कुछ दिनों पहले की ही बात है जब जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुआ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा सरकार की खूब तीखी आलोचना हुई। सरकार ने भी अपने स्तर से इसका जवाब दिया, यही एक स्वस्थ लोकतंत्र में होता है।
पर, जब राजनीतिक विरोध का स्तर भगवान राम और माता सीता तक पहुँच जाए, जब संसद परिसर में राम और सनातन को लेकर नौटंकी की जाए और कॉन्ग्रेस के नेता पूछने लगें कि ‘मोदी की सीता कौन हैं?’ तो सवाल इससे आगे का हो जाता है। सवाल यह हो जाता है कि आखिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था को इतना आसान निशाना क्यों समझ लिया गया है?
कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी का हालिया बयान पढ़िए। राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का संदर्भ लेते हुए उन्होंने कहा कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंदिर में पूजा कर रहे थे, तब उन्हें ‘मोदी की सीता’ दिखाई नहीं दीं और फिर सवाल किया कि ‘राम की सीता कौन थीं और मोदी की सीता कौन हैं’।
Delhi: On Ram Temple donation row, Congress MP Pramod Tiwari says, Now, many things are auspicious… Even when Lord Ram performed the Ashwamedha Yajna, he had a stone idol of Goddess Sita made and placed beside him before performing it. Now, I kept looking when PM Modi was… pic.twitter.com/Ll7bSEyna4
— IANS (@ians_india) August 2, 2026
31 जुलाई 2026 को संसद परिसर में राहुल गाँधी, पप्पू यादव और समाजवादी पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद समेत विपक्षी नेताओं ने राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के मुद्दे को लेकर एक नौटंकी। इसमें साधुओं को चोर दिखाया गया, सनातन का जमकर अपमान किया गया। इसके बाद राहुल गाँधी, पप्पू यादव तथा अवधेश प्रसाद के खिलाफ FIR तक की गई है।
सवाल मंदिर के चंदे को चुराने वालों को बचाने का कतई नहीं है, उन पर कार्रवाई हो रही है और कठोर होनी चाहिए। लेकिन भ्रष्टाचार के आरोप की जाँच और भगवान राम से जुड़े प्रतीकों को राजनीतिक तमाशे में बदल देने एक बात नहीं हो सकती है।
और इसी के ठीक बाद प्रमोद तिवारी का यह बयान सामने आता है। इसलिए यह सवाल उठता है कि क्यों प्रधानमंत्री पर राजनीतिक हमला करने के लिए कॉन्ग्रेस के नेताओं को भगवान राम और माता सीता से जुड़े प्रतीकों का इस्तेमाल करना जरूरी लगता है? क्या हिंदुओं की सहिष्णुता को हर बार उनकी कमजोरी मानकर, उनके प्रतीकों पर वोटों के लिए हमले किए जाते रहेंगे?
राम मंदिर पर कॉन्ग्रेस का 2024 वाला रुख भी याद रखिए
यह इतिहास भी ज्यादा पुराना नहीं है। 2024 में अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा होने वाली थी। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गाँधी को भी निमंत्रण मिला था। कॉन्ग्रेस ने समारोह में शामिल न होने का निर्णय लिया और अपने आधिकारिक बयान में प्राण प्रतिष्ठा समारोह को भाजपा और आरएसएस का ‘राजनीतिक प्रोजेक्ट’ तक बता दिया था।
राहुल गाँधी ने भी जनवरी 2024 में कहा था कि 22 जनवरी का कार्यक्रम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और RSS के इर्द-गिर्द बनाया गया ‘राजनीतिक कार्यक्रम’ बन गया है और इसलिए कॉन्ग्रेस का उसमें जाना ठीक नहीं है। अब यह खुद से पूछिए, क्या राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को सिर्फ इसलिए राजनीतिक कार्यक्रम कहा जा सकता है क्योंकि प्रधानमंत्री उसमें मौजूद थे?
राम मंदिर किसी एक प्रधानमंत्री की निजी संपत्ति नहीं था। यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था से जुड़ा विषय था। लेकिन कॉन्ग्रेस को हिंदुओं की चिंता क्यों ही होनी लगी। हम कैसे भूल सकते है, यह वही कॉन्ग्रेस है जिसने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर भगवान राम को काल्पनिक तक बता दिया था। अब जब लगता है कि चंदा चोरी के नाम पर बीजेपी को घेर लेंगे तो राम भक्त बन गए लेकिन उसमें भी भगवान का अपमान ही किया।
आप खुद से एक सवाल करके देखिए, यदि किसी नेता को किसी अन्य मजहब के प्रतीक को लेकर इसी तरह का व्यंग्य करना हो, तो क्या वही राजनीतिक दल और वही नेता कर सकते हैं? इसका सीधा जवाब है, नहीं। फिर हिंदू धर्म के साथ यह सुविधा क्यों है?
भारत का हिंदू समाज हजारों वर्षों से अपनी आस्था, परंपरा और संस्कृति को लेकर जीता आया है। उसने बहुत कुछ सहा है, बहुत कुछ देखा है और फिर भी अपने देवताओं को लेकर उसके भीतर श्रद्धा बनी रही है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी भावनाओं की कोई कीमत नहीं।
भगवान राम किसी एक पार्टी की संपत्ति नहीं हैं। माता सीता किसी चुनावी पोस्टर की पात्र नहीं हैं। इसीलिए भाजपा समर्थक से लेकर कॉन्ग्रेस समर्थक तक, हर हिंदू को यह अधिकार है कि वह अपने आराध्य के बार-बार ऐसे अपमान पर सवाल करे।
यदि कॉन्ग्रेस को नरेंद्र मोदी से समस्या है तो PM मोदी पर राजनीतिक हमला करें। यदि भाजपा की नीतियों से समस्या है तो नीतियों पर हमला करे। लेकिन भगवान राम को PM मोदी से जोड़कर, माता सीता को राजनीतिक तंज बनाकर और सनातन को राजनीतिक गाली की तरह इस्तेमाल करके आखिर कॉन्ग्रेस हासिल क्या करना चाहती है?
भगवान राम की सबसे बड़ी पहचान ही मर्यादा है। और विडंबना देखिए कि उन्हीं भगवान राम का नाम लेकर राजनीति करने वाले ये कॉन्ग्रेसी और विपक्षी हर दिन मर्यादा की सीमा पार करने लगते हैं।


