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डीप स्टेट से दूतावास तक… इस्लामी कट्टरपंथियों की आड़ में भारत को घेर रहे पश्चिमी देश, टैरिफ के बाद ‘टेरर’ को बनाया हथियार: जानें PM मोदी कैसे तोड़ रहे चक्रव्यूह

भारत के विकास की गाड़ी को पटरी से उतारने और अपना पिछलग्गू देश बनाने के लिए अमेरिका लगातार प्रयासरत है। भारत पर 25 फीसदी टैरिफ के बाद रूस से ऑयल मँगाने के नाम पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाकर भारतीय अर्थव्यवस्था को गहरा झटका दिया गया। भारत के अंदर असंतोष को हवा देने के लिए फंडिंग की गई। किसान आंदोलन से लेकर महिला पहलवान आंदोलन तक के विदेशी फंडिंग की बात सामने आई। इतना ही नहीं एक के बाद एक पड़ोसी देशों में ‘भारत विरोध’ का माहौल डीप स्टेट, चीन और अमेरिका बना रहा है।

हिन्दुओं और भारत विरोध की राह पर बांग्लादेश

मोहम्मद यूनुस का बांग्लादेश हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा और इस्लामी कट्टरता के तांडव का पर्याय बन गया है। जमात ए इस्लामी की इसमें अहम भूमिका है। छात्र संगठनों, धार्मिक नेटवर्क और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से लगातार भारत के खिलाफ नैरेटिव गढ़ी जा रही है। 85 साल का मोहम्मद यूनुस सत्ता की भूख मिटाने के लिए पााकिस्तान से लेकर अमेरिका तक का कठपुतली बना हुआ है। कट्टरपंथियों का नंगा नाच हो रहा है। हिन्दुओं के खिलाफ नफरत चरम पर है।

दो साल में बांग्लादेश में दो बार राष्ट्रव्यापी हिंसा और आगजनी हुई, जिसके टारगेट पर हिन्दू रहे। कट्टरपंथियों का युवा चेहरा उस्मान हादी की हत्या के बाद भारत के खिलाफ माहौल बनाया गया। रैलियों में कट्टरपंथियों से लेकर बांग्लादेश के पूर्व सैन्य अधिकारी तक भारत के ‘सेवन सिस्टर्स’ को अलग करने की धमकी दे चुके हैं।

अमेरिका का दोगलापन उजागर

इस्लामी कट्टरपंथियों ने जिस बेदर्दी से हिंदू युवक दीपू दास की हत्या की और उसके शव को फाँसी पर लटकाया और आग लगा दी। वह हिन्दुओं में दहशत फैलाने के लिए काफी था। लेकिन दीपू दास की विभत्स हत्या पर अमेरिका ने चुप्पी साध ली, जबकि हादी की हत्या पर दुख जताया। इससे अमेरिका का दोगलापन छलकता है। सभी जानते हैं कि हादी भारत का मुखर विरोधी था। उसकी मौत पर उसके ‘इंकलाब मंच’, जिसका वह प्रवक्ता था, ने साफ कहा था कि भारतीय वर्चस्व के संघर्ष में अल्लाह ने महान क्रांतिकारी उस्मान हादी को ‘शहीद’ के रूप में स्वीकार किया है। इसके बावजूद अमेरिकी दूतावास ने कहा कि हम ‘हादी के परिवार, उनके दोस्तों और उनके समर्थकों के प्रति गहरी संवेदना’ व्यक्त करते हैं।

यही हाल जर्मनी, ब्रिटेन जैसे कई यूरोपीय देशों का भी रहा। जर्मन दूतावास ने हादी की मौत पर बांग्लादेश के राष्ट्रीय शोक के मौक़े पर शनिवार को झंडा झुका दिया।

दूतावास ने एक्स पर लिखा, “शरीफ उस्मान हादी के निधन पर राष्ट्रीय शोक दिवस के दौरान बांग्लादेश और उसके लोगों के साथ पूरी एकजुटता प्रदर्शित करते हुए, फ्रैंको-जर्मन दूतावास में झंडे को आधा झुका दिया गया है।” वहीं ढाका में ब्रिटिश उच्चायोग ने एक्स पर लिखा, “युवा नेता शरीफ़ उस्मान हादी के निधन से हम दुखी हैं. इस कठिन समय में हम उनके परिवार, मित्रों और समर्थकों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हैं.”

बांग्लादेश में 2024 से हिन्दुओं के खिलाफ रची जा रही साजिश

जुलाई 2024 में बांग्लादेश में पहली बार आरक्षण के खिलाफ छात्रों का आंदोलन सड़कों पर हुआ। उनकी माँग कोटे को खत्म करने की थी, लेकिन जब आंदोलन कट्टरपंथियों के हाथों में आ गया, तो ये माँग शेख हसीना को हटाने की हो गई।

कुछ दिनों में ही शेख हसीना को देश छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी और बांग्लादेश में 8 अगस्त 2024 को अचानक मुहम्मद यूनुस की एंट्री हुई और वह बांग्लादेश के मुखिया बन गए। यूनुस के सत्ता में आते ही हिंसा हिन्दुओं की तरफ घूम गया। मंदिर तोड़े जाने लगे, हिन्दुओं को नौकरियों से निकाला जाने लगा। उनकी संपत्तियों को लूटा गया और अब फिर वही हो रहा है।

शेख हसीना को हटाने में डीप स्टेट और अमेरिका का हाथ!

बांग्लादेश के सत्ता परिवर्तन में डीप स्टेट और अमेरिका का हाथ था। अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA पर दशकों से दुनिया भर में सत्ता परिवर्तन (Regime Change) की साजिश रचने और सरकारें गिराने के आरोप लगते रहे हैं।

इसकी रणनीति हमेशा यही रही है कि जिस सरकार से अमेरिकी हितों को खतरा हो, उसके खिलाफ माहौल बनाया जाए, चाहे विरोधी आंदोलनों को हवा देना हो, अलगाववाद और हिंसा भड़कानी हो, चुनाव में हस्तक्षेप करना हो, या फिर सीधे तख्तापलट और गुप्त सैन्य कार्रवाई करनी हो। 2024 में बांग्लादेश में छात्र आंदोलनों को भड़का कर प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाया गया।

हसीना ने खुद अमेरिका पर आरोप लगाया था कि उसने उन्हें इसलिए हटवाया, क्योंकि उन्होंने सेंट मार्टिन द्वीप पर अमेरिकी सैन्य अड्डा बनाने से इनकार कर दिया और बांग्लादेश की संप्रभुता पर समझौता नहीं किया। इसके बाद शेख हसीना को अपदस्थ करवा दिया गया।

यूनुस अंतरिम सरकार के मुखिया बनते ही पाकिस्तान से ‘रिश्ते सुधारने’ की बात करते हैं। वह बांग्लादेश जो अपनी आजादी की लड़ाई के दौरान पाकिस्तानी जुल्म सहे। बांग्लादेश की महिलाओं के साथ पाकिस्तानी सैनिकों ने रेप किया, बच्चों को मार डाला। वह इस्लाम के नाम पर उसी कट्टरपंथी पाकिस्तानी जमात का साथ दे रहा है।

भारत को पड़ोसियों द्वारा घेरा जा रहा

नेपाल से लेकर मालद्वीप तक में ‘भारत विरोध’ को शह दिया गया। नेपाल में जेनजी आंदोलन के दौरान भारत विरोधी बयान सामने आए। लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाल द्वारा अपने नक्शों में शामिल करने से तनाव बढ़ा। नेपाल की चीन से नजदीकी इसके पीछे माना जा रहा है।

मालदीप की मुइज्जू सरकार बनते ही ‘भारत विरोध’ का झंडा बुलंद किया। भारतीय सेना की टुकड़ी हो हटाने से लेकर कई कदम उठाए। मुइज्जू ने राष्ट्रपति बनने के बाद पारंपरिक रूप से भारत के बजाय तुर्की की अपनी पहली विदेश यात्रा की, और बाद में चीन की राजकीय यात्रा पर गए। मालदीव ने चीन के साथ सैन्य सहायता समझौते पर भी हस्ताक्षर किए। चीन पाकिस्तान के बाद छोटे-छोटे ये पड़ोसी लगातार भारत को परेशान कर रहे हैं। इनके पीछे भी अमेरिका, डीप स्टेट और चीन का हाथ है।

हालाँकि 2 साल के भीतर ही मालदीव को समझ आ गया कि उसे भारत के साथ अपने रिश्तों को सुधारना होगा। मालदीव को समझ आया कि चीन से दोस्ती की ‘कीमत’ क्या है और भारत बगैर किसी ‘कीमत’ के उसके साथ खड़ा रहा है, और जब ऐसा नहीं हुआ है तो वह संकट में पड़ा है। यही वजह है कि मोइज्जू भारत दौरे पर भी आए और रिश्तों में पड़ी खटास को दूर करने की कोशिश की।

दरअसल पाकिस्तान अमेरिका की गोद में जाकर बैठ गया है। पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ कुछ दिनों में तीन बार अमेरिका घूम कर आ चुके हैं। इस दौरान अमेरिका के मनमुताबिक समझौता कर लिया है।

यही वजह है कि अब फिलिस्तीन में हमास के खिलाफ पाकिस्तानी सेना को ‘शांति सेना’ के हिस्से के रूप में लगाए जाने की बात की जा रही है। जो पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर बांग्लादेश से रिश्ते बनाता है और वहाँ कट्टरवाद का बीज बोता है, वही पाकिस्तान हमास के खिलाफ सेना भेजने पर राजी हो जाता है। जाहिर है पाकिस्तान से राष्ट्रपति ट्रंप खुश हैं।

भारत के खिलाफ लगातार हो रही साजिश

पीएम मोदी ने भारतीय हितों को सर्वोपरि रखा है, इसलिए भारत के खिलाफ लगातार साजिश रची जा रही है। भारत को अंदर और बाहर हर तरह से घेरने की तैयारी वर्षों से की जा रही है। सीएए के खिलाफ आंदोलन, शाहीन बाग, किसान आंदोलन, महिला पहलवानों का आंदोलन सबके पीछे विदेशी फंड की बात सामने आई। इन आंदोलनों को लेकर ईडी ने साफ तौर पर पीएफआई की फंडिंग की बात की थी।

इतना ही नहीं पीएफआई से कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी के संपर्क की बात भी ईडी ने कही थी। किसान आंदोलन और महिला पहलवानों के आंदोलन के दौरान केन्द्र सरकार ने अमेरिकन अरबपति जॉज सोरोस के नेतृत्व वाला ऑपन सोसाइटी फाउंडेशन पर आंदोलन को आर्थिक मदद करने का आरोप लगाया था। आंदोलन का मकसद भारत की आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना और देश को अस्थिर करना था। किसान आंदोलन का नेतृत्व करने वाले राकेश टिकैत पर खुद उनके सहयोगियों ने भी विदेशी फंडिंग का आरोप लगाया था।

खालिस्तानियों को लगातार समर्थन दे रहा डीप स्टेट

कनाडा से ऑस्ट्रेलिया तक खालिस्तानी आतंकियों को डीप स्टेट लगातार मदद कर रहा है। यही वजह है कि इन देशों में भारत विरोध देखा जा रहा है। कनाडा में आए दिन भारत विरोधी नारे लग रहे हैं और भारतीय तिरंगे का अपमान हो रहा है।

हाल ही में डीप स्टेट से जुड़ा ऑस्ट्रिया का अर्थशास्त्री, नेता और इन्फ्लुएंसर गुंथर फेलिंगर ने भारत को टुकड़ों में बाँटने की बात कही थी। खालिस्तानी समर्थक हैंडल पर उसने आतंकवादियों को भारत को काटकर अलग देश बनाने का तरीका बताया था। वह भारत और पीएम मोदी के खिलाफ जहर उगलता रहता है।

फेलिंगर ने एक्स पर लिखा कि उसने खालिस्तान नैरिटिव एक्स हैंडल के साथ 2 घंटे तक चर्चा की कि खालिस्तान की आजादी के लिए क्या किया जाए और रूस समर्थक भारतीय नेता नरेन्द्र मोदी के चंगुल से कैसे आजाद किया जाए। हालाँकि भारत में उसका पोस्ट प्रतिबंधित कर दिया गया।

कई देशों में सत्ता पलट कर चुका है डीप स्टेट और अमेरिका

1954 में ग्वाटेमाला में ऑपरेशन PBSuccess के जरिए राष्ट्रपति जाकोबो आर्बेन्ज को गिरा दिया गया, क्योंकि उनकी जमीन सुधार नीतियों से अमेरिकी कंपनियाँ परेशान थीं। 1957-58 में इंडोनेशिया में राष्ट्रपति सुकर्णो की सरकार को अस्थिर करने के लिए CIA ने विद्रोहियों को समर्थन दिया, लेकिन ऑपरेशन फेल हुआ और अमेरिका की पोल खुल गई।

