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4500 साल पुरानी है मोहनजोदड़ो की ‘डांसिंग गर्ल’, जानिए- इसकी पूरी कहानी: ‘कपड़े’ पहनाने पर विवाद के बाद NCERT ने वापस लिया फैसला

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की कक्षा 9 की नई किताब ‘मधुरिमा’ में सिंधु घाटी सभ्यता की प्रसिद्ध कांस्य प्रतिमा ‘डांसिंग गर्ल’ की तस्वीर में बदलाव किए जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। किताब के पहले अध्याय ‘कला का इतिहास’ में इस प्रतिमा की ऐसी तस्वीर प्रकाशित की गई थी, जिसमें उसके नग्न धड़ को ढक दिया गया था।

तस्वीर में प्रतिमा के कंधों से नीचे के हिस्से को छिपाकर ऐसा दिखाया गया था कि मानो उसे कपड़े पहनाए गए हों। इससे प्रतिमा की मूल शारीरिक विशेषताएँ नहीं दिखाई दे रही थीं। दुनिया भर में इतिहास और पुरातत्व की किताबों में यह प्रतिमा अपने वास्तविक स्वरूप में दिखाई जाती है, इसलिए इस बदलाव की काफी आलोचना हुई।

NCERT will replace the modified "Dancing Girl" image in the class 9 textbook with the original version.
मूल तस्वीर (बाएँ) और NCERT की किताब में छपी एडिटेड तस्वीर (दाएँ) (फोटो साभार: Deccan Herald)

आलोचना और विरोध के बाद NCERT ने तुरंत फैसला लिया कि प्रतिमा की मूल तस्वीर को फिर से वापस लाया जाएगा। यह बदलाव वेबसाइट पर उपलब्ध डिजिटल संस्करण और अभी तक ना छपी किताबों में किया जाएगा। एक अधिकारी ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि अगले साल से छपने वाली हार्ड कॉपी में भी सही तस्वीर ही दिखाई देगी।

शिक्षा मंत्रालय ने भी सोमवार (15 जून 2026) को NCERT से इस मामले में स्पष्टीकरण माँगा था। एक सूत्र ने कहा, “जब यही तस्वीर कक्षा 6 की सामाजिक विज्ञान की किताब में पहले से मौजूद है, तो फिर कक्षा 9 की किताब में इसे बदलने का कोई मतलब नहीं बनता।” गौरतलब है कि पिछले लगभग 25 वर्षों से NCERT की किताबों में ‘डांसिंग गर्ल’ की मूल तस्वीर प्रकाशित होती रही है।

हड़प्पा सभ्यता का एक प्रमुख प्रतीक

करीब 4,500 साल पुरानी यह कांस्य प्रतिमा सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख नगर मोहनजोदड़ो से मिली थी। इसकी ऊँचाई लगभग 10.5 सेंटीमीटर (4.1 इंच) है। मोहनजोदड़ो हड़प्पा सभ्यता का एक महत्वपूर्ण शहर था, जो अपनी सुनियोजित नगर व्यवस्था, विशाल इमारतों और दुनिया की शुरुआती शहरी स्वच्छता प्रणालियों के लिए जाना जाता है।

माना जाता है कि यह प्रतिमा लगभग 2500 ईसा पूर्व की है। इसमें एक युवा लड़की को दिखाया गया है जिसने कई चूड़ियाँ, एक कंगन और तीन लटकनों वाला हार पहन रखा है। उसके बाल सजे हुए हैं और एक कंधे पर बंधे हुए दिखाई देते हैं। उसका एक हाथ कमर पर टिकी हुआ है, जबकि दूसरा नीचे की ओर है। उसकी मुद्रा आत्मविश्वास से भरी नजर आती है।

इस प्रतिमा की खोज 1926 में ब्रिटिश पुरातत्वविद् अर्नेस्ट मैके ने वर्तमान पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र में की थी। उन्होंने ही इसे ‘डांसिंग गर्ल’ नाम दिया था। मैके का मानना था कि यह प्रतिमा उन्हें उस दौर की नृत्यांगनाओं जैसी लगी जो औपनिवेशिक भारत में राजदरबारों में नृत्य प्रस्तुत करती थीं।

प्रतिमा का शरीर पतला है और उसके हाथ-पैर लंबे दिखाई देते हैं। उसका माथा ऊँचा, आँखें बड़ी, नाक चौड़ी और होंठ भरे हुए हैं। उसके दाहिने हाथ में चार चूड़ियाँ और बाएँ हाथ में लगभग 24-25 चूड़ियाँ दिखाई देती हैं। वह अपने दाहिने पैर पर हल्का झुककर खड़ी है और उसका सिर थोड़ा पीछे की ओर झुका हुआ है। उसका दाहिना हाथ कमर के पीछे मुट्ठी बनाकर रखा गया है जबकि बाएँ हाथ में ऐसा लगता है जैसे वह कोई पात्र पकड़े हुए हो।

ब्रिटिश पुरातत्वविद् मॉर्टिमर व्हीलर ने इस प्रतिमा के बारे में कहा था कि यह लगभग 15 साल की लड़की जैसी दिखती है, जो पूरी तरह आत्मविश्वास से भरी हुई है। उनके अनुसार दुनिया में उसके जैसी दूसरी कोई प्रतिमा नहीं है।

कला और तकनीक का अद्भुत नमूना

यह प्रतिमा सिर्फ एक कलाकृति नहीं बल्कि उस समय की तकनीकी प्रगति का भी प्रमाण मानी जाती है। सिंधु घाटी सभ्यता में अधिकतर मूर्तियाँ मिट्टी (टेराकोटा) से बनाई जाती थीं। कांस्य की ऐसी मूर्तियाँ बहुत कम मिली हैं।

हड़प्पा सभ्यता से मिली महिलाओं की अधिकांश मिट्टी की मूर्तियों में कमर के नीचे कोई वस्त्र या बेल्ट दिखाई देती है लेकिन ‘डांसिंग गर्ल’ पूरी तरह नग्न दिखाई देती है। यही बात इसे अन्य मूर्तियों से अलग बनाती है।

यह प्रतिमा कांस्य (ब्रॉन्ज) से बनी है जो ताँबा और टिन को मिलाकर तैयार किया जाता है। इससे पता चलता है कि उस समय के कारीगर धातुओं को मिलाकर मजबूत मिश्रधातु बनाने की तकनीक जानते थे। कई पुरातात्विक खोजों से यह भी पता चला है कि वे ताँबे में आर्सेनिक मिलाकर उसे और मजबूत बनाते थे।

सिंधु घाटी सभ्यता में तांबे और कांस्य का इस्तेमाल औजार, हथियार, गहने, घरेलू सामान और धार्मिक वस्तुएँ बनाने में किया जाता था। ‘डांसिंग गर्ल’ को बनाने के लिए ‘लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग तकनीक’ का उपयोग किया गया था। यह आज भी इस्तेमाल की जाने वाली एक बेहद मुश्किल धातु ढलाई तकनीक है।

इस प्रक्रिया में पहले मोम से प्रतिमा का मॉडल बनाया जाता है। फिर उसे मिट्टी से ढक दिया जाता है और छोटे-छोटे छेद छोड़े जाते हैं। बाद में गर्म करने पर मोम पिघलकर बाहर निकल जाता है और उसकी जगह बने खाली हिस्से में पिघला हुआ कांस्य डाला जाता है। धातु ठंडी होने के बाद मिट्टी हटाई जाती है और अंतिम रूप दिया जाता है।

भारत के राष्ट्रीय संग्रहालय के अनुसार, “यह प्रतिमा दो महत्वपूर्ण बातों का प्रमाण है। पहली, सिंधु सभ्यता के लोग धातु मिश्रण और ढलाई जैसी उन्नत तकनीक जानते थे। दूसरी, उनके समाज में नृत्य और प्रदर्शन कला जैसी मनोरंजन की विकसित परंपराएँ मौजूद थीं।”

सभ्यता की विरासत को दिखाने वाली प्रतिमा

‘डांसिंग गर्ल’ को हड़प्पा सभ्यता की सबसे महत्वपूर्ण कलाकृतियों में गिना जाता है। पुरातत्वविदों के अनुसार यह उस दौर के लोगों की धातु विज्ञान, कला और शिल्प कौशल की उत्कृष्ट समझ को दर्शाती है।

प्रतिमा में दिखाई देने वाले गहने बताते हैं कि उस समय आभूषण निर्माण एक विकसित कला और उद्योग था। हड़प्पा सभ्यता के कई स्थलों से हजारों गहने, निर्माण उपकरण, अधूरे आभूषण और उनसे जुड़ा अन्य सामान मिला है। इससे पता चलता है कि गहना बनाना केवल घरेलू काम नहीं बल्कि एक बड़ा पेशा था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह प्रतिमा मोहनजोदड़ो के एक घर के अंदर मिली थी। इससे माना जाता है कि इसे पूजा के लिए नहीं बनाया गया था बल्कि यह किसी परिवार या व्यक्ति के उपयोग की वस्तु रही होगी। यह उस समय के लोगों की कलात्मक अभिव्यक्ति, सामाजिक पहचान और व्यक्तित्व को दर्शाती है।

दिलचस्प बात यह भी है कि कंधे से कलाई तक चूड़ियाँ पहनने की परंपरा आज भी उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ इलाकों में देखने को मिलती है। इससे संकेत मिलता है कि कुछ सांस्कृतिक परंपराएँ हजारों वर्षों से चली आ रही हैं।

भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान ने ‘डांसिंग गर्ल’ और ‘प्रिस्ट किंग’ नामक दूसरी प्रसिद्ध हड़प्पा कलाकृति दोनों पर दावा जताया था। लेकिन भारत केवल एक कलाकृति देने के लिए तैयार था।

बताया जाता है कि पाकिस्तानी अधिकारियों ने ‘प्रिस्ट किंग’ को चुना। इतिहासकार आशीष कुमार के अनुसार, पाकिस्तान में धार्मिक समूहों की प्रतिक्रिया के डर से नग्न किशोरी की प्रतिमा को लेने से परहेज किया गया था। उनके मुताबिक उस समय भी प्रतिमा की नग्नता को कुछ लोग अपनी नैतिक मान्यताओं के खिलाफ मानते थे।

आज ‘डांसिंग गर्ल’ भारत की राजधानी नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है। यह प्रतिमा सिंधु घाटी सभ्यता की उत्कृष्ट कला, फैशन, शिल्प कौशल और रचनात्मक प्रतिभा का एक महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

2.5 लाख रेप पीड़िता, 87% आरोपित मुस्लिम और 149+ शहरों में फैला नेटवर्क: 219 पन्नों की ‘रेप गैंग इन्क्वायरी रिपोर्ट’ में सामने आई UK में दशकों से चल रही बर्बरता

ब्रिटेन (UK) में बरसों से ग्रूमिंग गैंग की समस्या पर रिपोर्ट जारी की गई है। यह 219 पन्नों की ‘रेप गैंग इन्क्वायरी रिपोर्ट’ एक ऐसी कहानी बताती है जिसे पढ़ना भी आसान नहीं है। रिपोर्ट का दावा है कि दशकों तक देश के अलग-अलग शहरों में संगठित गिरोह कमजोर और नाबालिग लड़कियों को निशाना बनाते रहे। रिपोर्ट के अनुसार, इन गिरोहों में 87 प्रतिशत मुस्लिम आदमी शामिल थे और उनका शिकार ज्यादातर ‘श्वेत’ ब्रिटिश लड़कियाँ थीं। जाँच में कहा गया कि यह कोई इक्का-दुक्का अपराध नहीं था, बल्कि पूरे देश में फैला हुआ एक संगठित नेटवर्क था जो वर्षों तक चलता रहा।

रिपोर्ट के मुताबिक लड़कियों को पहले दोस्ती, प्यार, उपहार, शराब, सिगरेट और नशे के जरिए फँसाया जाता था। कई गवाहियों में बताया गया कि 11 से 13 साल तक की बच्चियों को स्कूल के बाहर, देखभाल गृहों और सड़कों से टैक्सियों में ले जाया जाता था। इसके बाद उन्हें घरों, फ्लैटों, होटलों और रेस्टोरेंट तक पहुँचाया जाता था, जहाँ कई आदमी मिलकर बार-बार उनका बलात्कार करते थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई पीड़िताओं को अलग अलग शहरों में ले जाकर बेचा गया, उनकी वीडियो बनाई गईं, ब्लैकमेल किया गया और उन्हें लगातार डर के माहौल में रखा गया।

सबसे चौंकाने वाला दावा पीड़िताओं की संख्या को लेकर है। रिपोर्ट के अनुसार कम से कम 2.5 लाख श्वेत लड़कियाँ इस तरह के अपराधों का शिकार हुईं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन मामलों में बार बार बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, तस्करी, यातना, गर्भावस्था, जबरन गर्भपात, जबरन इस्लामी धर्मांतरण और जीवनरभर का मानसिक आघात शामिल था।

रिपोर्ट में कई पीड़िताओं ने बताया कि उन्हें ‘व्हाइट ट्रैश’ और ‘काफिर’ कहकर अपमानित किया जाता था। जाँच के अनुसार अपराधियों ने गैर मुस्लिम और खासकर गरीब श्वेत लड़कियों को शिकार बनाया। कुछ गवाहियों में यह भी आरोप लगाया गया कि लड़कियों पर इस्लाम कबूलने का दबाव बनाया गया, उन्हें मजहबी तौर-तरीकों का पालन करने के लिए मजबूर किया गया और कुछ मामलों में विदेश में ले जाकर बेच दिया गया।

लेकिन रिपोर्ट सिर्फ अपराधियों पर सवाल नहीं उठाती। उसका सबसे बड़ा आरोप उन संस्थाओं पर है जिनका काम बच्चों की सुरक्षा करना था। रिपोर्ट के अनुसार पुलिस, सामाजिक सेवाएँ, स्कूल, अस्पताल और स्थानीय प्रशासन के पास बार-बार चेतावनी के संकेत पहुँचे। कई मामलों में बच्चियों के साथ हुए अत्याचार के सबूत मौजूद थे, फिर भी कार्रवाई नहीं हुई। जाँच का निष्कर्ष है कि नस्लवाद के आरोप लगने के डर, राजनीतिक दबाव और संस्थागत विफलताओं ने अपराधियों को वर्षों तक खुला छोड़ दिया, जबकि हजारों बच्चियाँ लगातार शोषण का शिकार होती रहीं।

रिपोर्ट क्या है और इसे किसने तैयार किया

यह ‘रेप गैंग इन्क्वायरी रिपोर्ट‘ ब्रिटेन के ग्रेट यारमाउथ से सांसद रुपर्ट लोव के नेतृत्व में गठित स्वतंत्र जाँच समिति द्वारा तैयार की गई है। जाँच का मकसद ब्रिटेन में दशकों से सामने आ रहे ग्रूमिंग गैग्स और बाल यौन शोषण के मामलों की वास्तविक तस्वीर सामने लाना था।

रिपोर्ट तैयार करने के दौरान अदालतों के रिकॉर्ड, आधिकारिक और गैर-आधिकारिक जाँच रिपोर्टों, पीड़ितों की गवाही, विशेषज्ञों के बयान और विभिन्न शहरों से मिले साक्ष्यों का अध्ययन किया गया। जाँच समिति का दावा है कि उसने देशभर से बड़ी संख्या में पीड़ितों, गवाहों और संबंधित लोगों की गवाही दर्ज की।

219 पन्नों की इस रिपोर्ट में ग्रूमिंग गैंग्स के काम करने के तरीके, अपराधियों की पृष्ठभूमि, पीड़ितों के अनुभव, संस्थागत विफलताओं और राजनीतिक प्रतिक्रिया जैसे मुद्दों को विस्तार से शामिल किया गया है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यह केवल कुछ स्थानीय मामलों की कहानी नहीं, बल्कि पूरे ब्रिटेन में फैला एक संगठित और लंबे समय तक चलने वाला संकट था।

कैसे लड़कियों को जाल में फँसाया जाता था?

