भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की पुण्यतिथि पर रविवार (11 जनवरी 2026) को केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उन्हें याद करते हुए कहा, “शास्त्री जी को कोटि-कोटि नमन। एक साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले गुदड़ी के लाल शास्त्री जी ने अपने दृढ़ संकल्प और मजबूत नेतृत्व से 1965 के युद्ध में भारत को विजय दिलाई। उनका सादगीपूर्ण जीवन हर एक समाजसेवी के लिए प्रेरणा है।”
शास्त्री जी का जीवन जहाँ लोगों को हमेशा प्रेरणा बना रहा तो उनकी दुखद मृत्यु से जुड़े सवाल आज भी रहस्य की तरह मौजूद हैं। लाल बहादुर शास्त्री का निधन 11 जनवरी 1966 को ताशकंद शहर में हुआ था। ताशकंद अब उज्बेकिस्तान की राजधानी है लेकिन तब यह सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करता था। शास्त्री वहाँ 1965 के भारत–पाक युद्ध के बाद हुए ‘ताशकंद समझौते’ के सिलसिले में मौजूद थे। सरकार की ओर से बताया गया कि उनकी मृत्यु ‘दिल का दौरा पड़ने’ से हुई लेकिन इसके बाद कई ऐसी बातें सामने आईं, जिनकी वजह से लोगों के मन में सवाल पैदा हुए।
रहस्यमयी मौत की पूरी कहानी
रिपोर्ट्स के मुताबिक, 10 जनवरी की रात लाल बहादुर शास्त्री ने हल्का भोजन किया और एक गिलास दूध पीने के बाद आराम करने चले गए। रात करीब 1:25 बजे उन्हें अचानक बेचैनी और खाँसी की शिकायत हुई। तुरंत डॉक्टर को बुलाया गया लेकिन कुछ ही मिनटों बाद यानी करीब 1:32 बजे डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। मेडिकल रिपोर्ट और तत्कालीन आधिकारिक बयान में उनकी मौत का कारण हार्ट अटैक बताया गया।
हालाँकि, शास्त्री की मृत्यु को लेकर शुरू से ही कई सवाल उठते रहे हैं। समय-समय पर इसे साजिश करार दिया जाता रहा है। सबसे पहले उनकी पत्नी ललिता देवी ने आशंका जताई थी कि शास्त्री को जहर दिया गया था। जब उनका पार्थिव शरीर भारत लाया गया, तो कई लोगों ने शरीर पर नीले निशान देखे, जिससे संदेह और गहरा गया।
इस मामले को और रहस्यमय बनाने वाली बात यह रही कि कहा जाता है कि शास्त्री का पोस्टमार्टम नहीं कराया गया। ताशकंद में जिस कमरे में वे ठहरे थे, वहाँ न तो टेलीफोन था और न ही कोई इमरजेंसी बेल। आरोप यह भी लगे कि उन्हें समय पर ठीक से इलाज नहीं मिल पाया। शास्त्री की मौत की जाँच को लेकर कई दावे किए गए लेकिन किसी भी जाँच से कोई ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आया। वर्ष 2009 में सरकार ने संसद में बताया कि सोवियत और भारतीय डॉक्टरों ने इस मामले की जाँच की थी लेकिन उससे जुड़े कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं।
यह भी कहा जाता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में इस मामले से जुड़ी एक फाइल मौजूद है लेकिन उसे आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया। संदेह को और बढ़ाने वाली एक और घटना यह रही कि शास्त्री के निजी डॉक्टर डॉ. आर.एन. चुग की बाद में एक रहस्यमयी सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। इन तमाम तथ्यों और सवालों के बावजूद, लाल बहादुर शास्त्री की मौत आज भी भारतीय इतिहास के सबसे रहस्यमय अध्यायों में से एक बनी हुई है।
उस रात क्या हुआ था?