1961 में क्यूबा में फिदेल कास्त्रो को हटाने के लिए Bay of Pigs आक्रमण कराया गया, लेकिन यह भी नाकाम रहा। 1963 में वियतनाम में अमेरिकी समर्थन से राष्ट्रपति Ngô Đình Diệm के खिलाफ तख्तापलट हुआ और उनकी हत्या कर दी गई।

1973 में चिली के राष्ट्रपति साल्वाडोर अयेन्दे को हटाने के लिए CIA ने विपक्ष और सेना को समर्थन दिया, जिससे तानाशाह पिनोशे सत्ता में आया। 1979-1989 के बीच CIA ने ऑपरेशन Cyclone चलाकर अफगानिस्तान में सोवियत समर्थित सरकार के खिलाफ अरबों डॉलर से मुजाहिदीन आतंकियों को फंड किया, जिसके नतीजे में तालिबान पैदा हुआ।

समय के साथ CIA ने अपनी रणनीति बदली और खुली बगावत या सीधा तख्तापलट करने के बजाय ‘सॉफ्ट पावर’ के जरिए सरकारें गिराने का खेल शुरू किया। बिल क्लिंटन के दौर में NGO और मीडिया नेटवर्क को हथियार बनाया गया।

जॉर्ज सोरोस और उनकी संस्थाओं फोर्ड फाउंडेशन, ओपन सोसाइटी, USAID, ओमिद्यार नेटवर्क आदि के जरिए देशों में अस्थिरता फैलाई गई। भारत में भी ऐसी कोशिशें हुईं लेकिन मोदी सरकार ने इन्हें नाकाम कर दिया।

तकनीकी मोर्चे पर भी CIA सक्रिय रही 2010 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को Stuxnet वायरस से निशाना बनाया गया। सीरिया गृहयुद्ध में बशर अल-असद के खिलाफ विद्रोहियों को फंड और ट्रेनिंग दी गई और ट्रंप ने भी CIA को असद को हटाने का आदेश दिया।

2024 में असद की सरकार गिरी और अब वहाँ pro-US शराअ सत्ता में है। वेनेजुएला में भी 2020 में अमेरिकी प्राइवेट मिलिट्री और विपक्षी नेताओं की मदद से राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हटाने की कोशिश हुई, लेकिन वह पकड़ी गई।

लैटिन अमेरिका CIA का पसंदीदा निशाना रहा है। 1964 में ब्राजील के राष्ट्रपति जोआओ गौलार्ट को हटाया गया, क्योंकि उन्हें अमेरिकी हितों के खिलाफ माना जा रहा था। 2023 में फिर से ब्राजील में राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा को हटाने के लिए ‘Maidan-style uprising’ की कोशिश की गई, जिसमें बोल्सोनारो समर्थकों ने संसद और सुप्रीम कोर्ट पर हमला किया, लेकिन CIA का दाँव उल्टा पड़ गया।

राष्ट्रपति लूला अब BRICS देशों का खुला समर्थन कर रहे हैं और ट्रंप प्रशासन की नीतियों को चुनौती दे रहे हैं।

अमेरिकी टैरिफ के खिलाफ भारत नहीं झुका

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगा दिए लेकिन भारत नहीं झुका , बल्कि दृढ़ता से खड़ा रहा है। खासकर रूस से तेल खरीदने और कृषि उत्पादों के लिए बाजार खोलने जैसे मुद्दों पर अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत व्यापार के दूसरे विकल्प तलाश रहा है और आत्मनिर्भरता पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, जिससे निर्यात में वृद्धि हुई है और भारत को अमेरिकी टैरिफ से भारी नुकसान नहीं हुआ है।

भारत ने ट्रंप प्रशासन की माँगों के आगे घुटने टेकने के बजाय, अन्य देशों के साथ व्यापार समझौते किए और वैकल्पिक बाजारों की तलाश की, जिससे यह पता चला कि वह ‘बंदूक की नोक पर’ कोई समझौता नहीं करेगा और अपनी संप्रभुता और किसानों के हितों की रक्षा सबसे पहले करेगा। इस दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘डेड इकॉनोमी’ भी करार दे दिया।

इसको लेकर देश के अंदर भी मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की गई। कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने भी ट्रंप के सुर में सुर मिलाया। लेकिन भारत अंदरुनी और बाहरी दबाव के आगे नहीं झुका।

नतीजा ये रहा कि भारत की अर्थव्यवस्था की ग्रोथ (वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही (अप्रैल-सितंबर) में 8% की वृद्धि दर्ज की गई और दूसरी छमाही में 8.5 % की वृद्धि) ने ‘डेड इकॉनोमी’ बोलने वाले लोगों के चेहरे पर तमाचे जड़ दिए। यहाँ तक कि IMF ने 2025 के लिए अपने अनुमान को बढ़ाकर 6.6% और 2026 के लिए 6.2% कर दिया है। OECD ने 2025 के लिए ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 6.7% और 2026 के लिए 6.2% कर दिया है। S &P का अनुमान है कि भारत का सकल घरेलू उत्पाद वित्त वर्ष 2026 में 6.5% और 2027 में 6.7% बढ़ेगा।

भारत ने निकाला ट्रंप की टैरिफ का तोड़

भारत ने अमेरिकी टैरिफ से निपटने के लिए दूसरे विकल्प तलाशे हैं। कई देशों और देशों के समूहों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) किए। खास कर आर्थिक भागीदारी समझौते (CEPA) और आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते (ECTA) किए हैं। नवंबर 2025 में भारत का कुल निर्यात 19.4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और टैरिफ के बावजूद अमेरिका के निर्यात में 22 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।

जिन देशों और ब्लॉक के साथ समझौते हो चुके हैं, उनमें यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन देश, ओमान, मॉरीशस समेत कई अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देश शामिल हैं। वहीं यूरोपीय संघ, चिली, न्यूजीलैंड के साथ बातचीत अंतिम दौर में हैं। इनके साथ समझौता कभी भी हो सकता है।

फिलहाल भारत का 26 देशों के साथ एफटीए है और 26 देशों के साथ ही प्राथमिक व्यापार समझौता यानी पीटीए है। इसके अलावा 50 से अधिक देशों के साथ व्यापारिक वार्ता चल रही है। इसकी सफलता के बाद चीन को छोड़ कर करीब सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ भारत के व्यापार समझौते हो जाएँगे। इससे भारत का निर्यात भविष्य में तेजी से बढ़ने की संभावना है।

भारत के इन कदमों ने ही भारत को दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था बना दिया है और 2027-28 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी। इस प्रगति का श्रेय ‘मेक इन इंडिया’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ मजबूत घरेलू खपत और ‘भ्रष्टाचार मुक्त’ शासन जैसे कदमों को दिया जा रहा है, जिससे भारत की जीडीपी में तेजी से वृद्धि हुई है।

महाराष्ट्र निकाय चुनाव में महायुति का जलवा, ‘ट्रिपल इंजन’ चलाकर किया MVA का सफाया: गठबंधन की राजनीति के भी मिले सबक तो ठाकरे ब्रदर्स का निकला दम

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर सत्ताधारी महायुति ने अपनी ताकत का ऐसा प्रदर्शन किया है कि विपक्षी महाविकास आघाड़ी (MVA) की नींव ही हिल गई। रविवार (21 दिसंबर 2025) को घोषित शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों ने साफ बता दिया कि राज्य की सियासत पर बीजेपी की अगुवाई वाली महायुति का दबदबा अब जमीनी स्तर तक पहुँच चुका है।

महाराष्ट्र की कुल 288 नगर परिषदों और नगर पंचायतों में से महायुति ने 213 सीटों पर कब्जा जमाया, जिसमें बीजेपी को 129, एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 51 और अजित पवार की एनसीपी को 33 सीटें मिलीं। दूसरी तरफ MVA को महज 52 सीटों से संतोष करना पड़ा- कॉन्ग्रेस को 36, उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) को 8 और शरद पवार की एनसीपी (SP) को 8। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) तो बिल्कुल ही खाता खोलने में नाकाम रही, जीरो पर अटक गई।

यह चुनाव महज स्थानीय निकायों की जंग नहीं था, बल्कि 2024 के विधानसभा चुनावों के बाद की पहली बड़ी कसौटी था, जहाँ महायुति ने अपनी ‘ट्रिपल इंजन’ सरकार को स्थानीय स्तर पर भी मजबूत कर लिया। दो चरणों में हुए मतदान (2 और 20 दिसंबर) में कुल 246 नगर परिषदों और 42 नगर पंचायतों पर वोट पड़े, जिसमें पार्षदों की कुल संख्या 6,900 के आसपास थी।

महायुति ने न सिर्फ अध्यक्ष पदों पर 213 का कब्जा किया, बल्कि पार्षदों में भी 48% से ज्यादा (लगभग 3,300) हासिल किए। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इसे ‘रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन’ बताया, जो 2017 के 1,602 पार्षदों से दोगुना है।

लेकिन सवाल यह है कि गठबंधन की राजनीति में साथ रहकर भी MVA क्यों हारी? अलग लड़ने पर राज ठाकरे और शरद पवार जैसे दिग्गज क्यों फेल साबित हुए? और महायुति की सफलता के पीछे क्या राज था? आइए इसकी गहराई से पड़ताल करते हैं।

संगठन, रणनीति और स्थानीय मुद्दों पर पकड़ से मिली महायुति को सफलता

महायुति की जीत कोई संयोग नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति और जमीनी स्तर पर मजबूत संगठन का नतीजा है। सबसे पहले बीजेपी की संगठनात्मक ताकत को देखिए, तो बीजेपी ने 2024 विधानसभा चुनावों में 132 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी, लेकिन लोकल बॉडी में उसकी पैठ पहले से ही गहरी थी।

इस बार बीजेपी ने विदर्भ (100 में 58) और मराठवाड़ा (52 में 25) जैसे क्षेत्रों में साफ झाड़ू लगाई यानी विपक्षियों को छितर-बितर करते हुए क्लीन स्वीप की तरफ कदम बढ़ाया। बाकी जगहों पर अधिकतर उसके ही राज्य-केंद्र के सहयोगी जीते। विदर्भ में महायुति ने कुल 73 सीटें लीं, तो विपक्षी गठबंधन की कॉन्ग्रेस को चंद्रपुर जैसी एक-दो जगहों पर ही सफलता मिली।

विशेषज्ञों का मानना है कि बीजेपी का ‘मोदी फैक्टर’ यहाँ काम आया, खासकर केंद्र की योजनाओं जैसे PMAY, उज्ज्वला और जल जीवन मिशन का प्रचार स्थानीय स्तर पर प्रभावी रहा। फडणवीस की छवि ‘विकास पुरुष’ के रूप में भी काम आई, खासकर शहरी विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस से।

दूसरा बड़ा कारण रहा महायुति गठबंधन की ‘स्प्लिट स्ट्रैटेजी’। महायुति ने जहाँ जरूरी था, वहां सीट शेयरिंग की, लेकिन ज्यादातर जगहों पर अलग-अलग लड़ी। उदाहरण के तौर पर, पश्चिमी महाराष्ट्र में अजित पवार की एनसीपी ने 60 में 12 सीटें जीतीं, जहाँ शरद पवार का गढ़ माना जाता था। बारामती जैसे गढ़ में अजित की जीत ने चाचा शरद को करारा झटका दिया। तो एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने कोंकण (27 में 10) और उत्तरी महाराष्ट्र (49 में 12) में अपनी मराठी मानुस की छवि को मजबूत किया।

सोशल मीडिया के ट्रेंडिंग पोस्ट्स में लोग इसे ‘दुश्मनी का दाँव’ बता रहे हैं, जहाँ महायुति के दल एक-दूसरे से टकराए… लेकिन ये टकराव फ्रेंडली फाइट जैसी दिखी और विपक्षी गठबंधन की पार्टियों को कोई मौका तक नहीं मिला।

तीसरा स्थानीय मुद्दों पर फोकस। महाराष्ट्र के शहरी इलाकों में पानी की किल्लत, सड़कें, कचरा प्रबंधन और रोजगार जैसे मुद्दे हावी थे। महायुति ने इन्हें केंद्र-राज्य की योजनाओं से जोड़कर प्रचार किया। इसी बदौलत शहरों में बीजेपी ने 10-15% वोट शेयर बढ़ा लिया। इसके अलावा EVM और चुनाव आयोग पर विपक्ष के आरोपों के बावजूद महायुति ने ‘पारदर्शिता’ का दावा किया। हिंदुस्तान टाइम्स के एनालिसिस में कहा गया कि महायुति की जीत ‘विपक्ष के फूट’ का फायदा रही।