रिपोर्ट के अनुसार ज्यादात मामलों में अपराध की शुरुआत किसी सुनसान जगह या हिंसा से नहीं, बल्कि दोस्ती से होती थी। गिरोह पहले ऐसी लड़कियों की तलाश करते थे जो भावनात्मक रूप से कमजोर हो, परिवार से दूर हों या किसी तरह की परेशानी से गुजर रही हों। उन्हें उपहार, पैसे, मोबाइल फोन, सिगरेट, शराब और नशीले पदार्थ देकर अपने करीब लाया जाता था।

जाँच में कहा गया है कि कई पीड़िताओं को यह विश्वास दिलाया गया कि अपराधी उनसे प्यार करते हैं और उनकी परवाह करते हैं। लेकिन एक बार भरोसा बन जाने के बाद हालात तेजी से बदल जाते थे। रिपोर्ट में दर्ज गवाहियों के मुताबिक लड़कियों को घरों, फ्लैटों, होटों, रेस्टोरेंट और टैक्सियों के जरिए अलग-अलग जगहों पर ले जाया जाता था, जहाँ उनका रेप किया जाता था।

(फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

रिपोर्ट में एक जगह कहा गया है कि लड़कियों को अकसर ‘passed between multiple adult men’ यानी कई वयस्क पुरुषों के बीच घुमाया जाता था। कई पीड़िताओं ने बताया कि एक बार गिरोह के कब्जे में आने के बाद उनके साथ बार-बार और कई लोगों द्वारा बलात्कार किया गया। जाँच के अनुसार विरोध करने पर मारपीट, धमकी, ब्लैकमेल और परिवार को नुकसान पहुँचाने की चेतावनी दी जाती थी।

ढाई लाख से ज्यादा लड़कियाँ बनीं शिकार, जुर्म करने वालों में अधिकतर पाकिस्तानी मुस्लिम

रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में कम से कम 2.5 लाख श्वेत ब्रिटिश लड़कियाँ ग्रूमिंग गैंग का शिकार बनीं। जाँच में कहा गया है कि इन पीड़िताओं के साथ बार-बार बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, तस्करी, यातना, जबरन गर्भधारण, जबरन इस्लामी धर्मांतरण और गंभीर मानिक शोषण हुआ। रिपोर्ट का दावा है कि वास्तविक संख्या इससे भी कहीं अधिक हो सकती है।

अदालत के रिकॉर्ड और आधिकारिक जाँचों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि ग्रूमिंग गैंग के मामलों में दोषी ठहराए गए लोगों में करीब 87 प्रतिशत के नाम मुस्लिम हैं। हालाँकि जाँच यह भी कहती है कि गिरोहों में शामिल अधिकांष लोग कभी दोषी ठहराए ही नहीं गए।

(फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

रिपोर्ट के मुताबिक इन नेटवर्कों में सबसे बड़ी संख्या पाकिस्तानी मूल के मुस्लिम आदमियों की थी। इसके अलावा कुछ मामलों में सोमाली, सीरियाई, ईरानी और तुर्की मूल के मुस्लिम आदमियों के नाम भी सामने आए। ऑक्सफोर्ड इस्लामी कांग्रेगेशन के इमाम डॉ. ताज हार्गे का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया कि ग्रूमिंग गैंग में शामिल मुस्लिम आदमियों की वास्तविक संख्या 95 प्रतिशत हो सकती है।

पूरे ब्रिटेन में फैला था ग्रूमिंग गैंग नेटवर्क

रिपोर्ट के अनुसार ग्रूमिंग गैंग्स का एक जैसा मॉडल ब्रिटेन के दर्जनों शहरों और कस्बों में देखने को मिला। सांसद रूपर्ट लोव के नेतृत्व में हुई इस जाँच में ऐसे सबूत मिलने का दावा किया गया है, जिनसे पता चलता है कि यह नेटवर्क देश के लगभग हर हिस्से तक फैला हुआ था।

(फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

जाँच के मुताबिक कम से कम 149 स्थानीय प्रशासनिक क्षेत्रों में ऐसे मामलों के सबूत मिले हैं। रिपोर्ट का कहना है कि यह आँकड़ा दिखाता है कि समस्या किसी एक शहर या कुछ इलाकों तक सीमित नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर फैली हुई थी।

रिपोर्ट में कहा गया कि अदालतों के रिकॉर्ड, विभिन्न जाँच रिपोर्टों और गवाहों की गवाही से एक समान पैटर्न सामने आया। जाँच का निष्कर्ष है कि यह अलग-अलग स्थानीय विफलताओं की कहानी नहीं, बल्कि संगठित बाल यौन शोषण का ऐसा नेटवर्क था जो उत्तर से लेकर दक्षिणी तट तक बार-बार एक जैसे तरीके से संचालित होता रहा।

पीड़िताओं की प्रमुख गवाहियाँ

  • हर दिन यौन शोषण: कई महिलाओं ने बताया कि उनके साथ महीनों और वर्षों तक लगातार बलात्कार हुआ। एक पीड़िता ने कहा, “मेरे साथ हर दिन रेप हुआ, कभी-कभी तो दिन में कई बार भी।”
  • एक से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाया जाता था: गवाहियों के अनुसार लड़कियों को अलग-अलग घरों, होटलों, फ्लैटों और कारों में ले जाया जाता था। रिपोर्ट में कहा गया कि कई पीड़िताओं को वयस्क पुरुषों के बीच इधर से उधर किया जाता था।
  • नस्लीय और मजहबी गालियाँ: कई महिलाओं ने बताया कि उन्हें ‘व्हाइट ट्रैश’ और ‘काफिर’ कहकर तक अपमानित किया जाता था। गवाहियों में बताया गया कि गैर-मुस्लिम होने के कारण उन्हें नीचा दिखाया जाता था। कुछ गवाहियों में कहा गया कि गैर-मुस्लिम होने के कारण उन्हें नीचा दिखाया जाता था।
  • धर्म बदलने का दबाव: कई महिलाओं ने बताया कि उनकी तस्वीरें और वीडियो बनाकर उन्हें चुप रहने के लिए मजबूर किया गया। कुछ को परिवार को नुकसान पहुँचाने और जान से मारने तक की धमकियाँ दी गईं।
  • धमकी और ब्लैकमेल: कई महिलाओं ने बताया कि उनकी तस्वीरें और वीडियो बनाकर उन्हें चुप रहने के लिए मजबूर किया गया। कुछ को परिवार को नुकसान पहुँचाने और जान से मारने तक की धमकियाँ दी गईं।
  • शराब और नशे के जरिए नियंत्रण: पीड़िताओं के अनुसार उन्हें शराब, ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थ दिए जाते थे ताकि वे विरोध न कर सकें और अपराधियों के नियंत्रण में रहें।
  • मदद माँगने पर भी नहीं सुनी गई बात: कई महिलाओं ने कहा कि उन्होंने पुलिस, स्कूलों और सामाजिक सेवाओं से मदद माँगने की कोशिश की, लेकिन उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया। कुछ मामलों में उन्हें ही दोषी मान लिया गया।
  • जिंदगी भर का मानसिक आघात: गवाहियों में अवसाद, डर, आत्महत्या के विचार, रिश्तों में समस्याएँ और जीवनभर बने रहने वाले मानसिक घावों का बार-बार जिक्र मिलता है। रिपोर्ट में बताया गया कि इन अपराधों का असर पीड़िताओं पर आज भी बना हुआ है।

पुलिस, स्कूल और सामाजिक सेवाओं की विफलता

रिपोर्ट का कहना है कि यह सिर्फ अपराधियों की कहानी नहीं है, बल्कि उन संस्थाओं की विफलता की भी कहानी है जिनका काम बच्चों की सुरक्षा करना था। जाँच रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस और अन्य सरकारी संस्थाएँ वर्षों तक यह जानती थीं कि बच्चियों के साथ क्या हो रहा है, लेकिन फिर भी समय रहते कार्रवाई नहीं की गई।

पुलिस को बार-बार शिकायतें मिलती रहीं, लेकिन कई मामलों में पीड़िताओं की बातों को नजरअंदाज कर दिया गया। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि कुछ मामलों में अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय पीड़ित लड़कियों को ही अपराधी की तरह देखा गया, सबूत नष्ट हुए और कई ज्ञात बलात्कार आरोपित जमानत पर बाहर घूमते रहे।

(फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

सामाजिक सेवाओं को लेकर रिपोर्ट और भी गंभीर आरोप लगाती है। जाँच के मुताबिक कई बच्चियों को ऐसे बाल संरक्षण गृहों में रखा गया, जो बाद में शोषण और तस्करी के केंद्र बन गए। रिपोर्ट कहती है कि साफ संकेत मिलने के बावजूद कई मामलों को बंद कर दिया गया और उन लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की गई जिन्होंने इस समस्या को उजागर करने की कोशिश की।

स्वास्थ्य सेवाओं की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार अस्पतालों और डॉक्टरों के पास 13 साल तक की बच्चियों में यौन हिंसा के संकेत, यौन संक्रमण, बलात्कार के कारण हुई गर्भावस्था और आत्महत्या के प्रयासों के रिकॉर्ड मौजूद थे। इसके बावजूद कई पीड़िताओं को बिना उचित सुरक्षा व्यवस्था, परामर्श या विशेष देखभाल के वापस उसी माहौल में भेज दिया गया, जहाँ उनका शोषण हो रहा था।

स्कूलों को भी चेतावनी के संकेत दिखाई दे रहे थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई शिक्षकों ने स्कूल के बाहर बड़ी उम्र के पुरुषों को लड़कियों का इंतजार करते देखा, कुछ मामलों में स्कूल परिसर के अंदर ही बलात्कार की शिकायतें सामने आईं। लेकिन जाँच के अनुसार कई बार पीड़िताओं को सुरक्षा देने के बजाय उन्हें ही स्कूल से निकाल दिया गया या अनुशासनहीन छात्रा मान लिया गया।

(फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

रिपोर्ट में बताया गया कि राजनीतिक शुद्धता, नस्लवाद का आरोप लगने का डर और कुछ समुदायों का समर्थन खोने की आशंका ने बच्चों की सुरक्षा को पीछे धकेल दिया। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई संस्थाओं ने समस्या का सामना करने के बजाय उससे बचने का रास्ता चुना, जिसका खामियाजा हजारों बच्चियों को भुगतना पड़ा।

रिपोर्ट की सिफारिशें और आगे क्या होगा?