पत्रकार रशीद किदवई ने अपनी किताब ‘भारत के प्रधानमंत्री’ में शास्त्री के निधन से जुड़ी जानकारी दी है। किदवई ने लिखा, “कुलदीप नैयर उस दौरे में शास्त्री के साथ थे। अपनी किताब में उन्होंने उस रात ताशकन्द में घटी घटनाओं का जीवन्त चित्रण किया है: ‘दरवाजा सतत खटखटाए जाने से मेरी आँख खुली। कॉरिडोर में खड़ी महिला ने मुझसे कहा, ‘तुम्हारे प्रधानमंत्री मौत का सामना कर रहे हैं।’ मैंने जल्दी से कपड़े बदले और एक भारतीय अधिकारी के साथ थोड़ी ही दूर स्थित रूस की देहाती शैली में बने उस आरामगाह की ओर चल पड़े, जिसमें शास्त्री आराम कर रहे थे। मैंने देखा कि (सोवियत संघ प्रमुख अलेक्सेई) कोसीगिन बरामदे में ही खड़े हैं।”
किदवई, नैयर के हवाले से आगे लिखते हैं, “उन्होंने हमें देख दूर से ही हाथ हिलाकर जता दिया कि शास्त्री की मृत्यु हो चुकी है। बरामदे के पीछे डाइनिंग रूम था, जहाँ एक लम्बी-चौड़ी अंडाकार टेबल के चारों ओर बैठी डॉक्टरों की टीम शास्त्री के चिकित्सक आर.एन. चुघ से घटना की जानकारी ले रही थी।कमरे के एक कोने में स्थित ड्रेसिंग टेबल पर एक थर्मस उलटा पड़ा था। ऐसा लग रहा था कि शास्त्री ने उसे खोलने की कोशिश की थी। कमरे में कोई घंटी नहीं थी। शास्त्री को बचाने में नाकाम रहने को लेकर संसद में किए जा रहे हमलों का सामना करते समय, यह वह बिन्दु था, जिस पर सरकार ने झूठ का सहारा लिया था’।”
उन्होंने आगे लिखा, “इधर-उधर से जुटाई गई जानकारी से सामने आया कि स्वागत समारोह से शास्त्री लगभग रात 10 बजे अपनी विश्राम-स्थली पहुँचे। उन्होंने अपने निजी सहायक रामनाथ से खाना माँगा जो भारतीय राजदूत टी.एन. कौल के घर से तैयार होकर आया था। कौल के बावर्ची जान मुहम्मद द्वारा तैयार किए गए इस भोजन में सब्जी की एक डिश, आलू और एक करी वाली डिश थी। शास्त्री ने बहुत थोड़ा खाना खाया। सोते समय शास्त्री को दूध पीने की आदत थी सो रामनाथ ने उन्हें दूध दिया। दूध पीने के बाद भारतीय प्रधानमंत्री एक बार फिर बेचैनी से चहलकदमी करने लगे, फिर उन्होंने पानी माँगा। रामनाथ ने ड्रेसिंग टेबल पर रखे थर्मस फ्लास्क में से उन्हें पानी दिया।”
किदवई आगे लिखते हैं, “शास्त्री के निजी सचिव अपने कमरे में सामान पैक कर रहे थे कि रात के 1 बजकर 20 मिनट पर शास्त्री उनके दरवाजे पर आए। जगन्नाथ ने बताया कि वे बहुत तकलीफ में दिख रहे थे। मुश्किल से उन्होंने पूछा, ‘डॉक्टर साहब किधर हैं?’ इस बीच शास्त्री को भयंकर खाँसी आने लगी, जिससे उनका पूरा शरीर कँपकँपा रहा था। निजी सहायकों ने उन्हें थामा और जल्दी से ले जाकर बिस्तर पर लिटाया। जगन्नाथ ने उन्हें पानी दिया और दिलासा भी, ‘बाबूजी, आप ठीक हो जाओगे।’ इस पर शास्त्री ने अपने सीने की ओर इशारा किया और बेहोश हो गए। जगन्नाथ ने दिल्ली में ललिता शास्त्री को जब यह बात बताई तो वे बोलीं कि ‘तुम बहुत भाग्यशाली हो जो अन्तिम समय में तुमने उन्हें पानी पिलाया’।”