चौथा और अहम कारण रहा महायुति के पक्ष में युवा और महिला वोटरों का झुकाव। साल 2024 विधानसभा में महिलाओं को 33% टिकट देने का फॉर्मूला यहाँ भी चला। महिलाओं ने ‘महायुति की महिला सशक्तिकरण’ योजनाओं की तारीफ की। कुल मिलाकर महायुति की सफलता ने साबित कर दिया कि ‘ट्रिपल इंजन’ अब लोकल लेवल पर भी दौड़ रहा है। यह जीत मुंबई, पुणे जैसे नगर निगम चुनावों के लिए बूस्टर डोज जैसे है।

एकता की परीक्षा में फेल, आंतरिक कलह का शिकार रही महाविकास आघाड़ी

महाराष्ट्र के निकाय चुनावों में महाविकास आघाड़ी (MVA) की हार सिर्फ नंबरों की नहीं, बल्कि रणनीति और एकता की हार है। 2022 में सत्ता गँवाने के बाद MVA ने 2024 लोकसभा में कुछ संभलाव दिखाया था, लेकिन विधानसभा में 46% वोट शेयर के बावजूद हार गई।

अब लोकल बॉडी में 52 सीटें तक सिमट चुकी एमवीए के लिए यह खतरे की घंटी है कि कैसे वो एकजुटता से बिखरते ही निकाय चुनाव में धरातल पर आ गिरी। इन चुनावों में कॉन्ग्रेस को 36 सीटें तो मिली, लेकिन बाकी दोनों पार्टियाँ नाममात्र की लड़ाई भी नहीं लड़ पाईं। इन नतीजों के कारणों को कुछ इस तरह से समझते हैं कि…

पहला कारण रहा- गठबंधन में फूट: MVA ने सीट शेयरिंग की कोशिश की, लेकिन शिंदे और अजित गुट के गुट ने विपक्ष को नुकसान पहुँचा दिया। उदाहरणस्वरूप, जहाँ MVA ने शिंदे शिवसेना के खिलाफ लड़ा, वहां अजित NCP ने काउंटर किया। कोंकण में उद्धव की शिवसेना को महज 1 सीट मिली, जबकि शिंदे को 10। ऐसे में महाविकास आघाड़ी के लिए महायुति के एकदम विपरीत नतीजे ‘गठबंधन का कब्रिस्तान साबित हुए। वो सही जगह पर सही कॉम्बिनेशन के साथ सत्ता पक्ष को चैलेंज नहीं कर पाई

दूसरा कारण है- नेतृत्व संकट: उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) ने मराठी अस्मिता का कार्ड खेला, लेकिन ‘रिमोट कंट्रोल’ वाली उसकी छवि ने नुकसान ही किया। शरद पवार की एनसीपी (SP) को 8 सीटें मिलीं, लेकिन पश्चिमी महाराष्ट्र में अजित के सामने वे बौने साबित हुए। बारामती में शरद का ‘फेल’ होना प्रतीकात्मक है, जिसमें चाचा अपना ही गढ़ भतीजे के हाथों हार गया। हालाँकि कॉन्ग्रेस ने विदर्भ में 23 सीटें लीं, लेकिन राज्य स्तर पर उसकी कमजोर संगठन ने बाकी क्षेत्रों में नुकसान किया।

तीसरा कारण रहा- मुद्दों पर फोकस की कमी: MVA ने महँगाई, बेरोजगारी और किसान मुद्दों पर प्रचार किया, लेकिन स्थानीय स्तर पर विकास के एजेंडे में पीछे रही। टाइम्स ऑफ इंडिया के लाइव अपडेट्स में कहा गया कि विपक्ष ने EVM और पैसे के दुरुपयोग के आरोप लगाए, लेकिन सबूत न होने से जनता ने नकार दिया। मराठवाड़ा में MVA को 10 सीटें मिलीं, लेकिन BJP के 39 के आगे पूरा गठबंधन ही बौना साबित हुआ।

चौथा कारण रहा- राज ठाकरे का ‘जीरो’: महाराष्ट्र निकाय चुनाव में MNS ने अलग लड़कर क्या साबित किया? कुछ भी नहीं। मुंबई और ठाणे जैसे मराठी बहुल इलाकों में भी MNS का वोट शेयर 1% से नीचे रहा। ठाकरे का ‘माराठी मानुस’ नारा पुराना हो चुका, और युवा वोटर मोदी-फडणवीस के विकास मॉडल की ओर मुड़े। ZEE न्यूज के अनुसार, यह MNS की ‘राजनीतिक मौत’ है।

साथ रहकर हार, अलग लड़कर बेकार; कुछ ऐसा रहा MVA गठबंधन का हाल

महाराष्ट्र निकाय चुनाव के नतीजों को अगर देखें, तो ये MVA के लिए कुछ ऐसा रहा- ‘साथ में रहकर भी हार, अलग लड़े तो एकदम बेकार।’ MVA ने एकजुट होकर लड़ा, लेकिन आंतरिक खींचतान ने सब बर्बाद कर दिया। उद्धव और शरद के बीच सीट बँटवारे पर झगड़े हुए, जिससे कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता दिखा। जबकि महायुति ने ‘स्प्लिट’ रणनीति से फायदा उठाया, जहाँ उनका आपसी टकराव हुआ, वहाँ भी कुल वोट शेयर 55% रहा।

राज ठाकरे की MNS का केस अलग: 2017 में 8% वोट शेयर वाली पार्टी अब महाराष्ट्र में अपना प्रभाव खो चुकी है। मीम्स में अब राज ठाकरे को ‘जीरो वाले हीरो’ कहा जा रहा है। वहीं, शरद पवार (83 वर्षीय) की उम्र और परिवारिक फूट ने NCP(SP) को कमजोर किया। साफ है कि अजित के साथ जाने वाले मराठा वोटरों ने शरद को छोड़ दिया है। इसके ‘जनरेशनल शिफ्ट’ भी कह सकते है।

क्षेत्रवाद समझें- कहाँ किसने मारी बाजी

विदर्भ- महायुति का किला: 100 में 73 सीटें। BJP का 58 का जलवा। MVA को 23 सीटें मिली, लेकिन कॉन्ग्रेस को… बाकी खाता भी नहीं खोल पाए।

मराठवाड़ा: महायुति ने 52 में 39 सीटें जीत ली, जिसमें BJP ने 25 सीटें जीती। साथी शिंदे गुट ने 8 सीटें जीती, जबकि MVA 10 पर सिमट गई।

पश्चिमी महाराष्ट्र: यहाँ भी महायुति का जलवा रहा। 60 में 45 सीटें महायुति ने जीती, जिसमें अकेले NCP ने 12 सीटें जीतकर अपना दबदबा दिखाया। रही सही कसर सहयोगियों ने पूरी कर दी।

उत्तरी महाराष्ट्र: इस जोन में भी महायुति का जलवा रहा। कुल 49 सीटों में से 36 पर BJP-SS ने जीत दर्ज की।

कोंकण: इस इलाके की 27 में 20 सीटों पर शिवसेना-शिंदे ने जीत हासिल की। ये एकनाथ शिंदे की मातृभूमि भी है।

भविष्य में नगर निगम और विधानसभा चुनावों पर पड़ेगा असर

यह जीत महायुति को मुंबई, पुणे, BMC जैसे ब्रेन सेंटर के लिए मजबूत करेगी। वो बढ़े हुए मनोबल के साथ मैदान में उतरेगी। वहीं महाविकास आघाड़ी को विधानसभा चुनाव से पहले अपनी पूरी रणनीति को रीसेट करने की जरूरत है।

महाराष्ट्र की जनता ने सिखाए सियासत के नए सबक

महाराष्ट्र की यह जंग बता गई कि गठबंधन में एकता जरूरी है। हालाँकि बिना ठोस रणनीति के एक होकर लड़ना भी कोई फायदा नहीं दिला पाएगा। चूँकि यहीं पर महायुति ने साबित कर दिया कि ‘विभाजन’ भी जीत का हथियार हो सकता है।

वैसे हाल के विधानसभा चुनाव को छोड़कर उससे पहले का विधानसभा चुनाव (2019) देखें, जिसमें बीजेपी और शिवसेना ने अलग-अलग होकर चुनाव लड़ा था और एनसीपी-कॉन्ग्रेस को अलग-थलग करके चुनाव हरा दिया था। वो जीत इस निकाय चुनाव की जीत जैसी ही दिखती है। हालाँकि तब 4 दल आपस में लड़ रहे थे, लेकिन इस बार दलों की संख्या 6 हो गई, जिसमें सबसे मजबूत 3 दलों ने मिलकर MVA के तीन दलों की पूरी राजनीति ही बर्बाद करके रख दी।

मंदिर टूटे-घर लूटे-महिलाओं का हुआ गैंगरेप… रवीश जी, अनाप-शनाप नहीं है बांग्लादेश से आती हिंदुओं के उत्पीड़न की हजारों खबर, हादी और दीपू की हत्या को एक समान बताना बंद करिए

प्रोपेगेंडा पत्रकार रवीश कुमार को बांग्लादेश में एक बार फिर भड़की हिंसा पर चिंता सताई है। शेख हसीना की सरकार गिरने के समय फैली हिंसा को उचित ठहराने वाले रवीश कुमार इस बार कुछ अलग अंदाज में सामने आए हैं। अपनी नई वीडियो में उन्होंने शेख हसीना की सरकार गिरने के समय हुई हिंसा में हिंदुओं पर हुए अत्याचार को झुठलाया है और मीडिया पर अनाप-शनाप खबरें चलाने का आरोप लगाया है।

दरअसल, रवीश कुमार ने हाल ही में उस्मान हादी की मौत पर बांग्लादेश में भड़की हिंसा पर 18 मिनट का वीडियो अपलोड किया है। वीडियो में वह खुद को ‘निष्पक्ष’ दिखाने की पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन स्क्रिप्ट पढ़ते-पढ़ते बीच में अपना प्रोपेगेंडा उजागर कर ही देते हैं। रवीश कुमार कहते हैं, “शेख हसीना को हटाने के समय जब हिंदुओं के साथ अत्याचारों की खबरें सामने आईं। तब गोदी मीडिया में अनाप-शनाप और झूठी खबरें चलने लगीं, जिसका बांग्लादेश में विरोध भी हुआ और वहाँ की जनता हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर सतर्क हो गई।”

यहाँ रवीश कुमार शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद अगस्त 2024 से हिंदुओं पर बड़े पैमाने पर हुए हमलों को झूठी और अनाप-शनाब खबरें बता रहे हैं, जिनमें मंदिरों पर तोड़फोड़, घरों और दुकानों में आगजनी, महिलाओं के रेप और हत्याएँ शामिल रहीं। ऑपइंडिया ने इन घटनाओं की विस्तृत कवरेज की है।

रवीश कुमार को यह जानने की जरूरत है कि शेख हसीना की सरकार गिरते ही केवल 4 से 20 अगस्त 2024 के भीतर ही हिंदू अत्याचार की 2000 से अधिक घटनाएँ दर्ज हुईं। इनमें 5 हिंदू मारे गए, 157 हिंदू परिवारों के घर लूटे, 70 से अधिक हिंदू मंदिर तोड़े गए, 219 से अधिक हिंदू महिलाओं से गैंगरेप के मामले सामने आए और 78 लड़कियों का जबरन धर्मांतरण हुआ। उसी अगस्त 2024 में 4 हजार से अधिक हिंदुओं को देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

उन्हें पता होना चाहिए कि यह घटनाएँ अनाप-शनाप नहीं है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की OHCHR रिपोर्ट में भी इसे सही ठहराया गया है। रिपोर्ट में साफतौर से कहा गया है कि बांग्लादेश में शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने का जश्न मना रहे लोगों के ‘जुलूस’ के दौरान हुए। हमलावर BNP और जमात-ए-इस्लामी के कट्टरपंथी नेता थे।

इतना ही नहीं रवीश कुमार ने भारत-विरोधी उस्मान हादी को ‘उभरता छात्र नेता’ बताया है और उसे ‘उन्हें’ और ‘थे’ भाषा का प्रयोग करते हुए सम्मान दिया है। संतुलन बनाने के लिए उस्मान हादी को भारत-विरोधी बातें करने का जिक्र तो किया है, लेकिन अगले ही पल उसे सम्मानपूर्वक दर्शकों के सामने पेश किया है। यहाँ तक कि उस्मान हादी की हत्या को साजिश करार देने की भी पूरी कोशिश की, जबकि बांग्लादेश पुलिस की जाँच अब भी जारी है।