रिपोर्ट का कहना है कि अब केवल पुरानी घटनाओं की जाँच करना पर्याप्त नहीं है। जाँच समिति ने पूरे देश में एक नई राष्ट्रीय सार्वजनिक जाँच शुरू करने की माँग की है, ताकि दशकों से चले आ रहे इस घोटाले की पूरी सच्चाई सामने आ सके और जिम्मेदार लोगों की पहचान की जा सके।

रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि ग्रूमिंग गैंग्स से जुड़े सभी मामलों की दोबारा समीक्षा की जाए और उन अपराधियों की फिर से जाँच हो जो कभी अदालत तक नहीं पहुँचे। इसके अलावा पुलिस, सामाजिक सेवाओं, स्कूलों और स्वास्थ्य विभाग की भूमिका की भी स्वतंत्र जाँच कराने की माँग की गई है, ताकि यह पता चल सके कि चेतावनियों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

(फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

जाँच समिति ने पीड़िताओं के लिए विशेष सहायता कार्यक्रम शुरू करने की भी सिफारिश की है। रिपोर्ट के अनुसार हजारों महिलाएँ आज भी मानसिक आघात, अवसाद और अन्य समस्याओं से जूझ रही हैं। इसलिए उन्हें लंबे समय तक मनोवैज्ञानिक, कानूनी और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

रिपोर्ट यह भी कहती है कि अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं को अपराधियों की जातीय या धार्मिक पृष्ठभूमि से जुड़े तथ्यों को छिपाने के बजाय खुलकर सामने रखना चाहिए। जाँच के अनुसार समस्या की सही पहचान किए बिना उसे रोकना संभव नहीं होगा।

आगे क्या होगा, यह काफी हद तक ब्रिटिश सरकार और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यदि इसकी सिफारिशों को लागू नहीं किया गया, तो हजारों पीड़िताओं को न्याय मिलने की संभावना और कमजोर हो सकती है। समिति का कहना है कि अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि क्या हुआ था, बल्कि यह है कि इतने वर्षों तक ऐसा होने क्यों दिया गया और भविष्य में इसे कैसे रोका जाएगा।

दशकों से ब्रिटेन में खतरा है ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल

ब्रिटेन में 2002 के आसपास पहली बार ग्रूमिंग गैंग से जुड़े मामले उजागर हुए थे, जहाँ पाकिस्तानी मूल के पुरुषों पर इन नाबालिगों के शोषण के आरोप लगे थे। 2010 में यह ग्रूमिंग गैंग स्कैंडर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना, जब ब्रिटिश अखबार ‘द टाइम्स’ ने जाँच के बाद अपनी रिपोर्ट में इन बाल यौन शोषण के मामलों का खुलासा किया। उस रिपोर्ट में भी यह सामने आया कि अधिकतर आरोपित मुस्लिम थे और वे कमजोर एवं असुरक्षित परिस्थितियों में रहने वाली लड़िकयों को अपना शिकार बना रहे थे।

हाल ही में जून 2026 की शुरुआत में ब्रिटेन की संसद में भी दोबारा से यह मुद्दा उठा था। जब सांसद रुपर्ट लोव ने संसद में ग्रूमिं गैंग की कई पीड़ित महिलाओं और लड़कियों की गवाहियाँ पढ़कर सुनाईं। इन गवाहियों में भी 600-700 आदिमयों ने किया रेप, टूटी बोतलों के टुकड़ों से रेप, पुलिस ऑफिसर द्वारा रेप, नस्लीय आधार पर ब्रिटिश लड़कियों को निशाना बनाने जैसी बेहद दर्दनाक घटनाओं का जिक्र था।

बच्चों के लिए बंद करो सोशल मीडिया… दुनियाभर से उठ रही माँग, पर टेलीग्राम फाउंडर बैन को बता रहे खतरनाक: जानिए- VPN से परिवार तक, उनके तर्क में कितना दम

दुनिया भर में बच्चों और किशोरों का बचपन मोबाइल, टैब और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तक सीमित होता जा रहा है। उन्हें पढ़ने-लिखने से लेकर खेलने-कूदने तक पर सोशल मीडिया का असर है। इसको देखते हुए कई देशों ने बच्चों को सोशल मीडिया से दूर करने के लिए उम्र सीमा तय की है।

ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, फ्रांस समेत कई देश मानते हैं कि सोशल मीडिया बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, लत, साइबर बुलिंग और यौन शोषण के खतरे को बढ़ाता है, लेकिन सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के बाद ‘खतरा’ और भी बड़ा दिख रहा है। आलोचकों का कहना है कि बच्चे और किशोर VPN की ओर चले जाते हैं।

VPN की ओर जाना ज्यादा खतरनाक क्यों है?

वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क यानी वीपीएन एक ऐसा असुरक्षित प्राइवेट इंटरनेट है, जो बगैर डेटा प्रोवाइडर के सीधे वीपीएन सर्वर से जुड़ जाता है। इसके जरिए बच्चे सरकारी प्रतिबंधों और पेरेंटल कंट्रोल को दरकिनार करते हुए डार्क वेब और असीमित, असुरक्षित कंटेंट, जैसे- पॉर्नोग्राफी और बेहद हिंसा तक पहुँच जाते हैं। इसके माध्यम से बच्चे उन देशों के सर्वर से जुड़ जाते हैं, जहाँ ऑनलाइन प्रतिबंध नहीं है। इससे आसानी से उनकी पहुँच पोनोग्राफी और हिंसक कंटेंट तक हो जाती है।

वीपीएन लोकेशन और आईपी (IP) एड्रेस को छिपा देता है। इससे पता नहीं चलता है कि बच्चा विश्व के किस कोने में मौजूद है। सबसे अहम बात है कि इसकी वजह से माता-पिता या स्कूल का नेटवर्क यह नहीं ट्रैक कर पाता कि बच्चा क्या देख रहा है। वीपीएन के इस्तेमाल के दौरान अक्सर बच्चे बिना सुरक्षा के अवैध वेबसाइटों और स्कैमर्स के संपर्क में आ जाते हैं। यह उसकी सुरक्षा के लिए भी खतरनाक है।

जब लोकप्रिय सोशल मीडिया जैसे-एक्स, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, फेसबुक, मेटा आदि से बच्चे जुड़ते हैं, तो उनके आयु की पुष्टि की जाती है। लेकिन वीपीएन में ऐसा कुछ नहीं है। बच्चे के न तो उम्र का पता है, न देश का पता है, न भाषा-संस्कृति की पहचान की जा सकती है, लेकिन बच्चा वीपीएन के माध्यम से इंटरनेट पर सारे कंटेंट देख लेता है।

समस्या यह है कि VPN केवल सोशल मीडिया ही उपलब्ध नहीं कराता, बल्कि पूरे इंटरनेट की सारी सीमाओं को खत्म कर देता है। इससे बच्चे उन वेबसाइटों, और प्लेटफॉर्मों तक पहुँच सकते हैं, जहाँ किसी तरह का नियंत्रण या मॉडरेशन नहीं होता।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि VPN फ्री होते हैं और ज्यादातर यूजर्स का डेटा जमा करते हैं। ब्राउजिंग एक्टिविटी रिकॉर्ड करते हैं और ये आपत्तिजनक एड नेटवर्क से भी जुड़े होते हैं। यदि कोई 13-15 साल का बच्चा बिना समझे ऐसे ऐप डाउनलोड करता है तो उसकी गोपनीयता और सुरक्षा दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

माता-पिता के ‘कंट्रोल से बाहर’ हो रहे बच्चे

कई VPN बच्चों के स्कूल नेटवर्क फिल्टर, पैरेंटल कंट्रोल और कंटेंट फिल्टरिंग को दरकिनार कर देते हैं। UK के एक अध्ययन में VPN इस्तेमाल करने वाले कुछ बच्चों ने माना कि वे इसका उपयोग स्कूल प्रतिबंधों या पैरेंटल कंट्रोल्स से बाहर जाने के लिए करते हैं। इससे बच्चों में ‘छिपकर इंटरनेट इस्तेमाल’ करने की प्रवृति विकसित होने लगती है।

ऑस्ट्रेलिया पर हुए एक हालिया शोध में पाया गया कि किशोर प्रतिबंधों को चुनौती के रूप में देखने लगे और वे यह सीखने लगे कि सिस्टम को कैसे चकमा दिया जाए। शोधकर्ताओं ने इसे तकनीकी नियंत्रणों की एक बड़ी कमजोरी बताया।

Telegram फाउंडर पावेल दुरोव ने क्या कहा

ब्रिटेन में 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया बैन किए जाने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म टेलीग्राम के फाउंडर Pavel Durov की प्रतिक्रिया सामने आयी। उन्होंने कहा कि ‘कोई कानून अच्छी परवरिश की जगह नहीं ले सकता।’

उन्होंने कहा कि यदि बच्चों को सोशल मीडिया से पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाएगा तो वे VPN का उपयोग शुरू कर देंगे और इससे वे अवैध या अधिक खतरनाक कंटेंट देखेंगे। उनके मुताबिक, माता-पिता के पास पहले से स्क्रीन-टाइम लिमिट, पैरेंटल कंट्रोल और डिवाइस नियंत्रण जैसे तरीके मौजूद हैं। इसका इस्तेमाल कर बच्चों को नियंत्रित किया जा सकता है। दुरोव ने रूस का उदाहरण देते हुए बताया कि जब रूसी सरकार ने टेलीग्राम को बैन किया था, तो 95% युवा वीपीएन का उपयोग करके प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते रहे।

भारत में Telegram पर NEET को लेकर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध के बाद भी Durov ने कहा कि किसी प्लेटफॉर्म को ब्लॉक करने से समस्या की जड़ खत्म नहीं होती, बल्कि यूजर्स दूसरे प्लेटफॉर्मों पर चले जाते हैं। उन्होंने कहा कि यह 150 करोड़ लोगों को ‘सजा’ देने जैसा है।

VPN का चलन दुनिया भर में बढ़ा

UK Online Safety Act लागू होने के बाद एक VPN को ब्रिटेन में डाउनलोड करने वालों की संख्या 1800% तक बढ़ गई। देश में VPN को लेकर सर्च और चर्चा में जबरदस्त उछाल आया है। गुगल पर वीपीएन को लेकर सर्च करीब 89% बढ़ी। सरकार भी मान रही है कि वीपीएन नियमों से बच निकलने का आसान रास्ता है। हालाँकि बच्चों में वीपीएन को जानने की दिलचस्पी बढ़ी है इसका कोई प्रमाण सामने नहीं आया है।

UK की संस्था Internet Matters के अनुसार, केवल 8% बच्चों ने पिछले 12 महीनों में वीपीएन के उपयोग की बात कही और नियमों उम्र को लेकर पाबंदी के बाद बच्चों के VPN उपयोग में कोई बड़ी उछाल नहीं दिखी। इसका मतलब है कि वीपीएन डाउनलोड करने वालों की संख्या जरूर बढ़ी है, लेकिन हर वृद्धि का मतलब यह नहीं कि सभी यूजर्स बच्चे ही हैं।

पूरी दुनिया की बात करें, तो हाल के वर्षों में वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क मार्केट का साइज तेज़ी से बढ़ा है। 2025 में $71.25 बिलियन यानी लगभग ₹6.76 लाख करोड़ था, जो 2026 में बढ़कर $86.02 बिलियन यानी ₹7.18 लाख करोड़ से ज्यादा हो जाएगा। इसका सालाना ग्रोथ रेट 20.7% है। 2030 तक यह बढ़कर $182.00 बिलियन यानी ₹17.29 लाख करोड़ रुपए हो जाएगा।

ऐसे में सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध और खुली आजादी के बीच का रास्ता अख्तियार करना जरूरी है। बच्चों की उम्र सीमा तय करना अच्छा कदम है। लेकिन ऐसे प्लेटफॉर्मों को भी उम्र के वेरिफिकेशन को सख्त करना चाहिए। जिन देशों में अभी उम्र संबंधी नियम नहीं बने हैं, उन्हें प्लेटफॉर्म को मजबूर करना चाहिए कि अनजान मैसेज पर प्रतिबंध लगे, खासकर तब जब यूजर बच्चा हो।

लोकल शेयरिंग की लिमिट होनी चाहिए। स्क्रॉलिंग की लिमिट होनी चाहिए। सबसे अहम है ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर एल्गोरिथम अनुशंसा पर नियंत्रण अर्थात यूजर तय करे कि उसे क्या देखना है, न की प्लेटफॉर्म का एग्लोरिथम। इस दिशा में कई प्लेटफॉर्म आगे बढ़े हैं, लेकिन बच्चों को लेकर इसका सख्ती से पालन होना जरूरी है।

‘पोर्टल में गंभीर खामियाँ, दिख रही गोपनीय जानकारी’: री-एग्जाम से पहले सवालों में NEET, दुबई के छात्र के सुझावों को NTA-IIT ने माना; पढ़ें- मध्यम वर्ग के लिए क्यों चुनौती है ये सिस्टम

NEET, JEE जैसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएँ केवल एक परीक्षा नहीं होतीं, बल्कि लाखों छात्र-छात्राओं और उनके परिवारों के सपनों, संघर्षों और वर्षों की मेहनत का परिणाम होती हैं। ये दोनों परीक्षाएँ भारत में मेडिकल और इंजीनियरिंग में एडमिशन तय करती हैं।

मध्यमवर्गीय परिवार में परीक्षा सिर्फ छात्र नहीं दे रहा होता, पूरा परिवार देता है। ऐसे में जब दुबई के छात्र रेनेल अनिल ने परीक्षा व्यवस्था में खामियों और छात्रों से जुड़े मुद्दों की ओर राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी यानी NTA का ध्यान खींचा और बताया कि क्या-क्या परीक्षा प्रणाली में दिक्कतें हैं, तो उनकी बातों को गंभीरता से लिया गया। इतना ही नहीं एनटीए के साथ साथ आईआईटी संस्थानों ने भी उनके सहयोग के लिए आभार जताया।

क्या किया 12वीं में पढ़ने वाले अनिल ने

दुबई में रहने वाले 12वीं क्लास के CBSE स्टूडेंट अनिल ने JEE एडवांस्ड और NEET के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की जाँच की। दोनों पोर्टल्स में गंभीर कमियाँ मिलने के बाद उसने अपनी जानकारी भारत की नेशनल साइबरसिक्योरिटी रिस्पॉन्स टीम यानी CERT-In को दी और फिर जो कुछ भी पता चला था, उसे X पर शेयर किया।

गल्फ न्यूज के मुताबिक उसने बताया, “दोनों प्लेटफॉर्म्स में घुसने में मुझे लगभग तीन से चार घंटे लगे। ऐसा करने के बाद, मैंने CERT-In को कमियों के बारे में बताया और फिर X (ट्विटर) पर इसके बारे में पोस्ट किया। इसी तरह लोगों को इसके बारे में पता चला।”

अनिल ने कहा कि उसने माता-पिता को भी कोई बात नहीं बताई थी। उन्हें भी हैकर की हेडलाइन से पता चला। उसके मुताबिक, पिता का बैकग्राउंड टेक का है, इसलिए उन्हें सब समझ आ गया और उन्हें काफी गर्व हुआ।

अनिल को क्या पता चला?

