत के लोकतंत्र के भीतर भी अलगाववाद की वह खाद-पानी आज भी सक्रिय है।
इतना ही नहीं, ‘दल खालसा’ जैसे कुछ सिख संगठनों का इस विवाद में कूदना और इसे ‘हिंदुत्व थोपने’ की कोशिश बताना यह दर्शाता है कि धार्मिक पहचान को ढाल बनाकर राष्ट्र की एकता को कमजोर करने वाले तत्व एक नया मोर्चा खोलने की कोशिश कर रहे हैं।
वंदे मातरम का गौरवशाली इतिहास
‘वंदे मातरम’ का इतिहास बेहद गौरवशाली है। इसकी रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में की थी और बाद में 1882 में यह उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना। इस गीत को सार्वजनिक मंच पर पहली बार 1896 के कॉन्ग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वर दिया था। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय क्रांतिकारियों के लिए आजादी का मंत्र बन गया था।
मैडम भीकाजी कामा ने जब विदेशी धरती पर पहली बार भारतीय ध्वज फहराया, तो उस पर ‘वंदे मातरम’ ही अंकित था। लाला लाजपत राय ने इसी नाम से अखबार निकाला और न जाने कितने क्रांतिकारी इसी जयघोष को लगाते हुए हँसते-हँसते फाँसी के फँदे पर झूल गए। इसकी इसी महत्ता को देखते हुए, 24 जनवरी 1950 को डॉ राजेंद्र प्रसाद ने इसे आधिकारिक रूप से राष्ट्रगान (जन गण मन) के समान ही संवैधानिक दर्जा देने की घोषणा की।
सोच का वही पुराना और खतरनाक ढाँचा
यह पूरी स्थिति एक कड़वा और ठोस सच सामने लाती है कि आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी भारत के भीतर एक ‘मिनी मुस्लिम लीग’ वाली मानसिकता फल-फूल रही है। मुस्लिम लीग की जो बुनियादी सोच 1908 या 1937 में थी कि ‘हमारी मजहबी पहचान राष्ट्र के प्रतीकों से ऊपर है’, वही सोच आज के कट्टरपंथी संगठनों में भी साफ दिखती है।
जब प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में खड़े होकर 121 बार ‘वंदे मातरम’ का जयघोष किया, तो वह केवल एक चुनावी संबोधन नहीं था, बल्कि उन ताकतों को सीधा जवाब था जिन्होंने तुष्टीकरण की राजनीति के दम पर राष्ट्रगीत को शर्मिंदगी का विषय बना दिया था।
संविधान के आर्टिकल 25 की दुहाई देकर मजहबी आजादी की बात करने वाले ये लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि जिस मिट्टी ने उन्हें पहचान दी, उसी मिट्टी की वंदना से उन्हें परहेज क्यों है? ‘वंदे मातरम’ का सीधा सा अर्थ है ‘माँ, मैं तुझे नमन करता हूँ’। अगर किसी को अपनी जन्मभूमि को प्रणाम करने में अपना खुदा खतरे में नजर आता है, तो समस्या मजहब में नहीं बल्कि उस कट्टरपंथी व्याख्या में है जो राष्ट्रवाद को मजहब के चश्मे से देखती है।
जिन्ना ने जो विभाजनकारी बीज बोया था, आज की कट्टरपंथी ताकतें उसे ही सींच रही हैं। यह इस बात की पुष्टि करती है कि इन तत्वों की सोच में न तो पहले कोई परिवर्तन आया था और न ही भविष्य में आने की कोई संभावना है, क्योंकि उनकी प्राथमिकता भारत की अखंडता से ज्यादा अपनी संकुचित मजहबी पहचान को बनाए रखने में है।