लेकिन रवीश कुमार ने इसका कहीं जिक्र नहीं किया कि इसी हादी ने पूर्वोत्तर राज्यों को बांग्लादेश का हिस्सा बनाने वाला नक्शा भी शेयर किया था। रवीश कुमार उस्मान हादी को ‘छात्र नेता’ बताकर अपने देश में भ्रष्टाचार और सही मुद्दों पर लड़ने वाला ‘सच्चा देशभक्त’ बताना भी नहीं भूले। वह हिंदू युवक दीपू चंद्र दास और इस्लामी कट्टरपंथी उस्मान हादी की हत्या को समान नजरिए से देख रहे हैं।

रवीश कुमार को यह समझना होगा कि दोनों हत्याएँ अलग हैं। दीपू चंद्र दास की निर्मम हत्या हिंदूओं पर अत्याचार का हिस्सा है, जिसमें पूरी हिंदू समाज को उदाहरण देने की कोशिश की गई है कि अगर वह बांग्लादेश में आवाज उठाएँगे तो उनका भी यही हाल किया जाएगा। जबकि उस्मान हादी की हत्या सांप्रदायिक हिंसा नहीं है, उस पर गोली चलाने वाले नकाबपोश का कोई अता-पता नहीं है। हादी के हत्यारों के भारत का हाथ होने और भारत भागने वाले दावे को भी बांग्लादेश पुलिस पहले ही खारिज कर चुकी है,।

यहाँ दिलचस्प बात यह है कि रवीश कुमार पहले मान चुके हैं कि शेख हसीना की सरकार गिरने के लिए हुए प्रदर्शनों में हिंसा फैली थी और इन प्रदर्शनकारी की पैरवी भी कर चुके हैं। लेकिन यह मानने को तैयार नहीं है कि यह हिंसा साफतौर पर हिंदू-विरोधी थी। यहाँ उन्हें मुस्लिमों को अत्याचारी और हिंदुओं को पीड़ित बताने में डर लगता है। इसमें उस्मान हादी जैसे इस्लामी कट्टरपंथ को वह ‘छात्र नेता’ का सम्मान देकर बांग्लादेश की हिंसक भीड़ का समर्थन नहीं तो और क्या कर रहे हैं?

गाय काटने से इनकार किया तो मुस्लिमों ने जनजातीय युवक की कुल्हाड़ी से कर दी हत्या, पुलिस ने हसन-हुसैन को किया गिरफ्तार: गुजरात के नवसारी का मामला

गुजरात के नवसारी जिले के डाभेल गाँव में एक हिंदू जनजातीय युवक दीपक कालिदास राठौड़ की सरेआम पिटाई कर हत्या कर दी गई। आरोप है कि यह हमला गाँव के कुछ मुस्लिम दबंगों ने किया जिनमें नाबालिग भी शामिल हैं। दावा किया गया है कि सभी आरोपित कसाईयों के परिवार से जुड़े हैं।

युवक ने एक वीडियो में बताया था कि वह कसाईयों के यहाँ काम करता था लेकिन जब उसे गाय काटने के लिए कहा गया तो उसने इनकार कर दिया। इसी वजह से उससे दुश्मनी के चलते हमला किया गया। 15 दिसंबर की शाम करीब 6:30 बजे, घर लौटते समय आरोपितों ने उसे कब्रिस्तान के पास रोककर गालियाँ दीं और कुल्हाड़ी से हमला किया।

गंभीर चोटें लगने के बाद उसे अस्पताल ले जाया गया लेकिन इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। नवसारी पुलिस ने FIR दर्ज कर आरोपितों को गिरफ्तार कर आगे की कार्रवाई शुरू कर दी है।

इलाज के दौरान दीपक की हुई मौत, FIR में लगा हत्या का आरोप

दीपक को गंभीर चोटें लगने के बाद अस्पताल ले जाया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग मौके पर जमा हो गए। मारोली पुलिस की टीम भी पहुँची और दीपक के बयान के आधार पर FIR दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की।

पुलिस ने हसन मोहम्मद एकलवाया, हुसैन शौकत एकलवाया और एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ BNS की धारा 115(2), 117(2), 352, 351(3), 54 और अत्याचार अधिनियम की धारा 3(1)(आर)(एस), 3(2)(5-ए) तथा गुजरात पुलिस अधिनियम की धारा 135 के तहत मामला दर्ज किया। बाद में दीपक की मौत हो गई और पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ हत्या की धारा भी इसमें जोड़ दी।

इस मामले में स्थानीय हिंदू संगठनों ने इलाज के दौरान दीपक का बयान वीडियो पर रिकॉर्ड किया, जो ऑपइंडिया के पास मौजूद है। वीडियो में दीपक ने बताया कि उसे इसलिए पीटा गया क्योंकि उसने आरोपितों को गाय काटने से मना किया था।

दीपक ने यह भी कहा कि आरोपित लंबे समय से उसे परेशान कर रहे थे और उसके परिवार ने पहले भी मारोली पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। दीपक ने वीडियो में यह भी बताया कि पहले भी उनके साथ मारपीट हुई थी लेकिन मारोली पुलिस उनकी शिकायत सुनने को तैयार नहीं थी और उन्हें बार-बार बाहर निकाल दिया गया।

पुलिस क्या कह रही है?

नवसारी के डीएसपी (एससी/एसटी सेल) एच बी चंदू ने ऑपइंडिया को बताया कि पीड़ित परिवार ने पहले कोई आवेदन नहीं दिया था। हाल की घटना के बाद पुलिस ने FIR दर्ज की और दीपक की मृत्यु के बाद हत्या की धाराएँ भी जोड़ी गई हैं। उन्होंने कहा कि सभी आरोपितों को पकड़ लिया गया है और नवसारी पुलिस इस मामले में औपचारिक कार्रवाई कर रही है। भविष्य में अगर और आरोपित पाए गए तो उनके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई होगी।

‘सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, दोषियों को न्याय के कटघरे में लाया जाना चाहिए’: हिंदू कार्यकर्ता

दीपक को पहले भी गाय न काटने पर पीटा गया था। उस समय उसने मीडिया को बताया था कि मुस्लिम पुरुष उसे गाय काटने के लिए दबाव दे रहे थे और मना करने पर मारपीट कर रहे थे। यह वीडियो भी ऑपइंडिया के पास मौजूद है।

दीपक की मौत के बाद उसकी पत्नी ने पुलिस पर आरोप लगाया कि वह पहले दो बार पुलिस स्टेशन जाकर शिकायत दर्ज करा चुकी थी लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की, जिससे उसके पति की हत्या हो गई।

हिंदू कार्यकर्ता जय पटेल नागराज ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा कि पुलिस ने सिर्फ तीन लोगों को आरोपित बनाया है जबकि घटना में तीन से ज्यादा लोग शामिल थे। उन्होंने कहा कि हिंदू समुदाय की माँग है कि आरोपितों को गाँव में सार्वजनिक रूप से पेश किया जाए और गुजरात में सख्त कार्रवाई की जाए।

पुलिस का कहना है कि सभी आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है और अन्य लोगों के शामिल होने को लेकर मामले की जाँच की जा रही है। नागराज ने पुलिस पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए तत्कालीन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की भी माँग की।

पहले से भी विवादों में घिरा है ये गाँव

जलालपुर तालुका के डाभेल गाँव में मुस्लिम समुदाय बहुसंख्यक है जबकि हलपति हिंदू समुदाय की आबादी बहुत कम है। गाँव के निवासी शौकत एकलवाया उर्फ शौकत दम की छवि एक कट्टर मुस्लिम की मानी जाती है। उनके खिलाफ पहले भी गौहत्या और मारपीट के कई मामले दर्ज हो चुके हैं, जिन्हें पुलिस ने भी सत्यापित किया है।

स्थानीय लोग और हिंदू कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह मुस्लिम परिवार पूरे गाँव में भय का माहौल बना रखा है और कई निर्दोष लोगों को सरेआम पीटा जाता है लेकिन कोई शिकायत दर्ज नहीं करा सकता।

डाभेल गाँव पहले भी विवादों में रहा है। 2023 में मारोली पुलिस ने अहमद मोहम्मद सुजान के घर पर छापा मारा, जो यहाँ ‘स्नैक्स सेंटर’ चला रहा था। तब पता चला कि वह लोगों को चिकन और मटन के नाम पर गोमांस से भरे समोसे बेच रहा था और पिछले चार सालों से यह काम कर रहा था। इसके अलावा, गाँव के मुसलमान और आसपास के हिंदू भी इन समोसों का खा रहे थे। पुलिस ने अहमद को गिरफ्तार कर आगे की कार्रवाई शुरू की।

वलसाड के सांसद ने पीड़ित परिवार से मुलाकात की, कार्रवाई का आश्वासन दिया

दीपक की मौत के बाद स्थानीय भाजपा नेता अस्पताल पहुँचे और पुलिस अधिकारियों से मुलाकात कर आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की। इसके बाद वलसाड से भाजपा सांसद धवल पटेल भी दाभेल गाँव में मृतक के परिवार के घर पहुँचे। उन्होंने परिवार को न्याय का भरोसा दिलाया है।

धवल पटेल ने इस मौके पर खुद को जनजातीय और दलित समुदाय का मसीहा बताने वाले नेताओं पर कड़ा हमला बोला। उन्होंने कहा कि कुछ लोग जनजातीय समुदाय के नाम पर सिर्फ राजनीति करते हैं।

उन्होंने चैतर वासावा और अनंत पटेल जैसे नेताओं का नाम लेते हुए कहा कि ये नेता आदिवासियों के नाम पर नवसारी, अंबाजी, उमरगाम जैसे इलाकों में घूमते रहते हैं लेकिन जब किसी मुस्लिम द्वारा एक जनजातीय युवक की हत्या होती है, तो ये लोग सामने तक नहीं आते। धवल पटेल ने कहा कि ऐसे नेताओं की चुप्पी की वजह सिर्फ वोट बैंक की राजनीति है और वे अपने वोट खोने के डर से इस मामले पर बोलने से बच रहे हैं।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट गुजराती में भार्गव राज्यगुरु ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)

सरकार की प्रतिबद्धता, लोगों की ‘चिंता’ और अरावली पर भ्रम: जानें- सुप्रीम कोर्ट के जिस 100 मीटर वाले फैसले पर हुआ विवाद, क्या है उसकी असली कहानी

सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक इन दिनों #SaveAravalli का मुद्दा चर्चा में है। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि कुछ ही दिनों में अरावली रेंज को ध्वस्त कर दिया जाएगा। यह विवाद सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से शुरु हुआ है और इसे लेकर लोगों के अपने तर्क हैं तो वहीं सरकार का अपना पक्ष भी है। इस खबर में अरावली से लेकर लोगों और सरकार के पक्ष और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आसान भाषा में समझेंगे।

हिमालय से भी करोड़ों वर्ष पहले मौजूद थी अरावली

अरावली केवल पहाड़ियों की एक श्रृंखला नहीं है बल्कि यह भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है। इतनी पुरानी कि जब हिमालय का जन्म भी नहीं हुआ था तो उससे करोड़ों साल पहले अरावली मौजूद थी।

भूवैज्ञानिक तथ्यों के अनुसार, अरावली पर्वतमाला की उम्र करीब 2.5 अरब वर्ष मानी जाती है। यह समय पृथ्वी के प्रारंभिक प्रीकैम्ब्रियन युग का था, जब धरती अभी स्थिर आकार ले रही थी। इसके विपरीत हिमालय अपेक्षाकृत युवा पर्वतमाला है, जिसका निर्माण लगभग 5-6 करोड़ वर्ष पहले भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों के टकराव से हुआ।

भौगोलिक दृष्टि से अरावली पर्वतमाला लगभग 670-692 किमी लंबी है। यह गुजरात से शुरू होकर राजस्थान होते हुए हरियाणा और दिल्ली तक फैली है। माउंट आबू में स्थित गुरु शिखर (1,722 मीटर) इसका सबसे ऊँचा शिखर है। दिल्ली की ‘रिज’ जिसे अक्सर राजधानी की ‘हरी दीवार’ या ‘ग्रीन लंग्स’ कहा जाता है भी अरावली का ही विस्तार है।

क्यों हमारे लिए जरूरी है अरावली?