अनिल ने दो अलग-अलग तरह की कमियाँ पाई। JEE एडवांस्ड 2026 के मामले में समस्या पब्लिकली एक्सेस किए जा सकने वाले क्लाउड स्टोरेज के गलत कॉन्फ़िगरेशन की थी। बिना किसी ऑथेंटिकेशन के, बड़ी संख्या में उम्मीदवारों का डेटा ओपन था। इसमें 179600 रिजल्ट रिकॉर्ड और 187300 एडमिट-कार्ड PDF शामिल थे, जिनमें उम्मीदवारों के नाम, जन्म तिथि और मोबाइल नंबर मौजूद थे।

अनिल ने बताया, ” उन्होंने सभी रिजल्ट और एडमिट कार्ड एक ही सर्वर पर स्टोर किए थे, और उस सर्वर के सेटअप में ही गड़बड़ी थी। उसी गड़बड़ी का फायदा उठाकर वह सारा डेटा एक्सेस और हासिल कर पाया।”

NEET सिस्टम में एक अलग की समस्या थी। इसके सुपर-एडमिन पोर्टल पर बहुत कमजोर क्रेडेंशियल (लॉगिन जानकारी) का इस्तेमाल किया गया था। अनिल के मुताबिक, इन कमियों का फायदा उठाकर वह न सिर्फ छात्रों की गोपनीय जानकारी देख सकता था, बल्कि उनके माता-पिता के बारे में जानकारी ले सकता था।

अनिल ने अपनी खोज की जानकारी देते समय काफी सावधानी बरती। उन्होंने सार्वजनिक पोस्ट में निजी जानकारी और तस्वीरों को हटा दिया और बताया कि JEE के किसी भी उम्मीदवार का पूरा डेटा लीक नहीं हुआ था। उन्होंने केवल पुष्टि करने के मकसद से कुछ फाइलें डाउनलोड कीं और बाद में उन्हें डिलीट कर दिया।

CBSE की खामी को भी उजागर किया

अनिल ने न सिर्फ NEET और JEE को कमियों की जानकारी दी, बल्कि सीबीएसई का ऑनमार्क मूल्यांकन पॉर्टल की कमियों की ओर भी ध्यान दिलाया। निसर्गा नाम के एक दूसरे एथिकल हैकर के साथ काम करते हुए, उन्होंने सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली और ऑनमार्क मूल्यांकन पोर्टल में खामी की पहचान की।

ये खामी बोर्ड परीक्षा के प्रश्न पत्रों को जाँचने से जुड़ा है। उन्होंने पाया कि कॉपी चेक करने वाले जाँचकर्ताओं के ईमेल, यूजर्स नाम, पासवर्ड, फोन नंबर, संस्थान विवरण और विषय आवंटन सभी अंदर घुसते ही मिल गए। अपने एक्सेस की वजह से वे इवैल्यूएटर अकाउंट्स तक पहुँच पाए, जहाँ स्कैन की गई आंसर स्क्रिप्ट और लाइव मार्किंग इंटरफेस उपलब्ध थे। उन्होंने इसकी जानकारी तुरंत CERT-In को दी। इसके बाद पोर्टल को ठीक करके ऑफलाइन कर दिया गया।

IITs, NTA ने तुरंत लिया संज्ञान

पोर्टल में कमियाँ उजागर होने के बाद अधिकारियों ने तुरंत प्रतिक्रिया दी, जिसकी अनिल ने तारीफ की। उनका कहना है कि IITs और NTA के आईटी स्टाफ ने अनिल से संपर्क करके उन्हें धन्यवाद दिया, और तकनीकी जानकारी माँगी। उन्होंने खामियों को दुरुस्त करने के लिए कदम उठाए। IIT रुड़की ने X पर सार्वजनिक रूप से इस खामी को स्वीकार किया।

अनिल ने कहा, “अब तक प्रतिक्रिया तारीफ़ करने वाली रही है। वे अब समस्याओं को हल करने की कोशिश कर रहे हैं। मुझे लगता है कि यह महत्वपूर्ण है कि वे बात सुनने के लिए तैयार हैं और समस्याओं को तेजी से हल भी कर रहे हैं।”

इसके बाद कई IITs (इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी) ने X पर आधिकारिक बयान जारी किए, जिनमें कहा गया कि उन्होंने उन उम्मीदवारों की मदद के लिए आपातकालीन तकनीकी सुधार किए जो अपने एडमिट कार्ड तक नहीं पहुँच पा रहे थे। इन सुधारों के कारण क्लाउड स्टोरेज सिस्टम में थोड़ी देर के लिए मामूली मिसकॉन्फिगरेशन हो गया था।

इसकी जानकारी भी अनिल ने ही दी। उन्होंने गलत कॉन्फिगरेशन की पहचान की और बताया कि वे संबंधित डेटाबेस को एक्सेस कर सकते हैं। इस समस्या को तुरंत ठीक कर दिया गया और डेटा तक एक्सेस को सीमित कर दिया गया।

अनिल अकेले ऐसे हैकर नहीं हैं। वह भारत में युवा एथिकल हैकर्स के एक छोटे लेकिन बढ़ते हुए नेटवर्क का हिस्सा हैं, जो देश के एजुकेशन टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर पर बारीक नजर रखे हुए हैं। अनिल का कहना है कि गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन और मेटा जैसी बड़ी कंपनियाँ कमियों का पहले से पता लगाने के लिए एथिकल हैकर्स को काम पर रखती हैं, उसी तरह भारत सरकार को चाहिए कि गलत हैकर्स के वहाँ तक पहुँचने से पहले बड़े प्लेटफॉर्म्स की कमियों को दूर करने के लिए वे एथिकल हैकर्स की मदद लें, ताकि सभी परीक्षाएँ निष्पक्ष और त्रुटिहीन हो सके।

इसमें कोई बदमाश हैकर सेंध लगा कर नुकसान न पहुँचा सके। पेपर लीक जैसी घटनाएँ न हो और रिएक्जाम का दंश छात्रों को न सहना पड़े।

NEET परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के विवाद के बाद NTA ने NEET UG 2026 परीक्षा रद्द की। इसके प्रश्न पत्र बनाने वाले कथित शिक्षकों से पूछताछ हो रही है। कई शहरों के तार इससे जुड़े हैं। ऐसा भी कहा जा रहा है कि 2025 में भी पेपर लीक हुए थे, इसकी जाँच भी की जा रही है। 2024 में पेपर लीक को लेकर काफी हँगामा हुआ था यानी यह एक बार की बात नहीं है। इससे परीक्षा की विश्वसनीयता खतरे में है। अब पोर्टल की ये कमी सामने आई है। एनटीए को ऐसी डिजिटल कमियों से भी जल्द से जल्द निपटना होगा।

अभी तक एनटीए ने क्या-क्या कदम उठाए हैं

NEET UG 2026 के रिएक्जाम को लेकर NTA ने इस बार परीक्षा की सुरक्षा, पारदर्शिता और छात्र-छात्राओं की सुविधाओं को लेकर कई बड़े कदम उठाए हैं। इनमें से अधिकांश कदम पेपर लीक विवाद और छात्रों की शिकायतों के बाद लागू किए गए हैं। 21 जून को होने वाली NEET UG 2026 की परीक्षा अवधि बढ़ाकर 195 मिनट (3 घंटे 15 मिनट) कर दी है। इससे छात्रों को प्रश्न हल करने के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा।

क्वेश्चन पेपर को दोबारा डिजाइन किया गया है ताकि पढ़ने और उत्तर देने में आसानी हो। साथ ही रफ वर्क के लिए अधिक जगह भी दी गई है। फर्जी अभ्यर्थियों और डुप्लीकेट आवेदन रोकने के लिए आवेदन प्रक्रिया में Aadhaar e-KYC और Live Photo Capture अनिवार्य किया गया है। परीक्षा केंद्रों पर कई स्तर की सुरक्षा लागू की है, जिसमें बायोमेट्रिक सत्यापन, कड़ी जाँच, CCTV निगरानी और दूसरे सुरक्षा प्रोटोकॉल शामिल हैं। CCTV फुटेज को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जाएगा।

देशभर में परीक्षा कर्मियों और केंद्र कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया, ताकि किसी भी स्तर पर लापरवाही न हो। सोशल मीडिया पर निगरानी रखी जा रही है। Telegram पर पेपर लीक की खबरों को देखते हुए इसपर अस्थायी प्रतिबंध 22 जून 2026 तक लगाया गया है। इसके अलावा Telegram के मैसेज-एडिटिंग फीचर को 30 जून 2026 तक बंद करने का निर्देश दिया गया है। NTA का कहना है कि पहले इस फीचर का इस्तेमाल कथित पेपर लीक के फर्जी सबूत बनाने और छात्रों को गुमराह करने के लिए किया गया था।

इस सब कवायद के बीच अहमदाबाद में बिहार के एक 19 साल के युवक को गिरफ्तार किया गया है। उस पर NEET पोर्टल पर लगभग 150 NEET उम्मीदवारों के अकाउंट्स को गैर-कानूनी तरीके से एक्सेस करके, उन्हें मिलने वाला रिफंड का पैसा अपने बैंक अकाउंट में ट्रांसफर करने का आरोप है। उसने बताया है कि NEET-UG उम्मीदवारों के अकाउंट्स का अनधिकृत एक्सेस पाने के लिए सिक्योरिटी की कमियों और कमजोर पासवर्ड्स का फायदा उठाया।

अब सरकार और परीक्षा करवाने वाली NTA और IITs को इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। JEE की परीक्षाओं में नकल भी एक बड़ी समस्या माना जा रही है। JEE Advance 2026 के रिजल्ट में छात्रों के दोनों पाली के नंबरों में बड़े अंतर पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

मध्यम वर्ग की उम्मीदें और NEET-JEE का दबाव

ये परीक्षाएँ सिर्फ एक बच्चे के सपनों को उड़ान नहीं देता, बल्कि पूरा परिवार गर्व से सीना ऊँचा कर घूमता है। यही वजह है कि परीक्षा में अच्छा परफॉर्म नहीं करने पर कई छात्र-छात्राएँ डिप्रेशन में भी चले जाते हैं। ऐसी स्थिति भी समाज के लिए ठीक नहीं है। इसलिए छात्रों को विश्वास होना चाहिए कि उनके साथ ‘न्याय’ होगा। ऐसे न्याय के लिए तकनीकी खामियों को ठीक करना बेहद जरूरी है। सार्थक सुझाव और तथ्य आधारित संवाद व्यवस्था में सुधार ला सकते हैं। छात्रों को केवल परीक्षार्थी के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग के रूप में देखा जाना चाहिए।

भारत में NEET-JEE की तैयारी करने वाले अधिकांश छात्र मध्यम वर्गीय या निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों से आते हैं। लाखों परिवार अपने बच्चों के डॉक्टर बनने के सपने को पूरा करने के लिए बचत करते हैं। उससे कोचिंग, स्टडी मटेरियल्स, हॉस्टल, आने-जाने का खर्चा समेत दूसरे खर्चों की तैयारी वर्षों से करते हैं। माता-पिता अपनी निजी जरूरतों की बातें नहीं करते, उन्हें तो बस बच्चों के सपने को उड़ान देनी होती है, वे अपने अहम खर्चों में भी कटौती करने से नहीं हिचकते।

ऐसी परिस्थितियों में छात्रों को बेहतर परीक्षा व्यवस्था, पारदर्शिता और सुरक्षित परीक्षा केंद्र, समय पर जानकारी और मानसिक रूप से अनुकूल माहौल मिलना उनका अधिकार है। यदि परीक्षा प्रणाली में कोई कमी या अव्यवस्था होती है, तो उसका सबसे बड़ा बोझ उन्हीं छात्रों और परिवारों पर पड़ता है जिन्होंने वर्षों तक काफी मेहनत की है।

NEET जैसी परीक्षाओं की विश्वसनीयता केवल प्रश्नपत्र की गोपनीयता से तय नहीं होता, बल्कि छात्रों के अनुभव से तय होते हैं। इसलिए परीक्षा प्रक्रिया में की पारदर्शिता, सुरक्षित और सुविधाजनक परीक्षा केंद्र, शिकायतों का तुरंत समाधान करने की व्यवस्था जरूरी है।

अनिल जैसे छात्रों की कोशिश यह याद दिलाती है कि शिक्षा व्यवस्था तब बेहतर बनती है, जब छात्रों की आवाज को सम्मान दिया जाता है। आखिरकार जिन युवाओं के कंधों पर देश का भविष्य टिका हुआ है, उन्हें निष्पक्ष, पारदर्शी और छात्र-केंद्रित परीक्षा प्रणाली मिलनी ही चाहिए। NTA और IITs ने जिस तरह से अनिल की बातों को गंभीरता से लिया और सकारात्मक जवाब दिया, इससे पता चलता है कि ये संस्थाएँ अपने काम को लेकर बेहद संजीदा हैं और अपनी कमियों को सुनने के लिए भी तैयार हैं।

38 की उम्र में भी समय से आगे चल रहा है एक आदमी, जिसका नाम है- लियोनेल मेसी: FIFA World Cup 2026

कैनसस सिटी की उस रात, लगभग 69 हजार दर्शकों से भरे एरोहेड स्टेडियम में एक विश्व चैंपियन अपना अभियान शुरू करने उतरा था। लेकिन मैच खत्म होने तक चर्चा अर्जेंटीना की जीत की नहीं, उस आदमी की थी, जिसने दो दशकों से फुटबॉल को अपनी निजी कहानी बना रखा है।

16 जून 2026 की रात, जब अर्जेंटीना ने अल्जीरिया को 3-0 से हराया, तब स्कोरबोर्ड पर सिर्फ तीन गोल दर्ज हुए। इतिहास की किताबों में शायद इससे कहीं ज्यादा लिखा जाएगा। क्योंकि यह रात फिर एक बार लियोनेल मेसी (Lionel Messi) की थी।

एक स्टेडियम, जो अर्जेंटीना बन गया

अमेरिका के मिसौरी राज्य में स्थित एरोहेड स्टेडियम उस शाम किसी विदेशी मैदान की तरह नहीं लग रहा था। नीले-सफेद रंग की लहरें स्टैंड्स में इस तरह फैली थीं, मानो ब्यूनस आयर्स का कोई हिस्सा अटलांटिक पार कर यहाँ आ पहुँचा हो।