नहीं हुआ पोस्टमॉर्टम फिर पर शरीर पर कट के निशान
रिपोर्ट्स में बताया गया है कि हार्ट अटैक को उस समय प्राकृतिक मृत्यु माना जाता था और इसलिए पोस्टमार्टम को अनिवार्य नहीं समझा गया। शास्त्री जी की शुरुआती मेडिकल जाँच सोवियत संघ में ही हुई और निधन के बाद ताशकंद में डॉक्टरों ने उनके शव की जाँच की। भारत सरकार ने सोवियत मेडिकल रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया क्योंकि उस दौर में सोवियत संघ भारत का करीबी रणनीतिक सहयोगी था। इसी वजह से भारत में दोबारा पोस्टमार्टम कराने की जरूरत महसूस नहीं की गई।
बाद में उनकी पत्नी ललिता शास्त्री ने कहा कि उनसे पोस्टमार्टम के लिए औपचारिक सहमति नहीं ली गई थी लेकिन गहरे शोक और अफरा-तफरी के बीच उन्होंने भी इस पर जोर नहीं दिया। सरकारी दस्तावेजों में भी दर्ज है कि परिवार की ओर से कोई विशेष मांग नहीं आई थी। यह भी माना जाता है कि अगर भारत में पोस्टमार्टम होता या जहर देने की आशंका सामने आती, तो इससे भारत-सोवियत संबंधों पर असर पड़ सकता था और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक संकट खड़ा हो जाता।
जब नैयर ताशकंद से भारत लौटे, तो ललिता शास्त्री ने उनसे सवाल किया कि शास्त्री जी के शरीर का रंग नीला क्यों हो गया था। इस पर नैयर ने जवाब दिया कि उन्हें बताया गया था कि शव को सुरक्षित रखने के लिए लगाए गए रासायनिक पदार्थों की वजह से शरीर का रंग नीला पड़ जाता है।
किदवई ने नैयर के हवाले से लिखा, “तब उन्होंने शास्त्री के शरीर पर लगे ‘कट के निशानों’ की बाबत पूछा। मुझे उनके बारे में कुछ पता नहीं था, क्योंकि मैंने शास्त्री का शरीर नहीं देखा था। इसके अलावा उनकी इस बात ने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया कि न तो ताशकन्द में, न ही दिल्ली में शास्त्री के शव का पोस्टमार्टम किया गया। यह था तो असामान्य ही। इसीलिए उन्हें व शास्त्री के दीगर परिजनों को उनकी मृत्यु के मामले में विभिन्न तरह की शंकाएँ थीं। कुछ दिनों बाद मैंने सुना कि लालबहादुर शास्त्री के दो निजी सहायकों पर ललिता शास्त्री गुस्सा हो गई। कारण यह था कि इन सहायकों ने उस कागज पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि शास्त्री की मौत प्राकृतिक नहीं थी।”
नैयर ने अक्टूबर 1970 के आखिर में इस मुद्दे पर मोरारजी देसाई से बातचीत की थी। उन्होंने देसाई से पूछा कि क्या उन्हें सच में लगता है कि शास्त्री की मौत प्राकृतिक नहीं थी। इस पर मोरारजी देसाई ने कहा, “यह सब राजनीति है। मुझे पूरा विश्वास है कि इसमें कोई गड़बड़ी नहीं थी। उनकी मृत्यु दिल का दौरा पड़ने से ही हुई थी। इस बारे में मैंने उनके डॉक्टर और उनके सचिव सी.पी. श्रीवास्तव से भी बात की थी, जो ताशकंद में उस समय उनके साथ मौजूद थे।” लाल बहादुर शास्त्री की मौत के कई पक्ष हैं, दावे हैं लेकिन इनके बीच कई सवाल भी हैं जो आज भी अपने जवाबों की प्रतीक्षा में हैं।