अरावली पर्वतमाला का महत्व केवल भूगोल तक सीमित नहीं है बल्कि यह उत्तर भारत के पर्यावरण संतुलन की एक रक्षक की तरह काम करती है।

अरावली पर्वतमाला इंडो-गंगा के उपजाऊ मैदानों और थार रेगिस्तान के बीच एक प्राकृतिक दीवार का काम करती है। यदि यह पर्वतमाला न होती, तो राजस्थान का थार रेगिस्तान धीरे-धीरे पूर्व की ओर फैलकर हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक पहुँच सकता था। इसी कारण इसे मरुस्थलीकरण (Desertification) को रोकने वाली प्राकृतिक ढाल माना जाता है।

यह पर्वत श्रृंखला क्षेत्र की जलवायु को स्थिर बनाए रखने में मदद करती है। इसकी पहाड़ियाँ गर्म हवाओं की गति को नियंत्रित करती हैं, जिससे तापमान में अत्यधिक उतार-चढ़ाव नहीं होता और वर्षा भी संतुलित रहती है। अरावली का एक बड़ा योगदान जैव-विविधता के संरक्षण में भी है। इसकी पहाड़ियों और जंगलों में अनेक प्रकार के पेड़-पौधे, पक्षी और वन्य जीव पाए जाते हैं। ये जंगल न केवल पर्यावरण को संतुलित रखते हैं बल्कि आसपास के क्षेत्रों को हरा-भरा बनाए रखने में भी सहायक होते हैं।

भूजल के दृष्टिकोण से अरावली अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसकी चट्टानों और मिट्टी की संरचना वर्षा के पानी को जमीन के भीतर जाने में मदद करती है। इससे भूजल पुनर्भरण होता है और कुएँ, बावड़ियाँ व ट्यूबवेल लंबे समय तक जल से भरे रहते हैं। अरावली पर्वतमाला से ही चंबल, साबरमती और लूनी जैसी महत्वपूर्ण नदियाँ निकलती हैं, जो राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के बड़े हिस्से को जल उपलब्ध कराती हैं। ये नदियाँ कृषि, पेयजल और स्थानीय जीवन का आधार हैं।

इसके अलावा अरावली क्षेत्र खनिज संसाधनों से समृद्ध रहा है। यहाँ बलुआ पत्थर, चूना पत्थर, संगमरमर और ग्रेनाइट के साथ-साथ सीसा, जस्ता, तांबा, सोना और टंगस्टन जैसे खनिज पाए जाते हैं। इसी कारण यह क्षेत्र लंबे समय से खनन गतिविधियों का केंद्र रहा है।

हालाँकि, पिछले कुछ दशकों में पत्थर और रेत खनन ने गंभीर समस्याएँ पैदा की हैं। इससे वायु प्रदूषण बढ़ा है, जंगल नष्ट हुए हैं और वर्षा जल का जमीन में समाना कम हुआ है। इसके चलते भूजल स्तर तेजी से गिरा है और पर्यावरण संतुलन बिगड़ने लगा है।

सुप्रीम कोर्ट का वो फैसला जिससे शुरू हुआ विवाद

सोशल मीडिया से लेकर सड़कों पर अरावली के समर्थन में किया जा रहा प्रदर्शन सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद आया है। कुछ दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में माना था कि अरावली क्षेत्र में 100 मीटर से नीचे की पहाड़ियों को अपने-आप ‘जंगल’ नहीं माना जाएगा।

CJI बीआर गवई, जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस NV अंजारिया की खंडपीठ ने कहा कि ICFRE जैसे विशेषज्ञ निकाय द्वारा वैज्ञानिक मूल्यांकन के बिना नई खनन गतिविधियों को अनुमति देना पर्यावरण और पारिस्थितिकी के हित में नहीं होगा। कोर्ट ने कहा कि MPSM तैयार होने के बाद ही यह तय होगा कि किन क्षेत्रों में खनन संभव है और किन क्षेत्रों को संरक्षण की आवश्यकता है।

लॉइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, इसी फैसले में कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय द्वारा दी गई अरावली की ऑपरेशनल परिभाषा को मंजूरी दी है। इसके तहत अरावली हिल्स किसी भी ऐसे स्थलरूप (Landform) को माना जाएगा जिसकी ऊँचाई स्थानीय सतह से कम से कम 100 मीटर हो। साथ ही, परिभाषा में अरावली रेंज ऐसे दो या अधिक पहाड़ियाँ 500 मीटर की दूरी में होने को माना गया है।

इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्र को ‘सस्टेनेबल माइनिंग प्लान’ करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने केंद्र से कहा है कि खनन योग्य क्षेत्रों, पर्यावरण-संवेदी क्षेत्रों और उन क्षेत्रों की पहचान हो जहाँ खनन बैन होना चाहिए। खनन के बाद पुनर्वास और बहाली की योजना के लिए भी निर्देश दिए गए हैं। इसी दौरान कोर्ट से पूरे अरावली क्षेत्र में पूर्ण खनन प्रतिबंध की माँग की गई थी जिसे कोर्ट ने ठुकरा दिया है। कोर्ट का मानना है कि इससे अवैध खनन को बढ़ावा मिल सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिस्सा

क्या अब खत्म हो जाएगी अरावली?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद कई लोगों में डर है कि इससे खनन कारोबारियों के लिए रास्ते खुल जाएँगे। एक्सपर्ट्स का मानना है कि नई परिभाषा के बाद करीब 90% हिस्सा ‘अरावली क्षेत्र’ के दायरे से बाहर हो जाएगा। 1990 के दशक से पर्यावरण मंत्रालय ने खनन को केवल स्वीकृत परियोजनाओं तक रखने तक के नियम बनाए थे लेकिन इनका खूब उल्लंघन हुआ और अब एक्सपर्ट मान रहे हैं कि खनन को कानूनी रूप मिल सकता है।

हालाँकि, यह फैसला किसी भी तरह से अरावली में कटाई या पूरी तरह नष्ट कर देने की इजाजत नहीं देता है। कोई जमीन अगर पहले से ही वन भूमि है या किसी कानून के तहत वो संरक्षित है तो उस पर इस फैसले का कोई असर नहीं पड़ता है। वहीं, इस फैसले से राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन को जमीन की व्याख्या से जुड़ा ज्यादा ताकत मिलती है। यानि अगर जंगल के क्षेत्र को सरकार चाहे तो ‘गैर-वन क्षेत्र’ बताया जा सकता है। इसी से लोगों को डर है लेकिन सरकार इसे बेकार का डर बताकर खारिज कर रही है।

केंद्र सरकार क्या कह रही है?

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव का कहना है कि खनन को लेकर किसी भी तरह की छूट नहीं दी गई है और इसे लेकर भ्रम फैलाना बंद किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अरावली के कुल 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में मात्र 0.19% हिस्से में ही खनन की पात्रता हो सकती है।

उन्होंने कहा, “अरावली भारत के 4 राज्यों और कुल 39 जिलों में है। अरावली की याचिका 1985 से चल रही है और इसमें खनन के लिए कड़े नियम होने चाहिए हम भी इसका समर्थन करते हैं।”

भूपेंद्र यादव का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का सभी राज्यों से कहना था कि अरावली की सभी जगह एक जैसी परिभाषा होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि इसी कड़ी में 100 मीटर को माना गया है और यह ऊँचाई 1968 की रिचर्ड मर्फी स्टडी के आधार पर तय की गई है। साथ ही, भूपेंद्र यादव ने यह भी स्पष्ट किया कि इस 100 मीटर में पहाड़ी के बॉटम को भी काउंट किया जाएगा।

इसके अलावा अगर 2 पहाड़ियों के बीच में 100 मीटर का अंतर है तो वो जमीन भी अरावली रेंज मानी जाएगी। उनका कहना है कि अरावली के मौजूदा क्षेत्र का 90% हिस्सा इस परिभाषा के तहत अरावली क्षेत्र में आ गया है।

भूपेंद्र यादव ने कहा, “कुल अरावली का क्षेत्र 1.4 लाख वर्ग किलोमीटर है और अभी 39 जिलों में 217 वर्ग किलोमीटर में ही माइनिंग हो सकती है। इसके लिए भी सुप्रीम कोर्ट से अनुमित मिलती है। दिल्ली में माइनिंग की ना इजाजत है और ना ही आगे होगी। यहाँ के फॉरेस्ट रिजर्व जस के तस ही रहेंगे।”

इस विवाद पर सरकार ने स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है और सरकार की बातों को देखें-समझें तो लगता है कि जितना बखेड़ा सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर हो रहा है असल में कहानी उससे अलग है।

हिंदुओं का नरसंहार- बकवास, पाकिस्तान की पोल खोलना- प्रोपगेंडा: ध्रुव राठी की Video में जाहिलपन और मुस्लिम प्रेम ही एजेंडा

आखिरकार जर्मनी में बैठकर खुद को भारत का ‘शुभचिंतक’ होने का दावा करने वाले ध्रुव राठी ने आदित्य धर की फिल्म ‘धुरंधर’ का काउंटर वीडियो निकाल ही दिया। लोग इसी इंतजार में बैठे थे, क्या सच में? क्योंकि वीडियो पर आई लोगों की प्रतिक्रिया को देखकर तो ऐसा लगता नहीं है। काउंटर वीडियो से पहले ध्रुव राठी की हवाबाजी का भी कोई असर लोगों पर नहीं पढ़ा। लेकिन जब सोशल मीडिया पर ट्रोल हुए, तो ध्रुव राठी वीडियो पर कमेंट ऑफ करके बैठ गए।

जी हाँ, तो हम आपको बताते हैं कि आखिर ध्रुव राठी ने अपनी वीडियो में ऐसी क्या आग लगाई, जिससे उसे कमेंट ही ऑफ करने पढ़ गए। ये हम आपको इसलिए बता रहे हैं, ताकि वीडियो देखने के बाद आप ये न कहें कि जितना सोचा था, उतना तो वीडियो में कुछ नहीं था और आपका समय भी जाया न जाए।

ध्रुव राठी का अगला पेशा ‘फिल्ममेकिंग’?

‘धुरंधर’ फिल्म के काउंटर वीडियो में अगर ध्रुव राठी को लेकर बात होनी चाहिए, तो वह है उसकी फिल्ममेकिंग स्किल्स पर। क्या कॉपी किया है, वाह! वीडियो के शुरुआत में वह अपनी एक काल्पनिक ‘ऑपरेशन भवंडर’ नामक फिल्म के कुछ सीन दिखाते हैं, जो धुरंधर से ही प्रभावित है। पर वीडियो की शुरुआत फिल्म से करने का यहाँ असली मकसद देश का नेतृत्व करने वाले सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति को ‘सुरेंदर गोभी’ बुलाकर जाहिलपन के अलावा कुछ नहीं है।

और रही बात ध्रुव राठी की अपनी फिल्म की तुलना ‘धुरंधर’ से करने की, तो यह हो ही नहीं सकता। ‘ऑपरेशन भवंडर’ बनाने पर ध्रुव राठी केवल इसीलिए मजबूर हुए क्योंकि एक बार उन्होंने ही कहा था- “अगर किसी को फिल्म से दिक्कत है, तो जा बना लो अपनी मूवी और जो दिखाना है दिखाओ।”

तो ध्रुव राठी ने दिखा दिया, जो वह लोगों को दिखाना चाहते थे। हमेशा की तरह भारत का ‘शुभचिंतक’ बनते हुए सरकार को निशाना बनाना। वैसे भी उनकी फिल्म पूरी ‘नकलची’ है, तो शायद वे इस पेशे में भी केवल नकल करके ही आगे बढ़ पाएँगे। वैसे ही जैसे वो अपना यूट्यूब चैनल सरकार को कोसकर चला पा रहे हैं।

‘धुरंधर’ प्रेरित या काल्पनिक फिल्म?

ध्रुव राठी की वीडियो में आगे बढ़ेंगे तो यहाँ प्रेरित (Inspirational) और काल्पनिक (Fictional) पर ज्ञान देने की कोशिश की जाती है। ध्रुव राठी को आपत्ति होती है कि कैसे एक बॉलीवुड फिल्म सच्ची घटनाओं से प्रभावित हो सकती है और इसे ‘झूठा प्रोपेगेंडा’ करार देते हैं। क्योंकि उनके अनुसार जासूस केवल ‘टाइगर’ और ‘पठान’ फिल्मों की तरह होते हैं, जो विदेश में घूमकर केवल ‘चटपटे’ गानों पर नाचते हैं और ‘लव स्टोरी’ की आड़ में दर्शकों का मनोरंजन करते हैं। वहीं धुरंधर में जासूस का किरदार एक गंभीर व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है, जिसे देश की परवाह है और अपने टारगेट से बिल्कुल नहीं भटका है। तो यह उनके मनमुताबिक सही नहीं है।

यहाँ बहस प्रेरित और काल्पनिक को लेकर है। भारत की घटनाओं से प्रभावित फिल्म पर बात करते हुए ध्रुव राठी ‘हिटलर’ तक पहुँच जाते हैं। माना कि वह NRI हैं, लेकिन देश के मुद्दों पर बात करते हुए विदेशी उदाहरण देना कहाँ तक ठीक है? वो भी एक ऐसे नाम से, जो तानाशाही के लिए जाना जाता है जबकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है। फिर ध्रुव राठी कहते हैं कि वे भारत के ‘शुभचिंतक’ हैं।

फिल्म में कितना प्रोपेगेंडा है?