अल्जीरिया ने गेंद पर 52 प्रतिशत कब्जा रखा। आंकड़ों में देखने पर यह मुकाबला संतुलित लग सकता है। लेकिन फुटबॉल में कुछ आँकड़े झूठ बोलते हैं।

अल्जीरिया के शॉट्स ऑन टार्गेट: शून्य।
अर्जेंटीना के गोल: तीन।
और तीनों पर एक ही हस्ताक्षर: मेसी।

पहला गोल: जब समय पीछे लौट गया

17वें मिनट में रोड्रिगो डी पॉल ने लंबा पास डाला।

मेसी ने गेंद को नियंत्रित किया। तीन स्पर्श। एक नज़र। और फिर बॉक्स के बाहर से बाएँ पैर का ऐसा शॉट, जिसने हवा को चीरते हुए गोलपोस्ट का रास्ता चुना।

गोलकीपर लुका जिदान ने हाथ लगाया, लेकिन सिर्फ इतना कि गेंद की दिशा बदलने के बजाय उसकी सुंदरता बढ़ जाए। उस पल स्टेडियम में बैठे हजारों दर्शकों ने शायद एक साथ सोचा होगा: यह 2026 नहीं, 2012 का मेसी है। या शायद 2015 का।

या शायद वह मेसी, जो किसी कैलेंडर का मोहताज ही नहीं।

दूसरा गोल: महान खिलाड़ी सिर्फ सुंदर गोल नहीं करते

60वें मिनट में एलेक्सिस मैक एलिस्टर का शॉट आया। लुका जिदान ने बचाव किया। लेकिन महान खिलाड़ी वहीं होते हैं, जहाँ गेंद गिरती है।

रिबाउंड सीधे मेसी के पास पहुँचा और उन्होंने बिना किसी नाटक के गेंद को जाल में डाल दिया। यह वह गोल था, जो बताता है कि प्रतिभा सिर्फ कला नहीं, आदत भी होती है.. परफ़ेक्शन भी आदत होती है।

तीसरा गोल: और फिर कहानी पूरी हो गई

76वाँ मिनट। निकोलस गोंजालेज़ ने गेंद पीछे छोड़ी। बॉक्स के किनारे खड़े मेसी ने एक बार देखा और फिर बाएँ पैर से गेंद को डिफेंडरों के बीच से ऐसे निकाला, जैसे सुई धागे के बीच रास्ता बनाती है।

गेंद निचले कोने में गई। गोलकीपर स्थिर। डिफेंडर स्थिर। स्टेडियम विस्फोटित। हैट्रिक पूरी। और शायद फुटबॉल का सबसे पुराना सवाल भी; कि आखिर यह आदमी कब रुकेगा?

जिदान का बेटा और मेसी की कहानी

फुटबॉल कभी-कभी लेखकों से बेहतर पटकथाएँ लिखता है। अल्जीरिया के गोलपोस्ट के सामने खड़े थे Luca Zidane। उनके पिता Zinedine Zidane उस पीढ़ी के नायक थे, जिसने विश्व फुटबॉल पर राज किया। वहीं सामने खड़े थे मेसी।

दो युग एक ही फ्रेम में थे। और अंत में कहानी फिर उसी आदमी के नाम रही, जिसने लगभग हर युग को पार कर लिया है।

सिर्फ हैट्रिक नहीं, इतिहास भी

इस रात की सबसे बड़ी बात सिर्फ तीन गोल नहीं थे। यह मेसी का पहला विश्व कप हैट्रिक था।
यह उनका छठा विश्व कप है: पुरुष फुटबॉल के इतिहास में ऐसा करने वाले पहले खिलाड़ी।

उन्होंने विश्व कप में अपने गोलों की संख्या 16 तक पहुँचा दी और महान जर्मन स्ट्राइकर Miroslav Klose की बराबरी कर ली। 38 वर्ष की उम्र में विश्व कप हैट्रिक करने वाले सबसे उम्रदराज खिलाड़ी भी बन गए।

2006 में विश्व कप में पहला गोल।
2026 में विश्व कप में हैट्रिक।
बीच में 20 साल।
फुटबॉल के अधिकांश करियर शुरू होकर खत्म हो जाते हैं। लेकिन मेसी का अभी भी चल रहा है।

मगर अर्जेंटीना के लिए इसका क्या मतलब?

स्कोरलाइन कहती है कि अर्जेंटीना ने आसान जीत हासिल की। मैदान कहता है कि अर्जेंटीना अभी भी विश्व चैंपियन जैसी दिखती है। एनजो फर्नांडीज़, मैक एलिस्टर और डी पॉल के मिडफील्ड ने खेल को नियंत्रित रखा। अल्जीरिया ने बहादुरी दिखाई, लेकिन महरेज की टीम कोई वास्तविक खतरा पैदा नहीं कर सकी। और जब आपके पास मेसी जैसा खिलाड़ी हो, तो अकसर इतना ही काफी होता है।

आखिरी दृश्य

80वें मिनट में मेसी को मैदान से बाहर बुलाया गया। पूरा स्टेडियम खड़ा हो गया। तालियाँ गूँजती रहीं। कुछ खिलाड़ी करियर बनाते हैं। कुछ ट्रॉफियाँ जीतते हैं। कुछ रिकॉर्ड तोड़ते हैं।

और फिर कुछ दुर्लभ लोग होते हैं, जिनके लिए स्टेडियम खड़ा हो जाता है, क्योंकि दर्शकों को एहसास होता है कि वे सिर्फ मैच नहीं देख रहे। वे इतिहास को गुजरते हुए देख रहे हैं। 16 जून 2026 की रात, कैनसस सिटी में, फुटबॉल ने फिर याद दिलाया:

विश्व कप बदलते रहते हैं।
महान टीमें आती-जाती रहती हैं।
लेकिन मेसी की कहानी अभी पूरी नहीं हुई है।

‘AI के दौर में भी मानवीय संवेदनाएँ पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत’: ऑपइंडिया की पूजा राणा को ‘उत्कृष्ट युवा पत्रकार’ का देवऋषि नारद सम्मान, इस साल 12 को मिले पुरस्कार

इंद्रप्रस्थ विश्व संवाद केंद्र की ओर से दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब के स्पीकर हॉल में रविवार (16 जून 2026) को देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाले 12 पत्रकारों और कंटेन्ट क्रिएटर्स को नवाजा गया। इनमें ऑपइंडिया की वरिष्ठ सह संपादक पूजा राणा को ‘उत्कृष्ट युवा पत्रकार’ की श्रेणी में सम्मानित किया गया।

देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान 2026 से सम्मानित हुए पत्रकारों का चयन प्रक्रिया में निर्णायक मंडल में डीडी न्यूज की महानिदेशक ममता वर्मा, अमर उजाला समूह के वरिष्ठ सलाहकार संपादक राज किशोर, एनडीटीवी इंडिया के प्रबंध संपादक रोहित विश्वकर्मा, नेटवर्क 18 के समूह संपादक (कन्वर्जेंस) ब्रजेश कुमार सिंह, आईटीवी नेटवर्क की मैनेजिंग डायरेक्टर ऐश्वर्या पंडित और ब्लू क्राफ्ट फाउंडेशन के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट हरीश चंद्र बर्णवाल शामिल रहे। जूरी ने सभी प्रविष्टियों का मूल्यांकन करने के बाद 12 श्रेणियों के विजेताओं का चयन किया।

इन पत्रकारों को मिला सम्मान:

  • ऑपइंडिया की वरिष्ठ सह संपादक पूजा राणा को उत्कृष्ट युवा पत्रकार
  • नो द नेशन की संपादक गरिमा उप्रेती को उत्कृष्ट स्त्री सरोकार/महिला संवेदना पत्रकारिता
  • किसान तक की हिमानी दीवान को उत्कृष्ट ग्रामीण/पर्यावरण पत्रकारिता
  • द पेम्फलेट के प्रभात रंजन मिश्रा को उत्कृष्ट साहसिक पत्रकार
  • प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे को उत्कृष्ट डिजिटल पत्रकार
  • दैनिक जागरण के निहाल सिंह को उत्कृष्ट पत्रकार (प्रिंट)
  • पीटीआई वीडियो के डॉ. राम किंकर सिंह को उत्कृष्ट पत्रकार (टीवी)
  • शाश्वत पाणिग्राही को उत्कृष्ट स्तंभकार
  • हिंदुस्तान समाचार के संपादक रामानुज शर्मा को उत्कृष्ट अभिनव पत्रकार
  • पब्लिक मित्र के विमल त्यागी को उत्कृष्ट कंटेन्ट क्रिएटर (यूट्यूब)
  • मयंक बालियान को उत्कृष्ट कंटेन्ट क्रिएटर (एक्स)
  • मनोज्ञा तिवारी को उत्कृष्ट कंटेन्ट क्रिएटर (इंस्टाग्राम)

इस समारोह में एनडीटीवी के सीईओ और एडिटर-इन-चीफ राहुल कंवल मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे। अपने संबोधन में राहुल कंवल ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में भी पत्रकारिता की मूल भावना को कोई तकनीक प्रतिस्थापित नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि देवऋषि नारद की तरह पत्रकारों को लोगों के बीच जाकर उनकी बात सुननी चाहिए और घटनाओं के संदर्भ को समझना चाहिए। यही मानवीय संवेदनाएँ पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत हैं।

साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने मुख्य वक्ता के तौर पर कार्यक्रम को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि पत्रकारों का दायित्व समाज की सच्चाई को सामने लाना है ताकि सकारात्मक और जागरूक समाज का निर्माण हो सके। उन्होंने पत्रकारों से अपील की कि वे हर समस्या को केवल राजनीतिक नजरिए से न देखें और खबरों के माध्यम से राष्ट्रीय हितों तथा मानवता के मूल्यों को मजबूत करने का प्रयास करें।

इसके अलावा संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर, दिल्ली प्रांत प्रचारक विशाल और दिल्ली प्रांत सह कार्यवाह राजेश कुमार भी कार्यक्रम में उपस्थित रहे।

PM सूर्य घर योजना में लखनऊ बना देश का नंबर-1 सोलर जिला, नागपुर-सूरत को पछाड़ा: समझें कई श्रेणियों में शीर्ष स्थान पाकर कैसे UP ने बनाया ऐतिहासिक कीर्तिमान

उत्तर प्रदेश ने सौर ऊर्जा (Solar Energy) के क्षेत्र में एक ऐसी ऐतिहासिक छलांग लगाई है, जिसने पूरे देश को हैरान कर दिया है। नई दिल्ली में आयोजित पीएम सूर्य घर पुरस्कार समारोह में उत्तर प्रदेश ने विभिन्न श्रेणियों में शीर्ष स्थान हासिल कर अपना परचम लहराया है। इस गौरवशाली उपलब्धि ने यह साबित कर दिया है कि उत्तर प्रदेश अब सिर्फ आबादी में ही नहीं, बल्कि क्लीन और ग्रीन एनर्जी के मामले में भी देश का अगुआ बन चुका है।

लखनऊ ने नागपुर और सूरत को पछाड़ा

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर राज्य की राजधानी लखनऊ से आई है। जिला स्तर पर सोलर इंस्टॉलेशन (Solar Installation) के मामले में लखनऊ ने पूरे देश में पहला स्थान प्राप्त किया है। कभी देश की सोलर कैपिटल कहे जाने वाले गुजरात के सूरत और महाराष्ट्र के नागपुर जैसे बड़े औद्योगिक शहरों को पीछे छोड़ते हुए लखनऊ देश का नंबर वन सोलर डिस्ट्रिक्ट बन गया है।

आधिकारिक पोर्टल के ताजे आँकड़ों के मुताबिक, लखनऊ में कुल 1,52,041 आवेदन आए, जिनमें से रिकॉर्ड 1,07,755 सोलर इंस्टॉलेशन पूरे किए जा चुके हैं। इस शानदार काम की बदौलत लखनऊ में 381.87 MW की भारी-भरकम सोलर क्षमता स्थापित हुई है, और जनता को 72,794.87 लाख रुपए की सब्सिडी जारी की जा चुकी है।

इस रेस में दूसरे नंबर पर रहे नागपुर में 92,483 इंस्टॉलेशन हुए, जबकि तीसरे पायदान पर खिसके गुजरात के सूरत शहर में 1,26,491 आवेदनों में से 87,748 घरों पर ही सोलर पैनल लग पाए, जिसकी क्षमता 334.93 MW दर्ज की गई है।

विभिन्न श्रेणियों में उत्तर प्रदेश ने मारी बाजी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी ‘पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना’ के तहत उत्तर प्रदेश ने राष्ट्रीय स्तर पर कई बड़े पुरस्कार अपने नाम किए हैं। राज्यवार वेरी हाई कंज्यूमर बेस (Very High Consumer Base) श्रेणी में उत्तर प्रदेश को देश भर में पहला स्थान मिला है। इसके साथ ही सर्वाधिक उपभोक्ता आवेदन (Maximum Consumer Applications), सबसे ज्यादा सोलर इंस्टॉलेशन और अधिकतम वेंडर रजिस्ट्रेशन (Maximum Vendor Registration) जैसी बेहद महत्वपूर्ण श्रेणियों में भी यूपी ने देश के सभी राज्यों को पछाड़कर पहला पायदान कब्जाया है। बता दें कि यूपी सरकार बुंदेलखंड को सोलर एनर्जी का हब बना रही है, जिससे पूरे बुंदेलखंड की खाली पड़ी जमीनों का अच्छा इस्तेमाल भी हो रहा है।

हालाँकि अगर कुल राज्यवार इंस्टॉलेशन की बात करें, तो उत्तर प्रदेश ने ‘टॉप थ्री स्टेट इंस्टॉलेशन’ श्रेणी में देश में तीसरा स्थान हासिल किया है, जबकि इस सूची में गुजरात पहले नंबर पर बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की यह कामयाबी राज्य के शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में सौर ऊर्जा के प्रति लोगों की तेजी से बढ़ती जागरूकता और सरकारी तंत्र के प्रभावी क्रियान्वयन का जीता-जागता सबूत है।

पीएम और सीएम की जोड़ी के विजन से हुआ यह चमत्कार

उत्तर प्रदेश के ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा ने इस शानदार कामयाबी पर बेहद खुशी जताई और इसका पूरा श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कुशल नेतृत्व को दिया। उन्होंने कहा कि यह ऐतिहासिक मुकाम उत्तर प्रदेश के निवासियों, ऊर्जा विभाग के अधिकारियों, बिजली कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों के सामूहिक और दिन-रात के कठिन परिश्रम का परिणाम है।

ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा ने कहा, “उत्तर प्रदेश आज देश के भीतर सौर ऊर्जा क्रांति का सबसे बड़ा अग्रदूत बनकर उभरा है। सौर ऊर्जा न सिर्फ हमारे राज्य के आम नागरिकों को प्रदूषण मुक्त और बेहद सस्ती बिजली उपलब्ध करा रही है, बल्कि यह ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक बहुत बड़ा कदम है। राज्य सरकार भविष्य में भी सौर ऊर्जा को हर घर तक पहुँचाने के लिए अपनी योजनाओं को और तेज करेगी।”

उत्तर प्रदेश और गुजरात के कुछ अन्य जिलों का तुलनात्मक प्रदर्शन

अगर हम दोनों राज्यों के कुछ अन्य प्रमुख जिलों के प्रदर्शन पर नजर डालें, तो स्थिति बेहद दिलचस्प नजर आती है-

गुजरात का प्रदर्शन: सूरत के अलावा राजकोट में 1,00,920 आवेदन आए और 76,444 इंस्टॉलेशन किए गए। वहीं पाटन में 13,605, साबरकांठा में 22,338 और सुरेंद्रनगर में 16,310 घरों को सौर ऊर्जा से कवर किया गया है।

पीएम सूर्य योजना के ताजा आधिकारिक आँकड़े

उत्तर प्रदेश का प्रदर्शन: लखनऊ के अलावा राज्य के अन्य जिलों में भी काम तेजी से चल रहा है। मथुरा में 6,321, खीरी में 6,990, ललितपुर में 3,872, मैनपुरी में 2,636 और महाराजगंज में 2,762 इंस्टॉलेशन पूरे किए जा चुके हैं।

पीएम सूर्य योजना के ताजा आधिकारिक आँकड़े

क्यों गेमचेंजर साबित हो रही है यह योजना?

‘पीएम सूर्य घर योजना’ उत्तर प्रदेश के आम परिवारों के लिए एक वरदान साबित हो रही है। इस योजना के तहत घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाने के लिए सरकार की तरफ से भारी सब्सिडी दी जा रही है। इससे न सिर्फ आम आदमी का बिजली बिल शून्य (जीरो) हो रहा है, बल्कि लोग अपनी जरूरत से ज्यादा पैदा होने वाली बिजली को वापस ग्रिड को बेचकर हर महीने कमाई भी कर रहे हैं। लखनऊ के नंबर वन बनने की सबसे बड़ी वजह यही है कि यहाँ के लोगों ने इस आर्थिक और पर्यावरणीय फायदे को बहुत जल्दी अपनाया और सरकारी विभागों ने भी वेंडर रजिस्ट्रेशन को आसान बनाकर काम में जरा भी ढील नहीं दी।

अमेरिका-ईरान शांति समझौते से भारत को फायदा ही फायदा, कच्चे तेल की कम कीमतों से मिलेगी महँगाई से राहत-मजबूत होगा रुपया: समझें विकास की पटरी पर कैसे बढ़ेगी इकोनॉमी की रफ्तार

अमेरिका और ईरान के बीच हुआ ऐतिहासिक शांति समझौता (US–Iran Preliminary Peace Accord) न केवल मध्य पूर्व (West Asia) के लिए, बल्कि पूरी दुनिया और विशेष रूप से भारत के लिए एक बहुत बड़ी राहत लेकर आया है। मार्च 2026 में शुरू हुए इस युद्ध ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया था। ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz – हॉर्मुज जलडमरूमध्य) को बंद किए जाने से कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें आसमान छूने लगी थीं, जिससे भारत में महँगाई और आर्थिक मंदी का खतरा मंडराने लगा था।

अब इस शांति समझौते के बाद भारत के नीति-निर्माताओं और आम जनता ने राहत की सांस ली है। आइए बहुत ही सरल शब्दों में गहराई से समझते हैं कि इस ऐतिहासिक पीस डील का भारत की अर्थव्यवस्था, कूटनीति और आम आदमी की जेब पर क्या असर पड़ेगा।

कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट से आम जनता को सबसे बड़ी राहत

भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% से 88% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। जब मार्च में युद्ध शुरू हुआ, तो ब्रेंट क्रूड (कच्चा तेल) की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार चली गई थीं। लेकिन जैसे ही 15 जून 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा शांति समझौते की घोषणा की गई, तेल बाजारों में नरमी आ गई।

पेट्रोल-डीजल के दाम होंगे कम: इस डील के बाद कच्चे तेल के दाम तेजी से गिरकर $75-$80 प्रति बैरल के दायरे में आने की उम्मीद है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होगा, तो भारत में भी पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बड़ी कटौती देखने को मिलेगी।

महँगाई (Inflation) पर लगेगी लगाम: भारत में माल ढुलाई (Transport) पूरी तरह डीजल पर निर्भर है। तेल सस्ता होने से ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट कम होगी, जिससे फल, सब्जियाँ, राशन और रोजमर्रा के सामानों की कीमतें नीचे आएँगी।

कंपनियों की चाँदी: विमानन कंपनियाँ (जैसे इंडिगो), पेंट उद्योग, टायर निर्माता और केमिकल कंपनियों की लागत बहुत कम हो जाएगी, क्योंकि इन सभी उद्योगों में कच्चे तेल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है।

स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज का खुलने से सप्लाई चेन होगी सुरक्षित

भारत के लिए इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज का दोबारा पूरी तरह से खुलना है। यह समुद्र का एक ऐसा संकरा रास्ता है जहां से दुनिया का 20% और भारत का लगभग आधा कच्चा तेल, एलपीजी (LPG) और एलएनजी (LNG) गुजरता है।

युद्ध के दौरान जब ईरान ने इस रास्ते की नाकेबंदी कर दी थी, तब भारत में घरेलू गैस (LPG) के सिलेंडर महँगे हो गए थे। अब यह रास्ता पूरी तरह सुरक्षित और टोल-फ्री हो गया है। इससे जहाजों को लंबा रास्ता तय नहीं करना पड़ेगा, जिससे शिपिंग का भाड़ा (Freight Cost) और समुद्री बीमा (Insurance Premium) बहुत कम हो जाएगा। इसका सीधा फायदा यह होगा कि भारत में खाद्यान्न, ऊर्जा और अन्य जरूरी सामानों की सप्लाई चेन बिना किसी रुकावट के सुचारू रूप से चलेगी।

भारतीय अर्थव्यवस्था और रुपए को मजबूती

जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत को तेल खरीदने के लिए बहुत ज्यादा अमेरिकी डॉलर चुकाने पड़ते हैं। इससे भारत का व्यापार घाटा (Trade Deficit) बढ़ जाता है और डॉलर की माँग बढ़ने के कारण भारतीय रुपया कमजोर होने लगता है।

अर्थशास्त्र का सीधा गणित कहता है कि कच्चे तेल की कीमत में हर $10 की गिरावट से भारत के आयात बिल में सालाना लगभग 1.5 से 2 लाख करोड़ रुपये की बचत होती है।

इस पीस डील से डॉलर की माँग घटेगी, जिससे भारतीय रुपया मजबूत होगा। शांति समझौते की खबर आते ही रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत होकर 94.67 के स्तर पर आ गया और आने वाले दिनों में इसके और मजबूत होने की उम्मीद है।

शेयर बाजार में बूम और ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद

युद्ध की अनिश्चितता के कारण भारतीय शेयर बाजार (Sensex और Nifty) पर जो दबाव बना हुआ था, वह अब पूरी तरह खत्म हो गया है। डील की पुष्टि होते ही भारतीय बाजारों ने शानदार बढ़त के साथ वापसी की है।

इसके अलावा, महँगाई कम होने से भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए ब्याज दरों में कटौती (Rate Cuts) करने का रास्ता साफ हो गया है। ऐसी उम्मीद है कि साल 2026 की दूसरी छमाही में आरबीआई ब्याज दरें घटा सकता है। ब्याज दरें घटने से आम आदमी के लिए होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ईएमआई (EMI) सस्ती हो जाएगी।

भारत को होने वाले 5 बड़े कूटनीतिक और आर्थिक फायदे

इस शांति समझौते से भारत को न केवल आर्थिक बल्कि रणनीतिक मोर्चे पर भी कई बड़े फायदे होने जा रहे हैं-

चाबहार बंदरगाह (Chabahar Port) को मिलेगी नई जिंदगी: भारत ने मध्य एशिया और यूरोप तक पहुँचने के लिए ईरान में चाबहार बंदरगाह को विकसित किया है। अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से यह प्रोजेक्ट कई बार सुस्त पड़ जाता था। अब अमेरिका और ईरान के बीच रिश्ते सामान्य होने से भारत बिना किसी हिचकिचाहट के चाबहार बंदरगाह के जरिए अफगानिस्तान और रूस तक अपना व्यापारिक नेटवर्क (INSTC – उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा) मजबूत कर सकेगा।

किसानों के लिए सस्ती खाद: भारत अपनी कृषि के लिए खाड़ी देशों (Gulf Countries) से भारी मात्रा में उर्वरक और उसके कच्चे माल का आयात करता है। युद्ध के कारण खाद की सप्लाई प्रभावित हो रही थी, जिससे भारत में खेती की लागत बढ़ने का डर था। अब रास्ते साफ होने से खाद का आयात सस्ता और आसान होगा, जिससे सीधे तौर पर भारत के करोड़ों किसानों को फायदा पहुँचेगा।

खाड़ी में रहने वाले 1 करोड़ भारतीयों की सुरक्षा: मध्य पूर्व या खाड़ी देशों में भारत के लगभग 1 करोड़ से अधिक नागरिक रहते हैं और काम करते हैं। वहाँ से आने वाला रेमिटेंस (विदेशी मुद्रा) भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। युद्ध छिड़ने से इन प्रवासियों की सुरक्षा और नौकरियों पर खतरा मंडराने लगा था। इस समझौते से वहाँ शांति बहाल होगी, जिससे भारतीय प्रवासियों का रोजगार और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी।

द्विपक्षीय व्यापार और निर्यात में सुधार: युद्ध की वजह से मार्च और अप्रैल के महीनों में खाड़ी देशों को होने वाले भारत के निर्यात में भारी गिरावट आई थी। भारत के इंजीनियरिंग सामान, कपड़ा (Textiles), रसायन और बासमती चावल का एक बड़ा बाजार मिडिल ईस्ट है। शांति स्थापित होने से भारतीय निर्यातकों के ऑर्डर फिर से बहाल होंगे और भारत का एक्सपोर्ट बिजनेस तेजी से बढ़ेगा।

कूटनीतिक संतुलन बनाने में मिली बड़ी कामयाबी

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती कूटनीतिक स्तर पर थी। भारत के अमेरिका और ईरान, दोनों के साथ बेहद मजबूत संबंध हैं। युद्ध की स्थिति में भारत पर अमेरिका की तरफ से ईरान के खिलाफ जाने और रूस से तेल न खरीदने का भारी दबाव था। इस समझौते ने भारत को उस सैंडविच’ स्थिति से बाहर निकाल लिया है। अब भारत बिना किसी वैश्विक दबाव के अपनी मर्जी से ईरान, रूस और अमेरिका के साथ संतुलित रणनीतिक साझेदारी बढ़ा सकता है।

कुल मिलाकर अमेरिका-ईरान शांति समझौता भारत के लिए हर मोर्चे पर एक ‘मास्टरस्ट्रोक’ साबित होने जा रहा है। इससे न केवल भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बचेगा, बल्कि घरेलू बाजार में महँगाई कम होगी, शेयर बाजार को नई ऊँचाई मिलेगी और आम आदमी की जेब पर पड़ रहा बोझ भी काफी कम हो जाएगा। विकसित भारत के लक्ष्य की ओर बढ़ रहे देश के लिए साल 2026 की यह सबसे सकारात्मक वैश्विक खबर है।

‘ऐसा तो हर जगह होता है’ से ‘कॉम्प्रोमाइज करना होगा’ तक: कैसे सामान्य बनाया जाता रहा कास्टिंग काउच का मुद्दा? संचिता उगले की मौत के बाद फिर उठे सवाल

मनोरंजन की दुनिया हर दिन लाखों लोगों को सपने बेचती है। टीवी स्क्रीन पर दिखते चेहरे, रेड कार्पेट, सोशल मीडिया की चमक, इंटरव्यू, फैन फॉलोइंग और सफलता की कहानियाँ, ये सब मिलकर एक ऐसी दुनिया की तस्वीर बनाते हैं जहाँ पहुँच जाना ही मानो जीत माना जाता है। लेकिन हर चमक के पीछे एक ऐसा हिस्सा भी होता है जो कैमरे से बाहर रहता है।

वहाँ संघर्ष है, असुरक्षा है, लगातार तुलना है, और कई बार ऐसी परिस्थितियाँ भी जिनके बारे में लोग खुलकर बात नहीं करना चाहते। हाल में अभिनेत्री संचिता उगले की मौत की खबर सामने आने के बाद एक बार फिर मनोरंजन उद्योग के भीतर के दबावों पर चर्चा शुरू हुई।

इस घटना के बाद अभिनेत्री आँचल खुराना ने जो कहा, उसने बहस को एक ऐसे विषय की तरफ मोड़ दिया जो वर्षों से मौजूद है, मगर हर बार नई घटना के साथ फिर लौट आता है।