ध्रुव राठी के मुताबिक, फिल्म एक प्रोपेगेंडा है। लेकिन कितना है और कितना नहीं, यह भी वह खुद ही सेट करना चाहते हैं। प्रोपेगेंडा बताने के लिए वह एक सच्ची घटनाओं से ‘प्रभावित’ फिल्म को तथ्यों से साबित करने में लगे हैं। पाकिस्तान में जासूस भेजने पर सरकार का इनकार हो या फिल्म में रहमान डकैत की मौत का सच हो। वे इस कहानी को मीडिया के आर्टिकल्स को दिखाकर झूठ बताने की कोशिश कर रहे हैं। वो भी पाकिस्तानी मीडिया से। और दूसरी तरफ वे फिल्म के ‘प्रभावित’ होने के बावजूद उसमें दिखाई गई सच्ची घटनाओं को लेकर सवाल उठा रहे हैं।

वीडियो में वह बताते हैं कि ‘द बंगाल फाइल्स’ और ‘द ताज स्टोरी’ जैसी सच पर आधारित फिल्में इनके लिए बकवास हैं, जिनके नाम पर वे लिबरल और वामपंथी लोगों को अपनी यूट्यूब ऑडियन्स बनाने में सफलता हासिल कर चुके हैं। अब बारी है ‘धुरंधर’ से दर्शक बँटोरने की, जिसको वो खुद भी एक ‘आकर्षक’ फिल्म मानते हैं। चूँकि फिल्म दुनियाभर में 800 करोड़ से ऊपर की कमाई कर चुकी है।

मुस्लिमों को खुश करने की कोशिश

इतना ही नहीं वीडियो में मुस्लिमों को खुश करने की कोशिश की गई और हिंदुओं को निशाना बनाया गया। ध्रुव राठी ने वीडियो में दावा किया कि 1947 से अब तक हुए हमलों में हिंदू और मुस्लिम दोनों की भागीदारी है। लेकिन वह एक भी ऐसा हमला नहीं बता पाते, जिसमें हिंदू ‘आतंकवादी’ हो।

उनका कहना है कि अगर एक हिंदू ISI की मुखबिरी करे तो वो सिर्फ हिंदू है, जबकि मुस्लिम आतंकी हमले में शामिल हो तो वह पूरे मजहब की देशभक्ति पर सवाल उठाया जाता है। लेकिन ध्रुव राठी यह बताना भूल गए कि ‘आतंकी हमलों’ का मकसद ही काफिरों के खिलाफ जिहाद होता है। शायद वह भूल गए कि पहलगाम हमले में धर्म पूछकर गोली मारी गई थी।

यहाँ देशभक्ति पर सवाल क्यों न उठाया जाए? जब देश में रहते हुए एक मुस्लिम को ‘वंदे मातरम’ बोलने में आपत्ति है, जो कि एक देशभक्ति गीत है। यहाँ ध्रुव राठी का मुस्लिमों के हित में बात कर भारत के मुस्लिमों से सब्सक्राइबर्स बँटोरने का उद्देश्य दिखाता है, क्योंकि पहले से ही उनकी आधी ऑडियन्स पाकिस्तान की है।

कॉन्ग्रेस का बचाव करने का प्रयास

ध्रुव राठी की वीडियो के मुताबिक, फिल्म में दिखाया गया कि 26/11 मुंबई हमले का खुफिया इनपुट होने के बावजूद कॉन्ग्रेस सरकार ने कोई एक्शन नहीं लिया। जबकि फिल्म में तत्कालीन सरकार को लेकर बात तक नहीं की गई। यहाँ ध्रुव राठी काउंटर करने के लिए ‘मोदी सरकार’ में हुए आतंकी हमले की पहले से खुफिया इनपुट होने का दावा करते हैं, वो भी विदेशी सोर्स से।

यहाँ लोगों को यह दर्शाया जा रहा है कि देश पर आतंकी हमला होना विफलता है, जबकि यह बताना जरूरी नहीं समझते कि क्या हमलों की वजह क्या थी और करने वाला कौन था? इन्होंने यहाँ उन्होंने केवल कॉन्ग्रेस की छवि को सुधारना चुना, बिना जनता को अहम जानकारी दिए।

वीडियो के आखिर में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और जवाहरलाल नेहरू का जिक्र करने से खुद को नहीं रोक पाते हैं। उनको परेशानी हो गई कि इनका नाम आजकल संसद में ज्यादा सुनने लगा है, वह भी नैगेटिव रोल में। लेकिन पीएम मोदी को ‘सुरेंदर गोभी’ कहना उनके मुताबिक सही है। पीएम मोदी और उनकी माताजी को गाली देने वालों पर उन्होंने चुप्पी साधी। आखिर में उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी का नाम लेकर चेतावनी दी कि अगर भवंडर बन गई, तो आप क्या करेंगे? इससे साफ है कि ध्रुव राठी अपनी अधिकतर वीडियो की तरह बिना बीजेपी और पीएम मोदी का नाम लिए व्यूज नहीं बँटोर सकते हैं। यह उनकी कन्टेन्ट स्ट्रैटजी बन गई है।

क्या है ISRO का ड्रॉग पैराशूट, जिसका रेल की पटरी पर किया गया ट्रायल: जानिए मनुष्य को अंतरिक्ष से लाने वाला ये सफल परीक्षण गगनयान के लिए कितना अहम

गगनयान मिशन की सुरक्षा के लिए अहम ‘ड्रॉग पैराशूट’ का सफल परीक्षण कर इसरो ने बड़ी कामयाबी हासिल की है। यह सफलता देश के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन को भरोसेमंद और सुरक्षित बनाने की दिशा में निर्णायक कदम है। 18-19 दिसंबर 2025 को चंडीगढ़ में ये परीक्षण टर्मिनल बैलिस्टिक रिसर्च लेबोरेटरी यानी TBRL की रेल ट्रैक रॉकेट स्लेज (RTRS) पर किया गया।

‘गगनयान’ की दिशा में बड़ा कदम

गगनयान क्रू मॉड्यूल विकास के लिए ड्रॉग पैराशूट का यह क्वालिफिकेश टेस्ट है। यह परीक्षण गगनयान क्रू मॉड्यूल के डिसेलेरेशन सिस्टम यानी गति को कम करन वाली सिस्टम को विकसित करने के लिए किए गए। गगनयान क्रू मॉड्यूल में 4 तरह के कुल 10 पैराशूट शामिल हैं।

इसका मकसद मुश्किल परिस्थियों में भी ड्रॉग पैराशूट की विश्वसनीयता बनी रहे और सफलतापूर्वक क्रू मेंबर्स टचलेंडिंग कर सकें, इसके लिए की गई है। इस दौरान ये भी सामने आया कि उड़ान की स्थितियों में बदलाव के बावजूद पैराशूट मजबूत और सक्षम था। इसमें डीआरडीओ, विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र और एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट ने अहम योगदान दिया है।

भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी 2026 में बिना क्रू वाले गगनयान मिशन के पहले लॉन्च की तैयारी कर रही है।

केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह ने एक्स पर ट्वीट कर कहा कि भारत मानव स्पेस मिशन की दिशा में एक कदम और बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि ISRO ने 18-19 दिसंबर 2025 को चंडीगढ़ में TBRL की RTRS फैसिलिटी में गगनयान क्रू मॉड्यूल के लिए ड्रॉग पैराशूट डिप्लॉयमेंट क्वालिफिकेशन टेस्ट सफलतापूर्वक पूरे किए।

उन्होंने कहा कि इन टेस्टों ने अलग-अलग फ्लाइट कंडीशंस में ड्रॉग पैराशूट के परफॉर्मेंस और भरोसेमंद होने की पुष्टि करता है। यह भारत के मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन के लिए पैराशूट सिस्टम को क्वालिफाई करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

क्या है ड्रॉग पैराशूट

ड्रॉग पैराशूट छोटे कॉनिकल रिबन तरह की पैराशूट होती है, जिनका व्यास 5.8 मीटर होता है। ये क्रू मॉड्यूल के पृथ्वी पर उतरने से पहले काम करने वाले पैराशूटों में से है। इन्हें पायरो-आधारित उपकरणों (मोर्टार) के भीतर पैक किया जाता है, जो कमांड मिलने पर इन्हें बाहर निकालते हैं।

ड्रॉग पैराशूट अंतरिक्ष यान को पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने पर उसकी गति को कम करता है और उसे स्थिर करता है, ताकि बाद में मेन पैराशूट पूरी तरह सुरक्षित खुल सके और अंतरिक्ष यान की गति को और कम किया जा सके। ये प्रक्रिया अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षित लैंडिंग के लिए बेहद जरूरी है। किसी भी अंतरिक्ष यान के लिए ये प्रक्रिया सबसे जटिल मानी जाती है।

गगनयान क्रू मॉड्यूल की डिसेलेरेशन सिस्टम में चार अलग-अलग तरह के कुल 10 पैराशूट हैं। शुरुआत दो ‘एपेक्स कवर सेपरेशन’ पैराशूट से होती है। ये सबसे पहले पैराशूट कम्पार्टमेंट के सुरक्षा कवच को अलग करते हैं।

इसके बाद दो ड्रॉग पैराशूट आते हैं, जो घूमते हुए मॉड्यूल को स्थिर करने और उसकी स्पीड को सुरक्षित लेवल तक कम करने में अहम भूमिका निभाते हैं।

एक बार जब ड्रॉग अपना काम पूरा कर लेते हैं , तो सीक्वेंस में तीन पायलट पैराशूट बाहर निकलते हैं। ये पायलट फिर तीन बड़े मेन पैराशूट निकालते हैं, जो क्रू मॉड्यूल की वेलोसिटी को और कम करते हैं ताकि मिशन में सवार एस्ट्रोनॉट्स के लिए सुरक्षित टचडाउन यानी जमीन या समुद्र में उतरना सुनिश्चित किया जा सके।

ड्रॉग पैराशूट खास तौर पर बहुत जरूरी होते हैं, क्योंकि उन्हें अंतरिक्ष यान के वायुमंडल में घुसने के तुरंत बाद काम करना होता है। ये बहुत डायनामिक फेज होता है, जहाँ एयरोडायनामिक लोड और फ्लाइट की स्थिति दोनों में काफी बदलाव होते हैं।

इस परीक्षण का मकसद बहुत ज्यादा और असामान्य स्थितियों में ड्रॉग पैराशूट के परफॉर्मेंस, विश्वसनीयता और मजबूती को अच्छी तरह से वेरिफाई करना था। RTRS-आधारित दोनों ट्रायल ने सभी तय लक्ष्यों को पूरा किया। इससे यह साबित हुआ कि सिस्टम फ्लाइट पैरामीटर में बड़े बदलावों को झेल सकता है और सफलतापूर्वक काम कर सकता है।

रेल ट्रैक से ‘गगन’ की सैर

रेल की पटरियों पर हम अंतरिक्ष की सैर की कल्पना भी नहीं कर सकते, लेकिन इसरो ने इसे सच कर दिखाया है। मिशन गगनयान के सबसे मुश्किल प्रक्रिया में से एक क्रू मॉड्यूल के धरती में प्रवेश करने के दौरान अपनाने वाली प्रक्रिया को सफलतापूर्वक कर।

रेल ट्रैक रॉकेट स्लेड का उपयोग करना इसरो की इंजीनियरिंग सूझबूझ को दर्शाता है। ये सफलता बताता है कि भारत अपने पहले मानव मिशन की दिशा में तकनीकी तौर पर तेजी से बढ़ रहा है साथ ही ये भी सुनिश्चित कर रहा है कि सुरक्षा मानको पर 100 फीसदी खड़ा उतरे।

इसरो ने टेस्ट के सफल समापन को गगनयान पैराशूट सिस्टम को मानव अंतरिक्ष उड़ान के लिए क्वालिफाई करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम बताया।

वही व्यवस्था टिकेगी जो जमीन से उठी हो, संगठन में तपी हो, जिसके केंद्र में राष्ट्र हो: BJP के ‘नवीन’ प्रयोग के निहितार्थ

राजनीतिक निर्णय मोटे तौर पर पर दो प्रकार के होते हैं। एक, तुरंत शोर मचाते हैं। सुर्खियाँ बटोरते हैं। दूसरे, बिना शोर किए राजनीति की दिशा बदल देते हैं। नितिन नवीन (Nitin Nabin) का भारतीय जनता पार्टी (BJP) का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष चुना जाना दूसरे प्रकार का निर्णय है।

नितिन नवीन को यह दायित्व न तो भावनात्मक लहर से मिली है। न ही यह किसी तात्कालिक चुनावी मजबूरी का प्रतिफल है, भले कुछ लोगों को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव और नवीन की जाति (कायस्थ) में कनेक्शन दिखता हो।