आँचल ने अपने वीडियो में कहा कि लोग सिर्फ पर्दे पर दिखने वाली मुस्कान देखते हैं, लेकिन कलाकारों के हिस्से का डर, लगातार रिजेक्शन, काम खोने की चिंता और पेशेवर दबाव नहीं देखते। उन्होंने यह भी कहा कि कई बार कलाकारों को ऐसे फैसलों के सामने खड़ा कर दिया जाता है जहाँ आत्मसम्मान और अवसर एक-दूसरे के सामने खड़े दिखाई देते हैं।

यहीं से चर्चा फिर उस शब्द तक पहुँचती है, जो दशकों से फिल्म और टीवी इंडस्ट्री के साथ जुड़ता रहा है- कास्टिंग काउच। एक ऐसा शब्द, जो सिर्फ फिल्मी गॉसिप नहीं बल्कि उन अनुभवों, आरोपों और बहसों का हिस्सा बन गया, जिनमें काम, पहचान और व्यक्तिगत सीमाओं के बीच की रेखाएँ धुंधली होने लगती हैं।

एक शब्द जिसने पर्दे के पीछे की दुनिया को नाम दिया

‘कास्टिंग काउच’ ऐसे बर्ताव को माना जाता है, जिसमें किसी को काम दिलाने के बदले उससे यौन संबंध बनाने की माँग की जाती है। आज कास्टिंग काउच शब्द बहुत सामान्य लगता है, लेकिन इसकी कहानी पुरानी है। इस शब्द का शुरुआती दर्ज इस्तेमाल 24 नवंबर 1937 को अमेरिकी मनोरंजन पत्रिका Variety में माना जाता है।

उस समय इसे ऐसे संदर्भ में इस्तेमाल किया गया था जिससे संकेत मिलता था कि मनोरंजन उद्योग में काम के बदले निजी या यौन अपेक्षाएँ कोई अनजानी बात नहीं थीं।

इसके बाद 1956 में ब्रिटिश फिल्म मैगजीन Picturegoer ने चार हिस्सों की एक चर्चित रिपोर्ट प्रकाशित की- ‘The Perils of Show Business’। इसमें कई अभिनेत्रियों ने अपने अनुभव साझा किए और बताया कि कैसे करियर में तरक्की या एक मौके के लिए भी उन्हें डायरेक्टर और प्रोड्यूसर से यौन संबंध बनाने का वादा करना पड़ता था

Picturegoer पत्रिका ने 14 जुलाई, 1956 के अंक के कवर पेज पर फिल्म उद्योग की कास्टिंग काउच के बारे में अपनी चार-भाग वाली श्रृंखला की घोषणा की (फोटो साभार: slate)

जब चुप्पियाँ टूटनी शुरू हुईं

भारत में लंबे समय तक कास्टिंग काउच को फिल्मी अफवाह या इंडस्ट्री की खुली हुई सच्चाई की तरह देखा जाता रहा। 2005 में एक स्टिंग ऑपरेशन के बाद इस विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हुई। बाद के वर्षों में कई कलाकारों ने अपने अनुभव साझा किए।

फिर 2017–18 में हॉलीवुड निर्माता हार्वे वाइंस्टीन विवाद और उसके बाद शुरू हुए #MeToo आंदोलन ने दुनिया भर में माहौल बदल दिया। हॉलीवुड अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने #MeToo को सोशल मीडिया पर व्यापक रूप दिया और इसके बाद हजारों महिलाओं ने अपने अनुभव सार्वजनिक किए।

भारत में भी इस अभियान के दौरान कई महिलाएँ सामने आईं। इसी दौरान अभिनेत्री और फिल्म निर्देशक नीना गुप्ता ने अपनी आत्मकथा ‘सच कहूँ तो’ में भी मनोरंजन जगत की उन परिस्थितियों का जिक्र किया, जिनका सामना महिलाओं को अपने करियर के दौरान करना पड़ सकता है

सभी मामलों में एक समान बात दिखी- पद, पहचान या प्रभाव रखने वाले लोगों पर निजी सीमाएँ पार कर सेक्सुअल फेवर माँगने, कपड़े उतारकर पूरा फिगर दिखाने के आरोप।

किसी ने साथ सोने तो किसी ने ब्रेस्ट दिखाने को किया मजबूर

समय के साथ कई अभिनेत्रियों और कलाकारों ने सार्वजनिक रूप से अपने अनुभव साझा किए। अंकिता लोखंडे ने बताया था, “मेरे साथ बॉम्बे में ही कास्टिंग काउच हुआ था। मैंने साउथ फिल्म के लिए ऑडिशन दिया था। मुझे कॉल आया कि आप साइन करने आ जाओ। मैं बहुत खुश थी, मुझे भी डाउट था कि इतनी आसानी से कैसे हुआ?”

उन्होंने आगे कहा,  “जब मैं साइन करने गई तो मुझे सिर्फ अंदर बुलाया गया और मेरी कॉर्डिनेटर को रुकने को कहा गया। मुझे बोला गया- तुम्हें कॉम्प्रोमाइज करना होगा’ मैं उस समय सिर्फ 19 साल की थी। तभी मेरा हिरोइन बनने वाला फेज चल रहा था। मैंने पूछा कि कौन सा कॉम्प्रोमाइज करना होगा। तो उन्होंने कहा कि आपको प्रोड्यूसर के साथ सोना पड़ेगा।”

इसी तरह सुरवीन चावला ने बताया था कि जब वो टेलीविजन जगत में अपना करियर बनाने की कोशिश कर रही थीं तब भी उन्होंने मुंबई में अपनी पहली फिल्म की मीटिंग के दौरान कास्टिंग काउच को फेस किया था। इस घटना के बाद उन्हें खुद पर डाउट हो गया था। उनसे उनकी अपीयरेंस, वजन, कमर, छाती के साइज पर प्रश्न किए गए थे।

आराधना शर्मा ने बताया था कि कास्टिंग एजेंटों में से एक ने उनके साथ गंदी हरकत की। इस घटना ने उनको जिंदगी भर के लिए इतना डरा दिया कि उनको किसी पर भी विश्वास नहीं होता था। यहाँ तक कि वो अपने पिता के साथ भी अनकंफर्टेबल हो गई थीं।

मुस्कान वार्ष्णेय ने बताया कि जब वह 16 साल की थी तब उन्होंने ऑनलाइन इंटरव्यू दिया, जिसमें उन्हें साड़ी पहनने के लिए बोला गया। और फिर ऑडिशन में उन्हें अचानक ब्लाउज उतारने को कहा गया। तब मुस्कान ने कहा कि वह सहज नहीं हैं। मुस्कान ने बताया कि एक ही व्यक्ति ने उन्हें बार-बार ऐसा करने को कहा।

सोनल वांगुलकर ने बताया था, साल 2018 में मुझे राजा बजाज के ऑफिस में एक रोल के लिए ऑडिशन के लिए बुलाया गया। राजा एक फेमस डायरेक्टर और फोटोग्राफर हैं। उस वक्त मैंने ऑडिशन दिया लेकिन पूरी तरह से तैयार न होने की वजह से मैं ठीक से डॉयलॉग बोल नहीं पाई। इसके बाद उन्होंने मुझे शूट में सहायता की ताकि मैं कुछ सीख पाऊँ।”

सोनल बताती हैं कि उन्हें पहले उस शूट का हिस्सा बनाया गया जिसकी वो हिस्सा नहीं थीं। बाद में उनसे कुछ कपड़े ट्राई करने को कहे गए। इस दौरान जबरन उनकी ब्रेस्ट पर क्रीम लगाई गई। उन्हें ये अजीब लगा और मन में डर बैठ गया। इसके बाद राजा ने उनके साथ भी घटिया हरकतें की।

उन्होंने कहा, “उसने मुझे कहा कि ये तंत्र विद्या मुझे उसके साथ बिना कपड़ों के करनी होगी। पूरी तरह से नग्न होकर मंत्र जाप करना होगा। मैं कुछ समझ पाती उससे पहले वो मेरी टीशर्ट उतारने लगा, लेकिन तब मैंने उसे धक्का देकर खुद को बचाया और वहाँ से भागने में कामयाब रही।”

शिव्या पठानिया ने कहा कि उनसे काम के बदले सेक्सुअल फेवर्स माँगे गए थे। इसी तरह मनीषा रानी ने बताया कि एक व्यक्ति ने खुद को बड़े शो से जुड़ा बताकर रात को उसके घर आने का दबाव बनाया। कनिष्का सोनी, प्रीती सूद और शालिनी पांडे जैसे कई नाम भी समय-समय पर अपने अनुभव साझा करते रहे हैं।

जब समझौते को सामान्य बताने वाले सरोज खान जैसे लोगों के बयान सामने आए

कास्टिंग काउच पर चर्चा जितनी पीड़ितों के अनुभवों से बनी, उतनी ही उन बयानों से भी बनी जिन्होंने लोगों को चौंकाया। 2018 में कोरियोग्राफर सरोज खान का बयान सबसे ज्यादा विवाद में आया। उन्होंने कहा था कि कास्टिंग काउच नई बात नहीं है और सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री तक सीमित नहीं है।

कोरियोग्राफर सरोज खान ने सांगली में एक न्यूज चैनल के कार्यक्रम में बॉलीवुड में कास्टिंग काउच होने की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि यह काम नया नहीं है। यह सदियों से चला आ रहा है। फिल्म इंडस्ट्री में दुष्कर्म के बाद लड़कियों को छोड़ नहीं दिया जाता, बल्कि उन्हें काम और रोजी-रोटी भी दी जाती है।

उनके समर्थन में कॉन्ग्रेस नेता रेणुका चौधरी ने कहा था कि ऐसी चीजें सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री नहीं बल्कि कई क्षेत्रों में मौजूद हैं और इसे कड़वी सच्चाई की तरह स्वीकार करना चाहिए।

दक्षिण भारतीय अभिनेता चिरंजीवी के एक बयान पर भी विवाद हुआ। उन्होंने कहा था, “ये एक बहुत अच्छी इंडस्ट्री है। अगर कुछ लोग यहाँ सफल नहीं हो पाए, या कुछ कहते हैं कि इंडस्ट्री में नकारात्मक लोग हैं, या किसी को बुरे अनुभव हुए हैं, तो मेरा मानना है कि इसके लिए कहीं न कहीं उनकी अपनी गलती भी होती है।”

उन्होंने आगे कहा, “अगर आप सख्त और गंभीर रहते हैं, तो कोई भी आपका गलत फायदा नहीं उठा सकता। तब कास्टिंग काउच जैसी कोई चीज नहीं होगी। ये आपके व्यवहार पर निर्भर करता है। आपकी असुरक्षा की वजह से आपको लग सकता है कि शायद ऐसे ही व्यवहार करना चाहिए। अगर आप प्रोफेशनल तरीके से पेश आते हैं, तो सामने वाला भी वैसा ही व्यवहार करेगा। ये इंडस्ट्री एक आईने की तरह है- आप जैसा दिखाते हैं, वही वापस दिखता है।”

कास्टिंग काउच पर राखी सावंत ने भी अजीबो-गरीब बयान दिया था। राखी ने अपने फिल्म इंड्रस्टी के शुरुआती दिनों के अनुभवों को साझा करते हुए कहा था, “मैंने भी कास्टिंग काउच का सामना कर के आगे बढ़ी हूँ। राखी सावंत ने कहा है कि बॉलीवुड में कास्टिंग काउच होता है, लेकिन यहाँ यह पूरी तरह इच्छा पर निर्भर है और कोई किसी का बलात्कार नहीं करता।”

राखी ने कहा कि उनकी पहचान की कई लड़कियों ने काम के लिए खुद को प्रोड्यूसर के आगे सौंप दिया, तो इसके लिए प्रोड्यूसर पर इलजाम नहीं लगाया जा सकता। इन बयानों ने एक बड़ा सवाल पैदा किया कि अगर किसी समस्या को ‘ऐसा तो हर जगह होता है’ कहकर सामान्य बना दिया जाए, तो क्या उससे समस्या कम होती है या उसकी गंभीरता हल्की पड़ जाती है?