यह एक सुनियोजित संगठनात्मक निर्णय है। इसका अर्थ आज से कहीं अधिक, आने वाले वर्षों में समझ आएगा। यह फैसला बीजेपी की उस राजनीतिक प्रक्रिया की उपज है, जिसे पार्टी दशकों से धैर्य के साथ गढ़ती आई है। इस प्रक्रिया में कोई भी पहले कार्यकर्ता बनता है और फिर नेता। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक के पुत्र हैं।

यह प्रक्रिया वंशवाद के स्तर पर भी दूसरे दलों से बीजेपी को अलग करती है। सुनिश्चित करती है कि राजा का बेटा ही राजा नहीं बनेगा। उसे भी संगठन के अन्य बेटों की तरह जमीन पर खुद को खपाना होगा। बार-बार खुद को साबित करना होगा। उसे जो कुछ भी प्राप्त होगा, वह उसके पिता के कार्य या नाम के आधार पर नहीं होगा। उसे अपने सामर्थ्य से उसे लेना होगा।

नितिन नवीन का यह उभार आकस्मिक नहीं। इस निर्णय ने फिर से यह स्पष्ट कर दिया है बीजेपी में नेतृत्व का रास्ता ड्राइंग रूम या मम्मी की कोठरी से नहीं निकलता। वह संगठन की धूल भरी पगडंडियों से होकर गुजरता है।

राहुल गाँधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव जैसे लोग जिन्हें राजनीतिक कद विरासत में मिली है, उनके महिमामंडन के लिए ‘युवा’ शब्द का भारतीय राजनीति में इतना दुरुपयोग हो चुका है कि अब किसी नेतृत्व को युवा बताना उसे कमतर आँकने जैसा लगता है। फिर भी नितिन नवीन को केवल युवा चेहरा कहकर निपटा देना भारी भूल होगी, क्योंकि भाजपा में युवा होना केवल महिमामंडन के लिए ही उपयोगी नहीं है। इसका अर्थ होता है उनकी राजनीति में युवाओं जैसी बेचैनी, जोखिम और संघर्ष का दिखना।

यहाँ दायित्व कई परीक्षाओं को उतीर्ण करने के बाद प्राप्त होता है। यह ‘वंश वृक्ष’ से नहीं निकलता। संगठन की पाठशाला में तपकर आता है। नितिन नवीन इसी पाठशाला से निकले एक युवा नेतृत्व हैं। उन्होंने बूथ से लेकर बिहार की सड़कों पर राजनीति सीखी है। फाइलों और फैसलों से टकराकर खुद को सींचा है। फिर राष्ट्रीय भूमिका में प्रवेश किया है।

नितिन नवीन एकमात्र युवा नहीं हैं, जिन्हें बीजेपी में नेतृत्व उत्तराधिकार से नहीं, प्रदर्शन से मिला है। अनुराग ठाकुर, तेजस्वी सूर्या, पुष्कर सिंह धामी जैसे उदाहरण पार्टी में भरे पड़े हैं। ये सभी बताते हैं कि युवा नेतृत्व का अर्थ उम्र से ही नहीं है। यह अथक परिश्रम और अनुशासन से आता है। उत्तराधिकार और प्रदर्शन का यह अंतर नितिन नवीन या अनुराग ठाकुर के पिता का नाम उल्लेख करने से कमतर नहीं हो जाता है। यही अंतर आज भारतीय राजनीति की दिशा तय कर रही है। आगे करती रहेगी।

बीजेपी का युवा नेतृत्व मॉडल उन कार्यकर्ताओं के लिए उम्मीद बनता है, जो अन्य दलों में भैया/दीदी/भौजी का जिंदाबाद करते, पोस्टर लगाते और दरी बिछाते खत्म हो जाते हैं। बीजेपी का संदेश साफ है- संगठन में खुद को झोंककर रखोगे तो शीर्ष तक जाओगे।

दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस, सपा या राजद जैसे दलों के कार्यकर्ताओं को पता होता है कि शीर्ष पर पहुँचने के लिए उन्हें अपना बाप बदलना पड़ेगा। इसलिए नितिन नवीन का राष्ट्रीय स्तर पर आना, राहुल-अखिलेश-तेजस्वी जैसों की राजनीति के लिए सीधी चुनौती है। बीजेपी यह चुनौती भाषणों से नहीं, संरचना से दे रही है।

वंशवादी राजनीति का सबसे बड़ा संकट यह है कि वह खुद को बदल नहीं सकती। कथित प्रयोगों के नाम पर भी वह​ हर बार ‘नई पैकिंग में पुराना माल’ ही परोसती है। इसके उलट बीजेपी पुराने ढाँचे में नए लोगों को जिम्मेदारी देती है। संगठन चलता रहता है, चेहरे बदलते रहते हैं। आज नितिन नवीन हैं। कल कोई और होगा। लेकिन इसे प्राप्त करने की पात्रता नहीं बदलेगी। यही वह बात है जो उसे इस देश के अन्य सभी राजनीतिक दलों से अलग करती है।

बीजेपी आज जो कुछ कर रही है, वह केवल सत्ता में बने रहने की राजनीतिक लड़ाई नहीं है। यह राजनीतिक संस्कृति गढ़ने की भी लड़ाई है। यही क्रम चलता रहा तो आने वाले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति की संस्कृति भी दो हिस्सों में साफ बँटी दिखेगी।

एक तरफ बीजेपी जैसी पार्टी होगी। जहाँ नेतृत्व तैयार किया मिलेगा। संगठन गतिमान रहेगा। दूसरी ओर वे वंशवादी दल होंगे, जहाँ नेतृत्व विरासत में मिला होगा। कार्यकर्ता हाशिए पर रहेंगे और संगठन मृत दिखेगा।

नितिन नवीन का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनना कोई सामान्य संगठनात्मक फेरबदल ही नहीं है। यह एक स्पष्ट राजनीतिक घोषणा है कि बीजेपी भविष्य को संयोग के भरोसे नहीं छोड़ेगी। वह नेतृत्व तैयार कर रही है जो उसकी यात्रा को आगे लेकर जाएगी।

यह निर्णय उन दलों के लिए चेतावनी भी है, जो अब भी यह मानकर चल रहे हैं कि राजनीति उनकी खानदानी जागीर है। समय ने इस सोच वाली राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है। अब चेहरा नहीं, चरित्र महत्वपूर्ण है। उपनाम नहीं, उपयोगिता मायने रखती है।

इस बदलाव के कारण धीरे-धीरे हाशिए की ओर जा रही राहुल गाँधी, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव जैसों की पारिवारिक राजनीति को एक दिन उस पाताल में पहुँचा देगी, जहाँ से ऐसी राजनीति की वापसी संभव नहीं होगी। उस दिन यह पूरी तरह सुनिश्चित हो जाएगा कि भारतीय लोकतंत्र में वही राजनीतिक व्यवस्था टिकेगी

जो जमीन से उठी हो। संगठन में तपी हो। जिसके केंद्र में राष्ट्र हो।

विरोध प्रदर्शन के नाम पर हल्ला, हिंदुओं का उत्पीड़न करके सब शांत: बांग्लादेश से लेकर पाकिस्तान के कट्टरपंथियों का पैटर्न एक, पहला नहीं है ‘दीपू चन्द्र’ केस

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा मचाया जा रहा बवाल हर जगह सुर्खियों में है। विरोध प्रदर्शन के नाम पर लूट, हिंसा और हत्याओं को जिस तरह अंजाम दिया जा रहा है ये किसी से छिपा नहीं है। इस बीच दीपू चंद्र नाम के हिंदू का नाम सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है। दीपू इन्हीं इस्लामी कट्टरपंथियों की बर्बरता का शिकार हुआ एक नाम है जिसे ईशनिंदा के इल्जाम में घेरकर मार दिया गया।

सोशल मीडिया पर दीपू की सारी वीडियोज मौजूद हैं। किसी में वो थाने में बैठा दिख रहा है, किसी में वो इस्लामी कट्टरपंथियों से घिरा दिख रहा है, किसी में सैंकड़ों कट्टरपंथी उसे नंगा करके मार रहे हैं और किसी में उसे पेड़ से लटकाकर जलाया जा रहा है।

ये वीडियोज इतनी हृदयविदारक हैं कि एक सामान्य इंसान के लिए इन्हें देखना मुश्किल हो जाए। जैसे-जैसे लोगों के पास ये वीडियो पहुँच रही है उसके साथ सवाल भी उठ रहे हैं कि बांग्लादेश में हिंदू किस डर-दहशत में रह रहे हैं।

विरोध प्रदर्शन का पुराना ‘खूनी पैटर्न’

खैर! इस वक्त चूँकि बांग्लादेश में हिंसा की चर्चा हर जगह है इसलिए हम और आप दीपू पर बात भी कर रहे हैं वरना हकीकत तो यही है कि इस्लामी कट्टरपंथियों के विरोध प्रदर्शन का यही पैटर्न है। वो पहले किसी मुद्दे के नाम पर विरोध करने सड़क पर आते हैं और अंत हिंदुओं के साथ उत्पीड़न, महिलाओं पर हत्याचार और हत्याओं से ही होता है।

बांग्लादेश में करीब 1 साल ही हुआ है जब शेख हसीना को सत्ता से निकालने के लिए हिंसा भड़की थी। उस समय उसे छात्रों का प्रदर्शन कहकर सराहा जा रहा था पर जमीन पर क्या हो रहा था वो याद है क्या आपको? उस हिंसा में 100+ मौत हुई थी जिसमें हिंदू पार्षद हरधन रॉय हारा और काजल रॉय जैसे लोगों के नाम शामिल थे। इस्लामी कट्टरपंथियों ने उस हिंसा में भी चुन-चुनकर हिंदुओं को निशाना बनाया था। न नेता छोड़े गए थे और न ही पत्रकार न कलाकार।

कट्टरपंथियों ने सबको निशाना बनाया था और जिन्हें छोड़ा था उनकी आपबीती और ज्यादा दर्दनाक थी। हिंदू महिलाओं को दो विकल्प दिए गए थे या तो वो रेप करवाएँ-घर लुटवाएँ या फिर अपने परिजनों की मौत होते सामने देखें।

ईशनिंदा: अल्पसंख्यकों के खिलाफ सबसे आसान हथियार

ये आईना सिर्फ 1 साल पहले छात्र क्रांति के नाम पर फैलाई गई हिंदू विरोधी हिंसा का नहीं, बल्कि इतिहास में हुए ज्यादातर इस्लामी कट्टरपंथियों के प्रदर्शन की सच्चाई है जिसे शुरुआत में विरोध का नाम दिया जाता और उसका अंत हिंदुओं के उत्पीड़न व कत्ल से होता है। इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है जब नारा-ए-तकबीर और अल्लाह-हू-अकबर जैसे नारों की गूँज के बीच हिंदू मार दिए गए।

बांग्लादेश जैसे इस्लामी मुल्कों में हिंदुओं के उत्पीड़न के लिए के लिए ईशनिंदा जैसे इल्जाम एक बहुत आसान हथियार है जिसका इस्तेमाल ये कभी भी किसी के भी खिलाफ कर लेते हैं। इसी साल की बात करें चटगाँव के पटेंगा काठगढ़ में हिंदू युवक को मुस्लिम भीड़ ने अगवा करके जमकर प्रताड़ित किया था। लड़के का नाम प्रांत तालुकदार था। भीड़ ने उस समय उस पर भी ईशनिंदा का आरोप लगाया था।

इसी तरह दिसंबर 2024 में एक घटना सामने आई थी जब आकाश दास नाम के युवक पर ईशनिंदा का इल्जाम लगाकर इस्लामी भीड़ विरोध करने सड़क पर आई थी और उसका अंत उन्होंने 130 हिंदू घरों व 20 मंदिरों को जलाकर किया था।

इससे पहले नवंबर 2024 में करीमगंज उपजिला में रहने वाले रिदॉय रोबी दास की हत्या कर दी गई थी। रिदॉय नाई का काम करता था और उन्हें 3 मौलानाओं ने किडनैप कर बुरी तरह पीटा और यातनाएँ दी, जिसके बाद उनकी मौत हो गई थी। इसमें मौलानाओं ने मुस्लिम युवती से प्रेम संबंध का कारण बताया था।

उससे पहले अक्तूबर 2024 में एक उन्मादी मुस्लिम भीड़ ने हृदय पाल नामक एक हिंदू लड़के पर पैगंबर मुहम्मद के अपमान का आरोप लगाकर फरीदपुर जिले के बोलमारी में कादिरदी डिग्री कॉलेज को घेर लिया था और मारने की कोशिश की गई थी।

अफवाहें और सरहद पार की दरिंदगी

बांग्लादेश के खगराचारी और रंगमती में मुस्लिम भीड़ ने धनंजय और रुबेल त्रिपुरा नामक हिंदू अल्पसंख्यकों की हत्या की थी। यह हिंसा एक मुस्लिम अपराधी की मौत के बाद फैलाई गई अफवाह के कारण हुई थी। जिसमें जनजातीय और अल्पसंख्यक समुदायों ने बंगालियों पर हमला बताया था।

एक और मामला पाकिस्तान के सियालकोट से सामने आया था, जहाँ एक श्रीलंकाई शख्स प्रियांथा कुमारा को ईशनिंदा के आरोप में उग्र इस्लामी भीड़ ने प्रताड़ित किया था और जलाकर मार डाला था। इस भयानक और दर्दनाक घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

यह इस बात की गवाह है कि बांग्लादेश में हिंदू होना अब अपनी जान हथेली पर लेकर चलने जैसा है। ईशनिंदा का आरोप कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि कट्टरपंथियों के लिए हिंदुओं के कत्ल का एक ‘लाइसेंस’ बन चुका है। दीपू चंद्र की जलती हुई चिता और रिदॉय रोबी दास जैसी नृशंस हत्याएँ यह साबित करती हैं कि जब मजहबी उन्माद सर चढ़कर बोलता है, तो कानून और इंसानियत दोनों दम तोड़ देते हैं।

सबसे डरावनी बात यह है कि इन हमलों को अक्सर ‘जन आक्रोश’ या ‘राजनीतिक विरोध’ का जामा पहना दिया जाता है, जबकि हकीकत में यह हिंदुओं के खिलाफ एक सोची-समझी नफरत है। पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक, पैटर्न एक ही है- अफवाह फैलाओ, भीड़ जुटाओ और हिंदुओं को खत्म कर दो। यदि दुनिया ने अब भी इन कट्टरपंथियों के खूनी खेल पर चुप्पी नहीं तोड़ी, तो दक्षिण एशिया से अल्पसंख्यकों का नामोनिशान मिटाने की यह साजिश सफल हो जाएगी।

1200+ पीड़ित, युवतियों के साथ बाथटब में क्लिंटन और बिल गेट्स-माइकल जैक्सन-ट्रंप का जिक्र: जानें एपस्टीन फाइल्स में क्या-क्या मिला?

अमेरिका के न्याय विभाग ने शुक्रवार (19 दिसंबर 2025) को दुनिया के सबसे विवादित सेक्स स्कैंडल ‘जेफ्री एपस्टीन फाइल्स’ से जुड़े तीन लाख दस्तावेज सार्वजनिक किए। यह खुलासा कॉन्ग्रेस द्वारा पास किए गए कानून ‘एपस्टीन फाइल्स ट्रांसपेरेंसी एक्ट’ के तहत हुआ। इन दस्तावेजों में कोर्ट रिकार्ड, ईमेल, फोटो, वीडियोज और जाँच से जुड़ी सामग्री शामिल है।

इन फाइलों में जेफ्री एपस्टीन और उसकी सहयोगी गिस्लेन मैक्सवेल द्वारा नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण के कई सबूत सामने आए हैं। इसके अलावा कई हाई-प्रोफाइल हस्तियों और नेताओं के नाम भी दस्तावेजों में आए। हालाँकि, बड़ी संख्या में कंटेंट रेडैक्ट की गई है ताकि पीड़ितों की पहचान सुरक्षित रहे, जाँच प्रभावित न हो और आपत्तिजनक तस्वीरें सार्वजनिक न हों।

यह खुलासा अमेरिका और पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है। नई तस्वीरें और दस्तावेज दिखाते हैं कि कैसे एपस्टीन ने अपनी ताकत, पैसा और संपर्कों का इस्तेमाल कर नाबालिग लड़कियों का शोषण किया।

दस्तावेजों में क्या है?

न्याय विभाग ने 4 बड़े डेटा सेट में हजारों दस्तावेज सार्वजनिक किए हैं। इन फाइलों में कोर्ट रिकार्ड, ईमेल, ऑडियो रिकॉर्डिंग्स, फोटो और वीडियो शामिल हैं। फाइलें न्याय विभाग की वेबसाइट पर अपलोड की गईं लेकिन भारी ट्रैफिक के कारण साइट पर यूजर्स को इंतजार करना पड़ा।

कई पन्नों पर पीड़ितों की पहचान सार्वजनिक करने से बचने के लिए नाम और फोटो ब्लैक बॉक्स से छिपाए गए हैं। 254 मसाज थेरेपिस्ट की सूची पूरी तरह से रेडैक्ट की गई है। कुछ तस्वीरों में अर्धनग्न अवस्था में या नग्न अवस्था में महिलाएँ दिखाई दे रही हैं, जिनकी पहचान सुरक्षित रखने के लिए ब्लैक बॉक्स लगाए गए हैं।

विशेष फोटो और फाइलों में बिल क्लिंटन को हॉट टब में, क्लिंटन और गिस्लेन मैक्सवेल को पूल में, राजकुमार एंड्रू को पाँच महिलाओं की गोद में लेटे हुए और एपस्टीन के घर की सुरक्षा कैमरा फुटेज, वॉइस रिकॉर्डर और VHS टेप जैसी चीजें शामिल हैं।

हाई प्रोफाइल लोगों का नाम आया सामने

दस्तावेजों में कई हाई-प्रोफाइल व्यक्तियों का नाम आया। इनमें से सबसे चर्चा बिल क्लिंटन की तस्वीरों को लेकर है। क्लिंटन हॉट टब में और पूल में मैक्सवेल के साथ नजर आए। हालाँकि, उन्होंने कभी भी इन आरोपों में सीधे तौर पर गलती स्वीकार नहीं की।

मिक जैगर और माइकल जैक्सन भी एपस्टीन के सोशल सर्कल में दिखाई दिए। कोई भी प्रत्यक्ष अपराध का सबूत नहीं मिला लेकिन उनकी मौजूदगी सार्वजनिक हुई हैं। राजकुमार एंड्रू की तस्वीरें भी जारी की गईं, जिसमें वह पाँच महिलाओं की गोद में लेटे हुए नजर आए। एंड्रू ने इन आरोपों का हमेशा खंडन किया है।

डोनाल्ड ट्रंप के नाम एपस्टीन की नोटबुक में आए लेकिन किसी भी फाइल में उनके सीधे अपराध का सबूत नहीं है। ट्रंप ने पहले फाइल्स के रिलीज के खिलाफ विरोध किया लेकिन कॉन्ग्रेस के दबाव के बाद कानून पास होने पर दस्तावेज सार्वजनिक किए गए हैं।

बॉडी मसाज के नाम पर बुलाई जाती थी नाबालिग लड़कियाँ, फिर होता था शोषण

इनसे पता चला कि 250 से अधिक नाबालिग लड़कियों का शोषण किया गया था। साथ ही, इन दस्तावेजों में 1,200 से अधिक पीड़ितों या उनके परिवारों से जुड़ी जानकारी भी सामने आई है। कई लड़कियों का यौन शोषण एपस्टीन और मैक्सवेल ने 10 साल तक किया।

नई तस्वीरों में महिलाओं के शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर व्लादिमीर नाबोकोव के उपन्यास ‘लोलिता’ के अंश लिखे मिले है। यह उसके नाबालिगों के प्रति असामान्य और खतरनाक रुचि को दर्शाता है। एपस्टीन ने लिटिल सेंट जेम्स द्वीप और प्राइवेट जेट ‘लोलिता एक्सप्रेस’ का इस्तेमाल पीड़ितों को लाने और शोषण के लिए किया।

एक लड़की वर्जीनिया गिउफ्रे ने एपस्टीन के खिलाफ कई गंभीर आरोप लगाए। गिउफ्रे ने कहा कि जब वह 16 साल की थी और डोनाल्ड ट्रंप के मार-ए-लागो क्लब में काम कर रही थी, तब उसकी मुलाकात मैक्सवेल से हुई। मैक्सवेल ने उसे मसाज थेरेपी का प्रस्ताव दिया और फिर उन्हें एपस्टीन के पास ले गई। इसके बाद, एपस्टीन ने उसे अपने विला में ले जाकर 3 साल तक यौन शोषण किया।

रेडैक्शन के बावजूद कई तस्वीरें और रिकॉर्ड्स अभी भी ब्लैक बार्स के पीछे हैं, जिससे पूरी तस्वीर साफ नहीं है। दस्तावेजों में कुछ फाइलें दिखाती हैं कि पीड़ित लड़कियों को ग्रुप सेक्स और जबरन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया।

एपस्टीन की सहयोगी और प्रेमिका मैक्सवेल को 2021 में दोषी ठहराया गया। उसे नाबालिग लड़कियों की भर्ती और शोषण में मदद करने का दोषी पाया गया और 20 साल की जेल की सजा मिली।

एपस्टीन पेशे से फाइनेंसर और व्यवसायी था लेकिन उसकी असली पहचान एक दोषी, सेक्स अपराधी और नाबालिग लड़कियों के शोषक के तौर पर है। उसके पास अमेरिकी वर्जिन आइलैंड्स के पास लिटिल सेंट जेम्स नाम का अपना द्वीप था, जिसे ‘एपस्टीन आइलैंड’ भी कहा जाता है। इस द्वीप पर केवल प्राइवेट जेट, हेलीकॉप्टर या नाव से ही पहुँचा जा सकता था।

इस द्वीप पर एपस्टीन पार्टियों का आयोजन करता था, जिनमें दुनिया भर के पैसे वाले लोग, प्रभावशाली और प्रसिद्ध लोग शामिल होते थे। हालाँकि, पार्टियों में खाने-पीने और शराब के मजे लेते हुए लोग दिखते थे, लेकिन असल में वहाँ नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण और ड्रग्स का इस्तेमाल किया जाता था। पीड़ित लड़कियों को एंटी-एजिंग दवाएँ दी जाती थीं और उन्हें बॉडी मसाज के बहाने बुलाया जाता था और ग्रुप सेक्स के लिए मजबूर किया जाता था।

यौन शोषण पूल, हॉट टब, गेस्ट हाउस और निजी कमरों में होता था। कर्मचारी बताते हैं कि ये पार्टियाँ कई दिनों तक चलती थीं और नाबालिग लड़कियों का शोषण लगातार होता था। एपस्टीन ने अपनी दौलत, शक्ति और प्रभाव का इस्तेमाल कर लड़कियों को फँसाया और उनके जीवन को तबाह कर दिया।

नेटवर्किंग का भी जरिया थी एपस्टीन की पार्टियाँ

एपस्टीन ने अपने द्वीप का इस्तेमाल केवल सेक्स स्कैंडल के लिए नहीं किया बल्कि इसे नेटवर्किंग और गोपनीय बैठकों के लिए भी इस्तेमाल किया। यहाँ उन लोगों के बीच छिपी बैठकों का आयोजन होता था, जो सार्वजनिक रूप से कभी आमने-सामने नहीं मिल सकते थे। डिनर, सामाजिक कार्यक्रम और फंडरेजिंग से जुड़ी चर्चाएँ भी यहाँ होती थीं।

एपस्टीन ने खुद को एक कनेक्टर के रूप में दिखाया है और इन बैठकों को अपने कैलेंडर में लिखा है। अरबपति बिल गेट्स ने भी स्वीकार किया कि उन्होंने दुनिया भर के धनी लोगों से जुड़ने के लिए एपस्टीन से मुलाकात की हालाँकि उन्होंने इसे अपनी गलती कहा।

कहा जाता है कि एपस्टीन ने अपने द्वीप पर व्यावसायिक बैठकों का आयोजन भी किया, जिनमें नेता, निवेशक, फाइनेंस एक्सपर्ट, वैज्ञानिक और अन्य लोग भी शामिल होते थे। इन बैठकों का उद्देश्य अमीर और प्रभावशाली लोगों को एक-दूसरे से जोड़ना था।

हालाँकि, द्वीप पर कोई ठोस और स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला है कि यहाँ किसी प्रकार के व्यापारिक सौदे या लेन-देन हुआ करते थे। इस तरह, एपस्टीन का द्वीप केवल सामाजिक और व्यावसायिक नेटवर्किंग का केंद्र भी था, जो उसकी शक्ति और प्रभाव का विस्तार करने में मदद करता था।

ट्रंप सरकार पर दस्तावेज सार्वजनिक करने को लेकर डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों पार्टियों का दबाव था। शुरुआत में ट्रंप इसके खिलाफ थे लेकिन जब इस संबंध में कानून पास हो गया तो सरकार को दस्तावेज जारी करने पड़े।

अब न्याय विभाग की जिम्मेदारी है कि वह कॉन्ग्रेस को एक पूरी रिपोर्ट देगा। इस रिपोर्ट में बताया जाएगा कि कौन-सी जानकारी जनता के सामने लाई गई, कौन-सी रोकी गई और उसे छिपाने की वजह क्या थी।