यह कहानी सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं रही

कास्टिंग काउच की चर्चा अक्सर महिलाओं के संदर्भ में होती है, लेकिन कई पुरुष कलाकारों ने भी ऐसे अनुभव साझा किए हैं। टीवी अभिनेता अंकित सिवाच ने बताया कि वह भी कास्टिंग काउच का सामना कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि उनसे न्यूड फोटोज माँगे गए थे।

अंकित ने आगे बताया, “मुझसे ऐसी पार्टियों में आने के लिए कहा जाता था, जिसमें ​मेरा कोई काम ही नहीं होता था। यह एक तरह से प्रताड़ना थी, क्योंकि मैं इसके लिए तैयार नहीं था।”

इसके अलावा हैदराबाद के मॉडल कृष्णा मोनाला ने कास्टिंग काउच के बारे में बयान दिया था कि कुछ निर्देशकों ने उन्हें अपने साथ सोने के लिए कहा। वे अकेले ऐसे एक्टर नहीं, इससे पहले गायक सोनू निगम ने भी एक पत्रकार पर फिजिकल रिलेशन बनाने की कोशिश का आरोप लगाया था।

प्रियंका चोपड़ा ने भी एक बातचीत में कहा था कि पुरुष कलाकार भी कई बार ऐसे दबावों का सामना करते हैं, हालाँकि वे कम बोलते हैं। इससे एक और परत सामने आती है- शोषण हमेशा एक ही दिशा में नहीं होता, लेकिन शिकायत करने में डर लगभग हर जगह समान दिखता है।

निष्कर्ष: कास्टिंग काउच सिर्फ उस मानसिकता का सवाल है जो शोषण को सामान्य बनाती है

जब प्रभावशाली लोग यह कहते हैं कि ‘ऐसा तो हर जगह होता है’, ‘ये नया नहीं है’, ‘कोई मजबूर नहीं करता’, ‘अगर आप सख्त रहें तो कुछ नहीं होगा’, तब समस्या सिर्फ एक बयान नहीं रह जाती, वह एक मानसिकता बन जाती है। ऐसी मानसिकता शोषण की जिम्मेदारी उस व्यक्ति पर डाल देती है जो पहले से कमजोर स्थिति में है।

कास्टिंग काउच को बढ़ावा सिर्फ वे लोग नहीं देते जो सत्ता या मौके का गलत इस्तेमाल करते हैं, बल्कि वे बयान भी देते हैं जो इस समस्या को सामान्य या व्यक्तिगत चुनाव बताकर उसकी गंभीरता कम कर देते हैं। जब सरोज खान इसे ‘सदियों से चल रही चीज’ बताकर यह कहती हैं कि यह सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री तक सीमित नहीं है, तो सवाल उठता है कि क्या किसी समस्या का पुराना होना उसे स्वीकार करने का कारण बन सकता है।

इसी तरह जब चिरंजीवी यह कहते हैं कि अगर कोई प्रोफेशनल और सख्त रहे तो उसका गलत फायदा नहीं उठाया जा सकता, तो इससे जिम्मेदारी उस व्यक्ति पर चली जाती है जो पहले से अवसर और दबाव के बीच खड़ा है। वहीं राखी सावंत का यह कहना कि यह इच्छा पर निर्भर है और इसके लिए पूरी तरह प्रोड्यूसर को दोष नहीं दिया जा सकता, शक्ति के असंतुलन और करियर के दबाव को नजरअंदाज करता दिखाई देता है।

यही मानसिकता कास्टिंग काउच को खत्म करने के बजाय उसे जगह देती है। क्योंकि जब प्रभावशाली लोग शोषण को मजबूरी, समझौता या सामान्य प्रक्रिया की तरह पेश करते हैं, तब शिकायत करना और भी मुश्किल हो जाता है। किसी भी पेशेवर क्षेत्र में काम का आधार प्रतिभा और योग्यता होनी चाहिए, न कि पावर, दबाव या निजी समझौते।

PM नरेंद्र मोदी के 4399 दिन: यात्रा एक ऐसे जननेता की, जिनके लिए राजनीति है राष्ट्रनिर्माण की साधना, सेवा का दायित्व

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में बुधवार (10 जून 2026) का दिन एक ऐतिहासिक दिवस के रूप में अंकित हो गया है। आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने प्रधानमंत्री पद पर 4,399 लगातार दिन पूर्ण करते हुए भारत के सबसे लंबे समय तक लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री बनने की गौरवपूर्ण उपलब्धि प्राप्त की है। यह केवल एक रिकॉर्ड नहीं, यह भारत की जनता के अटूट विश्वास, लोकतंत्र की शक्ति और राष्ट्रसेवा में समर्पित एक जीवन की तपस्या का प्रतीक है।

भारत जैसे विशाल, विविध और जीवंत लोकतंत्र में जनविश्वास प्राप्त करना अपने आप में बड़ी बात है; लेकिन उस विश्वास को निरंतर बनाए रखना, उसे सेवा, परिश्रम और परिणामों से और मजबूत करते जाना असाधारण नेतृत्व की पहचान है। मोदी जी की यह यात्रा इसी असाधारण नेतृत्व की यात्रा है। यह यात्रा एक ऐसे जननेता की है, जिसने सत्ता को कभी अधिकार नहीं माना, बल्कि सेवा का दायित्व माना; जिसने राजनीति को कभी प्रतिष्ठा का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की साधना बनाया।

बीते वर्षों में भारत ने केवल सरकार बदलते नहीं देखी, भारत ने शासन की सोच बदलते देखी है। पहले योजनाएँ बनती थीं, अब योजनाएँ लोगों के जीवन तक पहुँचती हैं। पहले गरीब व्यवस्था के दरवाजे पर खड़ा रहता था, अब व्यवस्था गरीब के द्वार तक पहुँचती है। पहले विकास कुछ क्षेत्रों और कुछ वर्गों तक सीमित दिखता था, अब विकास का केंद्र अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति है।

मोदी जी के नेतृत्व में गरीब के जीवन में सम्मान आया है। करोड़ों परिवारों को पक्का घर मिला, माताओं-बहनों को धुएँ से मुक्ति मिली, शौचालयों ने गरिमा दी, बिजली ने घरों में उजाला किया, नल से जल ने सुविधा पहुँचाई, बैंक खातों ने गरीब को आर्थिक व्यवस्था से जोड़ा, आयुष्मान भारत ने स्वास्थ्य सुरक्षा का भरोसा दिया और मुफ्त राशन ने कठिन समय में गरीब के चूल्हे को जलाए रखा। यह केवल योजनाएँ नहीं हैं; यह उन परिवारों की आँखों में दिखने वाला विश्वास है, जो पहली बार महसूस कर रहे हैं कि सरकार सचमुच उनके साथ खड़ी है।

मोदी जी ने यह सिखाया है कि विकास तभी सार्थक है, जब वह गरीब के जीवन में परिवर्तन लाए। आँकड़े तभी महत्वपूर्ण हैं, जब वे किसी माँ की चिंता कम करें, किसी किसान को संबल दें, किसी युवा को अवसर दें, किसी बहन को सम्मान दें और किसी गरीब परिवार को भविष्य के प्रति भरोसा दें।

उनसे मैंने यह सीखा है कि नेतृत्व का अर्थ सबसे आगे खड़े होकर श्रेय लेना नहीं, बल्कि सबसे पीछे खड़े व्यक्ति तक परिणाम पहुँचाना है।

मैंने उनसे सीखा है कि संवेदनशीलता राजनीति की कमजोरी नहीं, सुशासन की सबसे बड़ी शक्ति है।

मैंने उनसे सीखा है कि बड़ा निर्णय वही ले सकता है, जिसके मन में गरीब की छोटी-से-छोटी पीड़ा के लिए भी जगह हो।

मैंने उनसे सीखा है कि राष्ट्रसेवा में थकान का कोई स्थान नहीं होता। हर दिन, हर क्षण और हर निर्णय भारत माता के चरणों में समर्पित होना चाहिए।

और सबसे महत्वपूर्ण, मैंने उनसे सीखा है कि राजनीति का सर्वोच्च स्वरूप सत्ता नहीं, साधना है।

आज भारत का गरीब केवल लाभार्थी नहीं, विकास यात्रा का सहभागी है। आज भारत का युवा केवल अवसरों की प्रतीक्षा करने वाला युवा नहीं, बल्कि अवसरों का निर्माण करने वाला युवा है। आज भारत की महिलाएँ केवल योजनाओं की प्राप्तकर्ता नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की अग्रणी शक्ति हैं। आज भारत का किसान केवल अन्नदाता नहीं, आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला है।

मोदी जी के नेतृत्व में भारत ने इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में अभूतपूर्व गति देखी है। नए एक्सप्रेसवे, नए हाइवे, नए एयरपोर्ट, आधुनिक रेलवे स्टेशन, वंदे भारत ट्रेनें, मेट्रो नेटवर्क, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर और सीमावर्ती क्षेत्रों तक मजबूत कनेक्टिविटी इन सबने नए भारत की गति, शक्ति और आकांक्षा को नया आकार दिया है। आज विकास केवल महानगरों तक सीमित नहीं है; छोटे शहर, कस्बे, गाँव और सीमांत क्षेत्र भी राष्ट्र की प्रगति के केंद्र में हैं।

डिजिटल भारत की क्रांति ने भी सामान्य नागरिक के जीवन को बदल दिया है। जनधन, आधार और मोबाइल की शक्ति से पारदर्शी शासन संभव हुआ। DBT ने लाभ को सीधे नागरिकों तक पहुँचाया। UPI ने दुनिया को दिखाया कि भारत केवल तकनीक अपनाने वाला देश नहीं, बल्कि तकनीक को जनकल्याण का माध्यम बनाने वाला देश है। आज छोटे दुकानदार से लेकर बड़े उद्यमी तक, गाँव के युवा से लेकर वैश्विक निवेशक तक, सभी नए भारत की डिजिटल शक्ति को अनुभव कर रहे हैं।

भारत ने आत्मनिर्भरता की दिशा में भी नए आत्मविश्वास के साथ कदम बढ़ाए हैं। रक्षा उत्पादन हो, मैन्युफैक्चरिंग हो, स्टार्टअप्स हों, स्पेस टेक्नोलॉजी हो या सेमीकंडक्टर और इनोवेशन की नई संभावनाएँ, भारत अब केवल बाजार नहीं, निर्माता बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। आज भारत का युवा ‘कर सकता है’ के आत्मविश्वास से भरा है। यही आत्मविश्वास विकसित भारत की सबसे बड़ी पूँजी है।

मोदी जी ने भारत को यह भी सिखाया कि विकास और विरासत साथ-साथ चल सकते हैं। एक ओर देश आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल इनोवेशन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर अपनी संस्कृति, सभ्यता, योग, आध्यात्मिकता और राष्ट्रीय गौरव को भी पूरी दृढ़ता से विश्व के सामने रख रहा है। काशी विश्वनाथ धाम से लेकर अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर तक, केदारनाथ से लेकर महाकाल लोक तक, भारत ने अपनी आत्मा से जुड़कर आधुनिकता की ओर बढ़ना सीखा है।

आज विश्व मंच पर भारत की स्थिति पहले से कहीं अधिक मजबूत, सम्मानित और प्रभावशाली है। भारत अब केवल वैश्विक चर्चाओं का हिस्सा नहीं है, बल्कि कई विषयों पर दिशा देने वाला राष्ट्र है। जलवायु परिवर्तन हो, डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर हो, आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट दृष्टिकोण हो, वैश्विक स्वास्थ्य हो, आपदा के समय मानवीय सहायता हो या ग्लोबल साउथ की आवाज, भारत आज जिम्मेदार, संवेदनशील और आत्मविश्वासी वैश्विक शक्ति के रूप में उभरा है।

G20 की सफल अध्यक्षता ने दुनिया को भारत की संगठन क्षमता, सांस्कृतिक शक्ति और वैश्विक दृष्टि का परिचय दिया। योग आज विश्व की साझी विरासत बन चुका है। भारत की वैक्सीन क्षमता और आपदा के समय सहायता की भावना ने दुनिया को दिखाया कि भारत की शक्ति केवल अपने लिए नहीं, मानवता के लिए है। आज जब दुनिया भारत की ओर देखती है, तो उसे एक ऐसा राष्ट्र दिखाई देता है जो अपनी जड़ों से जुड़ा है, भविष्य के लिए तैयार है और विश्व कल्याण की भावना रखता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में भी भारत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि नया भारत शांति चाहता है, लेकिन अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करता। सीमाओं की मजबूती, सैनिकों के सम्मान, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और आतंकवाद के प्रति शून्य सहनशीलता ने भारत की सुरक्षा नीति को नई दृढ़ता दी है। आज भारत की आवाज में संयम भी है और संकल्प भी।

यह सब केवल नीतियों का परिणाम नहीं है। इसके पीछे वह नेतृत्व है जो दिन-रात काम करता है, जो चुनौतियों से घबराता नहीं, जो आलोचनाओं से विचलित नहीं होता और जो हर निर्णय में भारत के भविष्य को देखता है। मोदी जी के नेतृत्व की सबसे बड़ी प्रेरणा यही है कि वे हर उपलब्धि के बाद भी रुकते नहीं, हर सफलता के बाद भी और बड़े लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं।

4,399 दिन केवल कैलेंडर की गिनती नहीं हैं। ये दिन सेवा के हैं, संघर्ष के हैं, संकल्प के हैं, अनुशासन के हैं, तपस्या के हैं और करोड़ों भारतीयों के विश्वास के हैं। इन दिनों में भारत ने नीतियों का परिवर्तन देखा, व्यवस्थाओं का परिवर्तन देखा, कार्यसंस्कृति का परिवर्तन देखा और सबसे बढ़कर राष्ट्रीय आत्मविश्वास का पुनर्जागरण देखा।

आज इस ऐतिहासिक क्षण पर मन में गर्व भी है, भावुकता भी है और गहरी कृतज्ञता भी।

गर्व इस बात का है कि हम ऐसे भारत के निर्माण के साक्षी हैं, जो अपने सामर्थ्य को पहचान रहा है।

भावुकता इस बात की है कि एक साधारण पृष्ठभूमि से निकला व्यक्ति अपने परिश्रम, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति से करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा बन गया है।

कृतज्ञता इस बात की है कि देश को ऐसा नेतृत्व मिला है, जिसने शासन को सेवा, विकास को जनभागीदारी और राजनीति को राष्ट्रसाधना का माध्यम बनाया है।

आज यह केवल आदरणीय प्रधानमंत्री जी को बधाई देने का अवसर नहीं है। यह हम सबके लिए आत्ममंथन और संकल्प का अवसर है। क्या हम अपने दायित्वों में उतनी ही निष्ठा, उतनी ही विनम्रता और उतने ही परिश्रम से काम कर रहे हैं? क्या हमारे हर निर्णय के केंद्र में अंतिम व्यक्ति है? क्या हमारी हर कोशिश राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखती है?

मोदी जी की यात्रा हम सभी को यही प्रेरणा देती है कि सार्वजनिक जीवन में सबसे बड़ा पद नहीं, सबसे बड़ा धर्म सेवा है। सबसे बड़ी शक्ति अधिकार नहीं, कर्तव्य है। और सबसे बड़ी उपलब्धि व्यक्तिगत सफलता नहीं, राष्ट्र के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन है।

आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर हृदय से बधाई और कोटि-कोटि शुभकामनाएं।

ईश्वर से प्रार्थना है कि आपको उत्तम स्वास्थ्य, असीम ऊर्जा और दीर्घायु प्रदान करें। आपके नेतृत्व में भारत विकसित भारत, आत्मनिर्भर भारत और विश्वगुरु भारत के संकल्प को अवश्य साकार करेगा।

यह यात्रा सेवा की है।

यह यात्रा संकल्प की है।

यह यात्रा विश्वास की है।

यह यात्रा भारत के आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की है।

भारत माता की जय।